नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के श्रेयस सारिवान ने पिछले साल SD Pay ऐप में करीब 1.5 लाख रुपये निवेश किए थे. उनके स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल ने उन्हें इस ऐप से मिलने वाले रिटर्न के बारे में बताया था. सारिवान अपने प्रिंसिपल पर भरोसा किए बिना नहीं रह सके.
इस साल सितंबर तक सारिवान ने अपना पैसा निकालने के बारे में सोचा. ऐसा तब हुआ, जब उन्हें यूट्यूब पर SD Pay ऐप से जुड़े वीडियो दिखने लगे. ऐसा लग रहा था कि हर जगह इसी ऐप की चर्चा हो रही है. सारिवान ने दिप्रिंट को बताया, “मैंने यूट्यूब पर ऐसा ही एक वीडियो खोला और मुझे पता चला कि यह सब एक घोटाला था. मुझे इसकी जानकारी ही नहीं थी. मेरा सारा पैसा धोखाधड़ी में चला गया… मुझे यकीन नहीं हो रहा था. मैंने बस ऐप बंद कर दिया और बैठकर सोचने लगा कि सरकारी मंजूरी वाले जिन दस्तावेजों को मुझे दिखाया गया था, वे सब इतने बड़े घोटाले का हिस्सा कैसे थे.”
राज्य के शिक्षा विभाग में क्लर्क के तौर पर काम करने वाले 26 वर्षीय सारिवान के फोन पर ‘ग्रुप डायमंड अपना पे’ नाम के व्हाट्सएप ग्रुप में लगातार मैसेज आ रहे थे. यह ग्रुप SD Pay में पैसा लगाने वाले लोगों को जोड़ने के लिए बनाया गया था.
6 सितंबर को ग्रुप के एडमिन ने लिखा, “अच्छी खबर. मेरे सभी परिवार वालों को नमस्कार. हमें आप सभी को यह बताते हुए खुशी हो रही है कि MCA में पब्लिक लिमिटेड कंपनी का काम पूरा हो गया है और IMPS सेवा गुरुवार से सुचारू रूप से शुरू हो जाएगी. बाकी सभी सेवाएं भी जल्द ही एक-एक करके शुरू हो जाएंगी. परेशानी के लिए माफ करें.” इस मैसेज के जरिए निवेशकों को झूठी उम्मीद दी गई, जबकि करोड़ों रुपये की यह डिजिटल निवेश योजना आखिरकार बंद हो गई थी.
सितंबर में गुजरात की अमरेली पुलिस ने SD Pay ऐप से जुड़े कथित 1,211 करोड़ रुपये के डिजिटल निवेश घोटाले का पर्दाफाश किया. अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि मल्टी-लेवल मार्केटिंग (MLM) नेटवर्क के जरिए देशभर में 6.52 लाख से ज्यादा लोगों को कथित तौर पर ठगा गया. इस मामले में अब तक 12 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. जांचकर्ताओं ने करीब 900 लोगों के बयान दर्ज किए हैं और 1930 साइबर क्राइम हेल्पलाइन पर 800 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं. पुलिस की दो महीने तक चली जांच में इस कथित घोटाले का पूरा पैमाना सामने आया. प्रभावित निवेशकों की संख्या 6.52 लाख से ज्यादा है. 2024 में लॉन्च हुए इस ऐप को करीब 15 लाख बार डाउनलोड किया गया था.
प्रवर्तन निदेशालय (ED) और इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने भी अमरेली पुलिस से इस मामले की जानकारी मांगी है.
यह पूरा मामला कैसे काम करता था
छत्तीसगढ़ के पेंघा के रहने वाले सारिवान के लिए यह जाल किसी अनजान धोखेबाज ने नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद व्यक्ति ने बिछाया था. उनके स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल ने उन्हें SD Pay के बारे में बताया था. उन्होंने समझाया कि कम से कम 1,000 रुपये जमा करने पर रोजाना रिवॉर्ड पॉइंट्स और अच्छा रिटर्न मिलेगा.
