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Sunday, 8 November, 2026
होमफीचरअसम के 'स्नेक डॉक्टर' ने बनाई 'वेनम आर्मी', सांप के काटने से 4,200 से ज्यादा लोगों की बचाई जान

असम के ‘स्नेक डॉक्टर’ ने बनाई ‘वेनम आर्मी’, सांप के काटने से 4,200 से ज्यादा लोगों की बचाई जान

एनेस्थेसियोलॉजिस्ट डॉ. सुरजीत गिरी ने असम के एक गांव में सांप के काटने पर इलाज करने का एक अपरंपरागत तरीका ईजाद किया है. उनका डेमो मॉडल अब सांप के काटने से होने वाली मौतों को खत्म करने के लिए एक नेशनल प्रोजेक्ट का हिस्सा है.

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डेमो, असम: फोन पर आई खबर ने डॉ. सूरजीत गिरि को डरा दिया. शिवसागर के पास एक गांव में 22 साल की बरखा दत्ता को मोनोकल्ड कोबरा ने काट लिया था और उन्हें दो घंटे की दूरी पर डिब्रूगढ़ के असम मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था. लेकिन इस बार उन्हें पता था कि क्या करना है. उन्होंने परिवार से कहा कि वे बरखा को उनके पास लेकर आएं.

गिरि ने द प्रिंट को बताया, “मुझे समझ आ गया था कि बरखा डिब्रूगढ़ जिंदा नहीं पहुंच पाएगी. उस दिन वह बाल-बाल बची थी. अगर 10 मिनट और लग जाते, तो जहर उसकी नसों और मांसपेशियों के बीच के संपर्क को रोक देता और उसके सांस लेने की प्रक्रिया को ठप कर देता.” अगस्त 2023 की यह घटना इस एनेस्थीसियोलॉजिस्ट के लिए एक तरह से पुराने अनुभव की याद दिलाने वाली थी, लेकिन वैसी दूसरी घटना नहीं, जिसका उन्हें डर था.

2006 में इसी तरह के कोबरा के काटने के बाद 40 साल की एक महिला को उस निजी अस्पताल में लाया गया था, जहां गिरि की ड्यूटी थी. उस समय गिरि सिर्फ 29 साल के थे और उन्हें नहीं पता था कि महिला की जान कैसे बचाई जाए. इसलिए उन्होंने उसे डिब्रूगढ़ के असम मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया. रास्ते में ही उसकी मौत हो गई. उसी दिन उन्होंने कसम खाई कि उनकी निगरानी में अब कभी किसी की मौत सिर्फ इलाज न मिलने की वजह से नहीं होगी. आज डॉ. सूरजीत गिरि असम में ‘स्नेक डॉक्टर’ के नाम से मशहूर हैं.

उन्होंने शिवसागर से करीब 20 किलोमीटर दूर चाय के बागानों से घिरे डेमो नाम के गांव के एक ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज का अपना तरीका विकसित किया है. यहां न ICU है और न वेंटिलेटर, लेकिन 2018 से अब तक वह और उनकी टीम 4,200 से ज्यादा सांप के काटने के मरीजों का सफल इलाज कर चुके हैं. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर की समीक्षा वाली मेडिकल पत्रिकाओं में अपने शोध प्रकाशित किए हैं और राज्यभर में उनके इलाज के तरीके को अपनाया जा रहा है. पिछले साल दिसंबर में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने सांप के काटने के इलाज पर एक राष्ट्रीय पायलट परियोजना के लिए डेमो मॉडल को चुना.

डेमो मॉडल अस्पताल-सह-सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जहां डॉ. सूरजीत गिरि और उनकी टीम ने 2018 से अब तक सांप के काटने के 4,200 से ज्यादा मरीजों का इलाज किया है. | फोटो: मानस सागरा | दिप्रिंट

भारत में सांप का काटना एक ऐसी बड़ी समस्या है, जिस पर अक्सर ध्यान नहीं जाता, लेकिन इससे बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती है. अनुमान है कि 2000 से 2019 के बीच देश में सांप के काटने से 12 लाख लोगों की मौत हुई. यानी हर साल औसतन 58,000 मौतें. इनमें से ज्यादातर लोग ग्रामीण इलाकों के थे. देशभर में हुई मौतों के एक सर्वे, मिलियन डेथ स्टडी के मुताबिक, 2001 से 2014 के बीच उत्तर प्रदेश (1,53,600), बिहार (1,01,900) और आंध्र प्रदेश (82,900) में सबसे ज्यादा मौतें हुईं. इस दौरान असम में अनुमानित 7,300 लोगों की मौत हुई.

