हर चुनाव के दो पहलू होते हैं. एक पूरी तरह आंकड़ों से जुड़ा होता है और दूसरा उसके मायने बताता है. आइए, इन दोनों को मिलाकर समझते हैं कि अभी अमेरिका में क्या हुआ है.
आंकड़ों के लिहाज से देखें तो मध्यावधि चुनाव (मिड टर्म चुनाव) में राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप को बहुत बड़ी हार मिली है. इसे अंग्रेजी में ‘शेलैकिंग’ (करारी शिकस्त) कहा जाता है. यह शब्द बराक ओबामा के समय लोकप्रिय हुआ था. 2008 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद ओबामा को 2010 के मध्यावधि चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. भले ही इन चुनावों में राष्ट्रपति का नाम बैलेट पर नहीं होता, लेकिन हर कोई जानता है कि मध्यावधि चुनाव राष्ट्रपति के कामकाज पर जनता की राय माने जाते हैं.
2026 में ट्रंप को मिली हार 2010 में ओबामा को मिली हार से भी बड़ी है. उस समय डेमोक्रेट्स को हर जगह हार मिली थी, लेकिन वे सीनेट में मामूली बहुमत बचाने में कामयाब रहे थे. इस बार राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप कांग्रेस के दोनों सदनों में हार गए हैं. अब विधायिका पूरी तरह उनके नियंत्रण से बाहर हो गई है. प्रतिनिधि सभा के आखिरी नतीजे आने के बाद डेमोक्रेट्स के पास वहां 1990 के बाद सबसे ज्यादा सीटें हो सकती हैं.
अब इन चुनावों के मायने पर बात करते हैं. खास तौर पर उन नतीजों पर, जिनका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है.
जेरिमैंडरिंग को हराया जा सकता है
पहली बात, अमेरिका में चुनावी नक्शे को बदलने को लेकर लंबे समय से लड़ाई होती रही है, जिससे मौजूदा सत्ता में बैठे लोगों को फायदा मिले और चुनावी मुकाबला उनके पक्ष में झुक जाए. इसे जेरिमैंडरिंग या चुनावी क्षेत्रों का नए सिरे से बंटवारा कहा जाता है. अमेरिका के कई राज्यों में हर दस साल में ऐसा करने की अनुमति है. अमेरिका की यह प्रथा हंगरी और हाल के दिनों में भारत तक भी पहुंची है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने कई राज्यों में दस साल की तय अवधि से पहले ही चुनावी क्षेत्रों का नए सिरे से बंटवारा कराने की कोशिश की. उनका सबसे ज्यादा जोर टेक्सास पर था. यह अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है और रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण वाला सबसे बड़ा राज्य भी. ट्रंप राज्य की विधानसभा से अपने पक्ष में पांच चुनावी क्षेत्र बनवाने में कामयाब रहे. लेकिन वे इनमें से सिर्फ एक ही जीत सके. कुछ दूसरे राज्यों में भी ऐसा ही हुआ, जहां चुनावी क्षेत्रों का नए सिरे से बंटवारा किया गया था.
इससे सबक मिलता है कि चुनावी मुकाबले को अपने पक्ष में झुकाने की कोशिशों को भी हराया जा सकता है, बशर्ते विपक्षी पार्टियां लोगों का समर्थन जुटाएं. बड़े अंतर से मिली जीत जेरिमैंडरिंग की काट बन सकती है. कुछ महीने पहले हंगरी ने भी यही संदेश दिया था. जेरिमैंडरिंग के जरिए बनाए गए चुनावी क्षेत्रों में भी जीत हासिल की जा सकती है. यही राजनीति का काम है. राजनीति इस कहावत के मायने बदल सकती है कि आबादी का स्वरूप ही भविष्य तय करता है.
विधायिका की जवाबदेही की वापसी
दूसरी बात, अगर लोकतंत्र में सिर्फ चुनावों पर भरोसा किया जाए, तो उसके सत्ता में बैठे लोगों की मनमानी का जरिया बन जाने का खतरा रहता है. ट्रंप पर अब तक अगर कोई रोक लगी थी, तो वह न्यायपालिका की ओर से थी. खासकर निचली संघीय अदालतों ने उनके फैसलों पर रोक लगाई थी. विधायिका की ओर से कोई रोक नहीं थी, क्योंकि कांग्रेस के दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण था.
