हांगकांग: हथियार प्रणालियों और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में इस्तेमाल होने वाले रेयर अर्थ खनिजों की सप्लाई सीमित करने के चीन के कदमों का असर अमेरिका से कहीं ज्यादा देशों पर पड़ा है. चीन ने डॉनल्ड ट्रंप की ओर से चीनी सामान पर लगाए गए टैरिफ के जवाब में यह कदम उठाया था. अप्रैल 2025 में अमेरिकी टैरिफ बढ़कर 145 प्रतिशत तक पहुंच गए थे. इसके बाद बीजिंग ने रणनीतिक खनिजों के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा कर दिया. इससे जापान समेत कई दूसरे देशों की कमजोरियां भी सामने आ गईं.
फाइनेंशियल टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जापान के पास यिट्रियम का भंडार खत्म होने में अब कुछ ही महीने बाकी हो सकते हैं. यिट्रियम एक अहम रेयर अर्थ तत्व है, जिसका इस्तेमाल जेट इंजन, लेजर और गाइडेंस सिस्टम के निर्माण और रखरखाव में होता है.
अमेरिकी रक्षा क्षेत्र की सप्लाई चेन जापान में बने उन पुर्जों पर निर्भर करती है, जिनमें यिट्रियम का इस्तेमाल होता है. ऐसे में जापान से इसकी सप्लाई में रुकावट अमेरिकी रक्षा उपकरणों के निर्माण के लिए भी खतरा बन सकती है. चीन की ताकत रेयर अर्थ की पूरी सप्लाई चेन पर उसके दबदबे से आती है. दुनिया में रेयर अर्थ खनिजों के कुल खनन में चीन की हिस्सेदारी करीब 60-70 प्रतिशत है, जबकि इन्हें अलग करने और शुद्ध करने की प्रक्रिया में उसकी हिस्सेदारी करीब 90 प्रतिशत है.
इस साल की शुरुआत में चीन ने 20 जापानी कंपनियों पर निर्यात नियंत्रण लगा दिया. इसके तहत इन कंपनियों के लिए सात रेयर अर्थ तत्वों और उनसे जुड़ी सामग्रियों तक पहुंच सीमित कर दी गई. ये सभी चीन की दोहरे इस्तेमाल वाले सामान की निर्यात नियंत्रण सूची में शामिल हैं. इन कदमों से 2025 में शुरू की गई सप्लाई पर पाबंदियां और सख्त हो गईं. उस समय वॉशिंगटन ने चीनी आयात पर टैरिफ बढ़ाने का फैसला किया था.
इन पाबंदियों के बाद से जापान और अमेरिका को यिट्रियम की सप्लाई लगातार अनियमित होती गई है. इसकी खेप कम हो रही हैं और दो खेपों के बीच लंबे अंतराल आ रहे हैं. इस अनिश्चितता के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत बढ़कर 1,150 डॉलर प्रति किलोग्राम हो गई है. बाजार से जुड़ी जानकारी देने वाले प्लेटफॉर्म Argus के मुताबिक, यह चीन के घरेलू बाजार की कीमत से 127 गुना से भी ज्यादा है.

जापान, अमेरिका, भारत और यूरोपीय संघ जैसे रक्षा उपकरण बनाने वाले अहम देश अब यिट्रियम की सप्लाई के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए वे वियतनाम, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से इसकी खरीद कर रहे हैं. हालांकि, चीन की तुलना में वैश्विक बाजार में इन वैकल्पिक सप्लायर देशों की हिस्सेदारी अब भी बहुत कम है.
रक्षा उपकरणों के निर्माण में यिट्रियम की अहमियत
यिट्रियम एक नरम, चांदी जैसी चमक वाली धातु है. रक्षा उपकरणों के निर्माण में इसका खास महत्व है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से आधुनिक लड़ाकू विमानों में लगने वाले जेट इंजनों के निर्माण और रखरखाव में होता है. इनमें अमेरिका का F-35 और भारत का तेजस Mk2 भी शामिल हैं. इसके अलावा इसका इस्तेमाल लेजर और गाइडेंस सिस्टम में भी किया जाता है.
