भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी प्रतिबद्धताओं को वास्तविक सैन्य क्षमताओं में बदलने की है. 28 अक्टूबर को फिलीपींस के सेबू में आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक-प्लस के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके अमेरिकी समकक्ष पीट हेगसेथ ने 10 साल के रक्षा ढांचे के तहत हुई प्रगति की समीक्षा की. इसमें सैन्य तैयारियों, तकनीक साझा करने और रक्षा उद्योग को एक-दूसरे से जोड़ने पर ध्यान दिया गया. हेगसेथ ने सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी समर्थन की भी पुष्टि की. कुआलालंपुर में इस ढांचे पर हस्ताक्षर हुए करीब एक साल हो चुका है. अब चुनौती इसके बड़े लक्ष्यों को काम करने वाली व्यवस्थाओं और ठोस नतीजों में बदलने की है.
इससे सिर्फ एक हफ्ते पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो व्यापार, रक्षा, तकनीक और ऊर्जा सुरक्षा पर बातचीत के लिए मुंबई में विदेश मंत्री एस जयशंकर से मिले थे. दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में हुई प्रगति का स्वागत किया. 20-21 अक्टूबर की उनकी यह यात्रा इस साल भारत की उनकी दूसरी यात्रा थी. इस दौरान रक्षा सहयोग को व्यापक ‘व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ को बनाए रखने की कोशिश के हिस्से के रूप में देखा गया. कूटनीतिक स्तर पर लगातार हो रही यह गतिविधि एक साफ संदेश देती है: नई दिल्ली और वॉशिंगटन दोनों ही इस साझेदारी में निवेश जारी रखे हुए हैं, भले ही वे इसकी शर्तों को लेकर बातचीत कर रहे हों.
ऊर्जा सुरक्षा इस जुड़ाव को और जरूरी बनाती है. ईरान युद्ध और सप्लाई के रास्तों में रुकावटों ने अस्थिरता की कीमत हिंद-प्रशांत क्षेत्र के घरों और कारोबारों तक पहुंचा दी है. भारत के लिए सस्ती ऊर्जा और सुरक्षित समुद्री रास्ते तुरंत जरूरी हैं. इसलिए अमेरिका के साथ सहयोग में आर्थिक कमजोरियां भी एक अहम मुद्दा हैं. असली परीक्षा यह है कि क्या दोनों देशों के रणनीतिक हितों में समानता सैन्य क्षमता बढ़ाती है और भारत की खुद फैसले लेने की क्षमता मजबूत करती है. हाल की बैठकों को इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए.
ताकत और साझेदारी की कीमत
क्वाड के विदेश मंत्रियों की बैठकें इस एजेंडे के बढ़ते दायरे को दिखाती हैं. जनवरी 2025 में वॉशिंगटन में चारों देशों ने दबाव की नीति का विरोध दोहराया और समुद्री, आर्थिक और तकनीकी सुरक्षा को साझा प्राथमिकता बताया. जुलाई की बैठक में सहयोग को चार मुख्य हिस्सों के तहत रखा गया: समुद्री और सीमा पार सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि और सुरक्षा, महत्वपूर्ण तकनीकें और आपात स्थिति में प्रतिक्रिया. इन बैठकों ने क्वाड के सहयोग कार्यक्रम को ज्यादा ठोस बनाया और इसका उद्देश्य सिर्फ चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के नजरिए से आगे बढ़ाया.
26 मई को नई दिल्ली में हुई बैठक में क्वाड ने महत्वपूर्ण खनिजों के लिए एक ढांचे को आगे बढ़ाया और हिंद-प्रशांत की ऊर्जा सुरक्षा पर अलग बयान जारी किया. इसमें तेल, गैस, पेट्रोकेमिकल और उर्वरक की सप्लाई में आने वाली रुकावटों पर बात की गई. साथ ही सुरक्षित समुद्री आवाजाही पर जोर दिया गया, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य भी शामिल है. ये चिंताएं क्षेत्रीय सुरक्षा को सीधे उद्योगों की क्षमता और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जोड़ती हैं. सप्लाई और बुनियादी ढांचे पर सहयोग से क्वाड को समुद्री व्यापार को जारी रखने में व्यावहारिक भूमिका मिलती है और उसका उद्देश्य सिर्फ कूटनीतिक संकेत देने तक सीमित नहीं रहता.
22 जुलाई को मनीला में फिर हुई बैठक में मंत्रियों ने आसियान की एकता और केंद्रीय भूमिका के लिए समर्थन दोहराया. साथ ही हिंद-प्रशांत को लेकर आसियान के नजरिए के साथ सहयोग की बात कही. उनके बयान में समुद्री सुरक्षा को तकनीक, आर्थिक सहयोग और आपात स्थिति में प्रतिक्रिया से जोड़ा गया. सेबू में हुई बैठक के लिए यह क्षेत्रीय संदर्भ महत्वपूर्ण है. भारत और अमेरिका को ऐसे क्षेत्र में सहयोग आगे बढ़ाना होगा, जहां देश अपनी क्षमताओं को मजबूत करना चाहते हैं, लेकिन साथ ही अलग-अलग शक्तियों के साथ संबंध रखने की आजादी भी बनाए रखना चाहते हैं.
