रविवार को राष्ट्रीय राजधानी में विपक्ष की रैली बहुत बड़ी थी. माहौल जोशीला था और भाषण भी जोरदार थे. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह निश्चित तौर पर इससे प्रभावित नहीं हुए होंगे.
इस रैली से कुछ दिन पहले शाह ने भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में चुनिंदा पत्रकारों से बातचीत के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ विपक्ष के विरोध को खारिज कर दिया था. गृह मंत्री का मानना था कि कुछ साल बाद मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को मतदाता सूची से ‘फर्जी या गलत नाम हटाने’ के मामले में 1990 से 1996 तक 10वें CEC रहे टीएन शेषन से बेहतर सुधारक माना जाएगा.
शाह एक बड़े राजनीतिक रणनीतिकार हैं. उन्हें पता होगा कि राजनीतिक दल, खासकर पूरा विपक्ष, कुछ लाख कार्यकर्ताओं को नई दिल्ली लाकर अपनी ताकत दिखा सकता है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि इससे उसकी चुनावी ताकत का सही अंदाज़ा हो जाए. सिर्फ एक उदाहरण लें. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से एक साल पहले, वाम दलों से जुड़े संगठनों ने अप्रैल 2025 में कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक रैली की थी. इसमें लाखों लोग शामिल हुए थे, लेकिन 294 सदस्यों वाली विधानसभा में वाम दल को सिर्फ एक सीट मिली.
अभी तक ऐसा कोई सबूत भी नहीं है कि कथित ‘वोट चोरी’ का लोगों के वोट देने के तरीके पर कोई असर पड़ा है. बिहार विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ अभियान नाकाम रहा. उन्होंने इस मुद्दे को लेकर दिल्ली की सड़कों पर भी प्रदर्शन किया, लेकिन दिल्ली और पंजाब विश्वविद्यालयों में छात्र संघ चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI को इसका ज्यादा फायदा नहीं मिला.
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि कर्नाटक वह राज्य था जहां से राहुल गांधी ने कथित ‘वोट चोरी’ के सबूत पेश किए थे. ये सबूत बेंगलुरु की महादेवपुरा और कलबुर्गी की अलंद विधानसभा सीटों से जुड़े थे. इसके बावजूद कांग्रेस राज्य में विधान परिषद की चार सीटों के चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत सकी. इनमें बेंगलुरु टीचर्स सीट भी शामिल थी, जो कांग्रेस ने पिछली बार जीती थी.
मजाक उड़ाने से ‘अराजकता’ तक
इसलिए बात रामलीला मैदान में जुटी भीड़ के आकार या SIR विरोधी अभियान के असर की नहीं है. INDIA गठबंधन की रैली विपक्ष को एकजुट करने, अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने और राजनीतिक बहस पर अपनी पकड़ बनाए रखने का काम करती है. पिछले कुछ समय से राजनीतिक बहस में बीजेपी पीछे चल रही है. विपक्ष के लिए ये रैली के अच्छे नतीजे हैं, लेकिन क्या ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिंता में डालने के लिए काफी हैं?
पहली नज़र में तो नहीं, जैसा कि मैंने पहले भी बताया है. फिर प्रधानमंत्री मोदी इंदिरा गांधी की तरह यह क्यों कहेंगे कि विदेशी ताकतें देश में ‘अराजकता’ पैदा करने की कोशिश कर रही हैं? ऐसी बातें असुरक्षा की भावना दिखाती हैं. शनिवार को पीएम ने राहुल का नाम लिए बिना कहा, “विदेश में चुपचाप कौन किससे मिल रहा है? भारत विरोधी ताकतें किसका समर्थन कर रही हैं?”
बीजेपी जो कभी विपक्ष के नेता को ‘पप्पू’ कहती थी, अब अचानक उन्हें भारत में ‘अराजकता’ पैदा करने में सक्षम मान रही है. कुछ ऐसा ही इंदिरा गांधी को जयप्रकाश नारायण के बारे में लगता था. मोदी पहले राहुल का मज़ाक उड़ाते थे. अब वह विपक्ष के नेता से नाराज़ नज़र आ रहे हैं.
