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Friday, 9 October, 2026
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अमेरिका-चीन की बदलती दोस्ती के बीच भारत की चुनौती, जयशंकर का फोकस घरेलू ताकत बढ़ाने पर

स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी तब मायने रखती है जब भारत के पास उस आज़ादी का इस्तेमाल करने की क्षमता हो जिसका वह दावा करता है.

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रेज़िलिएंस (मुश्किलों से उबरना) शब्द का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय मामलों में अक्सर होता है. लेकिन रणनीतिक रूप से इसका असली मतलब एक कठिन सवाल पर टिका है. जब बाहरी परिस्थितियां बदलती हैं, तो क्या कोई देश अपने हितों को अपनी शर्तों पर आगे बढ़ाता रह सकता है? भारत के लिए रेज़िलिएंस की सिर्फ बात करने से आगे बढ़कर उसे वास्तव में लागू करने का मतलब है कि देश की महत्वाकांक्षा को उसे आगे बढ़ाने की क्षमता के साथ जोड़ा जाए. इसके लिए ऐसी बड़ी रणनीति की जरूरत है, जो देश की अंदरूनी ताकत को बाहरी जुड़ाव से जोड़े और उन मान्यताओं का लगातार फिर से आकलन करे, जिनके आधार पर भारत विदेशों में अपने फैसले लेता है.

यह चुनौती ऐसे अंतरराष्ट्रीय माहौल में और ज्यादा गंभीर है, जहां ताकत कुछ देशों के हाथों में केंद्रित है, एक-दूसरे पर निर्भरता दबाव बनाने का साधन बन सकती है और पुरानी प्रतिबद्धताओं पर फिर से बातचीत हो सकती है. सहयोगी, साझेदार और विरोधी आज भी महत्वपूर्ण श्रेणियां हैं, लेकिन केवल इन नामों से भारत यह नहीं समझ सकता कि किसी रिश्ते से उसे वास्तव में क्या मिलेगा. कोई साझेदार उसकी सुरक्षा मजबूत कर सकता है, लेकिन उसके आर्थिक विकल्प कम कर सकता है. कोई प्रतिस्पर्धी देश उसके विकास के लिए फिर भी महत्वपूर्ण रह सकता है. बड़ी ताकतों के बीच कोई समझौता उन देशों के विकल्पों को बदल सकता है, जिन्हें बातचीत की मेज पर जगह ही नहीं मिली है. भारत की रणनीति को लगातार यह देखना होगा कि इन सभी जुड़ी हुई वास्तविकताओं का उसके हितों और उसके पास मौजूद विकल्पों पर क्या असर पड़ता है.

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने 28 सितंबर को न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी में जो बातें कहीं, वे इस चर्चा की एक अच्छी शुरुआत हो सकती हैं.

उन्होंने पूछा, “हम जोखिम कैसे कम करें? हम अपने विकल्प कैसे बढ़ाएं? नए साझेदार कौन हैं? मौजूदा साझेदारी से हम ज्यादा फायदा कैसे लें?” उन्होंने ऐसी दुनिया का जिक्र किया, जहां अमेरिका और चीन एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं, लेकिन साथ ही दोनों के बीच “एक तरह की बातचीत” भी चल रही है.

रिश्तों में विविधता लाने और मौजूदा साझेदारियों से ज्यादा फायदा लेने पर उनका जोर एक बड़ा रणनीतिक सवाल खड़ा करता है. जब भारत के बाहरी रिश्तों को लेकर उम्मीदें पहले से कम भरोसेमंद होती जा रही हैं, तो भारत अपने फैसले लेने की आजादी को कैसे बढ़ा सकता है? इसका जवाब पाने के लिए सिर्फ मतभेदों को संभालने से आगे बढ़ना होगा और उन राष्ट्रीय ताकतों की नींव को देखना होगा, जो कूटनीतिक फैसलों को असली ताकत देती हैं और उन्हें लंबे समय तक कायम रखने में मदद करती हैं.