सारिवान ने बताया, “यह प्लेटफॉर्म एक आम फिनटेक वॉलेट की तरह दिखता था. हम QR कोड स्कैन कर सकते थे और रोजमर्रा के लेन-देन कर सकते थे. मुझे ऐसे दस्तावेज भी भेजे गए थे, जिनसे लगता था कि इस ऐप का भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) में रजिस्ट्रेशन है.”
उन्होंने कहा, “मुझे कोई शक नहीं था. मुझे लगा कि यह Paytm या Google Pay जैसा ही है. ऐप में हर दिन मुनाफे के साथ बैलेंस बढ़ता हुआ दिखता था, इसलिए मुझे घोटाले का शक करने की कोई वजह नहीं लगी.”
इस पेशकश पर भरोसा करके सारिवान ने सितंबर और अक्टूबर 2025 के बीच कभी इस ऐप को डाउनलोड किया. इसके बाद के महीनों में उन्होंने अपनी सैलरी के साथ-साथ पर्सनल लोन का पैसा भी इस प्लेटफॉर्म में लगा दिया.
मार्च और अप्रैल 2026 में इस ऐप का असली चेहरा सामने आने लगा, जब अचानक पैसे निकालने की सुविधा बंद कर दी गई. इसके बावजूद ऐप को बढ़ावा देने वाले लोग निवेशकों को लगातार फोन करते रहे और भरोसा दिलाने वाले मैसेज भेजते रहे.
अगस्त 2026 में यूट्यूब पर वीडियो देखते समय सारिवान को पहली बार इस ऐप के पीछे के लोगों पर पुलिस की छापेमारी और ओडिशा में बड़े आरोपियों की गिरफ्तारी से जुड़ी खबरें दिखीं. सारिवान ने कहा, “मैंने एक वीडियो खोला और समझ गया कि यह सब धोखाधड़ी थी.”
सारिवान ने तुरंत ‘ग्रुप डायमंड अपना पे’ के सदस्यों को इसकी जानकारी दी. इस व्हाट्सएप ग्रुप में 103 निवेशक थे. इनमें अच्छी पढ़ाई-लिखाई करने वाले पेशेवर और PhD धारक भी शामिल थे. इन सभी के करीब 20 लाख रुपये इस योजना में फंसे हुए थे. उन्होंने कहा, “सोशल मीडिया पेजों पर लगातार अपडेट दिए जा रहे थे कि नए नाम ‘अपना पे’ के तहत डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड और तुरंत IMPS से पैसे निकालने की सुविधा शुरू होने वाली है. लेकिन मैं इस जाल को पहचान गया था.”
सारिवान की सारी बचत खत्म हो चुकी है. इस धोखाधड़ी के बाद वह बहुत सतर्क हो गए हैं. अब वह किसी अनजान लिंक पर क्लिक नहीं करते और हर डिजिटल लेन-देन को ध्यान से जांचते हैं.
‘चाहे जो हो, आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे’
गुजरात के अमरेली की रहने वाली वनिताबेन मनुभाई किसी पर आसानी से भरोसा नहीं करतीं.
वह गर्भवती हैं और अपनी 1.5 साल की बेटी कियारा की देखभाल करते हुए अमरेली में अपने माता-पिता के साथ रहती हैं. उनका ज्यादातर समय घर की देखभाल में बीतता है. अब उन्हें बार-बार यह याद आता है कि कैसे SD Pay उर्फ अपना पे नाम के एक ऐप ने उनके परिवार का आर्थिक भविष्य और बैंक बैलेंस पूरी तरह खत्म कर दिया.
वनिताबेन ने दिप्रिंट को बताया कि यह मामला दिसंबर 2025 में शुरू हुआ था. उस समय उनके पति नरेंद्रकुमार रमेशभाई महिडा की मुलाकात मोटा जिंजुड़ा के रहने वाले उनके दोस्त अश्विनभाई विंजुडा से हुई.