अब अमेरिकी राजनीति का पुराना सिद्धांत, ‘बंटी हुई सत्ता के साथ शासन’, फिर से लौट रहा है. अब अमेरिकी कांग्रेस के साथ समझौते करने होंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति के पास विधायिका से पारित विधेयकों पर वीटो लगाने का अधिकार है. इससे वे कानून बनने से रुक जाते हैं. लेकिन व्यावहारिक तौर पर राष्ट्रपति के सामने आने वाले हर विधेयक पर वीटो लगाना संभव नहीं है. किसी न किसी रूप में विधायिका की जवाबदेही फिर से शुरू होगी.
19वीं सदी के राजनीतिक दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे ने ‘सुपरमैन’ (Übermensch) की अवधारणा दी थी. यह ऐसा व्यक्ति है जो ‘सत्ता की इच्छा’ से प्रेरित होता है. इस अवधारणा का इस्तेमाल ट्रंप के लिए भी किया गया है. साथ ही मोदी, ओरबान और एर्दोआन के लिए भी. इन चुनावों ने सुपरमैन की ताकत पर लगाम लगाने के हालात पैदा कर दिए हैं. अब सरकार और विधायिका के बीच गंभीर टकराव देखने को मिल सकते हैं.
पहचान की राजनीति के सामने रोजमर्रा के मुद्दे
तीसरी बात, पहचान की राजनीति को बड़ा झटका लगा है. ट्रंप की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत श्वेत बहुसंख्यकवाद था. इसमें हिस्पैनिक समुदाय का भी काफी समर्थन मिला था. अश्वेत अमेरिकियों के साथ हिस्पैनिक अमेरिका का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है. लेकिन अब हिस्पैनिक बड़ी संख्या में डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर लौट आए हैं. दरअसल, वोटरों के सभी अहम समूहों में डेमोक्रेट्स की ओर वापसी दिखी है. कुछ में यह कम है, तो कुछ में ज्यादा.
अगर एग्जिट पोल सही हैं, तो सबसे बड़ा बदलाव हिस्पैनिक समुदाय, 30 साल से कम उम्र के युवा वोटरों (श्वेत और गैर-श्वेत दोनों) और कम आय वाले वोटरों के बीच हुआ है. शहरों और गांवों के बीच के अंतर को देखें, तो ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों के काउंटी में भी डेमोक्रेट्स को पहले से ज्यादा समर्थन मिला है. ये वही इलाके हैं, जहां ट्रंप का आधार सबसे मजबूत था.
क्या लोगों की पहचान उनके हितों से ज्यादा मायने रखती है? राजनीतिक विश्लेषण में हमेशा इस सवाल पर बहस होती रही है. इसका कोई एक जवाब हर समय और हर जगह लागू नहीं होता. जवाब हालात के हिसाब से बदलते हैं. ट्रंप पहचान की राजनीति में माहिर थे, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े मुद्दों के सामने उनकी यह राजनीति कमजोर पड़ गई.
तेल और डीजल कितने महंगे हैं? यह ऐसे समाज में अहम सवाल है, जहां लोग आने-जाने के लिए गाड़ियों पर निर्भर हैं. स्वास्थ्य सेवाएं कितनी सस्ती और लोगों की पहुंच में हैं? निजी स्वास्थ्य व्यवस्था वाले अमेरिका में यह सवाल यूरोप के मुकाबले ज्यादा अहम है, जहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हैं. क्या युवा जोड़े घर खरीद सकते हैं? यह अमेरिका की पुरानी परंपरा रही है. इसलिए ब्याज दरें मायने रखती हैं. क्या लोगों को नौकरियां मिलेंगी? ऐसे में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एक खतरा है. ईरान के साथ युद्ध या टैरिफ को लोग तब तक स्वीकार नहीं कर सकते, जब तक इनसे जरूरी सामान की कीमतें न बढ़ें.
ट्रंप की पहचान की राजनीति को सबसे बड़ा झटका मिशिगन में लगा. यहां उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी के एक मुस्लिम उम्मीदवार को ‘जिहादी’ और ‘आतंकवादी’ कहा था. उन्होंने कहा था कि उसे कैपिटल हिल में घुसने देने से पहले मेटल डिटेक्टर से जांचा जाना चाहिए. यह उम्मीदवार मिस्र-अमेरिकी मूल का है, इस्लाम में उसकी गहरी आस्था है और वह रोड्स स्कॉलर रह चुका डॉक्टर है. अब्दुल एल-सayed ने बड़े अंतर से जीत हासिल की है और वह अमेरिका के पहले मुस्लिम सीनेटर होंगे. मेटल डिटेक्टर से जांच की बात ने वोटरों को उनसे दूर नहीं किया.
