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Friday, 6 November, 2026
होममत-विमतनरेंद्र मोदी, डॉनल्ड ट्रंप नहीं हैं. भारत का चुनावी गणित बीजेपी को हराना मुश्किल बनाता है

नरेंद्र मोदी, डॉनल्ड ट्रंप नहीं हैं. भारत का चुनावी गणित बीजेपी को हराना मुश्किल बनाता है

ज्ञानेश कुमार हों या न हों, बीजेपी के लिए हालात डॉनल्ड ट्रंप के मुकाबले आसान हैं. सिर्फ चुनावी आंकड़े बताते हैं कि नरेंद्र मोदी सत्ता विरोधी लहर को मात दे सकते हैं.

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दुनियाभर के उदारवादी लोगों ने अमेरिका के मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को मिली बड़ी हार का जश्न मनाया है और सिर्फ उदारवादी ही इस जीत से खुश नहीं हैं. दुनिया में हर जगह समझदार लोग डॉनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल में मची उथल-पुथल से हैरान और परेशान हैं. शायद दुनिया में सिर्फ इस्लामाबाद ही एक ऐसी जगह है, जहां इन नतीजों से निराशा हुई होगी. इसकी वजह यह है कि ट्रंप परिवार के साथ किए गए कई कारोबारी समझौतों की अब दोबारा जांच हो सकती है.

यह समझना मुश्किल नहीं है कि दुनियाभर में राहत की लहर क्यों दौड़ गई है. हममें से कई लोग अमेरिका और उसकी राजनीतिक व्यवस्था को देखकर बड़े हुए हैं. उदाहरण के लिए जब मैंने विश्वविद्यालय में अमेरिकी राजनीति की पढ़ाई की थी, तब मुझे बताया गया था कि अमेरिका में सत्ता के अलग-अलग अंगों के बीच नियंत्रण और संतुलन की व्यवस्था इतनी मजबूत है कि कोई भी मनमानी करने वाला व्यक्ति बहुत कुछ नहीं बदल सकता. हर फैसले में सहमति बनाना या कम से कम इसी तरह की कोशिश करना सबसे ज़रूरी माना जाता था.

ट्रंप के दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल ने (पहले कार्यकाल से कहीं ज्यादा) यह साबित कर दिया है कि यह सब बकवास है. कोई ताकतवर नेता, जिसे अपने देश की स्थापना के मूल सिद्धांतों की कोई परवाह न हो, आसानी से कंट्रोल और बैलेंस की पूरी व्यवस्था को दरकिनार कर सकता है. वह संसद को अपने इशारे पर नचा सकता है, सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा कर सकता है, मीडिया को डरा सकता है, अल्पसंख्यकों को निशाना बना सकता है, अपने अमीर दोस्तों को फायदा पहुंचा सकता है और मिलकर फैसले लेने के सिद्धांत का मजाक बना सकता है.

अमेरिका के उलट, भारत में हमें अपनी व्यवस्था की मजबूती को लेकर कभी कोई गलतफहमी नहीं रही. हम जानते हैं कि कोई ताकतवर नेता हमारे लोकतंत्र की संस्थाओं को आसानी से अपने हिसाब से चला सकता है. इंदिरा गांधी ने ऐसा किया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी बिना किसी सहमति या लोकतांत्रिक परंपरा की चिंता किए, अपनी मर्जी से लगभग सब कुछ कर सकते हैं.

पढ़े-लिखे भारतीयों में ट्रंप को मिली हार पर जो खुशी दिखाई दे रही है, उसका एक कारण यह उम्मीद भी है कि भारत और अमेरिका की स्थिति में कुछ समानता है. अगर दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति को इतनी बुरी तरह झुकना पड़ सकता है, तो हमारे देश के नेताओं का क्या? क्या भारत में भी ऐसा हो सकता है?

डॉनल्ड ट्रंप की चुनावी मुश्किलें

इसका छोटा जवाब है- हां, ऐसा हो सकता है, लेकिन अमेरिका और भारत के बीच समानताएं देखकर बहुत ज्यादा निष्कर्ष नहीं निकालने चाहिए. दोनों देशों के बीच कुछ बड़े अंतर हैं.

इसके बावजूद, दोनों देशों की समानताओं पर ध्यान देना लुभावना है. चुनावी नतीजे आने के बाद अगर आपने जीतने वाले डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के भाषण सुने हों, तो आपको भारत की याद आ सकती है. मिशिगन से नवनिर्वाचित 42-वर्षीय सीनेटर अब्दुल अल सैयद ने कहा कि उनके विरोधियों ने इस्लाम को गलत तरीके से पेश किया और मुस्लिम विरोधी भावना भड़काकर उन्हें हराने की कोशिश की. उनकी यह बात हमें जानी-पहचानी लगी.