हेगसेथ का दक्षिण-पूर्व एशिया दौरा क्षेत्रीय साझेदारों को भरोसा दिलाने की वॉशिंगटन की लगातार कोशिश का हिस्सा है. लेकिन अब इस भरोसे के साथ साझेदार देशों से ज्यादा जिम्मेदारी लेने की उम्मीद भी जुड़ रही है. 2026 की अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में देश की सुरक्षा और चीन को रोकने को प्राथमिकता दी गई है. इसमें सहयोगी देशों से ज्यादा योगदान और अमेरिकी रक्षा उद्योग को फिर से मजबूत करने की बात भी कही गई है. इस रणनीति में सैन्य तैयारी के साथ रणनीतिक संवाद पर भी जोर है, ताकि तनाव को बढ़ने से रोका जा सके. यह चीन के साथ प्रतिस्पर्धा जारी रखते हुए भी उसे संघर्ष में बदलने से रोकने की अमेरिकी कोशिश को दिखाता है.
अमेरिकी प्रतिबद्धताओं की यह स्पष्ट प्राथमिकता भारत के लिए अवसर और अनिश्चितता दोनों पैदा करती है. वॉशिंगटन को मजबूत क्षेत्रीय साझेदारों की जरूरत है, इसलिए उसकी दिलचस्पी भारत की क्षमताएं बढ़ाने में भी है. लेकिन ‘अमेरिका फर्स्ट’ की लेन-देन वाली सोच व्यापार और हिंद-प्रशांत के साझेदार देशों के साथ संबंधों को लेकर सहयोग में तनाव पैदा कर सकती है. इसलिए रणनीतिक समानता को भरोसेमंद व्यवस्था में बदलना जरूरी है. महंगे रक्षा सौदों और लंबे समय की औद्योगिक साझेदारी के लिए तकनीक तक पहुंच, समय पर डिलीवरी और लगातार समर्थन को लेकर भरोसा जरूरी है.
भारत को सहयोग जारी रखते हुए किसी भी रुकावट के लिए तैयार रहना होगा. भारत का बाजार, उसकी भौगोलिक स्थिति और हिंद महासागर में उसकी मौजूदगी उसे रणनीतिक महत्व देती है. लेकिन ये चीजें मजबूत विनिर्माण, बेहतर बुनियादी ढांचे और तकनीकी क्षमता की जगह नहीं ले सकतीं. अलग-अलग देशों के साथ साझेदारी से तभी लंबे समय का फायदा होगा, जब भारत तकनीक को अपना सके, खरीदी गई सैन्य क्षमताओं को लंबे समय तक चला सके और देश में ही उन पर आगे काम कर सके. अमेरिका की भरोसेमंदता पर चल रही बहस से भारत को अपनी आत्मनिर्भरता की ठोस बुनियाद पर और ज्यादा ध्यान देना चाहिए.
रणनीतिक इरादे से सैन्य क्षमता तक
10 साल का रक्षा ढांचा सैन्य आदान-प्रदान, समुद्री सहयोग, लॉजिस्टिक्स और रक्षा उद्योग में सहयोग की बुनियाद देता है. सेबू में हुई बातचीत में भी इन प्राथमिकताओं पर चर्चा हुई, जिसमें सूचना साझा करना और मिलकर रक्षा सामान बनाना शामिल था. अब असली परीक्षा इसे लागू करने की है: मंजूरियां लेना, व्यावसायिक समझौते पूरे करना और सेनाओं के स्तर पर जरूरी व्यवस्थाएं तैयार करना, ताकि इस ढांचे में किए गए वादे ऐसी क्षमताओं में बदलें, जिनका इस्तेमाल सशस्त्र बल कर सकें.
समुद्री सहयोग इसकी स्वाभाविक शुरुआत हो सकता है. भारत और अमेरिका दोनों के हित में है कि हिंद महासागर में खतरों पर नजर रखी जाए और समुद्री रास्तों को सुरक्षित रखा जाए. बेहतर निगरानी, पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता, सुरक्षित संचार और लॉजिस्टिक मदद भारत की समुद्री मौजूदगी को मजबूत कर सकती है. संयुक्त सैन्य अभ्यासों को इन क्षमताओं को वास्तविक सैन्य तैयारी में बदलना होगा. इससे किसी संकट के आने से पहले कमियों का पता चलेगा और दोनों देशों के बीच तालमेल बेहतर होगा.
