नई दिल्ली: एक विरोध प्रदर्शन, ‘भारत छोड़ने’ का नोटिस और माफी. ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (OCI) कार्ड एक बार फिर चर्चा में है. इस बार इसकी वजह अदालत में चल रहा एक अहम मामला है.
बॉलीवुड अभिनेता इमरान खान, जिनके पास OCI कार्ड है, को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के बाद 14 अक्टूबर को भारत छोड़ने का नोटिस मिला था. इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने 7 दिसंबर तक इस नोटिस पर रोक लगा दी. लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने भारतीय नागरिकों और OCI कार्डधारकों के बीच स्पष्ट अंतर बताया.
अदालत ने कहा, “आप (खान) को इस तरह के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने का कोई अधिकार नहीं था. विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार OCI कार्डधारक को नहीं है.”
लेकिन खान का मामला एक बड़ी और लगातार विवादित होती बहस का सिर्फ एक हिस्सा है.
यह आशंका बढ़ रही है कि नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 7D, जिसके तहत केंद्र सरकार OCI कार्ड रद्द कर सकती है, का इस्तेमाल विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के आलोचकों की आवाज दबाने के लिए किया जा रहा है. 2014 से 2023 के बीच 122 OCI पंजीकरण रद्द किए गए. अकेले 2024 में 57 और पंजीकरण रद्द हुए. यह पिछले एक दशक के कुल आंकड़ों का लगभग आधा है.
यह उस कार्ड की दिलचस्प स्थिति है, जिसे 2005 में एक बिल्कुल अलग मकसद से शुरू किया गया था. OCI भारत की ओर से दुनिया भर में फैले प्रवासी भारतीयों को एक बड़ा न्योता था कि वे अपने देश लौटें, निवेश करें, नए प्रयोग करें और अनौपचारिक सांस्कृतिक दूत बनें. यह दोहरी नागरिकता की लंबे समय से चली आ रही मांग के जवाब में भी उठाया गया कदम था.
लेकिन यह न्योता दशकों की दूरी के बाद आया था. यह दूरी हमेशा से नहीं थी, बल्कि हाल के वर्षों में और बढ़ी है.
आजादी से पहले विदेशों में रहने वाले भारतीय निर्वासित क्रांतिकारी हुआ करते थे. दक्षिण अफ्रीका में एमके गांधी के सत्याग्रह से लेकर दादाभाई नौरोजी के ‘धन के निकास के सिद्धांत’ तक, विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने नेटवर्क बनाए, पैसा जुटाया और क्रांतिकारी गतिविधियों की योजनाएं बनाईं. लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने 1901 में इंडिया हाउस बनाया था. पेरिस में मैडम भीकाजी कामा ने 1905 में पेरिस इंडियन सोसाइटी की स्थापना की. गदर पार्टी ने 1913 में सैन फ्रांसिस्को को अपना मुख्यालय बनाया.
अलग-अलग शहर. अलग-अलग तरीके. लेकिन लक्ष्य एक ही था–स्वराज.
फिर अगस्त 1947 आया और इसके साथ ही भारत ने अचानक दूरी बनानी शुरू कर दी.
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 4 दिसंबर 1947 को संविधान सभा में कहा था, “हम स्पष्ट रूप से विदेशों में रहने वाले भारतीयों के हितों की रक्षा करना चाहते हैं… लेकिन हम ऐसे किसी निहित स्वार्थ की रक्षा नहीं कर सकते, जो उस देश के हितों को नुकसान पहुंचाए जहां वे रहते हैं.”
कई दशक बाद, 2003 में एक और प्रधानमंत्री दिल्ली के प्रगति मैदान में संगीत की शानदार जुगलबंदी के बीच खड़े होकर उन्हीं विदेशों में रहने वाले भारतीयों का दो शब्दों में स्वागत करेंगे: “घर में आपका स्वागत है.”
तो बीच के वर्षों में ऐसा क्या हुआ? जिस देश ने कभी अपने लोगों को एकजुट करने के लिए सीमाओं के पार तक नजर दौड़ाई थी, उसने आजादी के बाद उन्हीं सीमाओं को लेकर इतना सख्त रुख क्यों अपना लिया?
इसका जवाब आंशिक रूप से देश के निर्माण की जटिलताओं में था. और आंशिक रूप से उस दुनिया की चिंताओं में, जो उपनिवेशवाद से आजाद हो रही थी.
नेहरू का भारत
1940 के दशक के बाद एशिया और अफ्रीका में कई नए आजाद हुए देश सामने आए. वर्षों तक औपनिवेशिक लूट और शोषण झेलने के बाद ये देश अपनी संप्रभुता की सख्ती से रक्षा कर रहे थे और बाहरी दखल का विरोध कर रहे थे. दूसरी ओर, नेहरू का भारत खुद को एशिया और अफ्रीका के बड़े एकजुटता अभियान के नैतिक केंद्र के रूप में पेश कर रहा था. वह संप्रभुता और दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल न देने के सिद्धांतों का समर्थन कर रहा था.
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सहायक प्रोफेसर डॉ. स्मिता तिवारी ने कहा, “प्रवासी भारतीयों को धीरे-धीरे एक बाहरी तत्व के रूप में देखा जाने लगा था.” उनके किसी भी तरह के दखल को दूसरे संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप माना जा सकता था.
इसलिए नेहरू चाहते थे कि विदेशों में रहने वाले भारतीय वहां के समाज में घुल-मिल जाएं और जिन देशों में वे बसे हैं, उनके प्रति वफादार रहें. भारत के साथ उनका राजनीतिक रिश्ता खत्म किया जाना था या कम से कम कमजोर किया जाना था.
