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Tuesday, 29 September, 2026
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प्रधानमंत्री मोदी अपनी विरासत के लिए ये पांच काम कर सकते हैं, लेकिन करेंगे नहीं

चुनावों को लेकर घटता भरोसा मोदी के सामने विरासत की एक अलग तरह की चुनौती रखता है. ऐसी चुनौती जिसे केवल सरकार की नीतियों की उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता.

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अब वक्त आ गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बारे में सोचें कि भारत के तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके व्यक्ति के तौर पर उन्हें इतिहास में किस तरह याद किया जाएगा. मैं कई नाराज़ आवाज़ें लगभग सुन सकता हूं: ‘अभी उनकी विरासत की बात क्यों करें?’

वे अभी महज़ 76 साल के हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप 80 साल के हैं. मोरारजी देसाई 81 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बने थे. महाथिर मोहम्मद ने 92 साल की उम्र में मलेशिया के प्रधानमंत्री के तौर पर अपना आखिरी कार्यकाल शुरू किया था. संयोग से, दो साल बाद उन्होंने उस राजनीतिक संकट के बाद इस्तीफा दे दिया था, जो अपने तय उत्तराधिकारी को सत्ता सौंपने की समयसीमा बताने से उनकी अनिच्छा के कारण पैदा हुआ था.

इसलिए, मैं कुछ बातें पहले साफ कर देना चाहता हूं. मैं उनकी विरासत की बात इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि वह 75 साल की उम्र पार कर चुके हैं. नहीं, वह अनौपचारिक उम्र सीमा लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और कुछ अन्य नेताओं के लिए एक बार की गई व्यवस्था थी.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी के संभावित उत्तराधिकारियों में गिना जाता है, उन्होंने यह कहने की बात कही है कि 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद भी मोदी सरकार का नेतृत्व करते रहेंगे. इससे उम्र से जुड़ा मुद्दा साफ हो जाता है.

यह भागवत की टिप्पणी की बात नहीं है

दूसरी बात जो मैं साफ करना चाहता हूं, वह यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत की हाल की टिप्पणियों को लेकर मैं विपक्ष की साजिश वाली बातों से सहमत नहीं हूं.

भागवत ने कहा था, “जब हम आज किसी नेता के बारे में सोचते हैं, तो हमारे सामने एक तस्वीर आती है…जो भाषण देता है, चुनाव जीतता है, लोगों को उपदेश देता है. इससे नहीं होता है….नेतृत्व का मतलब नेताओं को तैयार करना है…केवल खुद नेतृत्व करना ही नेतृत्व नहीं है.”

विपक्ष ने इस बात को पकड़ लिया और पूछा कि वह किस नेता की बात कर रहे थे, लेकिन RSS प्रमुख एक सामान्य बात कह रहे थे. विपक्ष ने आरएसएस प्रमुख की उस टिप्पणी का भी अपने तरीके से मतलब निकाला, जिसमें उन्होंने सूरज के उगने के बाद उसके डूबने को तय बताया था — “सूर्य का उदय-अस्त निश्चित है.”

सच्चाई यह है कि भागवत सार्वजनिक रूप से किसी को फटकार लगाने या ताना मारने के लिए नहीं जाने जाते, यहां तक कि वैचारिक विरोधियों पर भी नहीं. ऐसे में उस पूर्व प्रचारक की बात तो और भी नहीं, जिसका प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना 100 साल पुराने संगठन का इस सदी का सुनहरा दशक बन गया.

अगर किसी आरएसएस प्रमुख ने सच में किसी बीजेपी प्रधानमंत्री को मुश्किल में डाला था, तो वह भागवत के पूर्ववर्ती के.एस. सुदर्शन थे, जो 2000 से 2009 तक आरएसएस प्रमुख रहे. उन्होंने प्रधानमंत्री वाजपेयी को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश की थी, हालांकि वह इसमें सफल नहीं हुए.

