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Friday, 6 November, 2026
होममत-विमतबंगाल ने बदलाव के लिए वोट दिया था, लेकिन सत्ता में बीजेपी के 5 महीने में भी वही अराजकता दिख रही है

बंगाल ने बदलाव के लिए वोट दिया था, लेकिन सत्ता में बीजेपी के 5 महीने में भी वही अराजकता दिख रही है

अंडे फेंकने, आरोपियों को अधनंगा करके घुमाने, पुलिस मुठभेड़ों में हत्या और खाप पंचायतों जैसे फैसले पश्चिम बंगाल में आम होते जा रहे हैं. टीएमसी के शासन में फैली अराजकता का जवाब यह नहीं होना चाहिए.

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‘भॉय आउट, भरोसा इन’, जिसका मोटे तौर पर मतलब है ‘डर खत्म, भरोसा कायम’, इस साल की शुरुआत में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के राजनीतिक अभियान का नारा था. पश्चिम बंगाल में पिछले 15 साल से टीएमसी के शासन में अराजकता झेल रहे मतदाताओं को यह नारा काफी पसंद आया था.

चाहे पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से बलात्कार की घटनाओं पर दिए गए असंवेदनशील बयान हों, 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा हो, जिसमें पूरे राज्य में बीजेपी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को निशाना बनाया गया था, या हाल ही में आरजी कर बलात्कार और हत्या का मामला, जिसमें लोग बनर्जी के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए थे. पश्चिम बंगाल बदलाव की मांग कर रहा था.

बीजेपी ने बनर्जी की टीएमसी को हराकर इस साल मई में सत्ता संभाली थी. पार्टी ने ‘सुशासन’ का वादा किया था, लेकिन पिछले कुछ महीनों में अंडे फेंकने, लोगों को अधनंगा करके घुमाने और पुलिस मुठभेड़ों में हत्याओं जैसी घटनाओं ने नई सरकार में न्याय की व्यवस्था को ही मजाक बना दिया है. बंगाल के जिन मतदाताओं ने बदलाव के लिए वोट दिया था, उन्होंने ऐसे हालात की उम्मीद नहीं की थी.

खाप पंचायत के तरीके से न्याय

28 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल में 24 घंटे के अंदर दो अलग-अलग पुलिस मुठभेड़ों में दो लोगों की गोली लगने से मौत हो गई. इनमें से एक पर बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या और दूसरे पर नाबालिग लड़की के बलात्कार और हत्या का आरोप था. पुलिस के बयान के मुताबिक, दोनों घटनाओं में लगभग एक जैसी कहानी सामने आई. आरोपियों को घटनास्थल पर ले जाकर अपराध को दोबारा दिखाने की प्रक्रिया की जा रही थी. इसी दौरान उन्होंने पुलिस टीम से हथियार छीन लिए और जवाबी गोलीबारी में मारे गए.

रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई के बाद पश्चिम बंगाल में यह दूसरी घटना है, जिसमें बलात्कार और हत्या के आरोपी की पुलिस मुठभेड़ में मौत हुई है. 8 जुलाई को दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में 13 साल की लड़की के बलात्कार और हत्या के आरोपी प्रभास मंडल को पुलिस मुठभेड़ में गोली मार दी गई थी.

उस समय पुलिस का कहना था कि आरोपी को अपराध वाली जगह पर ले जाकर घटना को दोबारा दिखाने के दौरान उसने एक पुलिसकर्मी का हथियार छीन लिया और पुलिस टीम पर गोली चला दी. जवाबी गोलीबारी में उसकी मौत हो गई.

ममता बनर्जी की सरकार के दौरान बलात्कार का मुद्दा आम लोगों और राजनीतिक चर्चाओं में छाया रहा था. दो साल पहले कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक ट्रेनी डॉक्टर के बलात्कार और हत्या की घटना और उसके बाद हुए विरोध प्रदर्शनों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. दुनिया भर के मीडिया संस्थानों ने भी इस मामले पर गहरी नज़र रखी थी.

15 अगस्त 2024 को बीबीसी ने खबर दी थी कि पश्चिम बंगाल में हजारों महिलाएं बलात्कार और हत्या के विरोध में सड़कों पर उतरी थीं. ‘रीक्लेम द नाइट’ मार्च, 31 साल की महिला की हत्या के बाद करीब एक हफ्ते तक चले बड़े विरोध प्रदर्शनों का नतीजा था.

