“महान सच्चाइयां”, इन शब्दों का ऐलान किया गया. हर शब्द उनके बेचैन दिमाग से ऐसे निकल रहा था, जैसे नदी किनारे जल्द ही छोड़े जाने वाले आतिशबाजी के पटाखे. ये शब्द अंधेरे आसमान में ऊपर उठते और बड़े-बड़े अक्षरों और तिरछे लिखे शब्दों की लंबी कतारों में बदल जाते.
संदेश में लिखा था, “मेरे सामने अब तक आई हर परेशानी की असली वजह मैं अब आपके और पूरी दुनिया के सामने घोषित करता हूं. वह है उन तीन सबसे भयानक बुराइयों की गुलामी, जिन्हें मिलाकर पूरे समाज को मानसिक और शारीरिक रूप से नुकसान पहुंचाया जा सकता है.”
इसके बाद शब्द ऐसे फूटने लगे, जैसे कोई लगातार ईश्वरीय संदेश दे रहा हो: “निजी संपत्ति – धर्म और शादी की बेतुकी और तर्कहीन व्यवस्थाएं.”
ये शब्द रॉबर्ट ओवेन के थे. राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के ट्रुथ सोशल की स्थापना से करीब दो सदी पहले, वेल्स के कपास कारोबारी और समाजवादी ओवेन अमेरिका के छोटे से इंडियाना शहर न्यू हार्मनी पहुंचे थे. वहां उन्होंने एक समाजवादी आदर्श समाज के जन्म का ऐलान किया था. उनकी भाषा अमेरिकी राजनीतिक जीवन में पहले कभी नहीं सुनी गई थी.
करीब दो सदी बाद, अमेरिकी सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक बदलाव की भाषा फिर लौट आई है, हालांकि इस बार इसका रूप अलग है.
राजनीति में बड़े बदलाव के हर दौर की तरह, 3 नवंबर के मध्यावधि चुनावों के नतीजे भी कई वजहों का नतीजा हैं. मिशिगन में अब्दुल एल-सैयद अमेरिका के पहले मुस्लिम-अमेरिकी सीनेटर बने, जबकि उनके खिलाफ जमकर मुस्लिम विरोधी प्रचार किया गया था. टेक्सास में प्रगतिशील ईसाई विचारधारा के प्रमुख चेहरे जेम्स तालारिको 1988 के बाद सीनेट की सीट जीतने वाले पहले डेमोक्रेट बने.
न्यू मैक्सिको में डेब हालैंड ने जीत हासिल की और वह राज्य की पहली मूल अमेरिकी महिला गवर्नर बनीं. वहीं, कीशा लांस बॉटम्स जॉर्जिया की पहली अश्वेत महिला गवर्नर बनीं. न्यू हैम्पशायर में क्रिस पप्पास सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले ऐसे व्यक्ति बने, जिन्होंने खुले तौर पर खुद को समलैंगिक बताया है. वामपंथ की ओर इस बदलाव के पीछे की ताकतें राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के खराब शासन से कहीं ज्यादा बड़ी हैं.
2025 में 30 साल से कम उम्र के आधे अमेरिकी अपने माता-पिता के साथ रह रहे थे. 2019 के मुकाबले यह संख्या 12 फीसदी ज्यादा थी. बहुत कम युवा अपना अलग घर खरीदने या चलाने का खर्च उठा सकते हैं और छात्रों पर कर्ज का बोझ रिकॉर्ड स्तर पर है. अमेरिका की मिलेनियल पीढ़ी देश के इतिहास की पहली ऐसी पीढ़ी बनने जा रही है, जिसकी आर्थिक स्थिति और नौकरी का दर्जा उसके माता-पिता की पीढ़ी से खराब होगा. इसी वजह से कई युवा समाजवाद के बारे में उस सहानुभूति के साथ सोच रहे हैं, जिसकी कल्पना उनके माता-पिता की पीढ़ी भी नहीं कर सकती थी.
हालांकि, यह अभी साफ नहीं है कि मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ इस पीढ़ी के विरोध से कौन-सी नीतियां और योजनाएं सामने आएंगी और क्या कोई एक पार्टी इन पर एकजुट हो पाएगी. ओवेन ने न्यू हार्मनी बसाना शुरू किया था, उसके पांच साल भी पूरे नहीं हुए थे कि यह परियोजना खत्म हो गई. यह याद दिलाता है कि हकीकत से पहली टक्कर में ही बहुत कम सपने टिक पाते हैं.