2024 में केंद्र सरकार ने सांप के काटने और उसके जहर से होने वाले नुकसान को रोकने और नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPSE) शुरू की. इसका लक्ष्य 2030 तक सांप के काटने से होने वाली मौतों को आधा करना है. ICMR ने भी 13.5 करोड़ रुपये की जीरो स्नेकबाइट डेथ पहल शुरू की है. यह चार साल की परियोजना है, जिसमें देशभर के चार ऐसे मॉडल का अध्ययन किया जा रहा है, जिनके सफल होने के सबूत मिले हैं. इसका लक्ष्य सांप के काटने से होने वाली मौतों को शून्य करना है. इनमें महाराष्ट्र में किसानों को सांप से बचाने वाले रबर के लंबे जूते, हिमाचल प्रदेश में एंबुलेंस के भीतर ही एंटीवेनम देने की व्यवस्था और केरल में मरीजों के मामलों पर नजर रखने और इलाज में तालमेल बनाने वाला डिजिटल सिस्टम शामिल हैं. डेमो चौथा मॉडल है.

असम के डिगबोई में किंग कोबरा. यह पूर्वोत्तर भारत में पाई जाने वाली करीब 18 जहरीली सांपों की प्रजातियों में से एक है. | विशेष व्यवस्था

देशभर में इस दिशा में हो रहे प्रयासों के बीच गिरि के मॉडल ने भी असर दिखाया है. उनका तरीका तीन बातों पर आधारित है: तेजी से इलाज, सांप की प्रजाति के हिसाब से इलाज और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक टीम.

गंभीर हालत में मरीजों के अस्पताल पहुंचने का इंतजार करने के बजाय गिरि ने चाय बागानों के मजदूरों, शिक्षकों और जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की एक ‘वेनम आर्मी’ तैयार की है. आसपास के किसी चाय बागान में अगर किसी को सांप काट लेता है, तो ये लोग उसे सही शुरुआती इलाज देते हैं और जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था करते हैं. गिरि के मुताबिक, जमीनी स्तर पर इस व्यवस्था की वजह से सांप के काटने और अस्पताल में भर्ती होने के बीच का औसत समय 2018 में पांच घंटे से घटकर अब सिर्फ 25 मिनट रह गया है.

गिरि ने कहा, “सांप के काटने के मामलों में जहर से ज्यादा इलाज में होने वाली देरी मरीज की जान लेती है. अब तक 4,200 मरीजों में से सिर्फ एक की मौत हुई है. यह 2020 में हुआ था, जब मरीज बहुत देर से अस्पताल पहुंचा था.”

2018 में गिरि ने डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सांप के काटने वाले मरीजों के लिए दो बेड वाला एक अलग कमरा बनाया. इसमें एंटीवेनम और आपातकालीन इलाज के उपकरण रखे गए. उनका दावा है कि ग्रामीण अस्पताल में इस तरह का यह पहला कमरा था. यह विचार दिल्ली तक भी पहुंचा है. गिरि के मुताबिक, NAPSE ने डेमो मॉडल से प्रेरणा ली है.

गिरि ने कहा, “NAPSE ने हमारा विचार अपनाया है और सभी राज्यों को सांप के काटने वाले मरीजों के लिए अलग कमरा बनाने की सलाह दी है.”

एनेस्थीसियोलॉजिस्ट डॉ. सूरजीत गिरि का लक्ष्य 2030 तक असम में सांप के काटने से होने वाली मौतों की संख्या शून्य करना है. | फोटो: मानस सागरा | दिप्रिंट

ICMR भी अब डेमो मॉडल का अध्ययन कर रहा है, ताकि यह समझा जा सके कि समुदाय की भागीदारी पर आधारित इस तरीके को दूसरी जगहों पर कैसे अपनाया जा सकता है.