आधुनिक जेट इंजन बहुत ज्यादा तापमान पर काम करते हैं. इनमें तापमान 1,600 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा हो सकता है. यह तापमान उन निकेल आधारित खास धातुओं के पिघलने के तापमान से भी अधिक होता है, जिनसे ये इंजन बनाए जाते हैं. यिट्रियम से बनी गर्मी रोकने वाली परतें इंजन के धातु वाले हिस्सों को इस अत्यधिक गर्मी से बचाती हैं. इससे इन हिस्सों की मजबूती बनी रहती है और इंजन ज्यादा समय तक काम कर पाता है.
यिट्रियम की जगह किसी दूसरी धातु का इस्तेमाल करना खास तौर पर मुश्किल है, क्योंकि उपलब्ध विकल्प उतना अच्छा काम नहीं करते. कैल्शियम ऑक्साइड और मैग्नीशियम ऑक्साइड जैसे पदार्थ गर्मी को रोक सकते हैं, लेकिन इनसे बनी परतें कम मजबूत होती हैं. इसलिए इन वैकल्पिक परतों के जल्दी घिसने, उनमें दरार आने और खराब होने की आशंका ज्यादा रहती है. इससे इंजन के रखरखाव की जरूरत बढ़ सकती है और उसकी काम करने की क्षमता घट सकती है.
जेट इंजन के अलावा यिट्रियम का इस्तेमाल लेजर और गाइडेंस सिस्टम में भी होता है. ये सिस्टम युद्ध और सैन्य अभियानों के दौरान सटीक निशाना लगाने और खतरों का पता लगाने में मदद करते हैं. इनमें लेजर रेंजफाइंडर, लेजर से निर्देशित गोला-बारूद और लेजर चेतावनी सिस्टम शामिल हैं. यिट्रियम गर्मी को बहुत अच्छी तरह संभाल सकता है. इससे लेजर की किरणें अपना रास्ता नहीं बदलतीं और निशाना बेहद सटीक रहता है. यही वजह है कि गाइडेंस सिस्टम में भी इसका कोई आसान विकल्प नहीं है.
चीन पर दुनिया की निर्भरता
रेयर अर्थ खनिजों की प्रोसेसिंग पर चीन के दबदबे के कारण बड़ी अर्थव्यवस्थाएं किस हद तक उस पर निर्भर हैं, यह उनके आयात के आंकड़ों से पता चलता है. विश्व बैंक के 2025 के व्यापार आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका और यूरोपीय संघ अपने यिट्रियम आधारित उत्पादों के 70 प्रतिशत से ज्यादा आयात चीन से करते हैं.

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के मुताबिक, अमेरिका अपनी यिट्रियम की जरूरतों के लिए पूरी तरह आयात पर निर्भर है. विश्व बैंक के आंकड़े भी बताते हैं कि 2023 से 2025 के तीन साल के औसत के आधार पर अमेरिका के कुल यिट्रियम आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 93 प्रतिशत है.
जापान की चीन पर सीधी आयात निर्भरता अपेक्षाकृत कम है. वह अपनी जरूरत का करीब 66 प्रतिशत चीन से आयात करता है और बाकी सप्लाई वियतनाम तथा थाईलैंड जैसे देशों से लेता है. हालांकि, जापान के सीमा शुल्क के आंकड़ों को करीब से देखने पर पता चलता है कि दूसरे देशों से आयात की हिस्सेदारी ज्यादा दिखने की वजह कुल आयात में आई गिरावट है. 2024 में जापान की जितनी मांग थी, उसकी तुलना में चीन के अलावा दूसरे देशों के सप्लायर उसकी जरूरत का सिर्फ करीब 7 प्रतिशत ही पूरा कर पाते हैं. इसलिए चीन की हिस्सेदारी में आई गिरावट का मतलब यह नहीं है कि दूसरे देशों से सप्लाई में कोई बड़ी बढ़ोतरी हुई है, बल्कि कुल आयात ही कम हुआ है.

