scorecardresearch
Sunday, 8 November, 2026
होमThe FinePrintथिएटर कमांड पर सेना की अंतहीन बहस खत्म करे सरकार, अब राजनीतिक फैसले का वक्त

थिएटर कमांड पर सेना की अंतहीन बहस खत्म करे सरकार, अब राजनीतिक फैसले का वक्त

थिएटर कमांड का मतलब सर्विस टर्फ को फिर से बांटना नहीं है. ये इस बारे में हैं कि भारत भविष्य में होने वाले युद्ध कैसे लड़ेगा, जो ज़्यादातर जॉइंट, मल्टी-डोमेन और टेक्नोलॉजी-इंटेंसिव होंगे.

Text Size:

खतरा यह है कि एकीकृत थिएटर कमांडों का गठन अंतहीन चर्चाओं में फंसा हुआ सुधार का मामला न बनकर रह जाए. सात साल पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) का पद बनाया गया था और उसे थिएटर कमांडों के गठन का अधिकार दिया गया था. लेकिन इस पद पर नियुक्तियों के सात साल बाद भी थिएटर कमांडों के ढांचे पर तीनों सेनाओं का विचार-विमर्श जारी है. 

पूर्व सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने मई में सैन्य विचार-विमर्श पूरा करके तीन थिएटर कमांडों— पश्चिमी, उत्तरी और समुद्री—के गठन का प्रस्ताव तीनों सेना अध्यक्षों के अनुमोदन के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को भेजा था. लेकिन भारतीय वायुसेना (IAF) की बुनियादी आपत्तियां कायम हैं. 

PTI को 25 अक्तूबर को दिए इंटरव्यू में वायुसेना अध्यक्ष, एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने फिर से कहा कि “थिएटरीकरण को हम युद्ध के साधनों का भौगोलिक आधार पर स्थायी रूप से विभाजन के रूप में नहीं देखते. IAF एकीकरण और संयुक्तिकरण के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है.” 

उन्होंने वायु सेना की लचीलेपन और ऑपरेशन से सिंदूर से मिले सबक का जिक्र करते हुए “जहां जरूरी हो वहां केंद्रीय कंट्रोल और जहां उपयुक्त हो वहां विकेंद्रित नियंत्रण” की वकालत की. वे अपनी ओर से कोई नई बात नहीं कह रहे हैं. IAF निरंतर जायज बात कहता रहा है कि उसके पास युद्ध के जो संसाधन हैं उन्हें अलग-अलग भौगोलिक थिएटरों से स्थायी तौर पर संबद्ध न करके कई मोर्चों पर तैनात करने के लिए उपलब्ध किया जाना चाहिए.      

IAF की चिंताएं जायज हैं जिन्हें लचीले, एकीकृत कमांड ढांचे के जरिए दूर किया जाना चाहिए. लेकिन वे राष्ट्रीय सेना में परिवर्तन पर वीटो न बनें. सात वर्षों के विचार-विमर्श के बाद यह सरकार के लिए अपनी इच्छा लागू करने, मतभेदों को दूर करने, एक व्यावहारिक फ्रेमवर्क को मंजूर करने, और व्यावहारिक समयसीमा के तहत योजना को लागू करने की शुरुआत करने का समय है. 

IAF का मामला  

IAF का सबसे मजबूत तर्क वायुसेना की विशिष्ट शक्ति पर आधारित है. थलसेना की संरचनाओं और धीमी रफ्तार वाले नौसैनिक पोतों के विपरीत विमान उस भौगोलिक क्षेत्र में सिमटे नहीं रहते जहां उन्हें तैनात किया जाता है. उनकी गति, पहुंच, उड़ान भरते हुए ईंधन लेने की क्षमता, और लंबी दूरी तक मार करने वाले उनके हथियार उन्हें सभी थिएटरों में तैनात करने की सुविधा देते हैं. पूर्व चेतावनी देने वाले विमान, उड़ान के दौरान ईंधन देने वाले विमान, सामरिक महत्व वाले ट्रांसपोर्ट विमान और विशेष इलेक्ट्रोनिक युद्ध के प्लेटफॉर्म सरीखे फोर्स मल्टीप्लायरों की सीमित उपलब्धता के कारण उन्हें स्थायी तौर पर तैनात करना मुश्किल है. 

मुश्किलें IAF की युद्ध क्षमता में कमी के कारण और गहरी हुई हैं. उसके लिए लड़ाकू विमानों के 42.5 स्क्वाड्रन मंजूर किए गए हैं लेकिन उसके पास केवल 29 स्क्वाड्रन हैं. इस अपर्याप्त संख्या को तीन थिएटर कमांडों में स्थायी तौर पर बांट देने से क्षमता से कम फोर्स पैकेजों का गठन होगा. अगर दो मोर्चों पर लड़ने की नौबत आई तो निर्णायक मौके पर वायुसेना की ताकत कम पड़ जाएगी. 