8 मार्च 1948 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने पूछा था:
अब, विदेशों में रहने वाले ये भारतीय कौन हैं? क्या वे भारतीय नागरिक हैं? … अगर वे नहीं हैं, तो उनमें हमारी दिलचस्पी सांस्कृतिक और मानवीय होगी, राजनीतिक नहीं.
कई साल बाद, लोकसभा में श्रीलंका में रहने वाले भारतीयों पर चर्चा करते हुए नेहरू ने अपना रुख दोहराया.
उन्होंने 2 सितंबर 1957 को कहा, “सख्ती से देखें तो कानूनी और संवैधानिक रूप से यह हमारी समस्या नहीं है. वे हमारे नागरिक नहीं हैं. हमें उनके कल्याण में दिलचस्पी है और हम इसका समाधान ढूंढना चाहते हैं.”
इस तरह एक फैसला लिया गया: राजनीतिक भागीदारी के बजाय दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल न देना. लेकिन इस समझौते में कहीं न कहीं प्रवासी भारतीयों को किनारे कर दिया गया.
लेकिन क्या नेहरू की दखल न देने की नीति की दीवार को तोड़ना नामुमकिन था?
ऐसा नहीं था.
सीलोन के मामले में अपवाद
आजाद हुए श्रीलंका में स्वतंत्रता के साथ एक बड़ी मुश्किल भी आई. 1948 और 1949 के दो नागरिकता कानूनों के कारण भारतीय मूल के लगभग 10 लाख तमिल लोग नागरिकता विहीन हो गए थे.
इस बार नेहरू इस समस्या से मुंह नहीं मोड़ सकते थे. जल्द ही लंबी और अहम बातचीत के बाद 1954 में नेहरू-कोटेलावाला समझौता हुआ. अगले दिन इसकी खबर देते हुए द न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे “भारतीय मूल के करीब 10 लाख आर्थिक रूप से सक्रिय द्वीपवासियों की स्थिति सुलझाने की लंबी कोशिशों में एक नया कदम” बताया.
उसी साल अक्टूबर में जब दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात नई दिल्ली में हुई, तो नेहरू ने एक दुर्लभ और स्पष्ट वादा किया. उन्होंने कहा कि अगर भारतीय तमिल भारत लौटना चाहते हैं, तो “उन्हें यहां लाना हमारा कर्तव्य और जिम्मेदारी है. हम उन्हें लाएंगे और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रास्ते में कितनी मुश्किलें आती हैं.”
यह एक भावुक और मजबूत वादा था. लेकिन श्रीलंका अपवाद बना रहा, नीति में बदलाव की शुरुआत नहीं. दुनिया के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लाखों भारतीयों के लिए नेहरू का संदेश पहले जैसा ही रहा – वहां के समाज में घुल-मिल जाओ. उसी का हिस्सा बनो. अपना ध्यान अपने काम पर रखो.
1962 में म्यांमार की राष्ट्रीयकरण नीतियों से भारतीय मूल के कारोबारियों को खतरा हुआ, तो नेहरू ने यही रुख अपनाया.
27 फरवरी को कॉमनवेल्थ सचिव वाईडी गुंडेविया को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा, “मैं बर्मा सरकार से उसकी आयात या निर्यात नीतियों का राष्ट्रीयकरण न करने के लिए कहने को लेकर हिचकिचा रहा हूं, क्योंकि इससे भारतीयों को नुकसान हो सकता है.”
यही संदेश पूर्वी अफ्रीका तक भी पहुंचा. केन्या की आजादी से पहले नेहरू ने 2 नवंबर 1962 को केन्या ब्रॉडकास्टिंग सर्विस को दिए एक इंटरव्यू में वहां रहने वाले भारतीयों से कहा कि उन्हें “उस देश के लोगों के साथ पूरा सहयोग करना चाहिए, जिसे उन्होंने अपना घर बनाया है.”
कुछ दिन बाद उनकी सलाह और स्पष्ट हो गई: “जिस देश में वे रहते हैं, उसकी नागरिकता अपना लें.”
हालांकि, दूरी बनाए रखने की यह नीति इसके सूत्रधार नेहरू के बाद भी जारी रही. इंदिरा गांधी जब प्रधानमंत्री बनीं, तो उन्होंने अपने पिता की कई राजनीतिक नीतियों को नजरअंदाज किया. लेकिन प्रवासी भारतीयों के मामले में नेहरू की सावधानी का असर बना रहा.
तिवारी के मुताबिक, उनके कार्यकाल में भारत विदेशों में रहने वाले भारतीयों के साथ अपने संबंधों को लेकर “थोड़ा अधिक कूटनीतिक रूप से सतर्क और सावधान” हो गया था. हालांकि, इस सावधानी की जल्द ही पहली परीक्षा होने वाली थी.
सावधानी के साथ खुलते दरवाजे
इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनने तक प्रवासी भारतीयों के बारे में जानने का इंतजार नहीं करना पड़ा. वह कई वर्षों से विदेशों में रहने वाले भारतीयों से मिलती रही थीं. कई बार नेहरू के साथ विदेश यात्राओं पर और कई बार अकेले भी.
दिसंबर 1963 में केन्या की आजादी के समारोह में उनके बदलते रुख की एक झलक दिखाई दी. हाउस ऑफ लॉर्ड्स में अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए लॉर्ड ब्रॉकवे ने कहा कि इंदिरा ने “भारतीयों से केन्या के नागरिक बनने की जोरदार अपील की थी.”
लेकिन साउथ ब्लॉक पहुंचने के बाद उनकी नीति में विदेशों में रहने वाले भारतीयों के प्रति कूटनीतिक दिलचस्पी अधिक साफ दिखाई देने लगी. हालांकि, इसमें नेहरू की नीति की झलक भी बनी रही. प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही समय बाद उन्हें पहली कूटनीतिक चुनौती का सामना करना पड़ा.