अश्विनभाई ने महिडा को एक ऐसे डिजिटल निवेश के बारे में बताया, जिसमें बिना ज्यादा मेहनत किए अच्छी कमाई हो सकती थी. उन्होंने कहा कि वह खुद तीन महीने से SD Pay में पैसा लगा रहे थे और हर महीने 9 फीसदी का अच्छा रिटर्न पा रहे थे.
वनिताबेन ने पुलिस को बताया, “उन्हें बताया गया कि इस ऐप पर मोबाइल रिचार्ज, बिल भुगतान, टिकट बुकिंग और पैसे ट्रांसफर करने जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं, जो Google Pay और PhonePe में मिलती हैं. इसके अलावा, अश्विनभाई ने कहा कि अगर हम अपने नीचे दूसरे लोगों को जोड़ते हैं और उन्हें SD Pay ऐप शुरू करके इसमें पैसा लगाने के लिए कहते हैं, तो हमारे नीचे जुड़े लोगों को होने वाले मुनाफे का 30 फीसदी हमें मिलेगा. इस तरह, अलग-अलग रकम निवेश करने पर अलग-अलग प्रतिशत में रिटर्न मिलता है.”
उन्होंने कहा, “यह ऐप कम से कम 1,000 रुपये लगाकर शुरू किया जा सकता है और जब भी पैसों की जरूरत हो, ऐप से अपने बैंक खाते में पैसे निकाले जा सकते हैं.”
इस बात में दिलचस्पी बढ़ने के बाद महिडा वांडा गांव में अश्विनभाई के मामा गौतमभाई वाघेला से मिले. वाघेला ने उन्हें एक अच्छी तरह से तैयार किया गया प्रचार ब्रोशर दिखाया. इसमें पहले स्तर पर मिलने वाले कमीशन, कैशबैक और सूरत के प्रमुख लोगों आशीषभाई गेडिया और भावेशभाई चौहान की ओर से मिलने वाले सहयोग की जानकारी दी गई थी. इस सिस्टम के काम करने का भरोसा दिलाने के लिए वाघेला ने 27 दिसंबर 2025 को शुरुआती 10,000 रुपये ट्रांसफर किए.
हालांकि, वनिताबेन ने शुरुआत में सावधानी बरतने की सलाह दी थी, लेकिन उनके पति के फोन पर मिलने वाले शुरुआती रिटर्न ने उनकी शंकाओं को दूर कर दिया. जल्द ही वनिताबेन और उनके ससुर रमेशभाई के फोन में भी यह ऐप डाउनलोड कर दिया गया. दोनों ने इसमें 1,000-1,000 रुपये जमा किए. उन्होंने कहा, “यह सब असली लग रहा था.”
मोबाइल स्क्रीन पर हर दिन बढ़ती रकम देखकर परिवार ने इसमें और पैसा लगाना शुरू कर दिया. 2 फरवरी 2026 को वनिताबेन ने अपने HDFC बैंक खाते से ऐप के वर्चुअल खाते में 5 लाख रुपये ट्रांसफर किए. दो दिन बाद उनके ससुर ने भी इतनी ही रकम जमा कर दी. परिवार ने जो 10 लाख रुपये लगाए थे, वे कई सालों की बचत थी. अब यह पैसा उनके फोन में मौजूद एक ऐप में फंस गया था.
महिडा ने दिप्रिंट को बताया, “यह सिर्फ साइबर धोखाधड़ी नहीं थी, हमारा भरोसा लूटा गया था. अब हम किसी फोन कॉल या ऑनलाइन पेमेंट पर दोबारा कैसे भरोसा करेंगे?”
इस साल मार्च तक ऐप में गड़बड़ियां दिखने लगी थीं. इनमें से एक यह थी कि ऐप का नाम बदलकर ‘अपना पे’ कर दिया गया. महिडा ने दिप्रिंट को बताया, “पैसे निकालने की सुविधा बंद हो गई. इसके बाद IMPS, बिल भुगतान और मोबाइल रिचार्ज भी अचानक बंद हो गए.”
