नई दिल्ली: दिल्ली के पुरातत्व विभाग के एक वरिष्ठ कर्मचारी ने अक्टूबर 2025 में अपनी शिकायतों को लिखित रूप में दर्ज करने का फैसला किया. विभाग के सचिव को दी गई अपनी दो पन्नों की शिकायत में उन्होंने सर्वेयर जसपाल सिंह के पुरातत्व इंजीनियर के पद पर प्रमोशन पर सवाल उठाए. उनका तर्क था कि ये दोनों पद विभाग के बिल्कुल अलग-अलग विंग से जुड़े हैं. वे चाहते थे कि इस प्रमोशन की जांच हो, लेकिन इसके बजाय उन्हें चेतावनी मिल गई.
कर्मचारी ने आरोप लगाया कि भर्ती नियमों में किए गए बदलावों की वजह से ही जसपाल सिंह का प्रमोशन संभव हो पाया. उन्होंने मांग की कि इस मामले की जांच या तो संघ लोक सेवा आयोग करे या फिर प्रशासनिक सुधार विभाग.
लेकिन विभाग ने उन्हें चेतावनी दी कि बिना किसी ठोस तथ्य या दस्तावेजी सबूत के वरिष्ठ अधिकारियों पर आरोप न लगाएं.
कला, संस्कृति और भाषा (एसीएल) विभाग की ओर से दिए गए जवाब में कहा गया, “आपको सलाह दी जाती है कि बिना किसी ठोस तथ्य या दस्तावेजी सबूत के वरिष्ठ अधिकारियों पर गंभीर आरोप न लगाएं. अगर ऐसा दोबारा होता है—यानी बेबुनियाद शिकायतों की जांच में सरकारी तंत्र का समय बर्बाद किया जाता है—तो इसे कदाचार माना जाएगा.” दिप्रिंट के पास इस जवाब की एक प्रति मौजूद है.
दिल्ली का पुरातत्व विभाग, ACL विभाग के अंतर्गत आता है और इसके अधिकार क्षेत्र में 75 स्मारक आते हैं.
यह घटना विभाग में भर्ती और प्रमोशन को लेकर चल रहे बड़े विवाद का एक अहम हिस्सा बन गई है. कर्मचारियों का आरोप है कि 2021 से 2023 के बीच कई तकनीकी पदों के लिए भर्ती नियमों में जो बदलाव किए गए, वे कुछ खास लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए थे. इससे उन तरीकों पर सवाल उठते हैं, जिनसे दिल्ली की पुरातात्विक विरासत को सहेजने के लिए जिम्मेदार इस विभाग में नियुक्तियां और प्रमोशन किए जाते हैं.
आंकड़े बताते हैं कि विभाग में कर्मचारियों की संख्या लगातार कम हो रही है, जिससे पुरातत्व से जुड़े काम करने की इसकी क्षमता भी घटती जा रही है. दिल्ली के पुरातत्व विभाग में कुल 18 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 13 खाली पड़े हैं. इनमें डिप्टी डायरेक्टर, पुरातत्व इंजीनियर (एई) और कंजर्वेशन असिस्टेंट जैसे महत्वपूर्ण पद भी शामिल हैं.
विभाग के सबसे ऊंचे पद पर पिछले लगभग दो दशकों से कोई नियुक्ति नहीं हुई है. इस पद पर आखिरी बार किशन लाल थे, जिन्हें 2008 में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर प्रमोट किया गया था. उनसे पहले पुरातत्वविद् बीएसआर बाबू इस पद पर थे. तब से यह पद खाली पड़ा है. कमी इतनी गंभीर है कि विभाग में केवल एक असिस्टेंट आर्कियोलॉजिस्ट है, जिसे 2023 में कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) पर रखा गया था.