असम में ICMR की स्नेकबाइट अवेयरनेस, रिस्पॉन्स, प्रिवेंशन एंड एक्शन (SARPA) परियोजना की प्रोजेक्ट साइंटिस्ट डॉ. रफीका यास्मीन ने कहा, “डेमो मॉडल को उन प्रमुख सफल मॉडलों में से एक के रूप में चुना गया है, जिनका वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया जाएगा. इसके बाद इसे पूरे भारत में लागू करने की संभावना देखी जाएगी. इसमें समुदाय के स्वयंसेवक सबसे पहले मदद पहुंचाते हैं. इसके अलावा, वेनम रिस्पॉन्स टीम और फास्ट रिस्पॉन्स टीम है. मरीजों को एक घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचाने की व्यवस्था भी है. यह लोगों को झाड़-फूंक करने वालों के पास जाने के खतरों के बारे में जागरूक करने पर भी जोर देता है. अब हम इस मॉडल को दूसरे तीन राज्यों के मॉडलों के साथ जोड़ रहे हैं.”

‘जाओ और अपने सांपों के साथ सो जाओ’

सांप शनिवार और रविवार को भी काटते हैं. इसलिए हाल ही में एक वीकेंड पर गिरि डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में काम में व्यस्त थे. वह लकवा चाय बागान इलाके के 10 साल के विक्की करमाकर का इलाज कर रहे थे. पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाले विक्की को रेड-नेक्ड कीलबैक सांप ने काट लिया था और वह पांच दिन से अस्पताल में भर्ती था.

बच्चे ने बताया, “शाम को मैं अपनी नानी के घर से लौट रहा था, तभी मेरे पैर के अंगूठे में कुछ चुभा. मैंने नीचे देखा तो एक सांप झाड़ियों की तरफ जा रहा था.”

डॉ. सूरजीत गिरि दिखाते हैं कि रेड-नेक्ड कीलबैक सांप कैसे काटता है. इस सांप के ज्यादातर काटने के मामलों में शरीर में जहर नहीं जाता. | फोटो: मानस सागरा | दिप्रिंट

गिरि ने बताया कि क्लिनिक में रेड-नेक्ड कीलबैक के काटने के करीब 100 मरीजों का इलाज किया गया है. इनमें से सिर्फ दो के शरीर में वास्तव में जहर गया था. विक्की भी उनमें से एक था.

गिरि ने कहा, “ज्यादातर मामलों में ये सांप जहर नहीं डाल पाते, क्योंकि इनके दांत सिर के पिछले हिस्से में होते हैं. दुर्भाग्य से इस बच्चे के शरीर में जहर चला गया है. उसके शरीर में बहुत ज्यादा सूजन है और खून का थक्का भी नहीं जम रहा है.” उन्होंने बताया कि बच्चे की हालत में सुधार हो रहा है और उसे दो दिन में अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी.

सांप के काटने वाले मरीजों के लिए बनाया गया वार्ड देखने में काफी खुशनुमा लगता है. इसकी दीवारें चमकीले पीले रंग की हैं, गुलाबी पर्दे लगे हैं और इसमें सिर्फ दो बेड हैं. हालांकि, यहां लगे कुछ रंगीन पोस्टरों में डराने वाली तस्वीरें भी हैं. इनमें मोनोकल्ड कोबरा, ब्लैक क्रेट और रेड-नेक्ड कीलबैक समेत कई सांपों की तस्वीरें हैं. दूसरे पोस्टरों में बताया गया है कि सांप के काटने के बाद क्या करना चाहिए. यहां उन मरीजों की तस्वीरें भी लगी हैं, जो सांप के काटने के बाद ठीक हुए हैं. आपातकालीन इलाज के लिए एंटीवेनम, दवाइयां और मरीजों को सांस लेने में मदद देने वाले एंबू बैग भी रखे गए हैं.

डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के सांप काटने वाले मरीजों के वार्ड में लगे एक पोस्टर में असम में पाए जाने वाले अलग-अलग जहरीले सांपों की तस्वीरें हैं. | फोटो: मानस सागरा | दिप्रिंट

जब नए मरीजों की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो जो मरीज ठीक हो रहे होते हैं, उन्हें 50 बेड वाले अस्पताल के दूसरे कमरों में रखा जाता है.

गिरि की ड्यूटी आधिकारिक तौर पर सुबह 9.30 बजे शुरू होती है और शाम 5 बजे खत्म होती है. लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता. उनका फोन नंबर सार्वजनिक है और असमभर से मरीज, परेशान परिवार और डॉक्टर किसी भी समय उन्हें फोन करते हैं. उनके अनुमान के मुताबिक, इस तरह सलाह देकर वह अब तक 32,000 से ज्यादा मरीजों की अप्रत्यक्ष रूप से मदद कर चुके हैं.