1967 से केन्या में अफ्रीकीकरण की लहर शुरू हुई. भारतीय मूल के लोगों पर कारोबार से जुड़ी पाबंदियां लगाई गईं और वर्क परमिट के नियम सख्त कर दिए गए. इसी बीच ब्रिटेन ने पूर्वी अफ्रीका के उन एशियाई लोगों पर भी पाबंदियां लगा दीं, जिनके पास ब्रिटिश पासपोर्ट थे. इससे अनिश्चितता और पलायन दोनों बढ़े.
भारत चुप नहीं रहा. लेकिन उसने केन्या से अफ्रीकीकरण की नीति छोड़ने की मांग भी नहीं की. यह नेहरू की नीति के मुताबिक संतुलन बनाने की कोशिश थी.
इसलिए 14 मार्च 1968 को विदेश मंत्री बीआर भगत नैरोबी पहुंचे. कुछ दिन बाद 25 मार्च को उन्होंने राज्यसभा को बताया कि केन्या गैर-नागरिकों, जिनमें ब्रिटिश पासपोर्ट रखने वाले भारतीय भी शामिल थे, के वर्क परमिट को एक से दो साल तक अस्थायी रूप से बढ़ाने पर सहमत हो गया है.
लेकिन अरब सागर के दूसरी ओर एक और बड़ा संकट सामने आ रहा था. 22 अगस्त 1972 को द न्यूयॉर्क टाइम्स में एक शीर्षक छपा: “स्तब्ध युगांडा के एशियाई: समृद्धि से निराशा तक.”
युगांडा के राष्ट्रपति ईदी अमीन ने करीब 80 हजार एशियाई लोगों को, जिनमें बड़ी संख्या भारतीय मूल के लोगों की थी, देश छोड़ने के लिए 90 दिन का समय दिया था. अमीन ने उन पर “आर्थिक तोड़फोड़ करने वाले” होने का आरोप लगाया. TIME ने 21 अगस्त को रिपोर्ट किया कि अमीन के मुताबिक, वे “सिर्फ गाय का दूध निकालते थे, उसे चारा नहीं खिलाते थे.”
लेकिन इस बार भी नई दिल्ली का जवाब पहले जैसा ही था. 11 अगस्त को राज्यसभा में विदेश राज्य मंत्री सुरेंद्र सिंह पाल ने कहा कि भारत “अफ्रीकी देशों की अपने आंतरिक मामलों को नियंत्रित करने की आकांक्षाओं का सम्मान करता है.” उन्होंने यह भी कहा कि ब्रिटिश पासपोर्ट रखने वाले लोगों का मामला पूरी तरह ब्रिटेन से जुड़ा है.
क्या यह उदासीनता थी? तिवारी ने कहा कि भारत ने उनके साथ हो रहे बुरे बर्ताव को पहचाना था, लेकिन “वह उनकी भरपाई करने, उनकी रक्षा करने या उनके साथ संस्थागत संबंध बनाने की स्थिति में नहीं था.”
हालांकि 1977 में चुपचाप ओवरसीज इंडियन सेल की स्थापना की गई, लेकिन भारत की रणनीति चुनिंदा लोगों, निजी बातचीत और अपने एजेंडे तक सीमित रही.
दूरसंचार इंजीनियर और राजीव गांधी के सलाहकार सैम पित्रोदा ने द प्रिंट से कहा, “संपर्क बढ़ाने के बजाय यह निजी बातचीत तक सीमित था. इसे संस्थागत रूप नहीं दिया गया था.”
नेहरू ने वैज्ञानिक विशेषज्ञता के लिए होमी भाभा का सहारा लिया था. उनकी बेटी ने भी विदेशों में रहने वाले भारतीयों की प्रतिभा का इस्तेमाल किया. 1970 के दशक के आखिरी वर्षों में, जब भारत अपना सेमीकंडक्टर कॉम्प्लेक्स बनाने की तैयारी कर रहा था, तो उन्होंने भारतीय प्रतिभाओं को वापस लाने के लिए सिलिकॉन वैली में एक गुप्त मिशन भेजा.
राजीव गांधी के साथ एक नया, युवा और तकनीक को लेकर उत्साहित भारत सामने आया, जो आधुनिक बनना चाहता था. विदेशों में रहने वाले भारतीयों तक पहुंचने की उसकी कोशिश अब चुनिंदा मुलाकातों से आगे बढ़कर खुले और बड़े राजनीतिक जुड़ाव में बदलने वाली थी.
दूरी बनाने से लेकर अपनी बात रखने तक
भारत की दूरसंचार क्रांति की शुरुआत एक नाकाम फोन कॉल से हुई.
1980 के दशक तक प्रवासी भारतीय वैज्ञानिक विशेषज्ञता, तकनीक, निवेश और प्रभाव का ऐसा स्रोत बन चुके थे, जिसे आधुनिक बनता भारत अब नजरअंदाज नहीं कर सकता था. राजीव गांधी यह बात समझते थे. इसलिए उन्होंने देश के कुछ सबसे प्रतिभाशाली लोगों को वापस लाने की कोशिश शुरू की.
वापस लौटने वाले पहले बड़े प्रवासी भारतीयों में टेक उद्यमी सैम पित्रोदा थे.
उन्होंने बताया, “मैं अपने माता-पिता के साथ भारत आया हुआ था. मैंने अपनी पत्नी को फोन करने की कोशिश की, लेकिन फोन नहीं लगा. थोड़े घमंड और बहुत कम जानकारी के साथ मैंने इस समस्या को ठीक करने का फैसला किया.”
लेकिन सिर्फ महत्वाकांक्षा से देश की व्यवस्था नहीं बदली जा सकती थी. इसके लिए राजनीतिक समर्थन जरूरी था. राजीव गांधी पित्रोदा के सबसे बड़े समर्थक बने. लेकिन राजीव और पित्रोदा की साझेदारी कोई अकेली पहल नहीं थी.