सफलता की मुश्किलें
25 फरवरी 1825 और फिर 7 मार्च को प्रतिनिधि सभा में ओवेन ने अमेरिकी कांग्रेस के सामने अपने प्रोजेक्ट के बारे में भाषण दिया. उन्होंने जिस बात पर जोर दिया, वह आज के समाजवादियों को भी जानी-पहचानी लगेगी. उनके श्रोताओं में राष्ट्रपति चुने गए जॉन क्विंसी एडम्स, निवर्तमान राष्ट्रपति जेम्स मुनरो और पूर्व राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन तथा जेम्स मैडिसन शामिल थे. अमेरिका के ताकतवर और अमीर लोग भाप के इंजन, स्पिनिंग जेनी और ब्लास्ट फर्नेस जैसी मशीनों को अपनाना शुरू ही कर रहे थे. लेकिन वे यूरोप में इन मशीनों के साथ पैदा हुए गरीब मजदूर वर्ग को अमेरिका में नहीं देखना चाहते थे.
19वीं सदी के इस आदर्शवादी की तरह, प्रगतिशील डेमोक्रेट्स की नई पीढ़ी भी अब सबकी नजरों में होगी. न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी जिन नीतियों पर काम कर रहे हैं, उनसे अंदाजा मिलता है कि भविष्य में डेमोक्रेटिक पार्टी का एजेंडा कैसा हो सकता है. इसमें घर, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ध्यान देते हुए सरकारी दखल बढ़ाना शामिल है. इसका खर्च बहुत अमीर लोगों पर ज्यादा टैक्स लगाकर उठाया जा सकता है. हालांकि, बड़े सवालों के जवाब अभी बाकी हैं.
टैरिफ को ही लीजिए. अमेरिका के उन औद्योगिक इलाकों के प्रगतिशील नेता, जहां कभी बड़े पैमाने पर उद्योग हुआ करते थे लेकिन अब वे कमजोर पड़ चुके हैं, मानते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग और मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए सही तरीके से और सोच-समझकर टैरिफ लगाना जरूरी है. इसी सोच के तहत राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीन से आने वाली इलेक्ट्रिक गाड़ियों और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े दूसरे उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए थे. आलोचकों का कहना है कि इन टैरिफ से कीमतें बढ़ीं और उस तकनीक को अपनाना मुश्किल हो गया, जिसे सरकार बढ़ावा देना चाहती थी.
इससे भी मुश्किल सवाल यह है कि अमेरिका के मेक्सिको और कनाडा के साथ व्यापारिक संबंध कैसे होने चाहिए. इनका सीधा असर न सिर्फ मजदूरों पर पड़ता है, बल्कि सुरक्षा और भू-राजनीति से जुड़े अहम मुद्दों पर भी पड़ता है.
विदेश नीति भी पार्टी के भीतर मतभेद की एक वजह बनेगी. चुनाव प्रचार के दौरान एल-सैयद जैसे नेताओं ने इजरायल के मुद्दे पर विवाद में पड़ने से चतुराई से बचते हुए साफ कर दिया था कि उनकी प्राथमिकता घरेलू मुद्दे हैं. अब डेमोक्रेट्स पर दबाव होगा कि वे अपनी विदेश नीति को ट्रंप की नीतियों से साफ तौर पर अलग दिखाएं. ईरान में युद्ध, इजरायल को सैन्य मदद और चीन तथा रूस के साथ संबंधों को लेकर पार्टी के भीतर तीखी बहस होने की संभावना है.
वामपंथी डेमोक्रेट्स के लिए आव्रजन शायद सबसे मुश्किल मुद्दा होगा. भले ही इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) के रवैये से बहुत से आम अमेरिकी नाराज हों, लेकिन प्रगतिशील नेताओं को अपने ही समर्थकों के बीच मौजूद मतभेदों को संभालने के लिए बहुत सोच-समझकर आगे बढ़ना होगा.