लेकिन जब सुदर्शन तत्कालीन प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति भवन भेजकर राजनीतिक रूप से महत्वहीन बनाने के जरिए उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाना चाहते थे, तब भी उन्होंने यह काम बहुत गोपनीय तरीके से किया.

जैसा कि विनय सीतापति ने अपनी किताब “Jugalbandi: The BJP Before Modi” में लिखा है, अप्रैल 2002 में तत्कालीन आरएसएस प्रमुख वाजपेयी के घर एक प्रस्ताव लेकर पहुंचे थे: “वाजपेयी भारत के अगले राष्ट्रपति क्यों नहीं बन जाते और आडवाणी (जो उस समय गृह मंत्री थे) प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन जाते?”

अगली सुबह आरएसएस प्रमुख ने नाश्ते पर आडवाणी से मुलाकात की. जब आडवाणी ने पूछा कि इस प्रस्ताव पर वाजपेयी ने क्या जवाब दिया, तो संघ प्रमुख ने कहा, “उन्होंने (वाजपेयी ने) न हां कहा और न ही ना. इसलिए मुझे लगता है कि उन्होंने मेरे सुझाव को खारिज नहीं किया है.”

विनय सीतापति लिखते हैं कि इन मुलाकातों से कुछ हफ्ते पहले उद्योगपति धीरूभाई अंबानी ने वाजपेयी से मुलाकात की थी और उन्हें बताया था कि आडवाणी के करीबी कुछ पत्रकारों ने वाजपेयी के राष्ट्रपति बनने की बात उनसे कही थी. इसलिए, आरएसएस प्रमुख के सामने यह प्रस्ताव रखने से पहले ही वाजपेयी को आरएसएस की योजना के बारे में पता था.

मुलाकात के बाद वाजपेयी ने एनडीए के सहयोगी दलों को इस बात पर राजी कर लिया कि भारत का अगला राष्ट्रपति कौन होगा, इसका फैसला वह खुद करेंगे. और यही वह पृष्ठभूमि थी, जिसके बाद जुलाई 2002 में एपीजे अब्दुल कलाम भारत के राष्ट्रपति बने.

इससे कुछ हफ्ते पहले, उसी साल जून के अंत तक, वाजपेयी ने आडवाणी को उप प्रधानमंत्री बना दिया था.

अप्रैल-मई 2027 आते-आते, राष्ट्रपति चुनाव से पहले, प्रधानमंत्री मोदी को लेकर आरएसएस की योजना पर भी इसी तरह की अटकलों और कयासों के लिए तैयार रहिए.

सच कहूं तो, मैं अभी इस थ्योरी को नहीं मान रहा हूं.

यह अलोकप्रियता की बात भी नहीं है

इससे मैं तीसरी बात पर आता हूं. मैं प्रधानमंत्री मोदी की विरासत की बात इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि मुझे लगता है कि वह अलोकप्रिय हो रहे हैं, जैसा कि विपक्ष मानता है, खासकर छात्रों और युवाओं के देशभर में हुए प्रदर्शनों के बाद. इंडिया टुडे के हर दो साल में होने वाले मूड ऑफ द नेशन सर्वे बताते हैं कि मोदी आज भी लोगों की पसंद के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं—अपनी पार्टी के अंदर और बाहर मौजूद संभावित चुनौती देने वालों से बहुत, बहुत आगे.

कई लोगों का मानना है कि अगर और जब बीजेपी उत्तर प्रदेश में होने वाले अगले विधानसभा चुनाव जीतती है, तो प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को लेकर सभी संदेह खत्म हो जाएंगे.