इस तरह का सहयोग बिना दोनों देशों की प्रतिबद्धताओं को एक जैसा किए भी सुरक्षा और रोकथाम की क्षमता मजबूत कर सकता है. भारत की सुरक्षा चिंताओं में उसकी महाद्वीपीय सीमाएं और सीमा पार आतंकवाद शामिल हैं. इसके साथ समुद्र में प्रतिस्पर्धा भी है. वहीं, हिंद-प्रशांत को लेकर अमेरिका की रणनीति का भौगोलिक जोर अलग है. एक मजबूत भारत क्षेत्र में शक्ति का अनुकूल संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है और साथ ही अपने सुरक्षा हितों की रक्षा कर सकता है. चुनौती यह है कि दोनों देशों के साझा रणनीतिक हितों को ठोस सहयोग में बदला जाए, लेकिन यह मानकर नहीं चला जाए कि दोनों की प्राथमिकताएं या प्रतिबद्धताएं एक जैसी हैं.
रक्षा उद्योग में सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है. फरवरी 2025 के भारत-अमेरिका नेताओं के बयान में हथियारों के हस्तांतरण से जुड़े नियमों की समीक्षा, रखरखाव और मरम्मत की व्यवस्थाओं को मजबूत करने और दोनों देशों के बीच रक्षा खरीद पर बातचीत आगे बढ़ाने की बात कही गई थी. आगे बढ़ने के लिए पुराने अड़चनों को दूर करना जरूरी है: लाइसेंस मिलने में देरी, अनुबंधों को लेकर अनिश्चितता, स्पेयर पार्ट्स तक पहुंच और तकनीक साझा करने की शर्तें. इन मुद्दों पर शिखर बैठकों के बीच लगातार काम करना होगा. तभी रणनीतिक इरादे को औद्योगिक क्षमता में बदला जा सकेगा. निजी कंपनियां सहयोग को बढ़ाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन इसका दायरा इस बात पर निर्भर करेगा कि कारोबार के लिए यह कितना व्यावहारिक है और रक्षा खरीद कितनी तय और भरोसेमंद है. भारत-अमेरिका की मौजूदा साझेदारियां समुद्री प्रणालियों, विमानों की सहायता और नई तकनीकों में अवसर दिखाती हैं. भारत के लिए औद्योगिक सहयोग का फायदा घरेलू सप्लायरों को मजबूत करने, इंजीनियरिंग कौशल बढ़ाने और देश में ही उपकरणों के रखरखाव और उनमें सुधार करने की क्षमता तक पहुंचना चाहिए.
राजनीतिक संबंध यह तय करेंगे कि यह एजेंडा कितना आगे बढ़ता है. रुबियो की मुंबई में हुई बातचीत में व्यापार, ऊर्जा और रक्षा को एक साथ रखा गया, क्योंकि इन सभी क्षेत्रों में प्रगति व्यापक भरोसे की बुनियाद पर निर्भर करती है. व्यापार में बड़ी प्रगति इस बुनियाद को मजबूत कर सकती है, जबकि अनसुलझे विवाद सामान्य सैन्य या औद्योगिक देरी को भी राजनीतिक परेशानी में बदल सकते हैं.
नियमित संस्थागत बातचीत के जरिए राजनीतिक मतभेदों के बावजूद व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाते रहना होगा. सेबू में सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी समर्थन भी महत्वपूर्ण है. यह भारत की सुरक्षा से जुड़ी एक अहम चिंता को स्वीकार करता है और यह भी दिखाता है कि भारत अपने साझेदारों को किस नजर से देखता है. टिकाऊ साझेदारी के लिए दोनों देशों को एक-दूसरे की प्राथमिकताओं को गंभीरता से लेना होगा और इस बारे में साफ-साफ बात करनी होगी कि वे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं.
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को भरोसेमंद सप्लाई, मजबूत घरेलू रक्षा उद्योग और कार्रवाई के लिए तैयार सेनाओं से ताकत मिलेगी. क्वाड की बैठकें, रुबियो की यात्रा और सेबू में हुई समीक्षा लगातार राजनीतिक निवेश का संकेत देती हैं. अब इस निवेश को समय पर लिए गए फैसलों और लगातार काम के जरिए नतीजों में बदलना होगा. 10 साल के भारत-अमेरिका रक्षा ढांचे की असली परीक्षा साफ है: क्या भारत अपनी जरूरत की सैन्य क्षमताएं तैयार कर सकता है, दबाव के समय उन्हें बनाए रख सकता है और फैसले लेने की ज्यादा आजादी हासिल कर सकता है? रणनीतिक स्वायत्तता तब ज्यादा मजबूत होती है, जब भारत के पास खुद कार्रवाई करने के साधन हों.
मोनीष तौरंगबाम नई दिल्ली स्थित चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) में फेलो हैं. विचार निजी हैं.
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