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Tuesday, 3 November, 2026
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भारत-वियतनाम व्यापार के दो चेहरे—अमेरिका में प्रतिद्वंद्वी, घर पर पार्टनर

आंकड़े यह नहीं बताते कि भारत और वियतनाम भविष्य में प्रतिद्वंद्वी बने रहेंगे या साझेदार बन जाएंगे. यह फैसला नई दिल्ली और हनोई, दोनों को करना है.

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जब आप अमेरिका के ओहायो या टेक्सास में किसी इलेक्ट्रॉनिक्स स्टोर में जाते हैं और नया स्मार्टफोन देखते हैं, तो आपको उसके बनने की जगह में बदलाव दिखाई दे सकता है. एक दशक पहले उस पर “मेड इन चाइना” या “मेड इन वियतनाम” लिखा होने की संभावना ज्यादा थी. अब उस पर “मेड इन इंडिया” लिखा हो सकता है. 2025 में एक बड़ा बदलाव हुआ: स्मार्टफोन, दवाओं को पीछे छोड़कर अमेरिका को भारत के सबसे बड़े निर्यात का सामान बन गए. इनका मूल्य 25.8 अरब डॉलर था. इसी तरह, स्मार्टफोन अमेरिका को वियतनाम का भी सबसे बड़ा निर्यात हैं.

पहली बार स्मार्टफोन भारत और वियतनाम दोनों के लिए अमेरिका को सबसे ज्यादा निर्यात किया जाने वाला सामान बन गया है. दोनों देश एक दशक से चीन के विकल्प के तौर पर उभरने की होड़ में हैं.

मई में वियतनाम के राष्ट्रपति तो लाम की नई दिल्ली यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को बढ़ाकर व्यापक रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर पहुंचाया और 2030 तक 25 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार करने का लक्ष्य रखा, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार की तस्वीर अमेरिका की दुकानों में दिखाई देने वाली तस्वीर से अलग है.

भोजन बाहर, इलेक्ट्रॉनिक्स अंदर

वित्त वर्ष 2017-18 में भारत का वियतनाम के साथ 2.8 अरब डॉलर का व्यापार अधिशेष था. इसकी मुख्य वजह मांस और मछली का निर्यात था, जो वियतनाम को भारत के कुल निर्यात का आधे से ज्यादा था. इन निर्यातों से इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात पर भारत का खर्च काफी हद तक पूरा हो जाता था, लेकिन वित्त वर्ष 2018-19 में व्यापार की स्थिति में बड़ा बदलाव आया. वियतनाम से भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स आयात दोगुने से ज्यादा बढ़कर 1.6 अरब डॉलर से 3.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि मांस और मछली का निर्यात 1.4 अरब डॉलर घट गया. इन दोनों बदलावों, यानी कुल करीब 3.5 अरब डॉलर के बदलाव ने व्यापार अधिशेष को घाटे में बदलने में बड़ी भूमिका निभाई. मौजूदा व्यापार घाटा 4.9 अरब डॉलर है.

ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

वित्त वर्ष 2025-26 में वियतनाम से भारत के कुल 11.6 अरब डॉलर के आयात में से आधे से ज्यादा, यानी 6.1 अरब डॉलर का सामान इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी है. भारत वियतनाम को जितने मूल्य का यह सामान निर्यात करता है, उसके हर एक डॉलर के बदले वह करीब 10 डॉलर का सामान आयात करता है. स्टील के व्यापार की स्थिति भी बदली है. 2021-22 में भारत ने वियतनाम को 1.5 अरब डॉलर का लोहा और स्टील निर्यात किया, जबकि सिर्फ 160 मिलियन डॉलर का आयात किया, लेकिन अगले साल निर्यात घटकर 497 मिलियन डॉलर रह गया, जबकि आयात बढ़कर 879 मिलियन डॉलर हो गया.