सांप के काटने से जुड़े आपातकालीन मामलों में हर समय उपलब्ध रहने की वजह से कभी-कभी घर पर भी तनाव हो जाता है.

गिरि हंसते हुए बताते हैं, “शुरुआत में मेरी पत्नी मुझसे कहती थीं, ‘जाओ और अपने सांपों के साथ सो जाओ.’ लेकिन जल्द ही वह मेरे काम की प्रकृति समझ गईं और इसके हिसाब से खुद को ढाल लिया. इतने सालों में मैं मुश्किल से ही कभी छुट्टी पर जा पाया. एक बार हम सिंगापुर गए थे, वहां भी मुझे फोन पर लगे रहना पड़ा. अब मैं सर्दियों में छुट्टी लेने की कोशिश करता हूं, क्योंकि उस समय सांप काटने के मामले कम होते हैं.”

उनकी शादी को 24 साल हो चुके हैं. उनके दो बच्चे हैं. बेटी शिलॉन्ग के नॉर्थ ईस्टर्न इंदिरा गांधी रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड मेडिकल साइंसेज (NEIGRIMS) में BSc नर्सिंग की पढ़ाई कर रही है. बेटा मणिपाल यूनिवर्सिटी के जयपुर कैंपस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है.

उनकी पत्नी दीपा कहती हैं कि अब उनके पति के काम को लेकर गर्व की भावना उनकी नाराजगी पर भारी पड़ती है.

उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि उनके साथ कोई योजना बनाना आसान नहीं है. कई बार हम कहीं घूमने जा रहे होते हैं या किसी के यहां न्योते पर जा रहे होते हैं, तभी अस्पताल से उनका फोन आ जाता है और हमें अपना कार्यक्रम रद्द करना पड़ता है. लेकिन जब मैं उनके काम का नतीजा देखती हूं, जब मौत से जूझ रहे मरीज के परेशान परिवार के चेहरों पर वह फिर से मुस्कान लाते हैं, तो मुझे उनकी पत्नी होने पर गर्व होता है.”

दूसरे डॉक्टरों को साथ जोड़ना

जब गिरि मरीजों का इलाज नहीं कर रहे होते, तब वह सांपों पर लिखते हैं, दूसरे डॉक्टरों को प्रशिक्षण देते हैं या सांप के काटने के इलाज से जुड़ी सरकारी नीतियां बनाने में मदद करते हैं. उन्होंने असमिया में दो किताबें लिखी हैं. इनके नाम हैं ‘साप आरु आमी’ (सांप और हम) और ‘वेनम आर्मी’. वह सांप के काटने और उसके जहर से होने वाले नुकसान पर बनी राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समिति और असम सरकार की सांप के काटने के इलाज से जुड़े नियम बनाने वाली विशेषज्ञ समिति के सदस्य भी हैं.

असम के डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सांप के काटने के इलाज से जुड़ी एक पुस्तिका और मेडिकल सामान. | फोटो: मानस सागरा | दिप्रिंट

डेमो के बाहर उनके सबसे बड़े योगदानों में से एक दूसरे डॉक्टरों को सांप के काटने के मरीजों का इलाज करने की ट्रेनिंग देना है.

उन्होंने कहा, “मरीजों के देर से अस्पताल पहुंचने के अलावा, कई बार डॉक्टर या नर्स लक्षणों को ठीक से पहचान नहीं पाते. इससे भी इलाज में देरी होती है. अब तक हमने राज्य में 5,000 डॉक्टरों को इस बारे में प्रशिक्षण दिया है. अब असम का हर ग्रामीण अस्पताल सांप के काटने के मरीजों के इलाज में हिस्सा ले रहा है.”

गिरि से प्रेरणा लेने वाले डॉक्टरों में डॉ. केशव ज्योति हजारिका भी हैं. वह 2021 से लखीमपुर जिले के 30 बेड वाले बिहपुरिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनात हैं. गिरि से प्रशिक्षण लेने के बाद उनके अस्पताल ने 2024 में सांप के काटने वाले मरीजों का इलाज शुरू किया.

उन्होंने कहा, “2023-24 में डॉ. गिरि ने सांप के काटने के मामलों को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए पूरे असम का दौरा किया था. उसी दौरान मैं उनसे मिला और इस बारे में प्रशिक्षण लेने का फैसला किया. अब हमारे अस्पताल के सभी सात डॉक्टर सांप के काटने के मामलों का इलाज करने के लिए प्रशिक्षित हैं. हमारे यहां हर साल करीब 150 मामले आते हैं और पिछले तीन साल में सिर्फ एक मरीज की मौत हुई है.”