जब महिडा ने वाघेला से जवाब मांगा, तो उन्हें बहाने सुनने को मिले. महिडा ने कहा, “उन्होंने बताया कि ऐप में अपडेट का काम चल रहा है, कुछ मंजूरियां मिलनी बाकी हैं और सभी को भरोसा दिलाया कि 15 अगस्त 2026 तक सब कुछ सामान्य हो जाएगा.”
लेकिन स्वतंत्रता दिवस भी बीत गया और हालात सामान्य नहीं हुए. उनका पैसा भी वापस नहीं आया.
महिडा का परिवार अकेला नहीं था. सावरकुंडला, लूणीधर और आसपास के कई इलाकों में ऐसे कई परिवार इसी डिजिटल जाल में फंस गए थे.
2 सितंबर को वनिताबेन ने अमरेली के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने का फैसला किया. उन्होंने भारतीय न्याय संहिता (BNS), अनियमित जमा योजनाओं पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून, 2019, गुजरात वित्तीय संस्थान (जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा) अधिनियम, 2003, प्राइज चिट्स एंड मनी सर्कुलेशन स्कीम्स (बैनिंग) एक्ट, 1978 और IT एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत शिकायत दर्ज कराई.
घोटाले का पूरा तरीका
अमरेली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “SD Pay और अपना पे के काम करने का तरीका दिखाता है कि आम डिजिटल वॉलेट की सुविधाओं को पुराने मल्टी-लेवल वित्तीय पिरामिड मॉडल के साथ मिलाकर एक बेहद सोची-समझी और जटिल योजना बनाई गई थी.”
अधिकारी के मुताबिक, इस प्लेटफॉर्म को जानबूझकर इस तरह बनाया गया था कि छोटे शहरों और कस्बों के आम लोगों के लिए इसमें पैसा लगाना तकनीकी और मानसिक रूप से आसान हो जाए. उन्होंने कहा, “ऐप के प्रमोटरों, निदेशकों, मैनेजरों, एजेंटों और अन्य अज्ञात सहयोगियों ने पहले से रची गई आपराधिक साजिश के तहत लोगों को कम समय में असाधारण मुनाफा देने का लालच देकर पैसा लगाने के लिए तैयार किया.”
पुलिस के एक अन्य अधिकारी ने कहा कि SD Pay ऑनलाइन ऐप के जरिए निवेशकों को “गैरकानूनी तरीके से एक वित्तीय योजना चलाने, ऐप पर खाता खोलने और हर महीने 9 फीसदी रिटर्न, कैशबैक और अन्य आकर्षक लाभ देने का वादा करके लोगों को निवेश के लिए लुभाने” का काम किया गया.
अधिकारी ने कहा कि इससे शुरुआत में निवेशकों का भरोसा बढ़ा. उन्होंने कहा, “कुछ निवेशकों को रिटर्न और कैशबैक देने और ज्यादा लोगों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करने के बाद आरोपियों ने निवेशकों से बड़ी रकम जमा कर ली.”
इसके बाद आरोपियों ने “ऐप की कई सेवाएं बंद कर दीं, ऐप का नाम SD Pay से बदलकर अपना पे कर दिया, निवेशकों की रकम वापस नहीं की और शिकायतकर्ता समेत दूसरे निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की.”
ऊपर से यह ऐप एक “संपूर्ण डिजिटल सुविधा वाला प्लेटफॉर्म” लगता था. इस पर मोबाइल रिचार्ज, बिजली-पानी के बिल भरने और टिकट बुक करने जैसी रोजमर्रा की सुविधाएं थीं. इसका इंटरफेस Google Pay और PhonePe जैसे भरोसेमंद डिजिटल पेमेंट ऐप जैसा बनाया गया था.