अगर थोड़ा करीब से देखें तो 2018-19 के बाद से वियतनाम से भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स आयात सिर्फ एक-तिहाई बढ़ा है. इसी दौरान अमेरिका को भारत का फोन निर्यात 0.3 अरब डॉलर से बढ़कर 25.8 अरब डॉलर हो गया. इससे पता चलता है कि भारत के फोन निर्यात की बढ़ोतरी वियतनाम से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है. बढ़ते ट्रेड घाटे का मुख्य कारण मशीनरी इम्पोर्ट है, जो लगभग चार गुना हो गया है और इंडस्ट्रियल मेटल हैं.

1975 में, इकोनॉमिस्ट हर्बर्ट ग्रुबेल और पीटर लॉयड ने एक जैसे सामान के दो-तरफा ट्रेड और अलग-अलग सामान के एक्सचेंज के बीच अंतर करने के लिए एक इंडेक्स पेश किया था. कॉमर्स मिनिस्ट्री के डेटा के मेरे एनालिसिस के आधार पर, बड़े प्रोडक्ट-कैटेगरी लेवल पर मापने पर भी, भारत-वियतनाम ट्रेड का एक-तिहाई से भी कम हिस्सा आपसी है. ज़्यादातर ट्रेड में एक तरफ़ खाने और कच्चे माल का पारंपरिक एक्सचेंज और दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी का ट्रेडिशनल एक्सचेंज शामिल है. इसके उलट, अमेरिका के साथ ट्रेड पैटर्न एक अलग ट्रेंड दिखाता है.

पुराना इंडेक्स क्या बताता है

1979 में अर्थशास्त्रियों जे. माइकल फिंगर और मोर्देचाई क्रेनिन ने तीसरे बाजार में दो देशों के बीच प्रतिस्पर्धा की समानता को मापने का एक तरीका पेश किया. उनका निर्यात समानता सूचकांक उन सभी उत्पादों को देखता है जिन्हें दो देश किसी एक बाजार में निर्यात करते हैं. इसमें यह देखा जाता है कि दोनों देशों के कुल निर्यात में उस उत्पाद की कितनी हिस्सेदारी है, फिर दोनों में से छोटी हिस्सेदारी को रखा जाता है और सभी उत्पादों के इन आंकड़ों को जोड़ा जाता है. इस सूचकांक का मान शून्य होने का मतलब है कि दोनों देशों के निर्यात पूरी तरह अलग हैं, जबकि 100 का मतलब है कि दोनों देशों के निर्यात की सूची बिल्कुल एक जैसी है.

मैंने अमेरिका को भारत और वियतनाम के निर्यात के लिए इस सूचकांक की गणना की. इसके लिए अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय व्यापार आयोग के आधिकारिक अमेरिकी आयात आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया, जिसमें 12 साल की अवधि के दौरान करीब 1,200 उत्पाद श्रेणियां शामिल हैं. 2014 से 2019 के बीच यह सूचकांक करीब 20 पर स्थिर रहा. इस दौरान भारत ने अमेरिका को हीरे, दवाएं और कपड़े निर्यात किए, जबकि वियतनाम ने फर्नीचर, जूते और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात किए. लेकिन 2022 से सूचकांक बढ़ने लगा और 2025 में 37.9 पर पहुंच गया. यह कम से कम 12 साल का सबसे ऊंचा स्तर था. 2026 के पहले आठ महीनों में यह 37.1 रहा.

ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

इस समानता का करीब आधा हिस्सा सिर्फ एक उत्पाद श्रेणी से आता है: स्मार्टफोन. 2019 में वियतनाम ने अमेरिका को भारत की तुलना में 40 गुना ज्यादा फोन निर्यात किए थे. 2025 तक यह अनुपात घटकर 1.4 रह गया. अगर स्मार्टफोन को हटा दें, तो दोनों देशों के निर्यात में समानता कम हो गई है, क्योंकि दोनों देशों ने इलेक्ट्रॉनिक्स पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया है. 2007 में प्रकाशित अपने लेख “व्हाट यू एक्सपोर्ट मैटर्स” में रिकार्डो हॉसमैन, जेसन ह्वांग और दानी रोड्रिक ने दिखाया था कि जिन देशों के निर्यात की सूची अमीर देशों के जैसी होती है, वे आम तौर पर तेजी से बढ़ते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कोई देश जिन चीजों का निर्माण करता है, वे उसकी विकसित क्षमताओं को दिखाती हैं. अमेरिका के साथ एक दशक से ज्यादा समय से भारत के व्यापार की मुख्य चीजें रही दवाओं और हीरों से आगे बढ़ने की प्रक्रिया सिर्फ छह साल में हुई. इस बीच वियतनाम ने भी प्रगति की. 2019 से 2025 के बीच अमेरिका को उसका फोन निर्यात तीन गुना हो गया.