सरकारी अस्पताल का फायदा

अगस्त 2023 में बेदांता बोराह शाम को फुटबॉल खेलकर घर लौटे ही थे कि उनकी गर्लफ्रेंड की मां का घबराया हुआ फोन आया. वह तुरंत शिवसागर शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर देहिगांव में उनके घर पहुंचे. उनकी 22 साल की गर्लफ्रेंड बरखा दत्ता BA की छात्रा थीं और उन्हें मोनोकल्ड कोबरा ने काट लिया था. सांप ने उनके पैर के अंगूठे पर काटा था. वहां से खून बह रहा था और अंगूठा काला पड़ चुका था.

बोराह ने बताया, “उन्हें उल्टियां होने लगी थीं और वह मुश्किल से सांस ले पा रही थीं.” परिवार के एक सदस्य ने कार का इंतजाम किया और वे करीब 15 किलोमीटर दूर सबसे नजदीकी सरकारी अस्पताल पहुंचे.

बोराह ने कहा, “वहां ड्यूटी पर एक आंखों के डॉक्टर थे, जिन्होंने उनका इलाज करने से मना कर दिया. उन्हें यकीन नहीं था कि किसी जहरीले सांप ने काटा है या नहीं. इसलिए उन्होंने एंटीवेनम भी नहीं दिया. तीन घंटे से ज्यादा समय तक उन्हें उसी हालत में रखने के बाद डिब्रूगढ़ के असम मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया.”

असम के डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर डॉ. सूरजीत गिरि. सांप के काटने के इलाज का उनका मॉडल तेजी, खास इलाज और समुदाय की ‘वेनम आर्मी’ पर आधारित है. | विशेष व्यवस्था

किस्मत से किसी ने गिरि से संपर्क कर लिया.

उन्होंने कहा, “जब फोन आया, तब मैं शिवसागर में अपने घर पर था. लड़की के परिवार ने बताया कि उसे डिब्रूगढ़ रेफर किया गया है. यह सुनकर मुझे लगा कि 2006 की घटना फिर से दोहराने वाली है.”

समय बचाने के लिए गिरि ने परिवार से कहा कि वे बरखा को डिब्रूगढ़ ले जाने के बजाय प्रगति अस्पताल ले आएं. वह कई साल पहले इसी अस्पताल में काम कर चुके थे. रात करीब 11 बजे बरखा के पहुंचते ही उन्होंने उन्हें एंटीवेनम की 20 शीशियां दीं. इसके बाद आगे के इलाज के लिए उन्हें डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेज दिया.

बोराह आज भी इस बात से उबर नहीं पाए हैं कि उनकी गर्लफ्रेंड की जान कितनी मुश्किल से बची.

उन्होंने कहा, “सूरजीत गिरि हमारी जिंदगी में फरिश्ता बनकर आए.”

गिरि कभी-कभी आपातकालीन मामलों के लिए प्रगति अस्पताल का इस्तेमाल करते हैं, खासकर तब जब उन्हें लगता है कि मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है. लेकिन ज्यादातर काम के लिए उनका मानना है कि सरकारी अस्पताल ज्यादा बेहतर हैं. ग्रामीण मरीज वहां इलाज का खर्च उठा सकते हैं और डॉक्टर कई दिनों तक उन्हें निगरानी में रख सकते हैं. इस दौरान शोध भी किया जा सकता है और इलाज के बढ़ते बिलों की चिंता भी नहीं रहती.

उन्होंने कहा, “निजी अस्पताल में मैं सांप के काटने वाले मरीजों के लक्षणों का अध्ययन नहीं कर पाता था, क्योंकि इसके लिए मरीज को कई दिनों तक निगरानी में रखना जरूरी होता है. गांवों के गरीब लोग इसका खर्च नहीं उठा सकते. 2008 से मैंने डेमो में काम करना शुरू किया. हालांकि, वहां सांप के काटने वाले मरीजों के लिए अलग यूनिट शुरू करने में एक दशक और लग गया. यहां हम अलग-अलग सांपों के जहर के असर का अध्ययन कर सकते हैं और उसी के हिसाब से मरीजों का इलाज कर सकते हैं.”

निजी अस्पतालों में एंटीवेनम की कीमत और उसकी उपलब्धता भी एक समस्या है.