मैं यह मानना चाहूंगा कि सत्तारूढ़ बीजेपी को राहुल ने नहीं, बल्कि जेन जी और अल्फा पीढ़ी ने परेशान किया है. उसने पड़ोसी देशों—श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में पोस्ट-मिलेनियल्स को सरकारें हटाते देखा है. साथ ही जर्मनी, बेल्जियम, फ्रांस, इटली, अल्बानिया और सर्बिया में विरोध प्रदर्शनों की लहर भी देखी है.
भारत की जेन जी और अल्फा पीढ़ी और इन देशों के युवाओं में कई समानताएं हैं. उदाहरण के लिए, उनकी शिकायतें भी लगभग एक जैसी हैं—खराब शिक्षा व्यवस्था, आर्थिक अवसरों की कमी, व्यवस्था में भ्रष्टाचार, महंगाई, संस्थाओं का कमजोर होना और सबसे ज़रूरी, अपनी बात न सुने जाने की शिकायत. वे इसे लोकतंत्र के कमजोर होने के संकेत के तौर पर देखते हैं. वे अपनी नाराज़गी सिर्फ इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नहीं निकालते, बल्कि सड़कों पर भी उतरते हैं.
इन आंदोलनों में ज्यादातर कोई एक नेता नहीं है. सर्बिया में विरोध प्रदर्शन दो साल पहले यूनिवर्सिटी कैंपस से शुरू हुए थे और बाद में एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गए. इसका मकसद अलेक्जेंडर वुसिच के करीब 14 साल लंबे सत्तावादी शासन को खत्म करना था. एक भी छात्र ने चुनाव नहीं लड़ा. उनकी पार्टी ‘स्टूडेंट लिस्ट’ की ओर से संसद के लिए खड़े 250 उम्मीदवारों में से 160 के पास डॉक्टरेट की डिग्री है. साइंस जर्नल की हेडलाइन में सर्बिया की संसद को “दुनिया की सबसे ज्यादा पढ़ी-लिखी संसद” बताया गया.
जर्नल के मुताबिक, नए सांसदों में एक एस्ट्रोफिजिसिस्ट हैं, जिन्होंने आकाशगंगाओं के विकास पर पढ़ाई की है. एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं, जिन्होंने रोबोट बनाने में मदद की. एक ऑर्गेनिक केमिस्ट हैं, जिन्होंने कोविड-19 की दवाओं पर काम किया. इसके अलावा एक शिक्षा शोधकर्ता, एक समाजशास्त्री, कई राजनीतिक वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, डॉक्टर और मेडिकल रिसर्चर भी हैं. इनमें सर्बिया के नेशनल बैंक के पूर्व गवर्नर, एक पूर्व बास्केटबॉल स्टार और एक ओपेरा गायक भी शामिल हैं.
फिर भी चुनाव जीतने के एक हफ्ते बाद भी स्टूडेंट लिस्ट अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं कर पाई है. इसकी वजह यह है कि दो साल तक चले छात्रों के आंदोलन का कोई साफ नेता नहीं था. संयोग से, वुसिच ने भी अपनी हार के पीछे विदेशी ताकतों का हाथ बताया. उन्होंने इसके लिए “अलग-अलग यूरोपीय देशों और अमेरिकी डीप स्टेट” को जिम्मेदार ठहराया.
भारत की जेन जी और अल्फा भी किसी एक नेता के नेतृत्व में नहीं हैं. कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने शायद ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं, जिनसे युवाओं को अपनी नाराज़गी बाहर निकालने का मौका मिला, लेकिन इसका कोई साफ नेता नहीं है. जब CJP के नेता राष्ट्रीय राजधानी में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे, तब छात्र और युवा खुद-ब-खुद मुंबई, पटना और देश के कई दूसरे हिस्सों में जुट गए और यही मांग करने लगे. यहां तक कि जब रविवार को राष्ट्रीय राजधानी में INDIA गठबंधन की रैली में CJP शामिल नहीं थी, तब भी कई छात्र और युवा उसमें पहुंचे.
और यही बात मोदी-शाह को परेशान कर सकती है—मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों का जेन जी-अल्फा की निराशा को अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना. नेपाल में जेन जी के विरोध प्रदर्शनों का निशाना सभी पुरानी पार्टियां थीं. सर्बिया में छात्रों ने दूसरी विपक्षी पार्टियों से दूरी बनाए रखी. बेल्जियम, जर्मनी, इटली और अल्बानिया में भी राजनीतिक दल ज्यादातर दूर रहे. हालांकि विपक्ष के कुछ नेताओं ने छात्रों के मुद्दे का समर्थन किया.