अगस्त 2025 के आखिर से अमेरिका में आने वाले ज्यादातर भारतीय सामान पर 50 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क लगाया गया, जबकि वियतनामी सामान पर यह 20 प्रतिशत था. हालांकि, स्मार्टफोन को इससे छूट मिली हुई थी. इससे भारत का फोन निर्यात बढ़ता रहा, जबकि उसके कपड़ा और फर्नीचर उद्योगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा. फरवरी में यह अंतर खत्म हो गया, जब रूसी तेल पर शुल्क हटा दिया गया और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आपातकालीन शुल्क को अमान्य कर दिया. जुलाई से नई धारा 301 व्यवस्था के तहत भारत पर 10 प्रतिशत और वियतनाम पर 12.5 प्रतिशत शुल्क लगाया जा रहा है. जैसा कि मैंने जुलाई में कहा था, भारत को यह कम शुल्क वाली श्रेणी नियमों का पालन करने के कारण मिली. खास तौर पर, वॉशिंगटन की शुल्क श्रेणी की घोषणा से 10 दिन पहले भारत ने जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की थी.

ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट
ग्राफिक: मान्या अग्रवाल/दिप्रिंट

फोन को शुल्क से मिली छूट को देखते हुए, जिन क्षेत्रों में भारत और वियतनाम की काफी समानता है, वहां यह प्रतिस्पर्धी बढ़त कम हो जाती है. वहीं जिन क्षेत्रों में वियतनाम आगे है, जैसे कपड़े, जूते और फर्नीचर, वहां यह बढ़त ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. इन क्षेत्रों में 2022 से 2025 के बीच अमेरिका में भारत की बिक्री घटी. ट्रांसफॉर्मर और वाल्व जैसे इंजीनियरिंग सामान की बिक्री भी घटी. इन क्षेत्रों में ढाई प्रतिशत अंक का शुल्क लाभ भारत को फिर से ऑर्डर हासिल करने में मदद कर सकता है. लेकिन इसके लिए छोटे भारतीय निर्यातकों को यह दिखाना होगा कि वे नियमों का पालन कम लागत में कर सकते हैं, जैसा कि नासिक के अंगूर उत्पादकों ने ग्रेपनेट के जरिए किया है.

एक तीसरा कारण भी काम कर रहा है. पिछले साल वियतनाम में नए विदेशी निवेश का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत चीन था. भारतीय कारखाने भी चीन पर काफी निर्भर हैं. वित्त वर्ष 2025-26 में 71 इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद श्रेणियों में भारत के आयात का कम से कम 80 प्रतिशत चीन से आया. इसलिए भारत और वियतनाम को दो जुड़वां देशों की तरह देखा जा सकता है. दोनों वैकल्पिक वैश्विक विनिर्माण और असेंबली केंद्र के तौर पर काम कर रहे हैं और दोनों चीनी कलपुर्जों पर निर्भर हैं. आने वाले दशक में निर्णायक बात यह होगी कि दोनों में से कौन सा देश पहले इतना मजबूत कलपुर्जा आधार तैयार करता है कि वह आत्मनिर्भर बन सके.