भारतीय पुरातत्व विभाग प्राचीन इतिहास को फिर से दिलचस्प बनाने के नए तरीके अपना रहा है—जैसे खुदाई वाली जगहों को उत्सुक लोगों के लिए खोलना, इतिहास को संग्रहालय की दीवारों से बाहर लाना, और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके लंबे समय से भुला दी गई सभ्यताओं को आम जनता के करीब लाना. हालांकि, दिल्ली में स्थिति कुछ अलग है. राजधानी के इतिहास को सहेजने की जिम्मेदारी संभालने वाला राज्य पुरातत्व विभाग खुद ही संघर्ष करता नजर आ रहा है.
दिल्ली के इतिहास को सामने लाने की जिम्मेदारी वाले इस राज्य पुरातत्व विभाग के पास दिखाने के लिए कुछ खास नहीं है: पिछले लगभग तीन दशकों में कोई खुदाई नहीं हुई है और डिप्टी डायरेक्टर का अहम पद करीब 20 सालों से खाली पड़ा है. इस ठहराव की वजह से कर्मचारी निराश हैं. वे न केवल कर्मचारियों की कमी और नेतृत्व के अभाव से परेशान हैं, बल्कि उनका यह भी आरोप है कि विभाग की व्यवस्था अब कुछ चुनिंदा लोगों के फायदे के लिए काम करने लगी है.
विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि कई पदों के सालों से खाली रहने के बावजूद उनके काम में कोई रुकावट नहीं आ रही है.
ACL विभाग के सचिव के. महेश ने दिप्रिंट को बताया, “लोग राज्य पुरातत्व विभाग में शामिल होने में दिलचस्पी नहीं रखते. इसके बजाय, वे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि वहां कई तरह की सुविधाएं और लाभ मिलते हैं. हमने खाली पदों को भरने के लिए कई बार विज्ञापन निकाले हैं, लेकिन हम उन्हें भरने में सफल नहीं रहे हैं. फिर भी, हमारे पास जो स्टाफ है, हम उसी के साथ काम चला रहे हैं और हमारे किसी भी काम में कोई रुकावट नहीं आ रही है.”
जब 1990 के दशक में मोहम्मद नबी खान दिल्ली राज्य पुरातत्व विभाग से जुड़े, तो उन्हें लगा कि वे एक ऐसे विभाग का हिस्सा बन रहे हैं जहां आगे बढ़ने के काफी मौके हैं, लेकिन, समय के साथ उन्होंने देखा कि विभाग की कार्य-संस्कृति लगातार गिरती गई, जिसमें कर्मचारियों की भारी कमी भी शामिल थी.
2021 में जब खान ने कंजर्वेशन असिस्टेंट (CA) के पद से रिटायरमेंट लिया, तब तक उनकी निराशा और गहरी हो चुकी थी. उनके लिए, समस्या अब केवल स्मारकों को सहेजने तक सीमित नहीं थी; बल्कि यह एक ऐसे विभाग को फिर से जीवित करने की चुनौती थी, जो मानो अपना मकसद ही खो चुका था. खान ने कहा, “दिल्ली राज्य पुरातत्व विभाग को एक नई शुरुआत की ज़रूरत है; वरना, इतिहास को सहेजने की ज़िम्मेदारी वाला यह विभाग खुद ही इतिहास का एक हिस्सा बन जाएगा.”
भर्ती नियमों को लेकर विवाद
दिल्ली राज्य पुरातत्व विभाग के पुनर्गठन और खाली पदों को भरने के प्रस्ताव के तहत भर्ती नियमों में संशोधन किया गया था. हालांकि, नए नियम बनने के बावजूद, विभाग में कई महत्वपूर्ण पद अभी भी खाली हैं.
इस विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि पुरातत्व और संरक्षण (कंजर्वेशन) से जुड़े विशेष पदों पर किसे नियुक्त किया जाए और क्या इन नियुक्तियों से जुड़े नियमों में बदलाव करते समय तकनीकी विशेषज्ञता को नजरअंदाज किया गया है?
कर्मचारियों के अनुसार, सबसे विवादित मामला सर्वेयर से आर्कियोलॉजिकल इंजीनियर (AE) के पद पर सिंह का प्रमोशन है. पहला पद विभाग की ‘स्मारक इकाई’ (मोन्यूमेंट यूनिट) के अंतर्गत आता है, जबकि दूसरा पद ‘संरक्षण इकाई’ (कंजर्वेशन यूनिट) का हिस्सा है.