भारत की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. भारत में 99.999 प्रतिशत शुद्धता वाला यिट्रियम बड़े व्यावसायिक स्तर पर शुद्ध करने की क्षमता नहीं है. वह अपनी जरूरत का करीब 82 प्रतिशत चीन से आयात करता है. असल निर्भरता इससे भी ज्यादा हो सकती है. विश्व बैंक के आंकड़ों में अमेरिका को रेयर अर्थ धातुओं, स्कैंडियम और यिट्रियम की व्यापक श्रेणी में भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बताया गया है, जबकि अमेरिका खुद यिट्रियम का उत्पादन या निर्यात नहीं करता.
भारत की रक्षा विमानन से जुड़ी योजनाओं के लिए इसके खास मायने हैं. आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत तेजस Mk2 और AMCA Mk1 (एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट) जैसे प्रमुख लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक के F414 इंजन इस्तेमाल किए जाने की उम्मीद है. इन इंजनों के लिए यिट्रियम की जरूरत चीन से होने वाली सप्लाई पर निर्भर है. भारत जब AMCA Mk2 के लिए अपने इंजन विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब खनिजों की सप्लाई के दूसरे स्रोत तलाशना और देश के भीतर इनकी प्रोसेसिंग की क्षमता विकसित करना और भी जरूरी हो जाएगा.
चीन का दबदबा कैसे बना?
यिट्रियम की सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा मुख्य रूप से खनन के बजाय उसे शुद्ध करने और प्रोसेस करने की क्षमता पर टिका है. पृथ्वी की ऊपरी सतह में यिट्रियम काफी मात्रा में पाया जाता है. ऑस्ट्रेलिया, भारत, चीन, रूस, अमेरिका और वियतनाम समेत कई देशों में इसके बड़े भंडार हैं. चीन की रणनीतिक बढ़त इस बात में है कि वह इस तत्व को अलग करके 99.999 प्रतिशत तक शुद्ध कर सकता है. सैन्य इस्तेमाल के लिए इतनी शुद्धता जरूरी होती है.

यिट्रियम को शुद्ध करना तकनीकी रूप से बहुत मुश्किल काम है. इसमें एक के बाद एक सैकड़ों चरणों में प्रोसेसिंग करनी पड़ती है. कई दूसरे रेयर अर्थ तत्वों के मुकाबले यिट्रियम के रासायनिक गुण भारी रेयर अर्थ तत्वों, जैसे होल्मियम और डिस्प्रोसियम, से मिलते-जुलते हैं. यह जटिल खनिज भंडारों में भी पाया जाता है, जिनमें जेनोटाइम और मोनाजाइट शामिल हैं. इस वजह से इसे दूसरे तत्वों से अलग करना और मुश्किल हो जाता है.
बहुत ज्यादा शुद्धता वाला यिट्रियम तैयार करने के लिए प्रोसेसिंग के अतिरिक्त चरणों की जरूरत होती है. चीन ने कई दशकों में ऐसी औद्योगिक क्षमता विकसित की है, जिससे वह दुनिया की यिट्रियम की 90-95 प्रतिशत से ज्यादा जरूरत पूरी कर सकता है. यह स्थिति अलग-अलग उद्योगों में सरकार की लगातार मदद से किए गए निवेश और बड़े पैमाने पर खनन और प्रोसेसिंग का नतीजा है. पहले इन कामों से पर्यावरण को भी काफी नुकसान हुआ था. इसलिए दूसरे देशों में ऐसी क्षमता तैयार करना सिर्फ पैसा लगाने का मामला नहीं है. इसके लिए पूरा औद्योगिक ढांचा खड़ा करना होगा.