पुलिस अधिकारी ने बताया कि ऐप चलाने वालों ने यूजर्स की संख्या तेजी से बढ़ाने के लिए 15 स्तरों वाला रेफरल पिरामिड सिस्टम बनाया था. इसके लिए पारंपरिक विज्ञापनों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं थी. पहले से जुड़े निवेशकों को नए लोगों को जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था. उनसे वादा किया जाता था कि उनके सीधे नीचे जुड़े लोगों के जरिए होने वाले कारोबार से उन्हें 30 फीसदी तक मुनाफा मिलेगा.
शुरुआती निवेशकों का पूरा भरोसा जीतने के लिए प्लेटफॉर्म ने शुरुआत में पैसे निकालने की सुविधा पूरी तरह चालू रखी. यूजर्स सिर्फ 1,000 रुपये जैसी छोटी रकम जमा कर सकते थे और बिना किसी परेशानी के अपने बैंक खातों में पैसे निकाल सकते थे.
पुलिस अधिकारी ने कहा, “शुरुआत में जानबूझकर पैसे निकालने की सुविधा दी गई, ताकि लोगों को लगे कि यह सिस्टम स्थिर है. इससे संतुष्ट यूजर्स खुद इसका प्रचार करने लगे. वे प्रचार ब्रोशर बांटते थे, लोगों को जोड़ने के लिए सामुदायिक बैठकें करते थे और सोशल मीडिया पर अपने अच्छे अनुभव साझा करते थे.” इस तरह लोगों के बीच बने भरोसे के जरिए उन्हें सामान्य वित्तीय सावधानियों को नजरअंदाज करने के लिए तैयार किया गया.
ऐप के इंटरफेस के पीछे कई फर्जी कंपनियों और नकली पेमेंट गेटवे का एक जटिल नेटवर्क था. पुलिस के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, निवेशकों से आने वाला पैसा सही एस्क्रो खातों में रखने के बजाय कई कंपनियों के खातों में भेज दिया जाता था. इनमें एसडी हब (ओपीसी) प्राइवेट लिमिटेड, शिव धरती कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड, शिवधरती टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड, उपाय डिजी पेमेंट इंडिया लिमिटेड, उपाय डिजी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, यू पेमेंट इंडिया लिमिटेड, वनक्लिक फिनटेक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और अद्विक इन्फो प्राइवेट लिमिटेड शामिल थीं.
पुलिस अधिकारियों ने कहा कि पूरा सिस्टम “पोंजी मॉडल” पर काम कर रहा था. इसमें नए निवेशकों से जमा किए गए पैसे का इस्तेमाल पहले से जुड़े निवेशकों को हर महीने ज्यादा कैशबैक देने के लिए किया जाता था.
हालांकि, मार्च 2026 के आसपास यह पूरा सिस्टम टूटने लगा, जब नए निवेशकों से आने वाला पैसा कम होने लगा.
पुलिस के दूसरे अधिकारी ने बताया, “जब निवेश के लिए नया पैसा आना कम हो गया, तो ऐप चलाने वालों ने कई चरणों में लोगों से बच निकलने की योजना बनाई.” उन्होंने बताया कि सबसे पहले ऐप में पैसे निकालने की सुविधा बंद की गई. इसके कुछ समय बाद IMPS, बिजली-पानी के बिल भुगतान और मोबाइल रिचार्ज की सेवाएं भी बंद कर दी गईं. उन्होंने कहा कि सूरत के आशीषभाई गेडिया और भावेशभाई चौहान समेत आरोपियों ने पुलिस की कार्रवाई को टालने और निवेशकों में फैली घबराहट को रोकने के लिए झूठी बातें फैलाईं.
