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Wednesday, 4 November, 2026
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भारत और चीन को बांटने वाली रेखा साम्राज्यों, साजिशों और कल्पना से खींची गई थी

झाओ एरफेंग के झंडों से लेकर मैकमोहन रेखा तक, भारत-चीन सीमा विवाद नक्शों, ताकत और उन सीमावर्ती समुदायों की कहानी है जिन्हें भुला दिया गया.

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लोहित नदी के किनारे लहराते लाल झंडों की कतार पर चार पंजों वाले ड्रैगन की नीली मुहर लगी थी. इस मुहर ने स्कॉटलैंड के राजनेता विलियम डंडस को चेतावनी दी कि उनका कैंपेन अब आगे नहीं जा सकता. लकड़ी के एक बोर्ड पर मोटे और साधारण अक्षरों में लिखा था, “चीनी साम्राज्य के सिचुआन प्रांत की सीमा पर जायुल की दक्षिणी सीमा”. यह उन बाहरी लोगों के लिए लिखा गया था, जो इस निशान को पहचान नहीं सकते थे. स्थानीय मुखियाओं को झाओ एरफेंग के नाम से सुरक्षा के दस्तावेज़ दिए गए थे. झाओ एरफेंग वही कमांडर था जिसने पिछले साल यानी 1910 में ल्हासा पर कब्जा कर लिया था. इन दस्तावेजों में स्थानीय मुखियाओं के नए शासक, यानी निषिद्ध नगर में रहने वाले सम्राट के सामने समर्पण की घोषणा की गई थी.

पिछले कुछ हफ्तों से भारत भर में इस खबर को लेकर गुस्सा बढ़ रहा है कि अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी के दक्षिण में कई जगहों पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों ने अपनी मौजूदगी बना ली है. यह उस कूटनीतिक बातचीत के कथित तौर पर सफल रहने के बावजूद हुआ है, जिसने 2020 के गलवान घाटी संकट के बाद शुरू हुए लंबे संकट को खत्म किया था.

विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि ये टकराव सीमा और एलएसी को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग समझ की वजह से होते हैं, लेकिन इसका मतलब क्या है, इसे बहुत कम समझा गया है. इसी वजह से कई लोग यह मान लेते हैं कि बीजिंग बातचीत ईमानदारी से नहीं कर रहा है. सच्चाई इससे ज्यादा जटिल है. जैसे साम्राज्य के नक्शे बनाने वाले अधिकारियों ने भारत को उसकी सीमाओं के अपने विचार दिए थे, जो किसी के लिए वरदान तो किसी के लिए अभिशाप हो सकते हैं, उसी तरह झाओ एरफेंग और उसके कमांडरों के पास भी अपने नक्शे थे. उन नक्शों पर एक मोटी हरी रेखा बनी थी, जो बताती थी कि उनका साम्राज्य कहां खत्म होता है.

झाओ एरफेंग के भुला दिए गए नक्शे से मिलने वाली सीख आसान है: एलएसी पर लड़ाई दो बड़े देशों की नियति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक फैसला है. दुनिया की सभी सीमाओं की तरह भारत और चीन के बीच की सीमाएं सिर्फ पहाड़ों और नदियों से नहीं बनीं, बल्कि कल्पना से बनाई गईं.

कहीं का भी मैप

1904 की गर्मियों से, जब फ्रांसिस यंगहसबैंड का ल्हासा पर जानलेवा हमला हो रहा था, रूस में चीन के दूतावास ने सेंट पीटर्सबर्ग में एलेक्सी अफिनोजेनोविच इलिन के बड़े कार्टोग्राफिकल हाउस के साथ मिलकर तिब्बत की सीमाओं का नक्शा बनाना शुरू किया. 1904 का ज़िज़ांग क्वान तू, जिसका मतलब है “तिब्बत का पूरा मैप”, अब लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में रखा है—國界, या राष्ट्रीय सीमा के लिए साफ निशान वाला पहला मैप—चीनी डिप्लोमैट हू वेइडे के साइन से पब्लिश हुआ था. एक नोट में कहा गया है कि यह कई सोर्स से लिया गया था, जिसमें शाही रिकॉर्ड और 1890-1895 के जूल्स-लियोन ड्यूट्रेइल डे राइन्स और फर्नांड ग्रेनार्ड के फ्रेंच अभियान से मिले मटीरियल का इस्तेमाल किया गया था.