हालांकि, मेरी राय अलग है. यूपी चुनाव के नतीजे चाहे जो हों, वे प्रधानमंत्री मोदी के लिए स्थिति को और मुश्किल बना सकते हैं. अगर बीजेपी उत्तर प्रदेश में हारती है, बावजूद इसके कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लोकप्रिय हैं, तो बीजेपी और बड़े संघ परिवार में मोदी के विरोधी ऊपर नेतृत्व में बदलाव की मांग और तेज़ कर सकते हैं. बीजेपी उत्तर प्रदेश को हारने का जोखिम नहीं उठा सकती, क्योंकि इससे अगले लोकसभा चुनाव से करीब दो साल पहले विपक्ष को बड़ी राहत मिल जाएगी.

और अगर योगी उत्तर प्रदेश में बीजेपी को लगातार तीसरी बार जीत दिलाते हैं, तो उनके शीर्ष पद पर पहुंचने की मांग और ज्यादा मजबूत और तेज हो जाएगी. मोदी के बाद वह बीजेपी के अकेले ऐसे नेता हैं जिनकी पूरे देश में अपील है, और जो अपने राज्य से बाहर भी बीजेपी उम्मीदवारों के लिए वोट दिला सकते हैं. वैसे, राजनीतिक भविष्यवाणी करने के लिए कभी भी काल्पनिक स्थितियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. आज की तारीख में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता पर सवाल नहीं है.

तो फिर मुझे अभी प्रधानमंत्री मोदी की विरासत की बात क्यों करनी चाहिए?

क्योंकि विरासत बनाने में काफी समय लगता है और प्रधानमंत्री मोदी नहीं चाहेंगे कि उनकी विरासत का फैसला आने वाली पीढ़ियां अपने हिसाब से करें. उनके पूर्ववर्ती डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी विरासत का फैसला इतिहास पर छोड़ दिया था कि इतिहास उनके साथ ज्यादा नरमी बरते.

प्रधानमंत्री मोदी अभी इतिहास बनाने में विश्वास रखते हैं. अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से लेकर अनुच्छेद 370 को खत्म करने, बालाकोट एयर स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर, जीएसटी, जन धन योजना, आयुष्मान भारत, PM-KISAN, पाइप से पीने का पानी और ऐसी कई चीजों की लंबी सूची वह अपनी विरासत के तौर पर गिना सकते हैं.

लेकिन अगर यह धारणा बनती है कि उनके कार्यकाल में भारतीय लोकतंत्र कमजोर हुआ, चुनावी व्यवस्था और चुनावी प्रक्रियाएं खराब हुईं, तो ये सभी उपलब्धियां बेकार जैसी लग सकती हैं.

2069 की भविष्यवाणी

दिसंबर 2023 में मैंने लिखा था कि बीजेपी को लगातार यह भरोसा बढ़ता जा रहा था कि वह अगले 46 साल तक सत्ता में रहेगी. यह बात उस समय बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की 2018 में की गई 50 साल तक शासन करने की भविष्यवाणी पर आधारित थी.

मेरे इस निष्कर्ष की वजह Chief Election Commissioner and other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Bill, 2023 था, जो जल्द ही कानून बन गया. ऐसा कानून केवल वही राजनीतिक पार्टी बना सकती है जिसे इस बात का बहुत ज्यादा भरोसा हो कि वह कभी सत्ता नहीं हारेगी.

इस कानून ने प्रधानमंत्री को पहले की तरह CEC और ECs को अपनी पसंद से चुनने का अधिकार दिया. मोदी सरकार ने कांग्रेस के समय की नियुक्ति प्रक्रिया से भी आगे बढ़कर मौजूदा और पूर्व ECs और CECs को किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्रवाई से सुरक्षा दे दी.

मैंने दिसंबर 2023 में लिखा था, “ऐसी स्थिति के बारे में सोचिए, जहां प्रधानमंत्री ECs और CEC को नियुक्त करते हैं और माना जाए कि उनका पहले से वफादारी और आदेश मानने का रिकॉर्ड है. उनसे उम्मीद की जाएगी कि वे हर संभव तरीके से अपना आभार चुकाएं. कानून लागू होने के बाद उन्हें भविष्य में किसी भी नतीजे का डर नहीं होगा.”