इसके बाद आने वाले हफ्तों और महीनों में जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल छात्रों ने पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पतालों में अनिश्चितकालीन हड़ताल और काम बंद आंदोलन शुरू कर दिया था. राज्य में बीजेपी, कांग्रेस और वामपंथी दलों समेत सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियों और उनके छात्र संगठनों ने अलग-अलग विरोध मार्च निकाले थे. इन प्रदर्शनों में राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों पर मामले में सबूतों से छेड़छाड़ करने के आरोप लगाए गए थे.

उस समय विपक्षी नेताओं और आम लोगों को आरजी कर मामले की निष्पक्ष जांच करने की प्रशासन की इच्छा पर शक होने की एक बड़ी वजह ममता बनर्जी के पहले दिए गए बलात्कार से जुड़े असंवेदनशील बयान थे.

कभी उन्होंने कहा कि लड़कियों को रात में बाहर जाने की इजाजत नहीं होनी चाहिए, कभी सवाल उठाया कि क्या बलात्कार की घटना असल में ‘प्रेम संबंध या गर्भावस्था’ का मामला थी, तो कभी बलात्कार पीड़िता के बयान को मनगढ़ंत कहानी बताया. इस तरह राज्य की पहली और अब तक की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री ने एक बेहद गंभीर अपराध को मामूली बताने का काम किया था.

अब पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा है कि अगर कोई महिलाओं पर हाथ उठाने की हिम्मत करेगा, तो पुलिस ‘जो भी जरूरी कदम होगा, वह उठाएगी’. वहीं, राज्य की शहरी विकास और नगर निकाय मामलों की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने फेसबुक पर ‘मुठभेड़’ शीर्षक से एक कविता पोस्ट की है.

एक रिपोर्ट में कहा गया है, “हालांकि, उन्होंने (अग्निमित्रा पॉल ने) पुलिस की कार्रवाई का सीधे तौर पर जिक्र नहीं किया, लेकिन उनकी पोस्ट का समय बताता है कि यह मंगलवार की घटनाओं (दो मुठभेड़ों) के जवाब में थी. बांग्ला में लिखी गई उनकी कविता की शुरुआती पंक्तियों में पॉल ने अपराध खत्म करने की बात कही और कहा कि लोगों को शांति से जीने का मौका मिलना चाहिए.”

सत्ताधारी बीजेपी को बलात्कार के आरोपियों की मुठभेड़ में मौत पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती, भले ही अदालतों को इन मामलों की जांच करने का मौका भी न मिला हो, लेकिन विपक्ष और मानवाधिकार संगठनों को यह तरीका पसंद नहीं आ रहा है.

टीएमसी और सीपीआई (एम) दोनों ने इस मुद्दे पर सरकार की कड़ी आलोचना की है. ममता बनर्जी के गुट वाली टीएमसी के विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने कहा है कि मुठभेड़ से प्रचार तो मिल सकता है, लेकिन देश की कानूनी व्यवस्था का पालन करना जरूरी है. उन्होंने बताया कि बनर्जी सरकार ने बलात्कार के मामलों में जल्द सजा दिलाने के लिए कानून में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की थी.

सीपीआई (एम) नेता सुजन चक्रवर्ती ने सवाल उठाया कि आरोपी पुलिस से हथियार छीनने में आखिर कैसे कामयाब हो सकते हैं. वहीं, मानवाधिकार संगठन एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स ने सवाल उठाया कि आरोपियों को आधी रात में अपराध वाली जगह पर घटना को दोबारा दिखाने के लिए किन हालात में ले जाया गया था.

‘पुलिस की कार्रवाई ने कई असहज सवाल खड़े किए’

पश्चिम बंगाल की नई सरकार सिर्फ खाप पंचायतों के तरीके से तुरंत न्याय देने का तरीका ही नहीं अपना रही है. अक्टूबर के आखिरी हफ्ते में तीन लोगों को कथित तौर पर सार्वजनिक जगह पर निर्वस्त्र चलने के लिए मजबूर किया गया था. इसके बाद कोलकाता पुलिस ने उन्हीं आरोपियों को उसी इलाके में घुमाया. अपराध की घटना को दोबारा दिखाने के दौरान उन्हें ‘छोटे कपड़ों में, नंगे पैर और कमर में रस्सी बांधकर’ घुमाया गया.