मैप 1 | 1904 के मैप के हिसाब से हरी बॉर्डर; नीली: मैकमोहन लाइन; लाल: चीन की 1959 की क्लेम-लाइन| बेस मैप: शिज़ांग क्वान तू (1904), ए. इलिन, सेंट पीटर्सबर्ग, लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस ज्योग्राफी और मैप डिवीज़न. ओवरले: क्लाउड अर्पी के प्राइवेट कलेक्शन से, भारत को जमा किए गए 1959 के चीनी मैप से ट्रेस की गई बाउंड्री लाइनें. क्लाउड (एंथ्रोपिक) के साथ तैयार किए गए मार्कर और ओवरले और लगभग जगह पर रखे गए.
मैप 1 | 1904 के मैप के हिसाब से हरी बॉर्डर; नीली: मैकमोहन लाइन; लाल: चीन की 1959 की क्लेम-लाइन | बेस मैप: शिज़ांग क्वान तू (1904), ए. इलिन, सेंट पीटर्सबर्ग, लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस ज्योग्राफी और मैप डिवीज़न. ओवरले: क्लाउड अर्पी के प्राइवेट कलेक्शन से, भारत को जमा किए गए 1959 के चीनी मैप से ट्रेस की गई बाउंड्री लाइनें. क्लाउड (एंथ्रोपिक) के साथ तैयार किए गए मार्कर और ओवरले और लगभग जगह पर रखे गए.

तब से, चीन के दावे शिज़ांग क्वान तू में बताए गए बॉर्डर के काफी करीब रहे हैं. मैप 1 में क्लाउड 5.5 का इस्तेमाल करके बनाए गए ओवरले से यह साफ है कि 1959 में बॉर्डर पर बातचीत के दौरान चीन ने जो दावे किए थे, वे ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव, हेनरी मैकमोहन (मैप 2) द्वारा 1914 में खींची गई बॉर्डर के दक्षिण में काफी दूर तक जाते थे.

मैप 1 | शिज़ांग क्वान तू (1904), ए. इलिन, सेंट पीटर्सबर्ग, लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस ज्योग्राफी और मैप डिवीज़न. ओवरले: क्लाउड अर्पी के प्राइवेट कलेक्शन से, भारत को जमा किए गए 1959 के चीनी मैप से ली गई बाउंड्री लाइन. क्लाउड (एंथ्रोपिक) के साथ तैयार किए गए मार्कर और ओवरले और लगभग जगह पर रखे गए
मैप 1 | शिज़ांग क्वान तू (1904), ए. इलिन, सेंट पीटर्सबर्ग, लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस ज्योग्राफी और मैप डिवीज़न. ओवरले: क्लाउड अर्पी के प्राइवेट कलेक्शन से, भारत को जमा किए गए 1959 के चीनी मैप से ली गई बाउंड्री लाइन. क्लाउड (एंथ्रोपिक) के साथ तैयार किए गए मार्कर और ओवरले और लगभग जगह पर रखे गए

लद्दाख में 1904 का बॉर्डर मैप—जहां ब्रिटिश लोगों ने कोई बॉर्डर नहीं बनाया था—भी आज LAC के लगभग उसी एक्सिस पर चलता है (मैप 3). ब्रिटिश इंडिया ने लद्दाख में चीन के साथ अपने बॉर्डर का कोई मैप नहीं छोड़ा और भारत ने भी, ज़मीन पर सैनिकों के साथ कार्टोग्राफिक एक्सरसाइज के बाद 1954 तक कोई मैप नहीं बनाया (मैप 4).

मैप 3 | हरा चीन के 1904 के मैप से; नीला, मैकमोहन लाइन है; लाल चीन की 1959 की क्लेम लाइन है
मैप 3 | हरा चीन के 1904 के मैप से; नीला, मैकमोहन लाइन है; लाल चीन की 1959 की क्लेम लाइन है
मैप 4
मैप 4

फिर भी, शिज़ांग क्वान तू ने असलियत के एक ज़रूरी हिस्से को नज़रअंदाज़ कर दिया. भले ही इंपीरियल चीन की पॉलिटिकल ज़िंदगी कम से कम बारहवीं सदी से तिब्बत से जुड़ी हुई थी, लेकिन उसका आधिपत्य सिर्फ नाम का था. इंपीरियल सैनिक कम थे, और कोई असली बॉर्डर नहीं था. खासकर खाम जैसे इलाकों में, जहां असली ताकत वहाँ के ताकतवर लोगों और व्यापारियों के पास थी, जो बदले में तागिन, अदी, या मिशमी जैसे एथनिक ग्रुप्स के साथ शांति बनाए रखते थे.

एक उदाहरण के लिए, ल्हासा ने सुदूर पूर्व में अरुणाचल के अंजॉ ज़िले में वालोंग पर अपना आधिपत्य होने का दावा किया. वालोंग में सिर्फ तीन एथनिक-तिब्बती बस्तियां थीं, जिनमें सिर्फ पांच घर थे. उनमें से, मिजू मिशमी ने तिब्बतियों को सिर्फ इस शर्त पर बर्दाश्त किया कि वे उनके मवेशी चराएं.