नई दिल्ली विदेशों में रहने वाले भारतीय वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता का एक बड़ा नेटवर्क तैयार करना चाहती थी.
अक्टूबर 1985 में राजीव जब वॉशिंगटन डीसी गए, तो उन्होंने भारतीय मूल के कई बड़े वैज्ञानिकों से मुलाकात की. यह सिर्फ औपचारिक मुलाकात नहीं थी. यह 1980 के दशक में सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने की कोशिश थी. वैज्ञानिकों को परियोजनाओं के सलाहकार के रूप में जोड़ना और NRI के मालिकाना हक वाली कंपनियों को भारत में हाई-टेक कारोबार शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करना इसका हिस्सा था.
भारत जहां प्रतिभाओं के लिए विदेशों की ओर देख रहा था, वहीं वह प्रवासी भारतीयों के हितों में अपनी आवाज भी उठाने लगा था.
इसका एक उदाहरण फिजी था.
14 मई 1987 को कर्नल सितिवेनी राबुका ने तख्तापलट कर टिमोसी बावाद्रा की चुनी हुई सरकार को गिरा दिया. बावाद्रा की सरकार को इंडो-फिजियन समुदाय के दबदबे वाली नेशनल फेडरेशन पार्टी का समर्थन था. इस बार नई दिल्ली ने दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल न देने की पुरानी नीति के पीछे छिपने के बजाय कूटनीतिक स्तर पर जोरदार कदम उठाए.
उस साल अक्टूबर में वैंकूवर में हुए कॉमनवेल्थ सम्मेलन में राजीव ने सैन्य शासन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की. भारत ने अपने हाई कमिश्नर को वापस बुला लिया, व्यापारिक संबंध रोक दिए और फिजी की कॉमनवेल्थ सदस्यता खत्म कराने में सफलता हासिल की.
हालांकि, इस नए सख्त रुख की भी सीमाएं थीं और इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. श्रीलंका के गृहयुद्ध में राजीव गांधी के असफल हस्तक्षेप की आखिरकार उन्हें अपनी जान देकर कीमत चुकानी पड़ी.
लेकिन दिशा बदल चुकी थी.
और जैसे-जैसे भारत खुद को नए रूप में ढाल रहा था, प्रवासी भारतीय भी बदल रहे थे.
बदलता प्रवासी भारतीय समुदाय
1980 के दशक तक प्रवासी भारतीय समुदाय का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका था.
एक सदी से भी ज्यादा समय तक भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के रूप में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बिखरे रहे थे. इतिहासकार इट्टी अब्राहम ने अपनी किताब ‘हाउ इंडिया बिकेम टेरिटोरियल‘ (2014) में इसे “गुलामी की नई व्यवस्था” कहा है. कुछ भारतीय व्यापारी थे और कुछ देश से बाहर रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल थे. लेकिन अब मध्यम वर्ग के पेशेवरों की एक नई पीढ़ी वैश्विक कारोबार, तकनीक और राजनीति में अपनी पहचान बना रही थी. इससे विदेशों में भारत की छवि भी बदल रही थी.
2003 में पहले प्रवासी भारतीय दिवस पर अटल बिहारी वाजपेयी ने याद किया कि 1998 के परमाणु परीक्षणों और “भारत को अलग-थलग करने की कोशिश” के बाद प्रवासी भारतीय “भारत के साथ खड़े होने के लिए आगे आए थे.” कई साल बाद उन्होंने भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के समर्थन में अमेरिकी संसद के सदस्यों से भी संपर्क किया.
जमीनी स्तर पर इस अभियान का नेतृत्व करने वाले स्वदेश चटर्जी ने अपनी किताब ‘बिल्डिंग ब्रिजेस‘ (2015) में लिखा, “भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के अभियान की अगुवाई वास्तव में भारतीय-अमेरिकी समुदाय ने की थी.”
ईमेल, पत्र और मंदिरों तथा गुरुद्वारों में हस्ताक्षर अभियान के जरिए समर्थन जुटाया गया.
हालांकि, यह समर्थन बिना किसी शर्त के नहीं था. जब भारत में लोकतंत्र के बुनियादी मूल्यों को खतरा हुआ, तो प्रवासी भारतीयों ने अपनी आवाज उठाई.
इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने इंडियंस फॉर डेमोक्रेसी (IFD) नाम का संगठन बनाया. सुगाता श्रीनिवासराजू ने अपनी किताब ‘द कॉन्शियंस नेटवर्क’ (2025) में IFD को अलग-अलग शैक्षणिक और पेशेवर पृष्ठभूमि वाले “नागरिक समाज के जागरूक लोगों का समूह बताया, जिन्होंने लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया.”
पासपोर्ट जब्त होने, करियर को नुकसान पहुंचाने की धमकियों और बदनाम करने के अभियानों जैसे भारी दबाव के बावजूद उन्होंने काम जारी रखा. वे विदेशों में रहने वाले भारतीयों की ऐसी आवाज बने, जिसे दबाया नहीं जा सकता था.
लेकिन प्रवासी भारतीयों की सफलता की इस चमकदार कहानी के पीछे एक कम चर्चित सच्चाई भी थी: विदेशों में छोड़ दी गईं NRI दुल्हनों की परेशानी.
बेसहारा दुल्हनें
उन्हें “हॉलिडे ब्राइड”, “NRI ब्राइड” या “हनीमून ब्राइड” जैसे कई नामों से जाना जाता था. लेकिन उनका अंजाम अक्सर एक जैसा ही होता था.
