दृष्टि रखने वाला कोई भी व्यक्ति 1 नवंबर को रामलीला मैदान में हुई INDIA गठबंधन की रैली को एक शानदार नजारा मानता. ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुई इस रैली में राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर मार्च करते हुए दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान पहुंचे. ऐसे में यह हैरान करने वाली बात है कि उस दिन BJP ने रैली पर हमला बोलते हुए कहा कि यह नाकाम रही और इसमें कांग्रेस के दावे से कहीं कम लोग शामिल हुए. BJP ने न तो रैली में उठाए गए मुद्दों पर बात की, न ही ज्ञानेश कुमार का बचाव किया. उसने सिर्फ भीड़ की संख्या पर सवाल उठाए.
ज्यादातर लोगों ने, जिनमें वरिष्ठ संपादक प्रभु चावला भी शामिल हैं, माना कि यह जयप्रकाश नारायण की 24 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में हुई रैली के बाद देश की सबसे बड़ी राजनीतिक रैलियों में से एक थी. न्यूज़लॉन्ड्री के अनुमान के मुताबिक, रैली में कम से कम एक लाख लोग शामिल हुए थे और इससे भी बड़ी संख्या में लोग बाहर रह गए थे. इनमें वे लोग भी बड़ी संख्या में थे, जो राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं के साथ मिंटो ब्रिज से रामलीला मैदान तक कई घंटे चले जुलूस में शामिल हुए थे. मैंने खुद देखा कि कई लोगों को मैदान में प्रवेश नहीं मिल पाने के कारण वापस लौटना पड़ा. वहीं, कुछ लोग वहां मौजूद रहने के लिए मैदान और बैठने की जगहों पर कीचड़ और दलदल के बावजूद डटे रहे.
किसी राजनीतिक कार्यक्रम में भीड़ की संख्या को लेकर बहस का यह अकेला मामला नहीं है. डॉनल्ड ट्रंप ने 2017 में राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के दौरान जुटी भीड़ के आकार का खूब प्रचार किया था, जबकि तस्वीरों से पता चलता है कि 2009 में बराक ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह में इससे कहीं ज्यादा लोग शामिल हुए थे. ‘मेरी भीड़ तुम्हारी भीड़ से बड़ी है’ वाली अपनी शैली के मुताबिक, ट्रंप ने 6 जनवरी 2021 को हुई अपनी रैली को भी अब तक की सबसे बड़ी रैली बताया था. इसी रैली के बाद अमेरिकी कैपिटल पर हमला हुआ था.
आम तौर पर लोगों की इच्छा निष्पक्ष चुनावों और प्रतिनिधि संस्थाओं के जरिए सामने आती है. लेकिन अब चुनावों पर ही सवाल उठ रहे हैं. पुराने डराने-धमकाने के तरीके, जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास (‘आएगा तो मोदी ही’) और 2047 तक या अगले 50 साल तक सत्ता में बने रहने के दावे भी संदेह पैदा कर रहे हैं. आखिर आप इतने लंबे समय तक लगातार जीतने को लेकर इतने आश्वस्त कैसे हो सकते हैं?
जब चुनावी प्रक्रिया पर दाग लग जाते हैं, तो सड़कों पर लोगों की लामबंदी के जरिए जनता की सहमति सामने आती है. जब रैली में शामिल होने वाले लोग सिर्फ पार्टी कार्यकर्ता और पारंपरिक समर्थक नहीं, बल्कि छात्र और मध्यवर्ग के लोग भी हों, तो यह समझ आता है कि जनता अपना समर्थन वापस ले रही है. जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद से मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे दर्जनों दोस्तों और परिचितों को जानता हूं, जो पहले कांग्रेस के किसी मार्च में शामिल होने की बात तो दूर, वहां दिखना भी पसंद नहीं करते थे, लेकिन 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए मार्च और रामलीला मैदान की रैली में शामिल हुए.
BJP क्यों चिंतित है
बेशक, यह समझना मुश्किल नहीं है कि BJP भीड़ की संख्या को लेकर क्यों बहस कर रही है. उसका मकसद यह विचार कायम रखना है कि जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व राहुल गांधी या INDIA गठबंधन नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी करते हैं.
और वह विपक्ष के पक्ष में जा रहे तीन रुझानों को लेकर काफी चिंतित है.