साम्राज्य की आखिरी सांस

मजानोन के गांव के मुखिया ने डंडस को बताया कि चार पंजों वाले ड्रैगन के झंडे लेकर आए लोग 1911 के बीच में ताचेयी के चंद्र महीने में वहां पहुंचे थे. उनके नेतृत्व में चीनी अधिकारी ला तोह था. उसके साथ करीब 50 बंदूकधारी सिपाही और 100 कुली थे, जो उनका सामान उठा रहे थे. सैनिक ग्लेई दाखान दर्रे से होकर आए. यह 4,400 मीटर ऊंचा रास्ता था, जो तिब्बत के न्यिंगची से बाहर निकलता है. इसके बाद वे वालॉन्ग के आसपास के जंगलों में दाखिल हुए.

संप्रभुता दिखाने की इस कोशिश ने दोनों पक्षों को एक ऐसी प्रक्रिया में बांध दिया, जो आज भी दोहराई जाती है: दोनों साम्राज्य एक-दूसरे की ओर से लगाए गए सीमा स्तंभों और निशानों को उखाड़ने में लगे रहते थे.

फ्रांसिस यंगहसबैंड के तिब्बत पर हमले ने दोनों पक्षों की कमजोर स्थिति को उजागर कर दिया. यह हमला इस डर के कारण किया गया था कि दलाई लामा साइबेरिया में जन्मे दरबारी और भिक्षु अगवान दोरजीव के जरिए रूस के जार के साथ सैन्य गठबंधन की बातचीत कर रहे थे.

तिब्बती सैनिकों के पास बंदूकों और जादुई ताबीजों के अलावा बहुत कम हथियार थे. ब्रिटिश सेना की मशीनगनों ने हजारों तिब्बती सैनिकों को मार डाला. दूसरी ओर, चीन इस संकट पर अपना प्रभाव डालने में पूरी तरह नाकाम रहा. जब उसे पता चला कि ग्रेट ब्रिटेन हिमालयी क्षेत्र में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है, तब स्थिति और साफ हो गई.

साम्राज्य का धीमा और ढीला शासन अब बीजिंग के बचे हुए अधिकार को फिर से मजबूत करने की कोशिश में बदल गया. और मजेदार बात यह है कि इसका रास्ता ब्रिटिशों ने ही खोला था. रूस की कैथरीन द ग्रेट ने कभी थोड़े समय के लिए भारत पर हमला करने के विचार के बारे में सोचा था, लेकिन उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी गई. दूसरी ओर, उनके बदकिस्मत बेटे ने इस अभियान के लिए कोसैक लड़ाकों की एक सेना तैयार करने की कोशिश की. ब्रिटिशों को डर था कि एक स्वतंत्र तिब्बत इन पुराने सपनों को फिर से जिंदा कर सकता है. इसलिए 1906 में उन्होंने चीन की सर्वोच्च सत्ता को मान्यता दे दी.

इसके बाद खाम में जमीन और राजस्व से जुड़े बड़े सुधार शुरू किए गए. बाद में झाओ एरफेंग ने वहां हुए विद्रोह को बेहद हिंसक तरीके से दबाया, जिसे नरसंहार जैसी हिंसा कहा गया. इस अभियान के दौरान साम्राज्य की सेना ब्रिटिश भारत की सीमाओं तक पहुंच गई.

वायसराय चार्ल्स हार्डिंग ने पहाड़ों में बड़ी संख्या में सैनिक भेजने की महंगी योजना का विरोध किया. उनका तर्क था कि जब जरूरत हो, ब्रिटिश नौसेना चीन के बंदरगाहों पर हमला कर सकती है. लेकिन साम्राज्य की नौकरशाही के अधिकारियों जैसे आर्थर हर्ट्जेल और बंगाल के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर लैंसलॉट हेयर ने इसका विरोध किया. उनका कहना था कि भविष्य में चीन असम के कमाई देने वाले चाय बागानों के लिए खतरा बन सकता है.

जब यह बहस चल ही रही थी, तभी एक घटना ने साम्राज्य के उन अधिकारियों को मौका दे दिया जो सैन्य कार्रवाई के पक्ष में थे. मार्च 1911 में ब्रिटिश अधिकारी नोएल विलियमसन और चाय बागान के डॉक्टर जेडी ग्रेगोरसन अरुणाचल की सियांग घाटी में अभियान पर गए. उन्होंने आदि जनजाति की अपनी जमीन छोड़ने की मांग मानने से इनकार कर दिया. इसके बाद उन्हें 40 से ज्यादा नौकरों, सुरक्षाकर्मियों और कुलियों के साथ मार डाला गया.

उनके नौकर ने एक चिट्ठी में लिखा था, “केबोंग अबोर आगे जाने से मना करते हैं. साहब गांव के अंदर जाने पर अड़े हुए हैं. मुझे लगता है कि हम कभी वापस नहीं लौटेंगे” यह चिट्ठी उनकी मौत के बाद मिली.