12 अक्टूबर 1998 को इंडिया टुडे ने पंजाब की उन दुल्हनों की परेशानी को सामने रखा, जिन्हें कहीं का नहीं छोड़ा गया था. राज्य में एक परेशान करने वाला चलन शुरू हो गया था. आतंकवाद और हिंसा के कई सालों के बाद विदेश में बेहतर और सुरक्षित जिंदगी का सपना दिखने लगा था. दुल्हन के परिवार के लिए विदेश में रहने वाला दूल्हा, जो अच्छे कपड़े पहनता हो, शायद कार में आता हो और जिसके पास विदेशी नागरिकता हो, “खुशहाली का पासपोर्ट” लगता था.
परिवार जमीन बेचते थे, कर्ज लेते थे और भव्य शादी तथा महंगे दहेज के लिए भारी रकम खर्च करते थे. लेकिन शादी के मुश्किल से दो हफ्ते बाद ही दूल्हा लंदन, टोरंटो या फ्रैंकफर्ट लौट जाता था. वह दुल्हन को विदेश ले जाने के लिए इमिग्रेशन के कागजात भेजने का वादा करता था, जो कभी नहीं आते थे.
इसके बाद फोन आने बंद हो जाते थे. कुछ दुल्हनों को पता चलता था कि विदेश में उनके पति का पहले से ही परिवार है. कुछ को ससुराल में हिंसा, भारी कर्ज और सामाजिक बदनामी का सामना करना पड़ता था. न तो वे पूरी तरह शादीशुदा रह पाती थीं और न ही कानूनी रूप से तलाकशुदा. वे एक ऐसी स्थिति में फंस जाती थीं, जहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं होता था.
दशकों से चली आ रही इस समस्या के कारण आखिरकार 2007 में सरकार को कदम उठाना पड़ा. उस साल महिला सशक्तीकरण पर बनी संसदीय समिति ने NRI पतियों द्वारा छोड़ी गई महिलाओं की स्थिति की जांच की. इसके बाद विशेष कानूनी सेल बनाए गए, शादी का पंजीकरण अनिवार्य किया गया और NRI शिकायतों के लिए अलग डेस्क शुरू किए गए. पंजाब ने भी NRI आयुक्त और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था बनाई.
लेकिन शिकायतें आती रहीं. 2015 से अक्टूबर 2019 के बीच सरकार को NRI शादियों से जुड़ी 6,094 शिकायतें मिलीं.
फिर भी, हर मुश्किल दौर में, चाहे प्रवासी भारतीय भारत के पक्ष में खड़े हुए हों या उसकी सरकार से सवाल पूछे हों, संस्कृति, विरासत और पहचान का एक अदृश्य रिश्ता उन्हें उनके पूर्वजों की जमीन से जोड़ता रहा.
दूरी से घर वापसी तक
1990 के दशक की शुरुआत में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार खतरनाक रूप से कम हो रहा था. उदारीकरण की राह पर बढ़ते भारत ने अपनी सीमाओं के पार देखना शुरू किया. उसे सिर्फ पूंजी ही नहीं, बल्कि अपने लोगों की भी जरूरत थी.
भारतीय स्टेट बैंक के जरिए सरकार ने 1991 में इंडिया डेवलपमेंट बॉन्ड, 1998 में रीसर्जेंट इंडिया बॉन्ड और 2000 में इंडिया मिलेनियम डिपॉजिट जारी किए. इनके जरिए विदेशों में रहने वाले भारतीयों से अरबों डॉलर जुटाए गए.
लेकिन इस रिश्ते में सिर्फ पैसा ही शामिल नहीं था.
1999 में सरकार ने पर्सन्स ऑफ इंडियन ओरिजिन (PIO) कार्ड योजना शुरू की. इसके तहत भारतीय मूल के योग्य विदेशी नागरिकों को बिना वीजा भारत आने और संपत्ति खरीदने का अधिकार दिया गया.
नई सदी की शुरुआत के साथ एक बड़ा सवाल सामने आया: इस नए रिश्ते का स्वरूप क्या होना चाहिए? इसका जवाब 2000 में भारतीय प्रवासी समुदाय पर बनी उच्चस्तरीय समिति थी. इसकी अध्यक्षता एलएम सिंघवी ने की थी. समिति ने दोहरी नागरिकता, अलग-अलग देशों के साथ विशेष संबंध और हर साल प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन की सिफारिश की.
इसलिए 9 जनवरी 2003 को एमके गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने के 88 साल बाद भारत ने पहली बार प्रवासी भारतीय दिवस मनाया. दशकों की दूरी के बाद अब भव्य घर वापसी का समय था.
वेलकम होम
नई दिल्ली के विशाल प्रगति मैदान में उत्सुकता का माहौल था.
एक खास जुगलबंदी में दो दिग्गज कलाकार उस्ताद बिस्मिल्लाह खान और पंडित रविशंकर एक मंच पर आए. उनकी राग भैरवी ने 1,000 से ज्यादा प्रवासी भारतीयों को मंत्रमुग्ध कर दिया. सिलिकॉन वैली के बड़े कारोबारी, दुनिया भर के उद्यमी और यहां तक कि एक पूर्व प्रधानमंत्री भी वहां मौजूद थे. इन सभी को उनके साझा भारतीय मूल ने एक साथ जोड़ा था.
इसके बाद वाजपेयी मंच पर आए. अपनी शानदार भाषण शैली के लिए मशहूर वाजपेयी ने बेहद सरल शब्दों से शुरुआत की: “वेलकम होम” (घर में आपका स्वागत है.)
यह एक नई सोच थी. विदेशों में रहने वाले भारतीयों को भारत का अनौपचारिक दूत बताया जा रहा था. वे “दुनिया के सामने भारत की सच्ची तस्वीर भरोसेमंद और प्रभावी तरीके से पेश कर सकते थे.”
भारत को उनसे सिर्फ पैसा नहीं चाहिए था.
