नई दिल्ली: दिल्ली पुलिस के कथित ईमेल के जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X से इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF), सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर, इंडिया (SFLC.in) और @geoblockedindia अकाउंट को हटाने के लिए कहे जाने के कुछ दिनों बाद शुक्रवार को X ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि ये नोटिस दिल्ली पुलिस ने नहीं, बल्कि “किसी जालसाज” ने भेजे थे. इन नोटिस में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की कथित मानहानि को लेकर 16 अन्य यूजर्स की पोस्ट हटाने के लिए भी कहा गया था.
X के वकील ने कोर्ट को बताया कि कंपनी की आंतरिक जांच में ईमेल फर्जी पाया गया है. इस जालसाज की पहचान करने के लिए दिल्ली पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई गई है. X ने यह भी कहा कि फिलहाल वह IFF और SFLC.in के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है.
अपने X अकाउंट के खिलाफ कार्रवाई की आशंका जताते हुए IFF और SFLC.in ने हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं. इन दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई. दोनों संगठनों की ओर से वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल पेश हुए. उन्होंने कोर्ट के सामने X की पारदर्शिता रिपोर्ट और RSS के नाम से भेजे गए कानूनी नोटिस को रखा.
IFF ने कहा कि कोर्ट ने X के बयान को रिकॉर्ड किया और याचिकाओं का निपटारा कर दिया. साथ ही, अगर कोई कार्रवाई होती है तो संगठनों को दोबारा कोर्ट जाने की छूट दी गई है.
दिप्रिंट से बात करते हुए दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह दस्तावेज फर्जी लग रहा है और पुलिस ने ऐसा कोई अनुरोध नहीं भेजा है.
पुलिस अधिकारी ने कहा, “उस दस्तावेज में जिस ईमेल का जिक्र है, वह क्राइम ब्रांच का नहीं है. यह दस्तावेज फर्जी लग रहा है. हम इसकी असलियत की जांच कर रहे हैं.”
40 URL हटाने की मांग
मंगलवार सुबह X की ओर से IFF को भेजी गई रिपोर्ट की कथित कॉपी के मुताबिक, ये अनुरोध 31 अक्टूबर और 2 नवंबर को स्पेशल कमिश्नर ऑफ पुलिस (क्राइम) हरगोबिंदर सिंह धालीवाल ने भेजे थे.
31 अक्टूबर को रात 8.06 बजे भेजी गई पहली रिपोर्ट में नोटिस से जुड़ी दो पोस्ट का जिक्र था. इनमें एक पोस्ट IFF और दूसरी SFLC.in की थी. रिपोर्ट में इन पोस्ट को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 356 के तहत “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मानहानि करने वाला” बताया गया था.
2 नवंबर को सुबह 8.51 बजे भेजी गई दूसरी रिपोर्ट में 40 URL शामिल थे. इनमें @internetfreedom, @SFLCin और @geoblockedindia के पूरे अकाउंट भी शामिल थे. इन अनुरोधों के पीछे “नफरत फैलाने वाली भाषा”, “मानहानि”, “सुरक्षा” और “कोर्ट के आदेश को लागू करने” जैसे कारण बताए गए थे.
दोनों रिपोर्ट में कोर्ट के आदेश की प्रकृति और जानकारी पूछने वाले हिस्से खाली छोड़े गए थे. दूसरी रिपोर्ट में कहा गया था कि IT नियम, 2021 के नियम 3(1)(d) और IT एक्ट की धारा 79(3)(b) के तहत “कानूनी नोटिस पर 3 घंटे के भीतर कार्रवाई करना जरूरी है”.
रिपोर्ट में जिन 16 अन्य यूजर्स के नाम थे, उनमें RSS विचारक रतन शारदा (@RatanSharda55) और कांग्रेस नेता नासिर हुसैन (@NasirHussainINC) भी शामिल हैं. IFF ने कहा कि इन यूजर्स की पोस्ट में नोटिस पर टिप्पणी की गई थी.