विभाग के एक सूत्र ने बताया कि एक सर्वेयर का काम मुख्य रूप से स्थलों का सर्वेक्षण करना और रिपोर्ट तैयार करना होता है, जबकि आर्कियोलॉजिकल इंजीनियर की भूमिका के लिए अलग तरह की तकनीकी दक्षता की आवश्यकता होती है.
हालांकि, आर्कियोलॉजिकल इंजीनियर के लिए संशोधित भर्ती नियमों ने विभागीय उम्मीदवारों के लिए भी रास्ते खोल दिए. इन नियमों में यह प्रावधान किया गया कि पे-मैट्रिक्स के लेवल 6 में कार्यरत और इस ग्रेड में पांच साल की नियमित सेवा पूरी कर चुके सर्वेयर को भी बाहरी उम्मीदवारों के साथ इस पद के लिए विचार किया जा सकता है.
विभाग के एक सूत्र ने आरोप लगाया, “भर्ती नियमों में जानबूझकर बदलाव करके विभाग के प्रशासनिक और तकनीकी ढांचे को एक तरह से ‘हाईजैक’ कर लिया गया है, जिसका मकसद सत्ता पर अपना एकाधिकार जमाना है.”
उन्होंने सिंह के प्रमोशन को इस बात का सबसे स्पष्ट उदाहरण बताया कि कैसे, कर्मचारियों के अनुसार, संरक्षण कैडर (कंजर्वेशन कैडर) के मानकों को कमजोर किया जा रहा है.

दिप्रिंट को मिले एक दस्तावेज़ से पता चलता है कि योग्य उम्मीदवार के सर्विस रिकॉर्ड और शैक्षणिक योग्यताओं की, तय भर्ती नियमों के आधार पर जांच करने के बाद, विभागीय चयन बोर्ड ने प्रमोशन के ज़रिए सिंह को ‘आर्कियोलॉजिकल इंजीनियर’ (पुरातत्व इंजीनियर) के पद पर नियुक्त करने की सिफारिश की.
एक सूत्र ने बताया कि पहले यह पद UPSC के ज़रिए भरा जाता था, जिससे यह सुनिश्चित होता था कि ज़रूरी तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाले उम्मीदवार ही इस पद पर आएं.
कर्मचारियों का आरोप है कि संशोधित नियमों के तहत आंतरिक प्रमोशन की अनुमति देने से यह सुरक्षा व्यवस्था कमज़ोर हो गई है.
एक अधिकारी ने कहा, “ग्रुप-बी गजेटेड ‘आर्कियोलॉजिकल इंजीनियर’ पद के लिए भर्ती नियमों में जानबूझकर फेरबदल किया गया. इसे उच्च योग्यता वाले बी.टेक प्रोफेशनल्स के लिए खुला रखने के बजाय, नियमों को इस तरह से बदला गया कि यह पद केवल एक सामान्य सर्वेयर के प्रमोशन के लिए ही रह जाए. इस क्षेत्र के असली विशेषज्ञों को बाहर रखा जा रहा है और दिल्ली के स्मारकों के स्ट्रक्चरल संरक्षण (संरचनात्मक संरक्षण) का काम पूरी तरह से ठप हो गया है.”
सर्वेयर से ‘आर्कियोलॉजिकल इंजीनियर’ के पद पर सिंह की पदोन्नति उनके रिटायरमेंट से ठीक एक साल पहले हुई थी. लेकिन रिटायरमेंट के बाद भी वे विभाग से बाहर नहीं गए. संरक्षण के काम से कोई लेना-देना न रखने वाले एक अधीनस्थ कर्मचारी ने अचानक एक फाइल आगे बढ़ाई, ताकि सिंह को उनके रिटायरमेंट से खाली हुए पद पर ‘प्रोफेशनल कंसल्टेंट (संरक्षण)’ के तौर पर नियुक्त किया जा सके.