उन्होंने कहा, “एंटीवेनम की एक शीशी की कीमत टैक्स के बिना 800 रुपये है. किसी मरीज को इसकी 20 शीशियों की जरूरत पड़ सकती है, जिससे इलाज बहुत महंगा हो जाता है. निजी अस्पतालों में एंटीवेनम का ज्यादा स्टॉक भी नहीं रखा जाता, क्योंकि वहां सांप के काटने के मरीज नियमित रूप से नहीं आते.”

असम में काला रैट स्नेक को ‘कोला मोसुवा’ कहा जाता है. यह जहरीला नहीं होता. जून में फेसबुक पर एक पोस्ट में डॉ. सूरजीत गिरि ने अपने बगीचे में दिखे इस सांप की तस्वीर साझा की थी और लोगों से इन चूहों को खाने वाले बेजुबान सांपों को मारना बंद करने की अपील की थी. | विशेष व्यवस्था

हर सांप के लिए अलग इलाज

गिरि के इलाज की सफलता की एक बड़ी वजह उनके बनाए अलग-अलग इलाज के तरीके हैं. देश में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाला एंटीवेनम ‘बिग फोर’ सांपों के जहर से तैयार किया जाता है. इनमें चश्मे वाला कोबरा, कॉमन क्रेट, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर शामिल हैं. लेकिन असम में सबसे ज्यादा काटने वाले सांप मोनोकल्ड कोबरा, बैंडेड क्रेट और ग्रीन पिट वाइपर हैं.

गिरि का तरीका इस बात को ध्यान में रखता है कि अलग-अलग सांपों का जहर शरीर में अलग तरह की समस्याएं पैदा करता है और उनके लिए अलग इलाज की जरूरत होती है. उन्होंने असम के सांपों और उनके काटने के असर का अध्ययन करने में कई साल लगाए हैं.

उन्होंने कहा, “ऊपरी असम के जिलों में कोबरा का काटना सबसे आम मामलों में से एक है. कोबरा का जहर धीरे-धीरे मांसपेशियों को कमजोर कर सकता है, निगलने में परेशानी पैदा कर सकता है और सांस लेने की प्रक्रिया को ठप कर सकता है. कोबरा, जिसमें इंडियन मोनोकल्ड कोबरा भी शामिल है, के काटने पर हम बाजार में उपलब्ध एंटीवेनम के साथ नियोस्टिग्माइन और ग्लाइकोपाइरोलेट दवाएं देते हैं. इन दवाओं का इस्तेमाल नसों और मांसपेशियों पर पड़ने वाले कुछ असर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है.”

क्रेट सांप और भी ज्यादा खतरनाक हो सकते हैं. इनके काटने पर दर्द या सूजन नहीं होती, लेकिन इनका जहर धीरे-धीरे सांस लेने में मदद करने वाली मांसपेशियों को लकवाग्रस्त कर देता है. इनका इलाज भी बाजार में उपलब्ध एंटीवेनम के साथ नियोस्टिग्माइन और ग्लाइकोपाइरोलेट देकर किया जाता है. लेकिन कई बार इतना इलाज काफी नहीं होता.

गिरि ने कहा, “क्रेट के काटने के चार मामलों में हमें मरीजों को शिवसागर रेफर करना पड़ा, क्योंकि उन्हें वेंटिलेटर की जरूरत थी और हम यहां यह सुविधा नहीं दे सकते.”

डॉ. सूरजीत गिरि डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों का रजिस्टर देखते हुए. यहां सांप के काटने के अलावा कीड़े-मकोड़ों के काटने और डंक मारने के मामलों का भी इलाज होता है. | फोटो: मानस सागरा | दिप्रिंट

पिट वाइपर सांपों के मामले अलग हैं. राज्य में जहरीले सांपों के काटने के करीब 66 फीसदी मामले इन्हीं के होते हैं. शोध से पता चला है कि ‘बिग फोर’ के जहर से तैयार एंटीवेनम इन सांपों के जहर पर ज्यादा असरदार नहीं है. इसलिए गिरि पिट वाइपर के काटने पर एंटीवेनम का इस्तेमाल नहीं करते.

उन्होंने कहा, “पिट वाइपर के काटने के इलाज के लिए हमने मैग्नीशियम सल्फेट और ग्लिसरीन की पट्टियों वाला एक अलग तरीका तैयार किया है. ऐसे मामलों में हम एंटीवेनम नहीं देते. अब तक हमने इस तरीके से पिट वाइपर के काटने के 411 मरीजों का इलाज किया है. इनमें से किसी की भी मौत नहीं हुई.”