द टेलीग्राफ ने लिखा, “मूल अपराध ही काफी परेशान करने वाला था, लेकिन इसके बाद पुलिस की कार्रवाई ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए कि क्या किसी व्यक्ति की गरिमा का कथित तौर पर उल्लंघन किए जाने के बाद एक और उल्लंघन हुआ, इस बार उस एजेंसी के हाथों, जिसका काम कानून की रक्षा करना है.”

अखबार ने बताया कि पिछले कुछ महीनों में पुलिस ने कथित तौर पर अपराध की घटना को दोबारा दिखाने के नाम पर आरोपियों को भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक इलाकों में छोटे कपड़े पहनाकर घुमाया है.

रिपोर्ट में मानवाधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र के हवाले से कहा गया है कि कानून लागू करने वाली एजेंसी बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रही है और भीड़ की तरह व्यवहार कर रही है.

भद्र ने द टेलीग्राफ से कहा, “इससे एक गलत परंपरा शुरू होगी और अगर पुलिस इस तरह व्यवहार करेगी, तो लोग भी उसी से सीखेंगे. बीजेपी की नई सरकार के सत्ता में आने के सिर्फ पांच महीने के अंदर कानून का शासन पूरी तरह खत्म हो गया है. अगर पुलिस ने ही न्याय देना शुरू कर दिया है, तो न्यायपालिका को भंग कर देना चाहिए.”

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद एक और परेशान करने वाला चलन देखने को मिला है. इसमें भीड़ टीएमसी से जुड़े लोगों पर सड़े हुए अंडे फेंक रही है.

द वायर ने लिखा, “सरकारी अधिकारियों को नीचा दिखाने के इस अजीब तरीके में टीएमसी के कई चुने हुए और पद छोड़ रहे विधायक, सांसद, पार्षद, नगर निकायों और पंचायतों के प्रमुख, जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ता और यहां तक कि विपक्षी टीएमसी खेमे के नेताओं के परिवार के सदस्यों पर भी सड़े हुए अंडों से हमला किया गया है.”

अखबार ने आगे बताया कि ऐसी घटनाएं व्यस्त सड़कों के बीच हुई हैं. पुलिस थानों और अदालतों के बीच विचाराधीन कैदियों को ले जाते समय भी उन पर अंडे फेंके गए. यहां तक कि आरोपियों के घरों के अंदर भी ऐसी घटनाएं हुई हैं.

टीएमसी के सबसे बड़े नेताओं में शामिल सांसद अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा को भी इस ‘अंडा हमले’ से नहीं बख्शा गया. मोइत्रा ने एक लाइव वीडियो साझा किया था, जिसमें भीड़ उन पर अंडे फेंक रही थी और उनके मुताबिक, पुलिस चुपचाप खड़ी होकर यह सब देख रही थी.

बंगाल में राजनीतिक हिंसा का शर्मनाक इतिहास रहा है. 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार और टीएमसी की सत्ता में वापसी के बाद खबरें आई थीं कि बीजेपी के सैकड़ों कार्यकर्ता और उनके परिवार के सदस्य राज्य छोड़कर असम चले गए थे और वहां शरण ली थी.

उस समय असम सरकार में वरिष्ठ मंत्री रहे हिमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया था कि चुनाव के बाद हुई हिंसा से बचने के लिए बीजेपी के करीब 300-400 कार्यकर्ता और उनके परिवार के सदस्य असम के धुबरी जिले में पहुंचे थे. सरमा ने दावा किया था कि असम सरकार पश्चिम बंगाल छोड़कर आए बीजेपी कार्यकर्ताओं को खाना और रहने की जगह दे रही थी.

इस तरह की अराजकता उन बड़े कारणों में से एक बन गई, जिसकी वजह से बनर्जी को उन्हीं मतदाताओं का समर्थन खोना पड़ा था, जिन्होंने कभी वामपंथी सरकार को हटाने और राज्य में ‘परिवर्तन’ लाने के लिए उनका साथ दिया था. अब लोगों ने कानून का शासन वापस लाने के लिए बीजेपी की ओर उम्मीद से देखा है, लेकिन सबके सामने कानून से बाहर जाकर सजा देने के तरीकों को सामान्य बनाना एक बार फिर मतदाताओं के भरोसे के साथ धोखा होगा.

दीप हलदर एक लेखक और दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @deepscribble है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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