ताकत और साझेदारियां

सहयोगी देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं, ठीक उसी तरह जैसे विरोधी देशों ने भी साथ काम करने के कारण खोजे हैं. आज चुनौती इस बात में है कि सुरक्षा की होड़ उन आर्थिक और तकनीकी नेटवर्क में कितनी गहराई तक पहुंच गई है, जो समृद्धि को बनाए रखते हैं. देश ऐसे रिश्तों के अंदर रणनीतिक फायदा पाने की कोशिश करते हैं, जिनसे वे आसानी से अलग नहीं हो सकते. जो निर्भरता विकास में मदद करती है, वही दबाव का कारण भी बन सकती है. इसलिए बड़ी रणनीति बनाते समय यह समझना जरूरी है कि ये फायदे और कमजोरियां समय के साथ एक-दूसरे को कैसे प्रभावित करते हैं. साझा हितों पर सहमति होने का मतलब यह नहीं माना जा सकता कि रिश्ते के अंदर मौजूद अलग-अलग खिंचाव खत्म हो जाएंगे.

भारत के लिए Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता एक लगातार चलने वाली कोशिश है, जिसका मकसद अपने फैसले खुद लेने और उन पर खुद कार्रवाई करने की क्षमता बनाना है. कूटनीतिक फैसला लेने की आजादी का कोई खास मतलब नहीं है, अगर उसे बनाए रखने की कीमत बहुत ज्यादा हो जाए. दबाव का सामना करने, किसी रुख पर टिके रहने या बेहतर समझौता करने के लिए आर्थिक ताकत, तकनीकी क्षमता और ऐसी संस्थाओं की जरूरत होती है, जो महत्वाकांक्षा को काम में बदल सकें. विदेश नीति इन क्षमताओं को मजबूत करने में मदद कर सकती है, लेकिन लंबे समय तक उनकी कमी की भरपाई नहीं कर सकती. बाहरी दुनिया के साथ जुड़कर भारत जो जगह अपने लिए बनाता है, वह आखिरकार देश के अंदर बनाई गई ताकत की नींव पर निर्भर करती है.

सवाल यह है कि बाहरी देशों के साथ जुड़ाव निर्भरता और प्रभाव के बीच संतुलन को कैसे बदलता है. तकनीक और पूंजी तक पहुंच तब रणनीतिक रूप से मूल्यवान होती है, जब उससे ऐसी क्षमताएं बनती हैं जिन्हें भारत खुद बनाए रख सके और इस्तेमाल कर सके. इसलिए किसी साझेदारी की असली कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी शर्तें क्या हैं, भारत उसके फायदों को कितना अपना सकता है और किसी अचानक बदलाव के लिए वह कितना तैयार है.

अमेरिका और चीन के साथ भारत के रिश्ते इस चुनौती को और मुश्किल बनाते हैं. अमेरिका के साथ साझेदारी भारत के विकास के लिए जरूरी क्षमताओं को मजबूत कर सकती है, भले ही मतभेद रणनीतिक तालमेल की परीक्षा लेते रहें. चीन के साथ बातचीत तत्काल तनाव कम कर सकती है, लेकिन इससे दोनों देशों के बीच मौजूद बुनियादी प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं होगी. भारत को दोनों रिश्तों का आकलन इस आधार पर करना होगा कि वे राष्ट्रीय लक्ष्यों में कितना योगदान देते हैं, वे कौन सी सीमाएं पैदा करते हैं और उनकी प्रतिबद्धताएं कितने समय तक टिक सकती हैं.

वॉशिंगटन और बीजिंग के रिश्ते इस अनिश्चितता की एक और परत जोड़ते हैं. दोनों की प्रतिस्पर्धा दूसरे देशों के लिए नए अवसर खोल सकती है, लेकिन साथ ही उन्हें नई कीमतों और दबावों का सामना भी करना पड़ सकता है. कुछ मुद्दों पर सीमित समझौता तनाव कम कर सकता है, लेकिन इससे उन उम्मीदों को झटका लग सकता है जो लगातार टकराव की स्थिति को ध्यान में रखकर बनाई गई थीं. भारत की रणनीति अमेरिका-चीन रिश्तों के किसी तय रास्ते की उम्मीद पर आधारित नहीं हो सकती. उसे अपनी ताकत और लचीलेपन को इतना बढ़ाना होगा कि प्रतिस्पर्धा और समझौते के बदलते माहौल में भी वह अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ा सके.