वाजपेयी ने कहा, “हमें सिर्फ आपका निवेश नहीं चाहिए. हमें आपके विचार भी चाहिए.”
भाजपा के विदेश मामलों के विभाग के प्रभारी विजय चौथाईवाले ने कहा, “अटल जी ने हर साल प्रवासी भारतीय दिवस मनाने की घोषणा करके बहुत अच्छा काम किया.”
उन्होंने कहा, “इससे वास्तव में प्रवासी भारतीयों को नई ऊर्जा मिली और वे दुनिया में कहीं भी रहते हुए फिर से भारत से जुड़ गए.”
इस भव्य आयोजन के साथ कुछ व्यावहारिक वादे भी किए गए. खाड़ी देशों में काम करने वाले प्रवासियों के लिए अनिवार्य बीमा, कल्याण कोष और शिक्षा में छूट देने की बात कही गई. लेकिन सबसे बड़ा वादा वह था, जिसकी मांग प्रवासी भारतीय लंबे समय से कर रहे थे – दोहरी नागरिकता.
सिंघवी समिति का कहना था कि कई प्रवासी भारतीय व्यावहारिक कारणों से विदेशी पासपोर्ट लेते हैं, न कि भारत से अपने भावनात्मक रिश्ते खत्म करने के लिए. समिति के मुताबिक, दोहरी नागरिकता से निवेश, व्यापार और परोपकारी कामों को बढ़ावा मिल सकता है.
पित्रोदा के लिए यह मांग निजी तौर पर भी बहुत अहम थी.
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि हमें दोहरी नागरिकता की जरूरत है.” राजीव गांधी के साथ काम करने के लिए अमेरिकी नागरिकता छोड़ने के बावजूद उनका दोनों देशों से जुड़ाव बना हुआ था.
भारत ने मुझे जड़ें दीं, लेकिन अमेरिका ने मुझे पंख दिए.
लेकिन क्या नागरिकता दो देशों के बीच साझा की जा सकती है?
कुछ मोदी सरकार की नीतियों के आलोचक रहे अकादमिक रोहित चोपड़ा ने कहा, “दोहरी नागरिकता का विचार एक अस्पष्ट स्थिति में है.” उन्होंने बताया कि अगर दोहरी नागरिकता वाला कोई व्यक्ति अपने ही देश में गिरफ्तार होता है, तो संप्रभुता, राजनीतिक अधिकार और कानूनी अधिकार क्षेत्र से जुड़े कई जटिल सवाल उठ सकते हैं.
इस तरह संप्रभुता और रिश्तों के बीच खींचतान में पूरी दोहरी नागरिकता की मांग आगे नहीं बढ़ सकी. इसी समझौते से नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2003 सामने आया.
OCI की राह
प्रवासी भारतीय दिवस पर वाजपेयी का बड़ा वादा अब संसद तक पहुंच चुका था.
22 दिसंबर 2003 को उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने यह विधेयक पेश किया.
आडवाणी ने कहा, “कई वर्षों से प्रवासी भारतीय संविधान में दोहरी नागरिकता का प्रावधान शामिल करने की मांग कर रहे हैं. यह विधेयक उनकी मांग पूरी करता है.”
हालांकि, प्रस्तावित विधेयक पूरी दोहरी नागरिकता का नहीं था. इसमें भारतीय मूल के योग्य विदेशी नागरिकों के लिए OCI की एक नई श्रेणी बनाने का प्रस्ताव था. यह सुविधा 16 तय देशों के नागरिकों को मिलनी थी. पाकिस्तान और बांग्लादेश को इसमें शामिल नहीं किया गया था. 2005 के संशोधन कानून ने इस वादे को ठोस रूप दिया. इसके तहत आजीवन, कई बार भारत आने के लिए वीजा और पुलिस में पंजीकरण से छूट दी गई. हालांकि, राजनीतिक अधिकार – जैसे वोट देना, चुनाव लड़ना या संवैधानिक पद संभालना – पूरी तरह प्रतिबंधित रहे.
2004 तक सरकार ने प्रवासी भारतीय मामलों का मंत्रालय भी बना दिया. उसी साल बाद में इसका नाम बदलकर ओवरसीज इंडियन अफेयर्स मंत्रालय कर दिया गया.
हालांकि, संसद में हर कोई इस कदम को लेकर उत्साहित नहीं था.
बीजू जनता दल के सांसद तथागत सत्पथी ने 16 अगस्त 2005 को राज्यसभा में सवाल उठाया कि जो लोग बेहतर आर्थिक अवसरों की तलाश में भारत छोड़कर गए थे, उन्हें अब देश के समृद्ध होने पर विशेष सुविधाएं क्यों दी जा रही हैं.
उन्होंने कहा, “जिस तरह पत्नी के लिए एक ही पति का नियम है, उसी तरह देश के लिए भी एक ही देश का नियम होना चाहिए.”
उन्होंने पूछा कि अगर भारत से उनका जुड़ाव इतना गहरा था, तो “क्या वे उसी तरह अपने देश को छोड़कर चले जाते, जैसा उन्होंने किया?”
क्या यह दोहरी नागरिकता थी, जिसकी प्रवासी भारतीय मांग कर रहे थे? पूरी तरह नहीं.
तिवारी ने कहा कि OCI के जरिए “राष्ट्र होने की अवधारणा को भौगोलिक सीमाओं से बाहर ले जाने” की कोशिश की गई थी, ताकि दुनिया भर में फैले भारतीयों का एक परिवार बनाया जा सके. लेकिन भारत ने अगला कदम क्यों नहीं उठाया?
चौथाईवाले ने कहा, “मुझे लगता है कि सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता है. भारत में पासपोर्ट को बहुत पवित्र माना जाता है. फिलहाल OCI कार्ड ही सही तरीका है.”