X ने पारदर्शिता बनाए रखने के मकसद से ये ईमेल भेजे थे. इनमें कहा गया था कि IFF कानूनी सलाह लेना चाहे तो ऐसा कर सकता है. हालांकि, ईमेल में यह नहीं बताया गया था कि X ने इन अनुरोधों पर कोई कार्रवाई की है या नहीं.
इसके अलावा, @geoblockedindia को उत्तर प्रदेश पुलिस, तेलंगाना पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग और दिल्ली पुलिस की साइबर क्राइम यूनिट की ओर से भी नोटिस मिलने की जानकारी दी गई. MediaNama की रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना पुलिस के अनुरोध में आरोप लगाया गया था कि पूरा अकाउंट भारतीय कानून का उल्लंघन करता है.
यह मामला 29 अक्टूबर की रात से शुरू हुआ, जब IFF, SFLC.in और @geoblockedindia अकाउंट चलाने वाले व्यक्ति को RSS की ओर से जारी किए जाने का दावा करने वाला दो पन्नों का नोटिस मिला.
इसमें उनसे सरकार के ब्लॉक करने के निर्देशों का विरोध बंद करने, प्रतिबंधित कंटेंट का रिकॉर्ड रखने और जियो-ब्लॉक की गई पोस्ट की जानकारी साझा करने से रोकने को कहा गया था. साथ ही, सात दिनों के भीतर लिखित पुष्टि मांगी गई थी कि वे इन निर्देशों का पालन करेंगे.
कथित नोटिस पर किसी नाम के बिना “अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता” के हस्ताक्षर थे. इसमें SFLC.in के फ्री स्पीच ट्रैकर पर भी आपत्ति जताई गई थी. आरोप लगाया गया था कि यह लोगों को VPN के जरिए ब्लॉक किए गए कंटेंट तक पहुंचने में मदद करता है.
RSS के कई पदाधिकारियों ने X पर कहा था कि यह नोटिस असली नहीं है. वहीं, SFLC.in ने भी कहा था कि उसे लगता है कि नोटिस फर्जी है. IFF ने 30 अक्टूबर को यह नोटिस और उसका जवाब सार्वजनिक किया था. साथ ही, RSS के आधिकारिक पते पर पत्र भेजकर पूछा था कि क्या उसने इस नोटिस को जारी करने की अनुमति दी थी.
1 नवंबर को RSS के नाम से एक और नोटिस मिला. इसमें कहा गया था कि यह मामला RSS से जुड़े वकीलों के संगठन अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद ने उठाया है. इसमें यह भी कहा गया था कि कई राज्यों में शिकायतें दर्ज कराई गई हैं और IFF के X अकाउंट को ब्लॉक करने की मांग की गई है.
IFF के संस्थापक-निदेशक अपार गुप्ता ने दिप्रिंट से कहा, “हमने वकील के जरिए उन्हें कानूनी नोटिस भेजा है, लेकिन उन्होंने अभी तक लिखित में जवाब नहीं दिया है. उम्मीद है कि उनका औपचारिक जवाब मिलने से यह मामला खत्म हो सकेगा.”
IFF ने नोटिस के कानूनी आधार पर सवाल क्यों उठाए
IFF का कहना है कि BNS की धारा 356 के तहत मानहानि एक गैर-संज्ञेय अपराध है. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 222 के तहत कोर्ट इस मामले का संज्ञान तभी ले सकता है, जब पीड़ित व्यक्ति शिकायत करे. BNSS की धारा 174 पुलिस को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना गैर-संज्ञेय अपराध की जांच करने से भी रोकती है.
IFF ने कहा है कि इन रिपोर्ट में न तो RSS की कोई शिकायत बताई गई है और न ही मजिस्ट्रेट का ऐसा कोई आदेश दिया गया है.
साल 2015 में श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट ने IT एक्ट की धारा 79(3)(b) की व्याख्या सीमित करते हुए कहा था कि किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को गैरकानूनी कंटेंट की “वास्तविक जानकारी” तभी मानी जाएगी, जब उसे कोर्ट का आदेश मिले या संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत आने वाली सरकारी सूचना मिले.