जब 37-वर्षीय सीनेटर चुने गए जेम्स टालारिको ने कहा कि वह लोगों को बांटने वाली राजनीति की जगह प्रेम की राजनीति लाना चाहते हैं, तो वह काफी हद तक राहुल गांधी जैसे लगे. 39-वर्षीय सीनेटर जॉन ओसॉफ ने भ्रष्टाचार और अमीर ताकतवर लोगों के बढ़ते दबदबे की शिकायत की. उन्होंने कहा कि ये लोग और अमीर होते जा रहे हैं, जबकि बाकी लोग और गरीब हो रहे हैं. उनका यह भाषण भारत के किसी संसदीय चुनाव में भी उतना ही सही लगता.

इन शिकायतों में सिर्फ हमें अपनी जानी-पहचानी बातें ही नहीं सुनाई दीं, बल्कि वही भावना भी दिखी जो भारत में है. अब पीढ़ी बदलने का समय आ गया है. लंबे समय से राज कर रहे बुजुर्ग नेताओं को हटकर नई पीढ़ी के लिए रास्ता बनाना चाहिए.

इन सबके बावजूद कुछ बातें याद रखना ज़रूरी है. सबसे पहली बात, रिपब्लिकन पार्टी इसलिए नहीं हारी क्योंकि ट्रंप ने समाज को बांटने वाली नीतियां अपनाईं और अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाई. अगर अमेरिकी लोग ऐसी बातों के खिलाफ होते, तो उन्होंने शुरुआत में ही ट्रंप को कभी नहीं चुना होता.

चुनाव से जुड़े सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि महंगाई इन हारों की एक बड़ी वजह थी. ईरान के साथ बेवजह चल रहा लंबा युद्ध भी एक वजह था, जिसे अमेरिका कभी नहीं जीत सकता. इस युद्ध की वजह से अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं. महंगाई बढ़ने की दूसरी वजह वे बेवकूफी भरे आयात शुल्क थे, जो ट्रंप ने दुनिया के ज्यादातर देशों पर लगाए थे.

यही वे वजहें थीं, जिन्होंने चुनावी नतीजों में फर्क पैदा किया. अल्पसंख्यकों और युवाओं ने ट्रंप की नीतियों के खिलाफ वोट दिया, लेकिन कम पढ़े-लिखे गोरे लोगों के रूप में उनका जो पक्का वोट बैंक है, उसने उतनी बड़ी संख्या में डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट नहीं दिया.

पीएम मोदी को चुनावी बढ़त

मोदी के साथ ट्रंप की समानताएं सीमित हैं. भारत में अभी महंगाई कोई बड़ा चुनावी मुद्दा नहीं बनी है. यहां अमीर और ताकतवर लोगों के बढ़ते दबदबे को लेकर कुछ नाराजगी जरूर है, लेकिन यह अभी उस स्तर तक नहीं पहुंची है कि चुनावों पर असर डाल सके. हम ऐसे किसी बेवजह के युद्ध में शामिल नहीं हैं, जिसे हम जीत नहीं सकते. और मोदी की विदेश नीति की सबसे बड़ी कोशिश भी बुरी तरह नाकाम रही है. यह कोशिश थी कि वह अपने दोस्त ट्रंप के साथ मिलकर चीन के प्रभाव को रोकेंगे, लेकिन इसका असर मतदाताओं पर पड़ता नहीं दिख रहा है. लोगों को इस बात से भी कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा कि ट्रंप ने मोदी के साथ अपनी दोस्ताना छवि खत्म कर दी है और चीन को लेकर अपनी रणनीति में भारत को कोई खास जगह नहीं दी है.

इसके अलावा, दोनों नेताओं के व्यक्तित्व में भी अंतर है. ट्रंप कुछ हद तक मानसिक रूप से अस्थिर दिखने वाले ऐसे व्यक्ति हैं, जो अपनी ही उथल-पुथल भरी सत्ता की चाह और हैरान करने वाले आत्ममोह में खोए रहते हैं. मोदी समझदार हैं, सोच-समझकर फैसले लेते हैं और लंबी अवधि की रणनीति के बारे में सोचते हैं. उनके शासन के खिलाफ विरोध बढ़ने के साथ कभी-कभी ऐसा लगता है कि उनकी राजनीतिक पकड़ कमजोर हुई है. लेकिन ट्रंप के सबसे अच्छे दिन की तुलना में भी मोदी अपने सबसे खराब दिन में ज्यादा समझदार हैं.