तटीय शहरों में बड़ी कंपनियां और छोटे कारोबारी ज्यादा विदेशी कर्मचारियों का स्वागत कर सकते हैं, लेकिन उन औद्योगिक इलाकों के मजदूर ऐसा नहीं करेंगे, जहां कभी बड़े कारखाने हुआ करते थे. पार्टी में इस बात पर कोई सहमति नहीं है कि कितने प्रवासियों को या किस तरह के प्रवासियों को अमेरिका में आने की अनुमति दी जानी चाहिए.
मध्यावधि चुनावों में जीतने वाले नेताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली यह पीढ़ी एक नए तरह का अमेरिका बनाना चाहती है. अमेरिकी राजनीति में एक आदर्श समाज बनाने की गहरी चाहत रही है, जो धार्मिक भावना जैसी है. यही वजह है कि लोग छोटे-मोटे समझौतों से भी बचना चाहते हैं. लेकिन अमेरिका में आदर्श समाज बनाने की कोशिशों का इतिहास बताता है कि जब आदर्शों का सामना सरकार चलाने की हकीकत से होता है, तो क्या होता है.
अमेरिका में आदर्श समाज बनाने की कोशिशें
यह सोचना अजीब लग सकता है कि ट्रंप का मार-ए-लागो या फिशर आइलैंड किसी आदर्श समाज बनाने की परंपरा के उत्तराधिकारी हैं. लेकिन 19वीं सदी में अमेरिका की राजनीतिक संस्कृति में असल जिंदगी में आदर्श समाज बनाने की कई कोशिशें हुई थीं.
ओनाइडा समुदाय ने ऐसी संस्कृति बनाई, जिसमें यौन संबंधों में एक-दूसरे पर अधिकार जताने को हतोत्साहित किया जाता था. लेकिन जब तक एक समिति बच्चे पैदा करने की अनुमति न दे, तब तक पुरुषों को संयम बरतकर गर्भधारण रोकने पर जोर दिया जाता था. एन ली के शेकर्स समुदाय के लोग अपने धार्मिक उत्साह में कांपते थे, इसलिए उन्हें यह नाम मिला था. वे शादी और यौन संबंधों से दूर रहते थे, हिंसा का विरोध करते थे और मिल-जुलकर रहते थे. इस समुदाय में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का दर्जा था.
अमेरिका के शुरुआती आदर्श समाजों में से एक जर्मन तपस्वी जॉर्ज रैप ने बसाया था. 1799 में गुड फ्राइडे की सुबह जब उसके पड़ोसी चर्च में प्रार्थना कर रहे थे, तब रैप अपने खरीदे हुए सूअरों के झुंड को चर्च के सामने से ले गया. उसका कहना था कि चर्च की प्रार्थना सेवा खोखली है और उसे धार्मिक सेवा नहीं कहा जा सकता.
जर्मनी के छोटे से गांव इप्टिंगेन में दूसरे लूथरन ईसाइयों की तरह, रैप के भी सत्ता में बैठे लोगों के साथ अच्छे संबंध नहीं थे. धार्मिक तौर-तरीकों और रस्मों से जुड़े सरकारी नियमों को लेकर उसका अक्सर टकराव होता था. इससे परेशान होकर रैप 1805 में अपने समुदाय के लोगों को लेकर अमेरिका चला गया. वहां उन्होंने हार्मनी नाम की बस्ती बसाई. उन्हें लगता था कि दुनिया का अंत कभी भी हो सकता है. इसलिए वहां आए लोगों ने सख्त ब्रह्मचर्य अपनाया और सभी संसाधनों पर सामूहिक अधिकार रखा.
हार्मनी आर्थिक रूप से सफल रही. लेकिन 1823 में इसके नेताओं ने जमीन बेचकर पेंसिल्वेनिया में एक बड़ी जगह पर जाने का फैसला किया. इस जमीन को ओवेन ने खरीदा था. वह ऐसी सस्ती जगह की तलाश में थे, जहां अपने सिद्धांतों को आजमा सकें. एक लोहार के बेटे ओवेन ने सफल मिल मालिक बनने तक का सफर तय किया था. उनकी न्यू लैनार्क मिलें मजदूरों के लिए सामाजिक और कल्याणकारी योजनाएं चलाने का मॉडल बन गई थीं.
इतिहासकार ई.पी. थॉम्पसन का तर्क है कि ओवेन उस दौर के कई पूंजीपतियों की इस सोच से सहमत थे कि शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास में सुधार करके मजदूरों के भीतर उठ रहे विद्रोह को रोका जा सकता है. उस समय इंग्लैंड के मजदूर वर्ग की संस्कृति और आधुनिक कारखानों की जरूरतों के बीच टकराव बढ़ रहा था.
