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Friday, 6 November, 2026
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UPSC 2025 के नतीजों के 8 महीने बाद भी सेवा आवंटन नहीं, OBC क्रीमी लेयर फैसले ने बढ़ाई मुश्किल

केंद्र सरकार एक मुश्किल स्थिति में है, क्योंकि उसका कहना है कि OBC 'क्रीमी लेयर' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को लागू करने को लेकर स्पष्टता की कमी है.

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नई दिल्ली: केंद्र सरकार अगले कुछ महीनों में सिविल सेवा परीक्षा (CSE) 2026 के सफल उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देने की तैयारी कर रही है. गुरुवार को UPSC मुख्य परीक्षा का नतीजा घोषित होने के साथ ही सरकार एक ऐसी स्थिति में फंस गई है, जहां उसके सामने दोनों ही रास्ते मुश्किल हैं.

पिछले साल की सिविल सेवा परीक्षा के अंतिम नतीजे घोषित हुए आठ महीने हो चुके हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने अब तक सफल उम्मीदवारों को उनकी सेवाएं आवंटित नहीं की हैं और न ही उनका फाउंडेशन कोर्स (FC) प्रशिक्षण शुरू किया है. इसकी वजह सरकार के मुताबिक, OBC क्रीमी लेयर मामले में सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को लागू करने को लेकर स्पष्टता की कमी है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) या निजी क्षेत्र में काम करने वाले माता-पिता के वेतन या कृषि से होने वाली आय के आधार पर ही OBC उम्मीदवारों को आरक्षण के लाभ से बाहर नहीं किया जा सकता. अदालत ने साफ किया था कि क्रीमी लेयर की पहचान का मुख्य आधार माता-पिता की सामाजिक स्थिति होनी चाहिए. सरकार ने सितंबर में 11 मार्च के आदेश को लागू करने के तरीके पर स्पष्टीकरण मांगा था. इस मामले पर शुक्रवार को अदालत में सुनवाई होगी.

इस देरी से न सिर्फ नए सिविल सेवा अधिकारियों के प्रशिक्षण और उसके बाद उनकी तैनाती का कार्यक्रम प्रभावित हुआ है, बल्कि केंद्र सरकार की ओर से समय पर फाउंडेशन कोर्स शुरू करने में हो रही हिचकिचाहट से 2026 बैच की अखिल भारतीय सेवाओं के प्रशिक्षण और तैनाती का कार्यक्रम भी प्रभावित हो सकता है. इनमें IAS, भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय विदेश सेवा, भारतीय वन सेवा और केंद्र सरकार की अन्य ग्रुप-A सेवाएं शामिल हैं.

इस अनिश्चितता ने 2025 बैच के सफल उम्मीदवारों की चिंता भी बढ़ा दी है. आमतौर पर सिविल सेवा परीक्षा का नतीजा आने के बाद उम्मीदवारों को उनकी रैंक के आधार पर सेवा आवंटित की जाती है. अगस्त के अंत या सितंबर की शुरुआत तक उन्हें लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) और उससे जुड़ी दूसरी संस्थाओं में चार महीने का अनिवार्य फाउंडेशन कोर्स प्रशिक्षण दिया जाता है. यह प्रशिक्षण दिसंबर में पूरा होता है.

लेकिन नवंबर का पहला हफ्ता आ चुका है और केंद्र सरकार की ओर से अभी तक यह संकेत नहीं मिला है कि फाउंडेशन कोर्स कब शुरू होगा. यह कोर्स सिर्फ युवा अधिकारियों को लोक सेवक के तौर पर अपना काम करने के लिए जरूरी जानकारी और कौशल देने तक सीमित नहीं है. इससे उनमें आपसी तालमेल और भाईचारे की भावना भी विकसित होती है, जो “सरकार के कामकाज को सुचारु रूप से चलाने” के लिए जरूरी है.

दिसंबर में फाउंडेशन कोर्स पूरा होने के बाद फेज-I यानी पेशेवर प्रशिक्षण शुरू होता है. इसमें सफल उम्मीदवारों को उनकी सेवा के हिसाब से खास प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके बाद जिला प्रशिक्षण और फिर फेज-II का प्रशिक्षण होता है. इन सभी के लिए एक तय समयसीमा होती है. फाउंडेशन कोर्स शुरू होने में देरी का असर न सिर्फ प्रशिक्षण के बाकी चरणों के कार्यक्रम पर पड़ सकता है, बल्कि अधिकारियों की उनके संबंधित कैडर में अंतिम तैनाती भी प्रभावित हो सकती है.

केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले की जानकारी देते हुए दिप्रिंट को बताया कि देरी की वजह कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) की आशंका है. विभाग को डर है कि सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को लागू करने से OBC वर्ग के नए सफल उम्मीदवारों की ओर से मुकदमों का एक नया सिलसिला शुरू हो सकता है. DoPT भारत सरकार की नोडल एजेंसी है, जो भर्ती, कैडर प्रबंधन और प्रशिक्षण समेत कई मामलों से जुड़ी नीतियां बनाती है.

नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर अधिकारियों ने कहा कि इससे स्थिति और उलझ सकती है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पिछली तारीख से लागू करने के आदेश ने पहले ही मामले को जटिल बना दिया है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर उलझन

इस देरी की मुख्य वजह OBC क्रीमी लेयर की पहचान में समानता तय करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का 11 मार्च का फैसला है. शीर्ष अदालत ने केंद्र को 1993 के अपने कार्यालय ज्ञापन को लागू करने का निर्देश दिया था. इस ज्ञापन में कहा गया था कि OBC उम्मीदवारों की क्रीमी लेयर की स्थिति तय करने के लिए सिर्फ माता-पिता की आय या कृषि से होने वाली आय को आधार नहीं बनाया जा सकता.

अदालत ने इस फैसले को पिछली तारीख से लागू करने का निर्देश दिया था. इससे कई नए सवाल खड़े हो सकते हैं. सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इसका असर न सिर्फ नए सिविल सेवा उम्मीदवारों को सेवा आवंटित करने पर पड़ेगा, बल्कि पहले से सेवा में मौजूद सफल उम्मीदवारों की वरिष्ठता और राज्य सरकारों की ओर से की गई भर्तियों पर भी पड़ सकता है.

इसके बाद केंद्र ने 24 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में एक विविध याचिका दायर की. इसमें 11 मार्च के फैसले को लागू करने के तरीके पर स्पष्टीकरण और निर्देश मांगे गए. एक याचिका में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से दो साल का समय भी मांगा, ताकि सभी संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा किया जा सके, PSU में पदों के बीच समानता तय की जा सके और निजी क्षेत्र में उनके जैसे पदों की पहचान की जा सके.

‘ऐसी स्थिति जिसमें दोनों रास्ते मुश्किल’

2025 की सिविल सेवा परीक्षा के सफल उम्मीदवारों से जुड़े फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल एक वरिष्ठ IAS अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि उनके सामने ऐसी स्थिति है, जिसमें दोनों ही रास्ते मुश्किल हैं.

अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा, “यह सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने नए उम्मीदवारों को सेवा आवंटित करने पर रोक नहीं लगाई है. लेकिन हमारे सामने चुनौती यह है कि सेवा आवंटित करते समय किस नियम को आधार बनाया जाए. क्या हम सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च के फैसले को लागू करें, जिसमें कहा गया है कि OBC उम्मीदवारों की क्रीमी लेयर की स्थिति सिर्फ उनके माता-पिता की आय या कृषि से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं की जा सकती. या फिर उन मौजूदा नियमों को लागू करें, जो उम्मीदवारों के 2025 में फॉर्म भरने और परीक्षा देने के समय लागू थे.”

2025 की सिविल सेवा परीक्षा के समय लागू नियमों के तहत PSU या निजी क्षेत्र में काम करने वाले OBC उम्मीदवारों के माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को उनकी क्रीमी लेयर की स्थिति तय करते समय गिना जाता था. अगर ऐसे उम्मीदवारों के माता-पिता की सालाना वेतन आय 8 लाख रुपये से ज्यादा होती थी, तो उन्हें नॉन-क्रीमी लेयर का दर्जा नहीं दिया जाता था. क्रीमी लेयर तय करने के लिए यही आय सीमा निर्धारित की गई थी.

असमानता यह थी कि सरकारी नौकरी करने वाले उम्मीदवारों के माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को उनकी क्रीमी लेयर की स्थिति तय करते समय नहीं गिना जाता था. इसी अंतर को अदालत में चुनौती दी गई थी और सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च के फैसले में इसी पर विचार किया था.

ऊपर बताए गए अधिकारी ने कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण का इंतजार कर रहे हैं.”

सरकार के एक दूसरे अधिकारी ने बताया कि 2025 की सिविल सेवा परीक्षा में चुने गए 958 उम्मीदवारों में से 300 से ज्यादा ने OBC नॉन-क्रीमी लेयर श्रेणी के तहत आवेदन किया था.