रेयर अर्थ तत्वों को अलग करने और शुद्ध करने की वैकल्पिक क्षमता तैयार करना जटिल काम है और इसमें काफी समय लगता है. किसी रेयर अर्थ रिफाइनिंग प्लांट को शुरुआती जगह चुनने से लेकर व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने तक करीब चार से सात साल लग सकते हैं. इसमें खतरनाक रसायनों की प्रोसेसिंग के लिए पर्यावरण संबंधी मंजूरी लेना, खास तरह के उपकरण खरीदना या बनाना, प्लांट का निर्माण करना और रासायनिक प्रक्रियाओं को इस तरह तैयार करना शामिल है कि लगातार 99.999 प्रतिशत शुद्धता वाला यिट्रियम बनाया जा सके.
यह अनुमान भी कम हो सकता है. अमेरिका में सिर्फ रिफाइनिंग प्रोजेक्ट के लिए मंजूरी लेने में ही सात से दस साल लग सकते हैं. इसके बाद औद्योगिक स्तर पर व्यावसायिक इस्तेमाल के लायक उच्च शुद्धता वाला यिट्रियम बनाने के लिए रासायनिक प्रक्रियाओं को शुरू करने और उत्पादन बढ़ाने में कई और साल लग सकते हैं.
मलेशिया और वियतनाम जैसे देश अब प्रोसेसिंग और सप्लाई के वैकल्पिक केंद्र के रूप में उभर रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया की रेयर अर्थ खनन कंपनी Lynas ने भी दिखाया है कि चीन के बाहर ऐसी क्षमता विकसित की जा सकती है. हालांकि, अभी ये प्रयास बड़े पैमाने पर चीन के दबदबे को चुनौती देने के लिए काफी नहीं हैं.
यिट्रियम से आगे: बड़ा भू-राजनीतिक मुकाबला
यिट्रियम सप्लाई चेन की इकलौती कमजोरी नहीं है. यह अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते आर्थिक और तकनीकी टकराव का एक हिस्सा है. यह टकराव अब कई मोर्चों पर चल रहा है. इसमें अहम खनिजों, आधुनिक तकनीकों और औद्योगिक उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली चीजों पर नियंत्रण राष्ट्रीय सुरक्षा और भू-राजनीतिक दबाव बनाने का जरिया बन गया है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच सितंबर में हुई बैठक जैसे उच्चस्तरीय कूटनीतिक प्रयासों से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है. लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव की असली वजहें अब भी बनी हुई हैं. बीजिंग गैलियम, जर्मेनियम और यिट्रियम जैसे रणनीतिक खनिजों के निर्यात के लिए लाइसेंस की शर्तें लागू रखे हुए है. साथ ही, वह संवेदनशील तकनीकों और भारी औद्योगिक उपकरणों पर और पाबंदियां लगाने पर विचार कर रहा है. दूसरी ओर, वॉशिंगटन आधुनिक AI हार्डवेयर और DeepSeek जैसे चीनी टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण सख्त कर रहा है. इसके साथ ही, AI Overwatch Act जैसी पहल के जरिए विधायी निगरानी भी बढ़ा रहा है.
कुल मिलाकर, संकेत यही हैं कि सप्लाई चेन पर पाबंदियां और नियमों से जुड़ी रुकावटें अमेरिका और चीन के आर्थिक रिश्तों का अहम हिस्सा बनी रहेंगी. ऐसे में कुछ अहम सवाल अब भी अनसुलझे हैं: क्या निर्यात नियंत्रण की वजह से असल में जरूरी सामान की सप्लाई पूरी तरह रुक सकती है? रक्षा से जुड़े अहम कार्यक्रमों को सुरक्षित रखने के लिए देशों के पास कितने महीनों का भंडार होना चाहिए? और क्या देशों को मिसाइल गाइडेंस और सटीक ऑप्टिकल सेंसर जैसी रक्षा तकनीकों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जो बहुत कम मात्रा में इस्तेमाल होने वाली उच्च शुद्धता वाली सामग्रियों से भी रणनीतिक रूप से बड़ा फायदा दे सकती हैं?
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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