पुलिस अधिकारी ने कहा, “उन्होंने दावा किया कि ऐप के सर्वर अपग्रेड किए जा रहे हैं, नियमों का पालन करने की प्रक्रिया चल रही है और सेवाओं को दूसरे प्लेटफॉर्म पर ले जाया जा रहा है. उन्होंने 15 अगस्त 2026 तक सभी सेवाएं फिर से शुरू करने का वादा किया. जब हालात बिगड़ने लगे, तो प्रमोटरों ने धोखे का एक और तरीका अपनाया. उन्होंने निवेशकों से कहा कि वे ऐप में फंसे अपने वॉलेट बैलेंस के बदले ऐसी कंपनी के शेयर ले सकते हैं जो अभी शेयर बाजार में लिस्ट भी नहीं हुई है. उन्होंने इसे कंपनी की आने वाली स्टॉक मार्केट लिस्टिंग का हिस्सा बताया.”
इसी दौरान, कथित मुख्य आरोपी धवल पटेल और नरेंद्र सोलंकी ने पुलिस की कार्रवाई से पहले नए नाम अपना पे के तहत अपने कामकाज का ढांचा चुपचाप महाराष्ट्र में स्थानांतरित करने की कोशिश की, ताकि वे फिर से इसी तरह का घोटाला शुरू कर सकें.
12 गिरफ्तारियां, साइबर धोखाधड़ी की 826 शिकायतें
SD Pay घोटाले की अमरेली पुलिस की जांच में हाल के समय के सबसे बड़े अंतरराज्यीय डिजिटल धोखाधड़ी नेटवर्क में से एक का खुलासा हुआ है. इसके तार गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार और उत्तर प्रदेश तक फैले हुए हैं. पुलिस ने एक विशेष जांच दल (SIT) भी बनाया है, जिसने अब तक 12 मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया है.
शुरुआत में सूरत के प्रमोटर आशीषभाई छगनभाई गेडिया और भावेशभाई धीरुभाई चौहान के साथ उनके प्रमुख सहयोगियों निशी सत्यनारायण प्रसाद, सोहिलभाई जितेंद्रकुमार मकवाना और निरवकुमार अरविंदभाई पटेल को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए ऐप के मुख्य मालिक धवल गोविंदभाई पटेल और हिरेन मुकेशभाई शाह को ओडिशा के संबलपुर से गिरफ्तार किया. ट्रेनर भावेशभाई अरविंदभाई घनेचा को महाराष्ट्र के विरार से पकड़ा गया. अन्य प्रमुख गिरफ्तार आरोपियों में चक्रवात न्यूज चैनल के निदेशक मुश्ताक अहमदशाह दीवान और वापी के संतोष कनैयालाल पाठक शामिल हैं.
वित्तीय जांच में लेन-देन से जुड़े बड़े रिकॉर्ड सामने आए हैं. प्लेटफॉर्म के डिजिटल सिस्टम की जांच में पता चला कि इस ऐप के कुल 15 लाख से ज्यादा यूजर्स थे. रेफरल सिस्टम के पहले स्तर पर 271 सीधे खाते थे, जिनसे करीब 1.5 लाख से 2.5 लाख नियमित निवेशक जुड़े हुए थे.
SIT ने फर्जी कंपनियों के जरिए निवेशकों से पैसा जमा करने के लिए इस्तेमाल किए गए 40 मुख्य कॉरपोरेट बैंक खातों की पहचान की. इन खातों से कुल 2,033 करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ था. नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (NCCRP) पर इन खातों की जानकारी मिलाने पर साइबर धोखाधड़ी की 826 औपचारिक शिकायतें सामने आईं. गिरफ्तार किए गए 12 आरोपियों के नाम पर 88 अन्य व्यक्तिगत बैंक खाते भी मिले, जिनका संबंध NCCRP की 16 अतिरिक्त शिकायतों से था. पुलिस ने इन सभी बैंक खातों को आधिकारिक तौर पर फ्रीज कर दिया है.