विविधता लाना इसी बड़े उद्देश्य को पूरा करता है. साझेदारियों की संख्या यह बहुत कम बताती है कि उनसे भारत की फैसले लेने की आजादी कितनी बढ़ती है. उनकी रणनीतिक कीमत इस बात में है कि वे इस्तेमाल किए जा सकने वाले विकल्प पैदा करें, राष्ट्रीय क्षमताओं को मजबूत करें और दूसरे देशों के फैसलों पर निर्भरता से पैदा होने वाली कमजोरी को कम करें. एक बड़ा कूटनीतिक नेटवर्क होने के बावजूद कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्भरता बनी रह सकती है. इसलिए भारत को अपने रिश्तों का आकलन इस आधार पर करना होगा कि वे उसके लिए कौन से विकल्प खोलते हैं और दबाव आने पर वह उन विकल्पों को कितने समय तक बनाए रख सकता है.

स्वायत्तता को वास्तव में काम करने लायक बनाना

इसके लिए यह तय करना भी जरूरी है कि भारत को अपने संसाधन किन क्षेत्रों पर केंद्रित करने चाहिए. बाहरी झटकों से पूरी तरह खुद को अलग रखना न तो किफायती है और न ही भारत की विकास संबंधी महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल है. खुलापन आज भी विकास और राष्ट्रीय ताकत का एक स्रोत है. रणनीतिक चुनौती यह पहचानना है कि ऐसी कौन सी निर्भरताएं हैं जो राष्ट्रीय हितों से जुड़े जरूरी फैसलों को सीमित कर सकती हैं और उनसे निपटने की क्षमता बनाना है. रेज़िलिएंस का मतलब है कि आज कुछ कीमत चुकाकर कल अपने फैसले खुद लेने की आज़ादी बचाए रखी जाए. ऐसी बड़ी रणनीति जो हर फायदा पाने का वादा करे लेकिन इन समझौतों और त्यागों का सामना न करे, वह तब बहुत कम दिशा देती है जब अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच कठिन फैसले लेने पड़ें.

तैयारी की भी एक कीमत होती है. इसलिए रेज़िलिएंस के लिए यह साफ होना जरूरी है कि कौन से हित सबसे ऊपर हैं और कौन से सिर्फ अच्छे या फायदेमंद हैं. हर कमजोरी को दूर करने की कोशिश करने से संसाधन बहुत ज्यादा जगहों पर बंट सकते हैं और भारत की सबसे जरूरी क्षमताएं कमजोर हो सकती हैं. रणनीतिक प्राथमिकताएं तभी मायने रखती हैं जब यह तय किया जाए कि किस चीज के लिए पैसा लगाया जाए, किसे बाद के लिए छोड़ा जाए और कहां ऐसा जोखिम लिया जाए जिसे संभाला जा सकता है.

इन फैसलों के लिए ऐसी संस्थाओं की भी जरूरत है जो राष्ट्रीय ताकत को व्यवस्थित कर सकें और उसका इस्तेमाल कर सकें. बाहरी दुनिया के साथ जुड़ाव, आर्थिक नीति और तकनीकी विकास को एक-दूसरे से जुड़कर काम करना होगा. भारत की कार्रवाई करने की क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि वह विदेशों में हो रहे बदलावों को उनके घरेलू असर से जोड़ सके और कूटनीतिक मौकों को ऐसी क्षमताओं में बदल सके जिन्हें वह लंबे समय तक बनाए रख सके. किसी समझौते का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उसकी घोषणा के बाद वह और क्या करने की क्षमता देता है. इसी तरह तैयारी का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि जब बाहरी झटके राष्ट्रीय लक्ष्यों के लिए खतरा बनें, तो राज्य कितनी जल्दी संसाधनों को जुटा सकता है.