जेन जी के विरोध प्रदर्शनों का राजनीतिकरण
भारत में जो हो रहा है, वह कुछ हद तक बांग्लादेश में जो हुआ और अभी फ्रांस में जो हो रहा है, वैसा ही है. बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व युवाओं ने किया था, लेकिन बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी और उनकी छात्र इकाइयों ने संगठनात्मक मदद दी और विरोध प्रदर्शनों में शामिल भी हुए. फ्रांस में वामपंथी पार्टी फ्रांस अनबाउंड को हिंसा भड़काने के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है. इसके नेता जीन-ल्यूक मेलेंशों पिछले महीने विरोध प्रदर्शनों में शामिल हुए थे.
इसी तरह भारत में CJP छात्रों को सड़कों पर लाने में अहम भूमिका निभा सकती है, लेकिन राजनीतिक दलों ने शुरुआत से ही उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है. NEET पेपर लीक को लेकर CJP के विरोध प्रदर्शनों में वाम दलों से जुड़े छात्र संगठन भी शामिल थे. वहीं कांग्रेस और उसकी युवा और छात्र इकाइयों ने भी अलग-अलग विरोध प्रदर्शन किए.
राहुल और प्रियंका गांधी के साथ AISA की नेहा बोरा की तस्वीरें और दिवाली पार्टी में विपक्षी नेताओं के साथ CJP नेताओं की तस्वीरों ने इस साझा हित को साफ दिखाया. मुंबई में ठाकरे भाई जेन जी के विरोध प्रदर्शनों का चेहरा बन गए. विपक्षी गठबंधन का CJP को अपने साथ जोड़ लेना और नाराज जेन जी और अल्फा पीढ़ी का मार्गदर्शक और संदेशवाहक बन जाना ही वह बात है, जो प्रधानमंत्री मोदी को चिंता में डाल सकती है.
विपक्ष का SIR विरोधी अभियान अभी तक उसे चुनावी फायदा नहीं दे रहा है, लेकिन यह छात्रों और युवाओं की बड़ी शिकायतों से जुड़ रहा है. इनमें से कुछ छात्र और युवा रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान भी पहुंचे थे.
हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के दूसरे नेता अपनी गुस्से वाली प्रतिक्रियाओं और साजिश की बातों में ज़रूरत से ज्यादा आगे जा रहे हैं. अभी यह कहना जल्दबाजी होगी. भारत के जेन जी आंदोलन में विपक्ष का सबसे आगे आ जाना, जबकि ज्यादातर दूसरे देशों में छात्रों ने खुद आंदोलन का नेतृत्व किया, इसका एक दूसरा पहलू भी है.
इससे जेन जी के विरोध प्रदर्शनों का राजनीतिकरण होता है. इससे सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को नए सिरे से बदलने के विचार से जुड़ी वह उम्मीद और आकर्षण खत्म हो सकता है. इससे आंदोलन के शुरुआती दौर में ही उसके कमजोर पड़ने का खतरा है. यह भी अभी साफ नहीं है कि शहरों के बाहर जेन जी-अल्फा की नाराज़गी कितनी है, अगर है भी तो. हालांकि, बीजेपी के गढ़ माने जाने वाले वाराणसी, लखनऊ, नागपुर और पटना जैसे इलाकों में MLC चुनाव की ग्रेजुएट्स और टीचर्स सीटों पर बीजेपी की हार ने पढ़े-लिखे युवाओं में नाराजगी की ओर इशारा जरूर किया.
अगले लोकसभा चुनाव में अभी ढाई साल बाकी हैं. लगातार एक ही मुद्दे पर टिके रहना और लंबे समय तक मेहनत करते रहना विपक्ष की खासियत नहीं है. देखिए, कैसे उसने शिक्षा सुधारों को इतनी जल्दी भुला दिया और फिर ‘वोट चोरी’ पर लौट आया. इसके बाद कोई और मुद्दा आ जाएगा. जेन जी के लिए विपक्ष की बदलती प्राथमिकताओं के साथ कदम मिलाना मुश्किल होगा.
डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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