इस नीति का असर भी दिखा. 2006 में OCI पंजीकरण की संख्या 87 हजार थी, जो बढ़कर 50 लाख से ज्यादा हो गई.
फिर 2014 में राजनीतिक माहौल बदल गया. इसके साथ ही प्रवासी भारतीयों तक पहुंचने की कोशिशों का पैमाना भी बढ़ने वाला था और इसका चेहरा भी बदलने वाला था. हजारों मील दूर, स्टेडियम की रोशनी के बीच एक भीड़ नारे लगा रही थी: “मोदी! मोदी! मोदी!”
स्टेडियम से निगरानी तक
28 सितंबर 2014 को न्यूयॉर्क का मशहूर मैडिसन स्क्वायर गार्डन भगवा, सफेद और हरे रंग के झंडों के बीच गूंज उठा. करीब 19 हजार भारतीय-अमेरिकी वहां जुटे थे. वे तिरंगे लहरा रहे थे, मोदी की टी-शर्ट पहने हुए थे और उनके नाम के नारे लगा रहे थे. नरेंद्र मोदी मंच पर आए और वादा किया कि वह उनके प्यार का जवाब “आपके सपनों का भारत बनाकर” देंगे.
यह कोई अकेला आयोजन नहीं था. इसी तरह के कार्यक्रम सिडनी, टोरंटो, दुबई, वेम्बली और ह्यूस्टन तक पहुंचे.
चौथाईवाले ने कहा, “प्रधानमंत्री मोदी हमेशा से OCI कार्डधारकों के लिए भारत में प्रवेश और रहने की प्रक्रिया को आसान बनाने के पक्ष में रहे हैं.” इसकी शुरुआत जनवरी 2015 में PIO और OCI योजनाओं को मिलाने से हुई, जिससे दोनों कार्डों को लेकर भ्रम खत्म हुआ.
मार्च 2016 में ओवरसीज इंडियन अफेयर्स मंत्रालय को विदेश मंत्रालय में मिला दिया गया, ताकि “बेहतर तालमेल” बनाया जा सके.
इस कूटनीतिक कोशिश के साथ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी थीं, जिन्होंने सरकारी व्यवस्था में मानवीय संवेदना जोड़ी.
ट्विटर को 24 घंटे चलने वाली मदद की सेवा बनाकर स्वराज लगभग हर मदद की अपील का तुरंत जवाब देती थीं.
अगस्त 2015 में एक व्यक्ति ने ट्वीट कर बताया कि उसकी बहन को UAE में मानव तस्करों ने बंधक बना रखा है. स्वराज ने भारतीय राजदूत से संपर्क किया. उसी शाम उन्होंने जवाब दिया, “हमने स्थानीय पुलिस की मदद से आपकी बहन को बचा लिया है.”
एक साल बाद एक महिला ने बताया कि अमेरिका में रहने वाला उसका बेटा अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए भारत नहीं आ पा रहा है, क्योंकि दूतावास बंद है. स्वराज ने दूतावास खुलवाने और उसके बेटे के वीजा का इंतजाम करने का आदेश दिया. वॉशिंगटन पोस्ट ने उन्हें “सुपरमॉम ऑफ स्टेट” कहा.
ढाई करोड़ की संख्या पार कर चुका प्रवासी भारतीय समुदाय अब उन लोगों के रूप में नहीं देखा जा रहा था, जिन्होंने भारत छोड़ दिया था. उन्हें ‘सबका साथ, सबका विकास’ के सक्रिय भागीदार के रूप में शामिल किया गया. वे दान दे रहे थे, निवेश कर रहे थे और नई दिल्ली के अनौपचारिक दूत बन रहे थे.
फरवरी 2015 में भाजपा के महासचिव राम माधव ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा, “वे उन देशों के वफादार नागरिक रहते हुए भी भारत की आवाज बन सकते हैं. यह वैसा ही है, जैसे अमेरिका में यहूदी समुदाय इजरायल के हितों का ध्यान रखता है.”
लेकिन मोदी के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के साथ ही प्रवासी भारतीयों तक पहुंचने की यह तेज कोशिश सख्त नियमों, नई पाबंदियों और OCI कार्डधारकों के लिए अधिक जटिल प्रक्रियाओं में बदलने लगी.
प्रवासी भारतीयों में विरोध की आवाज
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने OCI कार्ड रद्द करने के लिए सरकार की कानूनी शक्तियों का दायरा बढ़ा दिया. वहीं, 2021 की एक अधिसूचना के तहत रिसर्च, पत्रकारिता, मिशनरी काम और सीमा से जुड़े संवेदनशील इलाकों में जाने जैसी सामान्य गतिविधियों के लिए भी सरकार से पहले अनुमति लेना जरूरी कर दिया गया.
‘कम सरकार, बेहतर शासन’ के आधिकारिक वादों के बावजूद सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलता बनी रही.
पित्रोदा ने कहा, “हमें प्रक्रियाओं को आसान बनाने की जरूरत है. ये बहुत जटिल हैं. हमारी सोच 19वीं सदी की है, प्रक्रियाएं 20वीं सदी की हैं और जरूरतें 21वीं सदी की हैं.”
शुरुआत इस सोच से होती है कि मैं अपराधी हूं. मुझे इनकी तीन कॉपी और उनकी चार कॉपी देनी हैं. अमेरिका में कहीं जाकर दस्तावेजों को नोटरी से प्रमाणित कराने और डाक से भेजने में मेरा बहुत समय लगता है.
लेकिन भारत में नियम सख्त होने के साथ ही विदेशों में विरोध की आवाज तेज होने लगी. जिन प्रवासी भारतीयों को कभी भारत का अनौपचारिक दूत कहा गया था, वे अब सत्तारूढ़ विचारधारा के खिलाफ संगठित होने लगे.