उदाहरण के लिए ट्रंप को यह समझने में बहुत देर हो गई कि मध्यावधि चुनाव में उनकी पार्टी को कितनी बड़ी हार का सामना करना पड़ेगा. वहीं, भारत में मोदी ने अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश चुनावों के बारे में कई महीने पहले से सोचना शुरू कर दिया था. मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार को उनके पद पर बनाए रखने के लिए मोदी इतनी कोशिश क्यों कर रहे हैं, इसकी एक वजह यह भी है.

दो और बातें हैं, जो दोनों देशों को अलग करती हैं. पहली बात यह है कि ट्रंप की धमकियों और डर के माहौल के बावजूद अमेरिका में कई बड़े मीडिया संस्थान अब भी सच दिखाते हैं. भारत में इसके उलट, लगभग पूरा मुख्यधारा का मीडिया सरकार से इतना डरा हुआ है कि वह सिर्फ मोदी की सफलताओं की खबरें दिखाता है. हिंदी टीवी चैनल तो उनकी इतनी तारीफ करते हैं कि लगता है जैसे हर दिन स्टूडियो में उनके नाम की कोई पूजा करके ही काम शुरू होता है. यह इसलिए मायने रखता है क्योंकि जिस मतदाता को सही जानकारी नहीं मिलती, वह चुनाव में गलत फैसला कर सकता है.

और फिर चुनावी आंकड़ों की बात आती है. जब ट्रंप ने कमला हैरिस को हराया था, तब उन्हें 49.8 प्रतिशत वोट मिले थे. आज, जब ट्रंप अमेरिका के सबसे अलोकप्रिय राष्ट्रपतियों में से एक हैं, तब भी उन्हें करीब 34-35 प्रतिशत मतदाताओं का पक्का समर्थन मिल सकता है. अमेरिका के हिसाब से देखें तो करीब 50 प्रतिशत से घटकर 34 प्रतिशत तक पहुंचना बहुत बड़ी गिरावट है. इसी से मध्यावधि चुनाव के नतीजों को समझा जा सकता है.

लेकिन भारत जैसी कई पार्टियों वाली चुनावी व्यवस्था में जीत के लिए जरूरी आंकड़े बिल्कुल अलग होते हैं. मोदी की लोकप्रियता को लेकर कितनी भी बातें हों, बीजेपी को आमतौर पर 37-38 प्रतिशत से ज्यादा वोट नहीं मिलते. इसके बावजूद पार्टी को बहुमत या बहुमत के करीब सीटें मिल जाती हैं, क्योंकि उसके वोट कुछ खास इलाकों में केंद्रित हैं. ये इलाके ज्यादातर हिंदी पट्टी के राज्य हैं.

इसलिए अगर बीजेपी का वोट प्रतिशत घटकर 35 प्रतिशत भी रह जाता है, जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में हार का आंकड़ा माना जाता है, तब भी वह शायद अपने कुछ सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बना सकती है.

इस तरह, हमारी चुनावी व्यवस्था अमेरिका से बहुत अलग है. यहां सरकार बनाने के लिए वोटों का प्रतिशत काफी कम होना भी काफी है. मान लेते हैं कि बीजेपी को मिलने वाले 37 प्रतिशत वोट प्रधानमंत्री की लोकप्रियता पर निर्भर हैं, जो (जनमत सर्वे के मुताबिक) उनकी पार्टी की लोकप्रियता से ज्यादा है. अगर आज मोदी की लोकप्रियता पिछले आम चुनाव के मुकाबले कम भी हो गई है (जो मानना सही लगता है), तब भी बीजेपी के वोट प्रतिशत को घटाकर, मान लीजिए 30 प्रतिशत तक लाने के लिए मोदी का बहुत ज्यादा अलोकप्रिय होना जरूरी होगा. इतने कम वोट मिलने पर पार्टी के लिए सरकार बनाना मुश्किल हो सकता है.

इसलिए बीजेपी के लिए हालात ट्रंप के मुकाबले आसान हैं, चाहे ज्ञानेश कुमार हों या न हों. सिर्फ चुनावी आंकड़ों की यही बात बताती है कि मोदी सत्ता विरोधी लहर को मात दे सकते हैं.

हालांकि, ऐसा तभी तक है, जब तक अगले दो साल में हालात और खराब नहीं होते. और ऐसा हो भी सकता है.

वीर सांघवी, प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. वे @virsanghvi पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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