अक्टूबर 2025 में IT नियमों के नियम 3(1)(d) में संशोधन किया गया था, जो उसी साल 15 नवंबर से लागू हुआ. इस संशोधन के मुताबिक, कंटेंट हटाने के लिए सूचना संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के अधिकारी की ओर से भेजी जानी चाहिए. पुलिस के मामले में यह अधिकारी पुलिस उपमहानिरीक्षक (DIG) या उससे ऊपर के पद का होना चाहिए. इसमें यह भी जरूरी किया गया कि नोटिस में कार्रवाई का कारण बताया जाए और हर महीने सचिव स्तर के अधिकारी इसकी समीक्षा करें.
फरवरी 2026 में एक और संशोधन किया गया, जिसके तहत कार्रवाई करने की समयसीमा 36 घंटे से घटाकर 3 घंटे कर दी गई.
स्पेशल कमिश्नर ऑफ पुलिस का पद DIG से ऊपर होता है. हालांकि, IFF की आपत्ति यह है कि 40 URL के लिए भेजी गई रिपोर्ट में कार्रवाई का सिर्फ एक लाइन में कारण दिया गया है और किसी कोर्ट के आदेश का जिक्र नहीं है.
पुलिस की ओर से कंटेंट हटाने के अनुरोधों को भी कोर्ट में चुनौती दी गई है. सितंबर 2025 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार के सहयोग पोर्टल के खिलाफ X की याचिका खारिज कर दी थी. इस पोर्टल के जरिए सरकारी एजेंसियां कंटेंट हटाने के अनुरोध भेजती हैं. X ने इस फैसले को चुनौती दी थी. इसके बाद केंद्र सरकार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने तब से हाई कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा रखी है.
SFLC.in ने X पर लिखा, “पहले दिन से ही हम इन नोटिस की असलियत पर सवाल उठा रहे हैं. हमने बार-बार दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर पूछा है कि क्या ये नोटिस वास्तव में उसी ने जारी किए थे.”
संगठन ने इन अनुरोधों को “गैरकानूनी और जरूरत से ज्यादा सख्त” बताया और पुलिस से उन कोर्ट के आदेशों को सार्वजनिक करने की मांग की, जिनके आधार पर ये नोटिस भेजे गए थे. संगठन ने यह भी कहा कि नोटिस में दिए गए पते पर दिल्ली पुलिस को भेजा गया ईमेल वापस आ गया था.
IFF ने कहा कि पहले नोटिस से पहले के तीन हफ्तों में उसने ऐसे 86 लोगों की मदद की थी, जिनके अकाउंट भारत में सस्पेंड कर दिए गए थे या जिनकी पोस्ट को भारत में दिखाने पर रोक लगा दी गई थी. SFLC.in के ट्रैकर के मुताबिक, अक्टूबर के पहले 29 दिनों में करीब 268 कंटेंट पर रोक लगाई गई और 83 अकाउंट पर प्रतिबंध लगाया गया.
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने “RSS की कार्रवाई करने वाली शाखा की तरह व्यवहार किया है”. CPI(ML) लिबरेशन ने भी इन अनुरोधों की निंदा की.
मंगलवार शाम तक कथित कंटेंट हटाने के अनुरोधों पर दिल्ली पुलिस या RSS की ओर से कोई सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया था.
IFF ने पुलिस से दोनों रिपोर्ट वापस लेने और इनके पीछे की शिकायत और कानूनी आधार सार्वजनिक करने की मांग की है. उसने X से भी कहा है कि वह इन रिपोर्ट के आधार पर कोई कार्रवाई न करे और इन्हें लुमेन डेटाबेस में सार्वजनिक करे. साथ ही, RSS से यह बताने को कहा है कि क्या उसने दोनों में से किसी नोटिस को जारी करने की अनुमति दी थी.
संगठन ने कहा, “IFF अपनी पोस्ट नहीं हटाएगा.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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