प्रमोशन के बाद कंसल्टेंसी
दिप्रिंट ने सिविल लाइंस स्थित उनके कार्यालय में सिंह से मुलाकात की, लेकिन उन्होंने अपने प्रमोशन पर कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.
इस बीच, महेश ने हेरफेर (मैनिपुलेशन) के आरोपों को खारिज कर दिया.
उन्होंने कहा, “भर्ती नियम पारदर्शी तरीके से बनाए गए थे और उससे पहले कई तरह की मंजूरियां ली गई थीं. भर्ती नियमों में कोई हेरफेर नहीं करता है.”
सिंह के खिलाफ शिकायत उनके जनवरी 2026 में रिटायर होने के महीनों बाद सामने आई. लेकिन सेवा से रिटायर होने का मतलब यह नहीं था कि विभाग के साथ उनका नाता खत्म हो गया. अगस्त में, वह एक साल के कॉन्ट्रैक्ट पर ‘प्रोफेशनल कंसल्टेंट (संरक्षण)’ के रूप में वापस आ गए.
यह विवाद केवल ‘आर्कियोलॉजिकल इंजीनियर’ (पुरातत्व इंजीनियर) के पद तक ही सीमित नहीं है.
2022 में, विभाग ने ‘कंजर्वेशन असिस्टेंट’ (CA) के लिए भर्ती नियमों में बदलाव किया. इसमें योग्यता के तौर पर ‘कंजर्वेशन, प्रिजर्वेशन एंड हेरिटेज मैनेजमेंट’ या ‘आर्किटेक्चरल कंजर्वेशन’ में मास्टर डिग्री होना अनिवार्य कर दिया गया.
एक सूत्र के अनुसार, इस पात्रता मानदंड को लेकर चिंताएं जताई गईं, क्योंकि भारत में केवल ‘स्कूल ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट’ (SHRM) ही ऐसा संस्थान था जो यह विशेष कोर्स कराता था. कर्मचारियों का आरोप है कि जिस तरह से ये नियम बनाए गए, उससे योग्य आवेदकों का दायरा बहुत सीमित हो गया और केवल एक ही संस्थान के स्नातकों को इसका खास फायदा मिलने लगा.
सूत्र ने सवाल उठाया कि विभाग ने इतनी सीमित योग्यताएं क्यों तय कीं? उन्होंने कहा, “इसका मतलब यह है कि भर्ती नियमों को इस तरह बदला गया कि केवल एक ही संस्थान के छात्र इस पद के लिए आवेदन कर सकें.”

दिप्रिंट को SHRM से जुड़ी एक ऑडिट रिपोर्ट भी मिली है, जिसमें प्रशासनिक अनियमितताओं की ओर इशारा किया गया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि संस्थान ने वित्त बोर्ड की मंजूरी के बिना, स्वीकृत संख्या से अधिक कर्मचारियों की नियुक्ति कर ली थी. इसमें यह भी उल्लेख है कि एक रिसर्च असिस्टेंट को ‘ऑफिस सुपरिंटेंडेंट’ के पद पर प्रमोट किया गया, जो नियमों के अनुसार नहीं था.
दिल्ली की पुरातात्विक विरासत को खोजने और उसकी रक्षा करने की जिम्मेदारी होने के बावजूद, यह विभाग वर्षों से अपना मुख्य काम—यानी पुरातात्विक खुदाई—भी नहीं कर पाया है. कर्मचारियों की कमी ने विभाग की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं. विभाग द्वारा की गई पिछली बड़ी खुदाई 1980 और 1990 के दशक की है, जब बाबू ने तीन ऐतिहासिक स्थलों — पूर्वी दिल्ली में मंडोली, उत्तरी दिल्ली में भोरगढ़ और पश्चिमी दिल्ली में झटिकारा — पर खुदाई के काम का नेतृत्व किया था.