प्रतिद्वंद्वी से साझेदार तक

जब दोनों सूचकांकों को साथ रखकर देखा जाता है, तो एक विरोधाभास सामने आता है. अमेरिका में भारत और वियतनाम एक-दूसरे के समान दिखाई देते हैं. दोनों एक ही उपभोक्ता वर्ग को एक जैसा सामान देते हैं. लेकिन आपसी संबंधों में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं. वे खाद्य और धातुओं के बदले इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी का व्यापार करते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वे प्रतिस्पर्धा करते हैं, जबकि आपसी व्यापार में एक-दूसरे के पूरक हैं.

1930 के दशक में जापानी अर्थशास्त्री कनामे अकामात्सु ने ‘फ्लाइंग गीज’ मॉडल के जरिए एशिया के विकास को समझाया था. इस मॉडल में आगे चल रही अर्थव्यवस्थाएं ज्यादा उन्नत उद्योगों की ओर बढ़ती हैं. वियतनाम इस दिशा में पहले ही आगे बढ़ रहा है. अमेरिका को उसका कंप्यूटर निर्यात 2019 में 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 33.6 अरब डॉलर हो गया. दूसरी ओर, भारत का उन क्षेत्रों में मजबूत स्थान बना हुआ है, जहां वियतनाम की मौजूदगी बहुत कम है. इनमें खास तौर पर दवाएं शामिल हैं. पिछले साल अमेरिका से दवाओं से भारत को 14.8 अरब डॉलर की आय हुई. इसके बावजूद, 2025-26 में भारत ने वियतनाम को सिर्फ 176 मिलियन डॉलर की दवाएं निर्यात कीं. दुनिया की फार्मेसी कहे जाने वाले देश के लिए यह एक बड़ी असमानता है.

निवेश भी चिंता का एक क्षेत्र है. वियतनाम सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कंपनियों ने वियतनाम में 503 परियोजनाओं में करीब 1.17 अरब डॉलर का निवेश पंजीकृत किया है. इसके उलट, भारत में वियतनामी निवेश अभी सीमित है. इसमें थूथुकुडी में विनफास्ट का 500 मिलियन डॉलर का इलेक्ट्रिक वाहन कारखाना एक प्रमुख निवेश है. जिन दो देशों के बीच हर साल 18 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार होता है, उनके लिए यह निवेश का काफी छोटा आधार है.

इस स्थिति में चार मौके हैं. पहला, आसियान-भारत सामान समझौते की चल रही समीक्षा में हर उत्पाद के लिए उसके मूल देश से जुड़े नियम तय किए जाने चाहिए. दूसरा, वियतनाम को जिन सामानों पर शुल्क का फायदा मिल रहा है, उनमें लंबे समय तक बाजार हिस्सेदारी बनाए रखने के लिए इस फायदे का इस्तेमाल करना चाहिए. इसके लिए ग्रेपनेट की तर्ज पर एक समान राष्ट्रीय ट्रेसबिलिटी प्रणाली बनाई जा सकती है. तीसरा, भारत की प्रमुख चीजों, जैसे दवाओं और इंजीनियरिंग सामान के वियतनाम को निर्यात को बढ़ाकर दोनों देशों के बीच व्यापार को संतुलित किया जाना चाहिए. इसके लिए ऐसी वस्तुओं पर निर्भरता कम करनी चाहिए, जिनका व्यापार कभी बढ़ता और कभी घटता रहता है. आखिर में, व्यापार को संयुक्त निवेश की ओर ले जाना चाहिए. इससे भारतीय और वियतनामी कंपनियां अमेरिकी ऑर्डर के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय मिलकर वैल्यू चेन विकसित कर सकेंगी.

ये सूचकांक दिखाते हैं कि भारत और वियतनाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी और घरेलू स्तर पर एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं. हालांकि, ये यह नहीं बताते कि दोनों देश भविष्य में प्रतिद्वंद्वी बने रहेंगे या साझेदार बन जाएंगे. यह फैसला नई दिल्ली और हनोई, दोनों को करना है.

बिदिशा भट्टाचार्य दिप्रिंट की कंसल्टिंग एडिटर (इकोनॉमिक्स) और चिंतन रिसर्च फाउंडेशन की एसोसिएट फेलो हैं. उनका एक्स हैंडल @Bidishabh है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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