डिजिटल सबूत जुटाने के लिए SIT ने तीन फॉरेंसिक हार्ड ड्राइव में मौजूद डेटाबेस रिकॉर्ड जब्त किए. पुलिस ने अपराध से कमाए गए पैसे से खरीदी गई संपत्तियां भी जब्त की हैं. इनमें तीसरे लोगों के नाम पर रजिस्टर्ड गाड़ियां, हीरे जड़े सोने के गहने और न्यूज चैनल के दफ्तरों से जब्त किए गए 11 कंप्यूटर सिस्टम शामिल हैं. इन कंप्यूटरों का इस्तेमाल वायरल प्रचार अभियान चलाने के लिए किया जाता था.
बड़ी संख्या में पीड़ितों के मामले को संभालने के लिए पुलिस ने 882 लोगों के बयान व्यक्तिगत रूप से दर्ज किए हैं. इसके अलावा Google Forms के जरिए 1,148 अन्य पीड़ितों के डिजिटल बयान भी जुटाए गए हैं. फरार आरोपियों के खिलाफ लुकआउट सर्कुलर और हवाई यात्रा पर रोक लगाने के आदेश जारी किए गए हैं. इनमें नरेंद्र कांगे और नरेंद्र सोलंकी शामिल हैं. SIT नौ अन्य पहचाने गए मुख्य संदिग्धों के खिलाफ सबूत जुटा रही है, ताकि ठगी के पैसे को कहां-कहां भेजा गया, इसका पूरा पता लगाया जा सके.
लोगों पर भरोसा करने में समय लेती हूं
बड़ौदा की एक अन्य रहने वाली सीमा (अनुरोध पर नाम बदल दिया गया है) एक अकेली मां और सरकारी स्कूल की शिक्षिका हैं. तलाक के बाद वह कई साल पहले मस्कट में शादी के बाद भारत लौट आई थीं.
वह अकेले अपने बच्चे की परवरिश कर रही हैं, इसलिए आर्थिक सुरक्षा हमेशा उनकी सबसे बड़ी चिंता रही है. यही वजह थी कि जुलाई 2025 में जब उनके साथी शिक्षकों ने एक एजेंट को डिजिटल रिटर्न का वादा करते हुए उनके घर भेजा, तो उन्होंने पहली बार में मना कर दिया.
सीमा ने दिप्रिंट को बताया, “कुछ दिन बाद वह एजेंट फिर आया. इस बार उसके पास पूरी तैयारी के साथ एक पेशकश थी. उसने मुझे बताया कि इस ऐप को सरकार की मंजूरी मिली हुई है. इसमें एक एस्क्रो वॉलेट है, जिसमें कोई भी मेरे पैसे को हाथ नहीं लगा सकता. यह Google Pay या Paytm की तरह ही काम करता है.”
उनकी शंकाएं दूर करने के लिए एजेंट ने एक गारंटी भी दी.
उन्होंने कहा, “एजेंट ने धोखाधड़ी होने की स्थिति में सुरक्षा के तौर पर HDFC बैंक का एक खाली हस्ताक्षर किया हुआ चेक दिया. मुझे लगा कि उन्होंने सुरक्षा से जुड़े मेरे सभी सवालों के जवाब दे दिए हैं. इसलिए मैंने 5,000 रुपये जमा करके खाता खोल लिया.” जल्द ही उनके खाते में शुरुआती रिटर्न आने लगा. भरोसा बढ़ाने के लिए हर हफ्ते Zoom पर बैठकें भी होती थीं, क्योंकि यह कारोबार तेजी से बढ़ रहा था.
ऐप की सुरक्षा पर भरोसा होने के बाद सीमा ने दूसरे लोगों को भी इससे जोड़ना शुरू कर दिया. उनके रेफरल कोड के जरिए 30 और लोग जुड़े. इसके बाद यह नेटवर्क बढ़कर 800 लोगों की टीम बन गया. इसमें किसान, उनके साथी शिक्षक और स्थानीय पेशेवर शामिल थे. सीमा ने खुद अपने 13 दोस्तों और परिवार के 11 करीबी सदस्यों को जोड़ा. इनमें उनकी 70 साल की मां, बहन और भाई भी शामिल थे.