लगातार दोबारा जांच और समीक्षा एक स्थायी उद्देश्य की साफ समझ पर आधारित होनी चाहिए. अगर हर मतभेद के बाद दिशा बदल दी जाए, तो लचीलापन भटकाव में बदल सकता है. भारत को अपने मुख्य हितों को लेकर स्पष्टता और निरंतरता बनाए रखनी होगी, जबकि उन्हें हासिल करने के तरीकों में बदलाव की गुंजाइश रखनी होगी. फिर से दिशा तय करने का मतलब यह देखना है कि कोई बदलाव केवल थोड़े समय का व्यवधान है या रिश्ते में कोई गहरा बदलाव आया है और इसका राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर क्या असर पड़ेगा. रणनीतिक धैर्य और सही समय पर बदलाव, दोनों जरूरी हैं.

संस्थाओं में यह क्षमता और इच्छा भी होनी चाहिए कि वे किसी संकट के जरिए उनकी सीमाएं सामने आने से पहले ही पुरानी और जानी-पहचानी मान्यताओं पर सवाल उठा सकें. क्या साझेदारियां अभी भी वही काम कर रही हैं जिसके लिए उन्हें बनाया गया था? क्या देश के अंदर की क्षमताएं बाहरी प्रतिबद्धताओं के साथ कदम मिला पा रही हैं? ऐसे सवालों को नियमित रूप से रणनीति का हिस्सा होना चाहिए. रणनीति में बदलाव निराशा के बाद अचानक उठाया गया कदम नहीं होना चाहिए, बल्कि सोच-समझकर की जाने वाली प्रक्रिया होनी चाहिए. तैयारी की शुरुआत यह पहचानने से होती है कि कल की मान्यताएं अब भरोसेमंद दिशा नहीं दे रही हैं.

Hobbesian (हॉब्सियन) यानी ज्यादा ताकत और असुरक्षा वाली दुनिया में भरोसेमंद होना एक रणनीतिक ताकत बन जाता है. जैसे-जैसे भरोसा कम होता है और तुरंत होने वाले समझौते ज्यादा महत्वपूर्ण होते जाते हैं, वैसे रिश्ते ज्यादा अहम हो जाते हैं जो स्थिरता और भरोसा देते हैं. भारत के हित में है कि वह ऐसे नियमों और संस्थाओं को बनाए रखने में मदद करे जो मनमानी ताकत को सीमित करें, साथ ही उन संस्थाओं की कमियों से निपटने की क्षमता भी बनाए. भारत की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि उसके काम उसके वादों और प्रतिबद्धताओं से कितने मेल खाते हैं. ग्लोबल साउथ के साथ सहयोग इस उद्देश्य को आगे बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे देशों को बाहरी दबाव झेलने और अपने फैसले खुद लेने की ज्यादा क्षमता मिल सकती है.

रेज़िलिएंस को वास्तव में लागू करने की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि भारत अपनी महत्वाकांक्षाओं, अपनी क्षमताओं और अपने बाहरी रिश्तों को कितनी अच्छी तरह जोड़ पाता है. क्या भारत अपने मुख्य हितों से समझौता किए बिना किसी झटके को झेल सकता है, दिशा खोए बिना अपनी पुरानी मान्यताओं को बदल सकता है और जब दूसरे देश अपना रास्ता बदलें तब भी अपने पास महत्वपूर्ण विकल्प बनाए रख सकता है? बड़ी रणनीति का असली सवाल यह है कि दुनिया के साथ भारत का बढ़ता जुड़ाव उसकी उस क्षमता को मजबूत कर रहा है या नहीं, जिसके जरिए वह उन परिस्थितियों को प्रभावित कर सके जिनमें उसे काम करना है. Strategic Autonomy यानी रणनीतिक स्वायत्तता तब असली अर्थ हासिल करती है, जब भारत के पास उस स्वतंत्रता का इस्तेमाल करने की क्षमता हो, जिसका वह दावा करता है.

मोनीष तौरंगबाम चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF), नई दिल्ली में फेलो हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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