वैधता: JP आंदोलन और अन्ना हजारे के आंदोलनों, दोनों को उनमें शामिल होने वाली बड़ी भीड़ से वैधता मिली थी. बड़ी भीड़ से सत्ताधारी पार्टी के लिए यह दावा करना मुश्किल हो जाता है कि सिर्फ वही जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करती है. यहां सड़क पर जुटी भीड़ मौजूदा सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह की तरह काम करती है. विपक्ष की ताकत का ऐसा प्रदर्शन उन मतदाताओं को भी उसके साथ आने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिन्होंने अभी तक अपना फैसला नहीं किया है. इसके उलट, मोदी सरकार रैली को ‘पूरी तरह फ्लॉप’ बताकर अपनी पहले से कम हो चुकी राजनीतिक साख को और गिरने से रोकना चाहती है.
बढ़त: जुलाई में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के तीन महीने से ज्यादा समय बाद विपक्ष की यह सफल रैली भी उसके बढ़ते प्रभाव का संकेत देती है. इससे वे मुद्दे उन मतदाताओं के बीच भी चर्चा में बने रहते हैं, जिन्होंने अभी तक अपना फैसला नहीं किया है या जो पहले मोदी के समर्थक थे. छात्रों के विरोध प्रदर्शन ने मध्यवर्ग के मतदाताओं के लिए रास्ता खोला. जंतर-मंतर पर भीड़ बढ़ने के साथ ही उनकी झिझक और डर कम होता गया. इसके बाद से राहुल गांधी ने लगातार दबाव बनाए रखा है. उन्होंने कई अप्रत्याशित कदम उठाए, जिनका अंत 31 अक्टूबर को ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रतीकात्मक सार्वजनिक महाभियोग और रामलीला मैदान की रैली के रूप में हुआ. विपक्ष का मानना है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेने के लिए व्यापक जनसमर्थन के साथ लगातार दबाव बनाए रखना जरूरी है. दूसरी ओर, अगर मोदी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को बचाते रहते हैं, तो उनकी राजनीतिक साख लगातार घटती रहेगी.
सत्ता के शीर्ष स्तर पर मतभेद: छात्रों के विरोध प्रदर्शन और ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आंदोलनों ने सत्ताधारी व्यवस्था के भीतर मतभेदों को साफ तौर पर बढ़ाया है. ऐसी खबरें हैं कि इन प्रदर्शनों से निपटने के तरीके को लेकर मोदी और अमित शाह के बीच मतभेद हैं. कमजोर होती सत्ता का एक संकेत यह भी है कि कुछ वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों ने कथित तौर पर लंबे समय से टल रहे कैबिनेट फेरबदल का रास्ता साफ करने के लिए इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है. BJP के कुछ सहयोगी दलों ने भी SIR को लेकर चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगा. चिराग पासवान ने जुलाई में पुलिस की कार्रवाई की आलोचना की, हालांकि बाद में उन्होंने अपना रुख बदल लिया. वहीं, क्षेत्रीय दलों के नेता जैसे जगन मोहन रेड्डी, नवीन पटनायक और केटी रामा राव, जो पहले अक्सर चुप रहते थे, छात्रों के समर्थन में सामने आए हैं और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने वालों में शामिल हो गए हैं.
शायद सबसे अहम बात यह है कि ऐसी खबरें हैं कि वरिष्ठ नौकरशाहों ने सरकारी कर्मचारियों को सभी फैसले लिखित रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया है, ताकि उन पर गलत या गैरकानूनी तरीके से काम करने के आरोप न लगें. इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है कि दो चुनाव आयुक्तों ने दस महीने के दौरान 14 बार लिखित रूप में ज्ञानेश कुमार के फैसले लेने के तरीके पर आपत्ति जताई. इनमें कैबिनेट सचिव को लिखी गई आपत्तियां भी शामिल थीं.
बदलाव की आहट साफ सुनाई दे रही है. मैंने जिन ज्यादातर लोगों से बात की है, उन्होंने कहा कि BJP चाहे रैली को लेकर कुछ भी कहे, लेकिन यह सफल रही. विपक्षी खेमे का उत्साह बढ़ा हुआ है, क्योंकि ये तीनों रुझान साफ तौर पर उसके पक्ष में जा रहे हैं. वहीं, BJP की हालत कमजोर होती दिख रही है और अब तक वह इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ खास नहीं कर पाई है.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. वे @dubeyamitabh पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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