सितंबर 2021 में अमेरिका के 50 विश्वविद्यालयों के अकादमिक विभागों ने तीन दिन का ऑनलाइन सम्मेलन आयोजित किया. इसमें हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और प्रिंसटन जैसे विश्वविद्यालय भी शामिल थे. सम्मेलन का नाम था ‘डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’. इसका मकसद हिंदू राष्ट्रवाद को एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में समझना था, न कि हिंदू धर्म पर हमला करना.
लेकिन इसका विरोध तुरंत शुरू हो गया. विश्वविद्यालयों के ईमेल इनबॉक्स में 10 लाख से ज्यादा विरोध संदेश पहुंचे. भारत और विदेशों में हिंदू संगठनों ने इसे “हिंदू विरोधी” बताया. आयोजकों को ऑनलाइन उत्पीड़न, धमकियों और गाली-गलौज का सामना करना पड़ा.
जब विदेशों में रहने वाले अकादमिक और कार्यकर्ता भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ने पर सवाल उठा रहे थे, तो एक और सवाल सामने आया: क्या दुनिया भर के भारतीयों को जोड़ने के लिए बनाया गया यह कार्ड अब असहमति पर निगरानी रखने का जरिया बन रहा है?
असहमति पर लगाम लगाने का जरिया बना कार्ड?
यह सवाल नवंबर 2019 में और गंभीर हो गया, जब पत्रकार आतिश तासीर का OCI पंजीकरण रद्द कर दिया गया. सरकार ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने दिवंगत पिता के पाकिस्तानी मूल की जानकारी नहीं दी थी. यह फैसला तासीर की उस TIME कवर स्टोरी के कुछ हफ्ते बाद आया था, जिसमें उन्होंने मोदी को “भारत का विभाजन करने वाला नेता” बताया था.

इसके बाद कुछ और चर्चित नाम सामने आए. इनमें प्रोफेसर अशोक स्वैन, अकादमिक निताशा कौल और रॉयटर्स के पत्रकार राफेल सैटर शामिल थे. ये सभी सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं.
अब अभिनेता इमरान खान भी इस बहस में शामिल हो गए हैं. चौथाईवाले ने कहा कि विदेशी नागरिक भारतीय नागरिकों के समान राजनीतिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकते.
OCI कार्ड एक सुविधा है, अधिकार नहीं. अगर इमरान खान भारत में प्रदर्शन करना चाहते हैं, तो उनका स्वागत है कि वे भारतीय नागरिकता लें और ऐसा करें.
बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी अपने फैसले में इसी तरह का अंतर बताया. अदालत ने कहा, “आप (खान) OCI कार्डधारक के रूप में भारतीय नागरिकों के बराबर नहीं हैं.”
लेकिन राष्ट्रीय हितों की रक्षा और असहमति की आवाज दबाने के बीच की सीमा कहां है? विदेशों में रहने वाले भारतीय लंबे समय से अपने देश के बारे में बोलते रहे हैं. कभी उसके समर्थन में और कभी उसकी सरकार के खिलाफ. क्या अब भारत से अपने रिश्ते बनाए रखने के लिए उन्हें अपनी आजादी की कीमत चुकाने का जोखिम उठाना होगा?
चोपड़ा ने कहा, “मुझे लगता है कि OCI कार्ड राजनीतिक असहमति को काबू में रखने का एक जरिया बन गया है.”
वह मानते हैं कि सरकार की ओर से इसका आधिकारिक कारण “भारत की अखंडता और संप्रभुता” बताया जाता है.
लेकिन अकादमिक ने कहा, “मुझे लगता है कि यह सब आखिरकार राजनीतिक नियंत्रण के सवाल पर आकर टिकता है.”
अधूरा रिश्ता
इमरान खान के OCI दर्जे को लेकर हाल में हुआ कानूनी विवाद याद दिलाता है कि भारत और प्रवासी भारतीयों के बीच रिश्ता अब भी जटिल है. कई बार यह रिश्ता असहज और अधूरा भी लगता है. भारत के साथ अपने ही लोगों के बदलते संबंधों का भविष्य क्या होगा?
सबसे पहले जरूरत सरकारी प्रक्रियाओं में बदलाव की है. 30 जून 2026 को डिजिटल ई-OCI कार्ड की शुरुआत इस दिशा में एक कदम है, जिससे भारत आने की प्रक्रिया आसान हो सकती है. लेकिन सच्चे जुड़ाव के लिए दशकों से चली आ रही सरकारी लालफीताशाही को खत्म करना होगा.
अगली पीढ़ी पहले से ही इस ओर देख रही है. वे अपने पूर्वजों की जमीन से दूर पैदा हुए हैं. उनका खून भले ही भारतीय हो, लेकिन भारत से उनका भावनात्मक रिश्ता अभी बन रहा है. हालांकि, चौथाईवाले का मानना है कि सांस्कृतिक जुड़ाव बना रहेगा.
उन्होंने कहा, “तकनीक और संपर्क के कारण अगली पीढ़ी, भले ही उन देशों की अच्छी नागरिक बन जाए जहां वे रहती है, लेकिन भारत से उसका सांस्कृतिक जुड़ाव बना रहेगा.”
लेकिन इस जुड़ाव के साथ शर्तें नहीं जुड़ी होनी चाहिए. छात्रों के आदान-प्रदान, अकादमिक सहयोग और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से यह रिश्ता बना रह सकता है. इसके लिए मुश्किल सवाल पूछने की आजादी भी जरूरी है.
चोपड़ा ने कहा, “अगर भारतीय मूल का कोई छात्र भारत आकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों, दलितों के अधिकारों या जंगलों की कटाई पर पढ़ाई करना चाहता है, तो यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उसकी दिलचस्पी भारत विरोधी है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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