मंडोली में हुई खोजें विशेष रूप से महत्वपूर्ण थीं. 1987-88 और 1988-89 के दौरान की गई खुदाई में, दिल्ली में पहली बार ऐसी परतें मिलीं जिनमें ‘उत्तर हड़प्पा’ (Late Harappan) और ‘पेंटेड ग्रे वेयर’ (Painted Grey Ware) संस्कृतियों के प्रमाण थे. इससे दिल्ली का ज्ञात इतिहास लगभग 1500 ईसा पूर्व (protohistoric times) तक पीछे चला गया.
मंडोली खुदाई रिपोर्ट की प्रस्तावना में बाबू ने इन खोजों के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा, “इसने दिल्ली के इतिहास को लगभग 1500 ईसा पूर्व (आद्य-ऐतिहासिक काल) तक पीछे धकेल दिया.” फिर भी, इस काम को सार्वजनिक रिकॉर्ड तक पहुंचने में दशकों लग गए. खुदाई का विवरण देने वाली रिपोर्ट पिछले साल प्रकाशित हुई, जो फील्डवर्क पूरा होने के लगभग तीन दशक बाद की बात है.
जसपाल सिंह ने कहा, “दिल्ली में पुरातात्विक स्थल बहुत कम हैं और अतिक्रमण के कारण वे सभी समतल हो चुके हैं, इसलिए अब यहां खुदाई की कोई गुंजाइश नहीं बची है.”
‘संस्थागत इच्छाशक्ति की गहरी विफलता’
दिल्ली पुरातत्व विभाग के कामकाज पर सवाल सिर्फ कर्मचारियों की नियुक्ति तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि शहर की विरासत के संरक्षण के लिए ठेके (कॉन्ट्रैक्ट) देने के तरीके पर भी उठ रहे हैं.
जुलाई 2025 में, विभाग ने बदरपुर में ‘नॉर्दर्न गेटवे’ के पास स्थित ‘कोस मीनार’ के छोटे-मोटे संरक्षण और विकास कार्यों के लिए 4.59 लाख रुपये का टेंडर निकाला. पहला टेंडर वापस ले लिया गया और 25 जुलाई को एक नया टेंडर जारी किया गया.
आखिरकार, यह ठेका दिल्ली की एक फर्म ‘भवानी एंटरप्राइजेज’ को मिल गया. इसे राहुल चलाते हैं, जिनके पास बीए (BA) की डिग्री है. उपलब्ध जानकारी और रिकॉर्ड के अनुसार, इस फर्म की योग्यता पर सवाल उठते हैं: टेंडर जारी होने से महज दो हफ्ते पहले ही यह फर्म बनी थी, जबकि इसका आधार ऑथेंटिकेशन ठेका मिलने के कई महीनों बाद पूरा हुआ.
विभाग ने खुद एक और शर्त भी रखी थी. टेंडर नोटिस में साफ कहा गया था कि बोली लगाने वालों को पिछले तीन सालों में पुरातत्व या विरासत संरक्षण के काम का अनुभव दिखाना होगा—चाहे उन्होंने यह काम अकेले किया हो या किसी समूह (कंसोर्टियम) के हिस्से के रूप में और इसके लिए ज़रूरी दस्तावेज़ भी देने होंगे. इस नोटिस पर जसपाल सिंह के हस्ताक्षर थे, जो उस समय विभाग के ‘हेड ऑफ ऑफिस’ थे.
विभाग के सूत्रों का आरोप है कि ‘भवानी एंटरप्राइजेज’ को फायदा पहुंचाने के लिए यह टेंडर दिया गया, जबकि स्मारकों के संरक्षण में इस फर्म का कोई पुराना ट्रैक रिकॉर्ड नहीं था.
एक सूत्र ने बताया, “यह टेंडर एक ऐसी एजेंसी को दिया गया, जिसे स्मारकों के संरक्षण का कोई पूर्व अनुभव नहीं था और जो टेंडर निकलने से कुछ हफ्ते पहले ही रजिस्टर हुई थी.”
इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि एक नई बनी फर्म उस ठेके के लिए कैसे योग्य हो गई, जिसके लिए पुरातत्व और विरासत स्थलों के संरक्षण का पूर्व अनुभव होना अनिवार्य था.
राहुल ने दिप्रिंट से कहा, “हमें राज्य पुरातत्व विभाग से काम मिला था, और हमने वह काम किया. मैं टेंडर प्रक्रिया के बारे में कुछ नहीं कह सकता.”

दिल्ली के सिविल लाइंस स्थित विकास भवन की दूसरी मंजिल पर पुरातत्व विभाग का दफ्तर है, जिस पर आसानी से किसी का ध्यान नहीं जाता. यहां इसके होने की जानकारी देने वाला कोई साइनबोर्ड या पट्टिका नहीं है.
गेट पर चिपका एक छोटा सफेद कागज़, जिस पर ‘पुरातत्व विभाग, दिल्ली’ लिखा है, बस यही इस दफ्तर की पहचान बताता है. इसके ठीक नीचे जनवरी 2024 में अयोध्या के राम मंदिर में हुए ‘प्राण प्रतिष्ठा’ समारोह का एक पोस्टर टंगा है.
यह विभाग ‘शाहजहानाबाद पुनर्विकास निगम’ (शाहजहानाबाद रीडेवलपमेंट कॉरपोरेशन) के साथ एक ही मंजिल पर स्थित है. यह भी एक सरकारी संस्था है, जो अपने तय लक्ष्यों को पूरा करने में संघर्ष करती रही है.
इस विभाग की शुरुआत 1978 में हुई थी. पिछले चार दशकों में यह कई जगहों से काम कर चुका है, जिनमें कश्मीरी गेट बस स्टैंड, दारा शिकोह लाइब्रेरी और अब सिविल लाइंस स्थित विकास भवन शामिल हैं.
दफ़्तर के अंदर पुरानी फाइलों से भरी बड़ी-बड़ी अलमारियों की कतारें हैं, जबकि कई कुर्सियां खाली पड़ी हैं. यहां कुछ अधिकारी अपना काम कर रहे हैं, जबकि बैकग्राउंड में धीमी आवाज़ में धार्मिक मंत्र या भजन बज रहे हैं.
विभाग के एक अधिकारी ने बताया, “जहां दूसरी जगहों पर पुरातत्व विभाग अतीत को लोगों के सामने जीवंत करने के नए तरीके खोज रहा है, वहीं दिल्ली के दबे हुए इतिहास की ज़िम्मेदारी संभालने वाला यह विभाग खुद एक संकट से जूझ रहा है. कर्मचारियों का कहना है कि यह सिर्फ संसाधनों की कमी का मामला नहीं है, बल्कि यह संस्थागत इच्छाशक्ति की गहरी विफलता है.”
‘दिल्ली की विरासत को और संवारने का समय आ गया है’
दिल्ली के पुरातत्व विभाग का कायाकल्प अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली (AAP) सरकार के समय शुरू हुआ. इस सरकार ने राजधानी के ऐतिहासिक स्थलों और विरासत से जुड़ी संरचनाओं पर विशेष ध्यान देने का प्रयास किया.
इसका मकसद विभाग की पारंपरिक भूमिका यानी केवल स्मारकों की सुरक्षा करना से आगे बढ़कर, संरक्षण, जीर्णोद्धार और विरासत स्थलों के विकास के जरिए दिल्ली की पुरातात्विक धरोहर को आम जनता तक पहुंचाना था.
यह सुधार प्रक्रिया 2019 में और स्पष्ट रूप से सामने आई, जब विभाग के पुनर्गठन और कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया. अगस्त 2021 तक, सरकार भर्ती नियमों में बदलाव पर काम कर रही थी, जिसके तहत विभाग में कर्मचारियों की संख्या को चरणों में बढ़ाकर 60 करने की योजना थी.
पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली के पुरातत्व विभाग पर कई बार विशेष ध्यान दिया गया है. सरकारों ने स्मारकों के जीर्णोद्धार और राजधानी की भुला दी गई विरासत को फिर से लोगों के सामने लाने के लिए कई बड़ी योजनाएं घोषित कीं.