धीरे-धीरे उनके डिजिटल वॉलेट में हर दिन 20,000 से 25,000 रुपये तक का रिटर्न दिखने लगा. जब उन्होंने एजेंटों से पूछा कि इतना ज्यादा मुनाफा कैसे मिल सकता है, तो प्रमोटरों ने उन्हें प्रेजेंटेशन भेजे. इनमें एस्क्रो सिस्टम और विदेशों में नियमों के पालन से जुड़ी जानकारी थी. उन्होंने भरोसा दिलाया कि एस्क्रो वॉलेट में उनका पैसा पूरी तरह सुरक्षित रहेगा.
धवल पटेल के साथ मिलकर राजस्थान के कुछ प्रमोटर भी काम कर रहे थे. सीमा ने बताया कि कंपनी ने “वडोदरा के पास फार्महाउस में बड़े-बड़े सेमिनार आयोजित किए. वहां लोगों को मुफ्त खाना, विज्ञापन और कंपनी की ओर से डेबिट कार्ड, वेंडिंग मशीन और साउंड बॉक्स देने का वादा किया जाता था.”
उन्होंने कहा, “प्रमोटरों ने कई साल तक चलने वाले एक बड़े कारोबारी सिस्टम का सपना दिखाया. उनका दावा था कि 2028 तक गारंटीड रिवॉर्ड मिलते रहेंगे और इसके बाद कंपनी के शेयरों से बड़ा मुनाफा होगा. मैंने मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में होने वाले एक बड़े कॉरपोरेट कार्यक्रम के लिए हजारों रुपये के टिकट भी खरीदे थे. वहां ब्रांड एंबेसडर की घोषणा होनी थी.”
भरोसे में आकर सीमा ने अपनी जिंदगी भर की संपत्ति इसमें लगा दी. उन्होंने अपना एक बेडरूम और किचन वाला फ्लैट 10 लाख रुपये में बेच दिया और अपनी 9 लाख रुपये की बचत भी इसमें लगा दी. उनकी मां ने 7 लाख रुपये और बहन ने 5 लाख रुपये लगाए. उनके रेफरल नेटवर्क से जुड़े लोगों ने भी लाखों रुपये जमा किए. इनमें एक स्थानीय किसान ने निवेश के लिए सोने पर बड़ा लोन तक ले लिया.
जब IMPS से पैसे निकालने की सुविधा बंद हुई, तो इस पूरे सिस्टम की सच्चाई सामने आने लगी. प्रमोटर बार-बार सर्वर अपग्रेड का बहाना बनाते और 15 अगस्त तक सभी सेवाएं फिर से शुरू करने का वादा करते रहे.
लेकिन 15 अगस्त आया और प्लेटफॉर्म पूरी तरह बंद हो गया.
सीमा की टीम में शामिल एक वकील ने Zoom बैठक के दौरान एस्क्रो वॉलेट को लेकर तकनीकी सवाल उठाए, लेकिन किसी भी एजेंट ने जवाब नहीं दिया. जब सीमा ने एक बैठक में प्रमोटरों से तीखे सवाल किए, तो एजेंट रातोंरात गायब हो गए. उनके फोन का जवाब मिलना बंद हो गया और मैसेज भी पहुंचने बंद हो गए.
अपनी सारी संपत्ति खोने के डर से परेशान सीमा आखिरकार जहर की एक बोतल लेकर खुद पुलिस स्टेशन पहुंचीं. उन्होंने कई बार साइबर पुलिस से संपर्क किया था और उन्हें पता चला था कि साइबर शिकायतों के कारण उनका अपना बैंक खाता भी फ्रीज कर दिया गया है.
उन्होंने पुलिस से कहा, “मैं कैसे गुजारा करूंगी? अपनी मां की दवाइयां कैसे खरीदूंगी? अब मैं क्या करूंगी?”
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