तीन साल बाद चीज़ें बिल्कुल इसी तरह होती दिख रही हैं.

चुनाव आयोग पर घटता भरोसा

विपक्ष के आरोपों और बीजेपी के ‘आपने क्या किया’ वाले जवाबों से आगे बढ़ते हैं. ज्यादा से ज्यादा भारतीयों का चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रियाओं पर भरोसा कम हो रहा है.

मार्च-अप्रैल 2024 में सीएसडीएस-लोकनीति ने चुनाव से पहले एक सर्वे किया था. इसमें 28 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि उन्हें ECI पर काफी हद तक भरोसा है. 2019 में यह आंकड़ा 51 प्रतिशत था. उन पांच सालों में ECI पर बहुत कम भरोसा करने वाले लोगों की संख्या दोगुनी होकर 14 प्रतिशत हो गई.

इंडिया टुडे सी–वोटर के मूड ऑफ द नेशन (MOTN) सर्वे के मुताबिक, 43 प्रतिशत लोगों ने कहा कि ECI पर उनका भरोसा बढ़ा है, जबकि 38 प्रतिशत ने कहा कि उनका भरोसा कम हुआ है.

इस सवाल पर पिछले तीन MOTN सर्वे के जवाब देखिए: “क्या आपको लगता है कि भारत में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं?”

अगस्त 2025 में 64 प्रतिशत लोगों ने ‘हां’ कहा था, जनवरी 2026 में 57 प्रतिशत और अगस्त 2026 में 52 प्रतिशत. यानी इसमें लगातार गिरावट आई.

‘नहीं’ कहने वालों की संख्या अगस्त 2025 में 32 प्रतिशत थी, जनवरी 2026 में 37 प्रतिशत और अगस्त 2026 में 41 प्रतिशत. यानी इसमें लगातार बढ़ोतरी हुई.

यह कहना गलत होगा कि ज्यादातर भारतीय—52 प्रतिशत—अब भी मानते हैं कि भारत में चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होते हैं. अगर हर पांच में से दो भारतीय मानते हैं कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हैं, तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत चिंता की बात है.

100 प्रतिशत लोगों का हमारी चुनावी व्यवस्था, प्रक्रियाओं और संस्थाओं की निष्पक्षता पर भरोसा वापस लाना प्रधानमंत्री मोदी की सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए.

विपक्ष क्या कहता है

वह हमेशा की तरह विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा सकते हैं, लेकिन अगर 41 प्रतिशत भारतीय विपक्ष की साजिश वाली बातों पर भरोसा कर रहे हैं, तो प्रधानमंत्री मोदी को उन्हें समझाने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए.

तो विपक्ष की बड़ी बात क्या है?

विपक्ष का कहना है कि भारत की चुनावी निगरानी करने वाली संस्था पक्षपाती और प्रभावित है. वह एनडीए के अलावा दूसरे दलों के मतदाताओं को वोट देने के अधिकार से वंचित करती है. वह चुनावी वोटर लिस्ट में बदलाव करके, विपक्षी उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराकर, विपक्ष को निशाना बनाकर और सत्तारूढ़ पार्टी को गंभीर उल्लंघनों के बावजूद बचाकर हर तरह से सत्तारूढ़ पार्टी की मदद करती है.

विपक्ष का यह भी आरोप है कि वह ‘साम, दाम, दंड, भेद’ का इस्तेमाल करती है—खासकर CBI और ED जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों का — ताकि विपक्षी पार्टियों को कमजोर किया जा सके और विपक्ष की सरकारों को गिराया जा सके.

मोदी क्या पांच काम कर सकते हैं

मैं इन आरोपों की सच्चाई या उनके पक्ष में नहीं जा रहा हूं, लेकिन अगर दो में से केवल एक भारतीय को चुनाव निष्पक्ष लगता है और हर सर्वे में ऐसे लोगों की संख्या घट रही है, तो यह हमारे लोकतंत्र के लिए संकट की स्थिति है.