रिपब्लिकन पार्टी के मजबूत गढ़ कमजोर पड़े
चौथी बात, ‘रूबी रेड’ यानी ऐसे राज्य जहां रिपब्लिकन पार्टी की पकड़ बहुत मजबूत हो और जहां डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत की कोई उम्मीद न हो, अब इस धारणा को बड़ा झटका लगा है. कम से कम फिलहाल तो ऐसा ही है.
कंसास ने करीब एक सदी, यानी ठीक 94 साल बाद अपना पहला डेमोक्रेटिक सीनेटर चुना है. टेक्सास में 1988 के बाद पहली बार डेमोक्रेटिक सीनेटर चुना गया है. साउथ कैरोलाइना में 1998 और नॉर्थ कैरोलाइना में 2008 के बाद पहली बार डेमोक्रेटिक सीनेटर चुना गया है. इस सूची में दो और ऐसे राज्यों को जोड़ सकते हैं, जहां डेमोक्रेट्स ने जीत हासिल की है. आयोवा लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी का गढ़ रहा है और ओहायो भी हाल के वर्षों में ऐसा ही रहा है. आखिर में, तीन दशक से रिपब्लिकन सीनेटर रहीं सुसान कॉलिन्स मेन में चुनाव हार गईं.
कैलिफोर्निया के बाद अमेरिका की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य टेक्सास शायद सबसे ज्यादा बदला है. यहां 38 साल में पहली बार डेमोक्रेटिक सीनेटर चुना गया है. जेम्स तालारिको ने केन पैक्सटन को हराया है. इसके अलावा, गवर्नर चुनाव में भी बड़ा उलटफेर हुआ है. रिपब्लिकन पार्टी के ग्रेग एबॉट, जो राज्य के सबसे ताकतवर गवर्नर थे, एक हिस्पैनिक महिला जीना हिनोयोसा से हार गए. हिनोयोसा ने शुरुआत में पिछड़ने के बावजूद मुकाबला किया और ट्रंप के प्रति एबॉट के समर्थन का विरोध किया.
हिनोयोसा और तालारिको, दोनों के चुनाव प्रचार में एलॉन मस्क को निशाना बनाया गया. मस्क ने इस चुनाव में 15 करोड़ से 20 करोड़ डॉलर तक खर्च किए. इससे टेक्सास का चुनाव अमेरिका का सबसे महंगा चुनाव बन गया. लेकिन पैसा वोटरों का पर्याप्त प्यार नहीं खरीद सका.
ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता अमेरिका
आखिर में, अमेरिका के चुनावों की कोई भी चर्चा अश्वेत अमेरिकी समुदाय के प्रदर्शन पर नजर डाले बिना पूरी नहीं हो सकती. इस बार अश्वेत उम्मीदवारों ने राज्य के गवर्नर पद के पांच चुनाव जीते हैं. इनमें कीशा लांस बॉटम्स भी शामिल हैं, जो जॉर्जिया में जीत के बाद अमेरिका के किसी राज्य की गवर्नर बनने वाली पहली अश्वेत महिला होंगी.
राजनीतिक सिद्धांतकार हन्ना पिटकिन अपनी ‘वर्णनात्मक प्रतिनिधित्व’ (descriptive representation) की अवधारणा के लिए जानी जाती हैं. इससे उनका मतलब था कि चुनी हुई संस्थाएं आबादी की कुछ अहम पहचान, जैसे जातीय और सामाजिक समूहों के आधार पर उसका कितना प्रतिनिधित्व करती हैं.
भारत में इस शब्द का मतलब हमेशा जाति, धर्म और भाषा से रहा है और हाल के दिनों में इसमें लिंग भी जुड़ गया है. अमेरिका में इसका मतलब नस्ल, जातीय पहचान और लिंग से रहा है.
इन चुनावों के बाद अगले दो साल तक अमेरिका की चुनी हुई सत्ता की तस्वीर पिछले दो साल के मुकाबले देश की असली आबादी से ज्यादा मिलती-जुलती होगी. हमें नहीं पता कि 2028 के बाद भी यह जारी रहेगा या नहीं. लेकिन फिलहाल यही स्थिति है. और इस तरह सबको प्रतिनिधित्व मिलना शायद 2026 के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों की सबसे बड़ी जीत है.
आशुतोष वार्ष्णेय ब्राउन यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के ‘सोल गोल्डमैन प्रोफ़ेसर’ हैं, और साथ ही राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर भी हैं. विचार निजी हैं.
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