दूसरे अधिकारी ने कहा, “अगर हम सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करके सेवा आवंटित कर देते हैं, तो यह अदालत के आदेश के मुताबिक होगा. लेकिन उन उम्मीदवारों के साथ यह अन्याय होगा, जिन्होंने क्रीमी लेयर की स्थिति तय करने के लिए उस समय लागू आय संबंधी नियमों के आधार पर आवेदन किया था.”

अधिकारी ने कहा कि सभी संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा करने के लिए दो साल का समय चाहिए. उन्होंने कहा, “कई राज्यों से सलाह लेनी है. अलग-अलग श्रेणियां होने की वजह से व्यापक स्तर पर विचार-विमर्श करना होगा. हमें दो साल का समय चाहिए.”

सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर को केंद्र की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में एक और आवेदन देकर पुराने नियम के आधार पर फाउंडेशन कोर्स शुरू करने की अनुमति मांगी थी. दूसरे अधिकारी ने कहा, “हमने दो आवेदन दिए थे. दूसरे आवेदन में हमने कहा था कि फाउंडेशन कोर्स अभी शुरू करने दिया जाए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश में आगे जो भी फैसला आएगा, हम उसे भविष्य में लागू करेंगे.”

हालांकि, अधिकारी ने कहा कि OBC क्रीमी लेयर मामले की उलझन के कारण नए उम्मीदवारों का प्रशिक्षण तो टल गया है, लेकिन इससे उनकी वरिष्ठता पर असर नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा, “वरिष्ठता की गिनती उस साल की पहली जनवरी से होती है, जिस साल सेवा आवंटित की जाती है और फाउंडेशन कोर्स शुरू होता है. सभी नए उम्मीदवारों की वरिष्ठता एक ही दिन से शुरू होगी.”

वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने कहा कि सेवा आवंटन और फाउंडेशन कोर्स का इंतजार कर रहे उम्मीदवारों के बीच इस स्थिति से चिंता और अनिश्चितता पैदा हुई है.

LBSNAA के पूर्व निदेशक संजीव चोपड़ा ने कहा कि यह देरी दुर्भाग्यपूर्ण है और इसके चलते प्रशिक्षण की अवधि कम हो सकती है. उन्होंने कहा, “यह एक जरूरी मामला है और इसके लिए विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition) दायर करने की जरूरत है. दुर्भाग्य से कई दूसरी चीजें प्राथमिकता बन गई हैं. इस मामले को वह अहमियत नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी. इसी वजह से यह समस्या पैदा हुई है.”

चोपड़ा ने कहा कि फाउंडेशन कोर्स युवा अधिकारियों के लिए बेहद जरूरी है. इसमें उन्हें जरूरी कौशल का प्रशिक्षण देने के साथ-साथ आपस में दोस्ती और एकजुटता की भावना विकसित करने में भी मदद मिलती है. उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार नए उम्मीदवारों के लिए फाउंडेशन कोर्स शुरू कर सकती थी. देरी के कारण प्रशिक्षण की अवधि कम हो सकती है. इससे प्रशिक्षण के दौरान युवा सिविल सेवकों के बीच बनने वाला आपसी जुड़ाव और भाईचारा प्रभावित होगा.”

चोपड़ा ने कहा कि उन्हें पहले ऐसा कोई मामला याद नहीं है, जब फाउंडेशन कोर्स में इतनी ज्यादा देरी हुई हो. उन्होंने कहा, “कोविड महामारी के दौरान भी फाउंडेशन कोर्स दिसंबर तक पूरा हो गया था.”

उन्होंने कहा कि अब देरी हो चुकी है, लेकिन स्थिति को संभालने के कुछ तरीके हैं. उन्होंने कहा, “एक तरीका यह है कि पहले पेशेवर कोर्स कराए जा सकते हैं. हम फेज-I शुरू कर सकते हैं और पेशेवर कोर्स पूरा होने के बाद सभी सेवाओं के लिए एक विशेष फाउंडेशन कोर्स करा सकते हैं. इसे नया नाम भी दिया जा सकता है. यह ज्यादा सही रहेगा. शायद यही रास्ता हो सकता है.”

पहले जिन सरकारी अधिकारियों का जिक्र किया गया, उनमें से एक ने कहा कि यह बहुत मुश्किल फैसला है. उन्होंने कहा, “DoPT के सामने चुनौती है. उसे बेहद मुश्किल, अनिश्चित और विवादित परिस्थितियों के बीच नीति बनानी है. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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