प्रधानमंत्री मोदी इस संकट को कैसे हल करते हैं, यही उनकी असली विरासत तय करेगा.

लोगों की चिंताओं को दूर करने के लिए वह तुरंत पांच काम कर सकते हैं.

पहला, 2023 के कानून को खत्म किया जाए, ताकि प्रधानमंत्री और उनके जरिए सत्तारूढ़ पार्टी के पास ECs और CEC को अपनी पसंद से चुनने की ताकत न रहे. नियुक्ति की प्रक्रिया वास्तव में स्वतंत्र, निष्पक्ष और किसी राजनीतिक दल के प्रभाव से दूर होनी चाहिए.

दूसरा, केंद्रीय जांच और खुफिया एजेंसियों पर संसद की निगरानी सुनिश्चित की जाए, जैसा कि अमेरिका समेत कई देशों में होता है. इससे ये एजेंसियां ज्यादा जवाबदेह होंगी और राजनीतिक मकसद के लिए इनके इस्तेमाल को रोका जा सकेगा. अगर और कुछ नहीं, तो कम से कम ‘वॉशिंग मशीन’ का नाम तो खराब नहीं होगा.

तीसरा, या तो दल-बदल विरोधी कानून को पूरी तरह खत्म किया जाए या फिर दल बदलने वाले नेताओं के लिए अयोग्यता को अपने आप या अनिवार्य बनाया जाए, चाहे उनकी संख्या कितनी भी हो. राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के अध्यक्षों या इस मामले में राज्यसभा के सभापति से यह उम्मीद करना कि वे अपनी पार्टी की निष्ठा से ऊपर उठकर निष्पक्ष फैसला करेंगे, बहुत भोला होना है.

चौथा, चुनाव कराने में सरकारी अधिकारियों की भूमिका को देखते हुए, रिटायरमेंट के बाद राजनीति में आने या चुनाव लड़ने से पहले पांच साल की रोक की अवधि लागू की जाए.

पांचवां, कॉरपोरेट चंदे की एक सीमा तय की जाए और यह भी तय हो कि कोई राजनीतिक पार्टी कंपनियों से अधिकतम कितना चंदा ले सकती है. क्या हम सच में सोचते हैं कि कोई कारोबारी या उद्योगपति किसी राजनीतिक पार्टी को बिना बदले में कुछ उम्मीद किए सैकड़ों करोड़ रुपये देता है?

और ऐसा क्यों है कि केंद्र या किसी राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी को हमेशा विपक्ष से कहीं ज्यादा कॉरपोरेट चंदा मिलता है?

वैसे, राजनीतिक पार्टियों के पास हजारों करोड़ रुपये होने ही क्यों चाहिए? एक आयोग या समिति बनाई जानी चाहिए, जो यह तय करे कि किसी राजनीतिक पार्टी को अपने रोजमर्रा के कामकाज और चुनाव लड़ने के लिए कितनी रकम की ज़रूरत है.

अगर प्रधानमंत्री मोदी सिर्फ इन पांच चीजों को लागू कर दें, तो इससे हर मतदाता का सिर्फ 52 प्रतिशत लोगों का नहीं हमारी चुनावी व्यवस्था पर भरोसा वापस लाने में बहुत मदद मिलेगी.

यही उस तरह की विरासत होगी, जिसे इतना लोकप्रिय प्रधानमंत्री आमतौर पर अपने पीछे छोड़ना चाहेगा.

प्रधानमंत्री मोदी उन कामों को करने में विश्वास रखते हैं, जिन्हें उनके पूर्ववर्ती “70 साल” में नहीं कर सके.

लेकिन ऊपर बताए गए मामलों में उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों के कदमों पर चलना चुना है.

डीके सिंह दिप्रिंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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