लेकिन ओवेन को सुनने आए अमेरिका के नेता निराश हुए. न्यू हार्मनी बसने के एक साल से भी कम समय में तीन गुटों में बंट गई. इन गुटों के बीच जिम्मेदारियों और कमाई के बंटवारे को लेकर तीखे मतभेद थे.
1828 में इसे फिर से संगठित करने की कोशिशें नाकाम रहीं. इसके बाद जमीन को निजी प्लॉट में बांटकर बेच दिया गया. ब्रिटेन में ओवेन की परियोजनाएं भी धीरे-धीरे गुमनामी में चली गईं. विद्वान कृष्ण कुमार ने लिखा है कि ज्यादातर आदर्श समाज बनाने की कोशिशें सिद्धांत और व्यवहार के बीच फंसकर नाकाम होने के लिए ही अभिशप्त थीं.
न्यू हार्मनी के खत्म होने से अमेरिका में आदर्श समाज बनाने की चाहत खत्म नहीं हुई. लेकिन इससे यह साफ हो गया कि एक अलग तरह के समाज की कल्पना करना और उसे बनाए रखने के लिए संस्थाएं खड़ी करना, दो अलग-अलग बातें हैं.
बदलती राजनीति
यह चुनाव और इससे पहले दक्षिणपंथ के बढ़ते प्रभाव, दोनों से एक बात सीखने को मिलती है. अमेरिका की राजनीति किसी तूफान की तरह है, जिसे उस समाज से ताकत मिल रही है जो गहरे मतभेदों के बीच अपना रास्ता तलाश रहा है. चार दशक पहले लेखिका जोन डिडियन ने ऐसी संस्कृति के बढ़ने पर चिंता जताई थी, जिसमें उम्मीदवारों के बीच चुनाव उनके विचारों और नीतियों के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी छवि और अंदाज के आधार पर किया जाता था.
आज की राजनीति में धन के बंटवारे, सामाजिक सत्ता की संरचना, नस्ल और लैंगिक समानता जैसे बुनियादी सवाल शामिल हैं. भले ही पार्टियां राजनीति को सरकारी कामकाज के प्रबंधन तक सीमित करना चाहें, लेकिन जब बुनियादी सवाल सामने आते हैं, तो समाज अपनी आवाज उठाता है.
इससे भी अहम बात यह है कि सिर्फ पैसा चुनाव के नतीजे तय नहीं करता. अमेरिका की कई अदालती फैसलों ने व्यक्तिगत दानदाताओं को चुनावी प्रक्रिया में बड़ी रकम लगाने की अनुमति दी है. इससे राजनीतिक पार्टियों के अस्तित्व और उम्मीदवारों की ईमानदारी पर खतरा पैदा होने की आशंका बढ़ी है.
मिसाल के तौर पर, एलन मस्क ने इस गर्मी के बाद से रिपब्लिकन पार्टी के चुनाव प्रचार पर 27.6 करोड़ डॉलर खर्च किए हैं. यह डेमोक्रेटिक पार्टी के चुनाव प्रचार के लिए सभी दानदाताओं की ओर से दिए गए कुल पैसे से भी ज्यादा है. इसके बावजूद न तो मस्क और न ही सिलिकॉन वैली के दूसरे अरबपति चुनाव के नतीजे बदल सके.
दोनों पार्टियों के पुराने और ताकतवर नेताओं का दबदबा भी कमजोर पड़ा है. इससे उन ताकतों को आगे आने के ज्यादा मौके मिले हैं, जिन्हें लंबे समय से हाशिये पर रखा गया था.
दुनिया के बाकी हिस्सों के कई देशों को ट्रंप की इस बेइज्जती से कुछ संतोष जरूर मिलेगा. लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिकी राजनीति अब बड़े बदलाव के लंबे दौर में प्रवेश कर रही है और इसके नतीजे बेहद अनिश्चित हैं. जैसा कि ओवेन ने जाना था, ऐलान कर देना आसान है, असली मुश्किल उसके बाद शुरू होती है.
प्रवीण स्वामी ‘दिप्रिंट’ में कॉन्ट्रिब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका X हैंडल @praveenswami है. विचार निजी हैं.
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