साल 2022 में, तत्कालीन उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने अजीमगंज सराय में चल रहे संरक्षण कार्यों का निरीक्षण किया और वादा किया कि इस स्मारक को उसकी मूल स्थिति में वापस लाया जाएगा.
सिसोदिया ने कहा था, “अजीमगंज सराय जैसी ऐतिहासिक महत्व की इमारतें लंबे समय से उपेक्षित रही हैं, जिसके कारण उन्हें काफी नुकसान पहुंचा है, लेकिन केजरीवाल सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि विशेषज्ञों और बेहतरीन कारीगरों की मदद से इन सभी इमारतों को उनके मूल स्वरूप में संरक्षित किया जाए.”
विभाग उस समय चर्चा में भी आया, जब एक अखबार ने खबर छापी: ‘70 करोड़ रुपये से होगा 72 स्मारकों का कायाकल्प.’
लेकिन खान जैसे व्यक्ति के लिए, जिन्होंने इस विभाग में दशकों बिताए हैं, ऐसी घोषणाओं से संस्थान के भीतर शायद ही कभी कोई बुनियादी बदलाव देखने को मिला हो.
खान कहते हैं, “कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो हर सरकार के कार्यकाल में यह विभाग बस एक ढर्रे पर चलता रहा है. इसे पर्याप्त फंड तो मिला, लेकिन विभाग के भीतर कुछ भी नहीं बदला.”
हाल ही में, रेखा गुप्ता सरकार की ओर से एक नई पहल की गई है. उन्होंने विरासत संरक्षण के लिए एक अभियान शुरू किया है, जो मुख्य रूप से ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) और रिसर्च फेलोशिप पर केंद्रित है. सरकार ने अपनी ‘हमारे स्मारक, हमारा गौरव’ (Our Monuments, Our Pride) पहल के तहत दो योजनाओं को मंजूरी दी है. इसके जरिए निजी संस्थाएं स्मारकों को गोद ले सकती हैं और उनके जीर्णोद्धार (restoration) के लिए 2 करोड़ रुपये तक की आर्थिक सहायता दे सकती हैं.
गुप्ता ने एक्स पर लिखा, “दिल्ली की हर पीढ़ी ने इस शहर को अपने-अपने तरीके से जिया है. कुछ लोगों ने इन स्मारकों के बारे में किताबों में पढ़ा है, तो कुछ ने इन्हें करीब से देखा है. अब समय आ गया है कि हम इस विरासत को और संवारें और इसे अगली पीढ़ी को सौंपें.”
सरकार का कहना है कि निजी कंपनियां, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSUs), ट्रस्ट और गैर-सरकारी संगठन (NGOs) दिल्ली के 75 ऐतिहासिक स्मारकों को पांच साल के लिए गोद ले सकेंगे. हालांकि, भले ही यह योजना राजधानी की विरासत के लिए नए संसाधन और ध्यान आकर्षित करने का वादा करती है, लेकिन इसके क्रियान्वयन (implementation) को लेकर अभी भी सवाल बने हुए हैं. विभाग के एक अधिकारी जसपाल सिंह ने यह नहीं बताया कि स्मारकों को गोद लेने के लिए अब तक कितने आवेदन मिले हैं.
लेकिन ज़मीनी स्तर पर देखा जाए तो, लोगों का उत्साह उतना नहीं दिखा, जितना जसपाल सिंह ने दावा किया था.
विभाग के सूत्रों के अनुसार, शुरुआती विज्ञापन के बाद बहुत कम लोगों ने स्मारकों को गोद लेने में दिलचस्पी दिखाई. कम प्रतिक्रिया मिलने के कारण, विभाग ने एक हफ्ते पहले एक और नोटिस जारी करके आवेदन की समय-सीमा बढ़ा दी है. इससे पता चलता है कि यह योजना अभी तक लोगों का उतना ध्यान नहीं खींच पाई है, जितनी उम्मीद की जा रही थी.
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