पिछले कई सालों में गिरि ने सांप के काटने के इलाज पर अपना शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित किया है. 2023 में उन्होंने टॉक्सिकॉन नाम की पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में दूसरे लेखकों के साथ काम किया था. यह पत्रिका इंटरनेशनल सोसाइटी ऑन टॉक्सिनोलॉजी की है. इस शोध में अप्रैल 2018 से अगस्त 2022 के बीच डेमो में इलाज किए गए सांप के काटने के 1,011 मामलों का अध्ययन किया गया था. इसमें पिट वाइपर के इलाज का तरीका भी शामिल था.

शोधपत्र में कहा गया, “डेमो मॉडल अस्पताल में अपनाए गए बचाव के उपायों और सुविधाओं से सांप के काटने से होने वाली मौतों और बीमारी के गंभीर असर को काफी कम किया जा सकता है. इसलिए इन्हें भारत के अलग-अलग राज्यों में एक मॉडल के तौर पर अपनाया जा सकता है.”

टॉक्सिकॉन में 2025 में प्रकाशित एक अन्य शोध में 2024 के दौरान डेमो में सांप के काटने के 863 मरीजों के इलाज का ब्यौरा दिया गया. इनमें जहर वाले सांपों के काटने के 146 मामले थे और किसी भी मरीज की मौत नहीं हुई. गिरि 2026 में अमेरिकन जर्नल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन एंड हाइजीन में प्रकाशित काले क्रेट के काटने से होने वाले न्यूरोटॉक्सिक असर पर एक शोधपत्र के लेखकों में भी शामिल थे.

सांप के काटने के अलावा डेमो अस्पताल में कीड़े-मकोड़ों के काटने और डंक मारने के मामलों का भी इलाज होता है. इनमें कुछ ऐसे मामले भी रहे हैं, जिनसे डॉक्टर हैरान रह गए. 2018 से अब तक 100 से ज्यादा मरीज ऐसे जलीय जीवों के काटने के बाद अस्पताल पहुंचे हैं, जिनकी पहचान नहीं हो पाई. कुछ मरीजों के घाव बहुत गंभीर थे और उनके शरीर के ऊतकों को नुकसान पहुंचा था. अक्टूबर 2025 में एक मरीज की मौत भी हो गई. शक है कि इनमें बड़े आकार के वॉटर बग और वॉटर स्कॉर्पियन शामिल हो सकते हैं, जिनके जहर के बारे में अभी बहुत कम जानकारी है.

इस साल शिवसागर में आई भीषण बाढ़ ने एक नई चुनौती खड़ी कर दी. सिर्फ जुलाई में डेमो में कीड़े-मकोड़ों से जुड़े 163 मामले सामने आए. इनमें मधुमक्खियों के डंक मारने के 33, मकड़ियों के काटने के 21 और अज्ञात कीड़ों के काटने के 78 मामले शामिल थे.

गिरि ने कहा, “इनमें से कुछ कीड़े बेहद खतरनाक होते हैं और उनके काटने से जान भी जा सकती है. भारत के कुछ हिस्सों में मधुमक्खियों के डंक से लोगों की मौत हुई है. मकड़ियों के काटने से शरीर के ऊतकों को बहुत नुकसान हो सकता है, जिससे गैंगरीन हो सकता है और शरीर का कोई अंग काटना पड़ सकता है.”

सांप के काटने पर तुरंत मदद पहुंचाने वाली टीमें

असम के चाय बागानों में घने और हरे पत्तों के नीचे कई तरह के सांप छिपे रहते हैं. खासकर गर्मी और बारिश के मौसम में चाय की पत्तियां तोड़ने वाले मजदूरों के लिए सांप का काटना काम से जुड़ा एक बड़ा खतरा है.

इसके सही आंकड़े जुटाना मुश्किल है, क्योंकि सांप के काटने के कई मामले दर्ज ही नहीं होते. लेकिन गिरि के सह-लेखन वाले एक अध्ययन के मुताबिक, 2024 में असम में करीब 11,000 लोगों को सांप ने काटा. इनमें से 863 मरीजों का इलाज डेमो अस्पताल में हुआ. ज्यादातर मरीज शिवसागर, डिब्रूगढ़, चराइदेव, जोरहाट और तिनसुकिया जैसे चाय उत्पादक जिलों से थे. इनमें आधे से ज्यादा सिर्फ शिवसागर के थे.