ब्रिटिश सेना की चार टुकड़ियां इस नरसंहार के कथित जिम्मेदार लोगों की तलाश में निकल पड़ीं. स्थानीय गांवों ने भी जवाबी लड़ाई की. वे अपनी जमीन पर हथियार लेकर घुसने वालों को सजा देना चाहते थे. औपनिवेशिक सेना ने बदला लेने के लिए बेहद हिंसक युद्ध छेड़ दिया. उसने पूरे-पूरे गांव जला दिए, जब तक कि 1912 में आदि विद्रोह को कुचल नहीं दिया गया.

इस खून-खराबे से साफ हो गया कि पूर्वोत्तर की सीमा पर रहने वाले लोग, जो दो बड़े साम्राज्यों की पहुंच से बाहर रहते थे, उन्हें नक्शे पर खींची गई रेखाओं का कोई मतलब नहीं था. 1911 की उस क्रांति के बाद, जिसने चीन के आखिरी सम्राट को सत्ता से हटा दिया था, अगले चार दशकों तक यह उम्मीद बनी रही कि पहाड़ों के राज्य और स्थानीय मुखियाओं के इलाके शायद बच सकेंगे. और फिर भी…

राष्ट्रों का निर्माण

1948 की वसंत ऋतु के आखिर में, अपने नए देश के बनने के कुछ ही महीनों बाद, धनुष और तीर से लैस अपातानी योद्धाओं ने कुरे में असम राइफल्स की चौकी पर हमला कर दिया. हालांकि, वे वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों को अचानक पकड़ने के लिए थोड़ा देर से पहुंचे. सैनिकों ने गोलीबारी की, जिसमें तीन लोग मारे गए. बाद में असम राइफल्स ने दो और लोगों को गोली मारकर मार दिया. ये लोग अपने गांवों और अनाज के भंडारों को जलाए जाने का विरोध कर रहे थे. यह सब पुराने औपनिवेशिक तरीके से किया गया.

पांच साल बाद, तागिन लोगों ने अचिंगमोरी में एक सरकारी गश्ती दल पर हमला किया. इसमें 47 लोग मारे गए, जिनमें मेजर रिपुदमन सिंह के नेतृत्व वाले असम राइफल्स के 27 सैनिक भी शामिल थे.

हालांकि, सेना की ओर से हवाई हमले करने की मांग को खारिज कर दिया गया, लेकिन प्रसिद्ध सैनिक और प्रशासक एसएम कृष्णात्री ने दर्ज किया कि गांवों को जला दिया गया और मवेशियों को मार दिया गया.

1914 में शिमला सम्मेलन में सीमाएं खींची गई थीं. उस समय ब्रिटिश साम्राज्य चीन की कमजोरी का फायदा उठाना चाहता था. इस सम्मेलन का उद्देश्य तथाकथित बाहरी रेखा के आगे एक नया अर्ध-स्वतंत्र बफर क्षेत्र बनाना था. यह बाहरी रेखा ब्रिटिश राज की सबसे दूर की सीमा थी, जिसे जमीन पर स्पष्ट रूप से तय नहीं किया गया था.

1914 में मैकमोहन द्वारा खींची गई रेखा को चीन ने खारिज कर दिया. चीन अपनी 1904 की सीमा रेखा पर कायम रहा. दूसरी ओर, ग्रेट ब्रिटेन ने अपनी नई सीमाओं को 1938 तक सार्वजनिक नहीं किया. वहीं, तिब्बत ने भी मैकमोहन रेखा को मानने से इनकार कर दिया. इस रेखा के कारण तवांग मठ भारत में आता था. तिब्बत का कहना था कि वह इसे तभी मानेगा, जब पहले चीन के साथ अंतिम सीमा समझौता हो.

1904 में बनाए गए नक्शे और उसके बाद बनाए गए नक्शों से साफ है कि जिस सीमा को लेकर आज चीन और भारत के बीच विवाद है, वह साम्राज्यों की साजिशों, अधिकारियों की कल्पना और उन समुदायों के खून से बनी थी, जिन्हें उन देशों के साथ युद्ध में धकेल दिया गया था, जिनके अस्तित्व के बारे में वे जानते तक नहीं थे.

इस संघर्ष को खत्म करने के लिए चीन और भारत, दोनों को यह स्वीकार करना होगा कि उन्हें बांटने वाली इन रेखाओं में कुछ भी तय या अपरिहार्य नहीं है, और न ही ये रेखाएं कोई पवित्र चीज हैं.

प्रवीण स्वामी दिप्रिंट में कंट्रीब्यूटिंग एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @praveenswami है. यह लेख उनके निजी विचार है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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