डेमो से करीब 5-6 किलोमीटर दूर अथाबारी टी गार्डन अस्पताल में काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मी दुलश्वर गोआला, गिरि के वेनम आर्मी व्हाट्सऐप ग्रुप के 450 से ज्यादा सदस्यों में से एक हैं.

उन्होंने कहा, “डेमो में करीब 15 चाय बागान हैं और पत्तियां तोड़ने के मौसम में सांप के काटने के कई मामले सामने आते हैं. हमारे अस्पताल में एंटीवेनम नहीं है, इसलिए हम सिर्फ शुरुआती इलाज करते हैं और अगर सांप जहरीला हो तो मरीज को डेमो भेज देते हैं. व्हाट्सऐप ग्रुप से मदद मिलती है, क्योंकि हम घाव की तस्वीर ग्रुप में डाल सकते हैं. इससे पता लगाने में मदद मिलती है कि किस सांप ने काटा है.”

डॉ. सूरजीत गिरि अपनी वेनम आर्मी के सदस्यों के साथ. | विशेष व्यवस्था

गिरि का डेमो मॉडल समुदाय के लोगों और मेडिकल पेशेवरों के आपस में जुड़े नेटवर्क पर आधारित है.

वेनम आर्मी में चाय बागानों के मजदूर, शिक्षक, पत्रकार, सांपों को पकड़ने वाले लोग और दूसरे स्वयंसेवक शामिल हैं. ये लोग डॉक्टरों को सूचना देते हैं और सांप के काटने वाले मरीजों को जल्द अस्पताल पहुंचाने में मदद करते हैं. एक दूसरा व्हाट्सऐप ग्रुप मुख्य रूप से मेडिकल पेशेवरों का है. इसके जरिए डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी एक-दूसरे से सलाह लेते हैं और इलाज में तालमेल बनाते हैं.

तीसरी टीम डेमो की फास्ट रिस्पॉन्स टीम है. इसमें नर्स और दूसरे स्वास्थ्यकर्मी शामिल हैं. इन्हें लक्षण पहचानने और डॉक्टर के उपलब्ध न होने पर भी इलाज शुरू करने की ट्रेनिंग दी गई है.

यह नेटवर्क लगातार बढ़ रहा है. इस साल सितंबर में गिरि और ICMR की मदद से चलने वाली SARPA टीम ने डेमो की ग्राम पंचायतों के 57 और स्वयंसेवकों को प्रशिक्षण दिया. इन सत्रों में सांप के काटने के खतरे के संकेत, शुरुआती इलाज, सांप के काटने से जुड़े भ्रम और मरीज को जल्द अस्पताल पहुंचाने की अहमियत के बारे में बताया गया.

लेकिन डेमो में अब भी एक जरूरी सुविधा नहीं है. यहां ICU और वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है. गिरि का कहना है कि जल्द ही यह कमी दूर हो सकती है, क्योंकि करीब 4-5 किलोमीटर दूर एक मेडिकल कॉलेज बनाया जा रहा है.

उन्होंने कहा, “मेडिकल कॉलेज बनने के बाद डेमो सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को उसमें मिला दिया जाएगा. तब हम सांप के काटने वाले मरीजों को बेहतर इलाज दे सकेंगे, क्योंकि वहां ICU और वेंटिलेटर की सुविधा होगी. यह काम 2030 से पहले हो जाना चाहिए.”

अब तक हुई प्रगति से कुछ उम्मीद जगी है. गिरि ने बताया कि असम में 2024 में सांप के काटने से 36 लोगों की मौत हुई थी. 2025 में यह संख्या 27 रही और इस साल अब तक 23 लोगों की मौत हुई है.

उन्होंने कहा, “मेरा लक्ष्य 2030 में सांप के काटने से होने वाली मौतों की संख्या शून्य करना है.”

गिरि के मुताबिक, लोगों की सोच में आए बदलाव से उनके काम का असर पहले ही दिखने लगा है.

उन्होंने कहा, “झाड़-फूंक करने वालों पर लोगों का भरोसा लगभग खत्म हो गया है. हमने लोगों को यह भी समझाया है कि अगर सांप काट ले, तो मरीज को जल्द से जल्द अस्पताल लाना चाहिए. अगर वे कार का इंतजाम नहीं कर पाते, तो ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब मरीज को साइकिल पर अस्पताल लाया गया.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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