चिंता का सैद्धांतिक पहलू भी है. IAF ने केंद्रित कंट्रोल और विकेंद्रित कार्रवाई का जो सिद्धांत बनाया है उसका मकसद यह है कि हवाई ताकत का इस्तेमाल एकीकृत संसाधन के रूप में हो, न कि जमीनी सेनाओं को टुकड़ों में सहारा देने के रूप में. रणनीतिक हवाई अभियानों, जवाबी हवाई ऑपरेशनों और रणनीतिक पाबंदियों के मामलों में वायुसेना की स्वतंत्र भूमिका होती है और यह सभी थिएटरों के लिए हो सकती है. इसे केवल थलसेना और नौसेना को सहारा देने वाले जवाबी जमीनी फोर्स ऑपरेशन, हवाई-जमीनी ऑपरेशन और समुद्री हवाई ऑपरेशन में नहीं बदला जा सकता. 

ये जायज़ पेशेवर तर्क हैं. मैंने 2021 में अपने एक लेख में IAF का बचाव करते हुए लिखा था कि वायुसेना को सेना की केवल सहायक शाखा मानना गलत होगा. थिएटरीकरण में इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि वायुसेना की सभी थिएटरों में स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका है. 

वैसे, यह तर्क पेशेगत कसौटी पर खरा नहीं उतरता कि थिएटरीकरण में वायुसेना के साधनों का स्थायी भौगोलिक बंटवारा जरूरी है. आवंटन और स्थायी विभाजन में अंतर है. विमान अपने मौजूदा अड्डों पर IAF के प्रशासनिक और तकनीकी नियंत्रण में रह सकते हैं और उन्हें ऑपरेशन के लिए थिएटर कमांडों के लिए तैनात किया जा सकता है. उनके आवंटन की समीक्षा की जा सकती है और ऑपरेशन की बदलती स्थिति के अनुसार उसमें बदलाव किया जा सकता है. यह सिद्धांत दूसरे सभी संसाधनों के लिए लागू किया जा सकता है, समय और स्थान की मांग के लिहाज से. 

संसाधनों का भौगोलिक थिएटर कमांडों के लिए स्थायी आवंटन का विचार अनुभव आधारित बुद्धि और पेशेगत समझ से परे है. सेना की क्षमता के केंद्रीकरण और अधिकतम उपयोग के मूल सिद्धांत का उल्लंघन कैसे किया जा सकता है? रणनीतिक तथा ऑपरेशन संबंधी सूचनाएं जबकि तुरंत उपलब्ध हो जाती हैं, तब सभी थिएटर कमांडों के लिए अहम संसाधनों के अधिकतम उपयोग की व्यवस्था करने वाली लचीली ‘कमांड-ऐंड कंट्रोल सिस्टम’ क्यों नहीं तैयार की जा सकती? बाधा केवल समय और स्थान के रूप में आ सकती है, जो संसाधनों के स्थानांतरण की गति और लचीलेपन से तय हो सकती है. IAF इस मामले में कमजोर नहीं है.   

पक्का समाधान 

एकीकरण की किसी भी सिस्टम में, अहम संसाधनों का भौगोलिक या कमांड के स्तर पर कोई स्थायी विभाजन नहीं होता. कोई-न-कोई राजनीतिक सत्ता और शीर्ष सैन्य मुख्यालय होता है जो मिशन तय करते हैं और संसाधनों का आवंटन या पुनरावंटन करते हैं. 

अमेरिका में, एक चेयरमैन (जो कि समान दर्जे वालों में प्रथम माना जाता है) के अधीन ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ स्टाफ संसाधनों का आवंटन करता है और राष्ट्रपति द्वारा मंजूर ‘यूनिफ़ायड कमांड प्लान’ के रूप में थिएटरों के बीच तालमेल स्थापित करता है. ज्वाइंट चीफ़्स ऑफ स्टाफ किसी ऑपरेशन में कोई भूमिका नहीं निभाता और एकीकृत थिएटर कमांड (ITC) पर नियंत्रण नहीं करता. यह नियंत्रण राष्ट्रपति या सेक्रेटरी ऑफ वार के हाथ में होता है. 

भारत में, चीफ़्स ऑफ स्टाफ की कमिटी है. CDS इसके स्थायी अध्यक्ष होते हैं. तीनों सेनाओं के ऑपरेशंस निदेशालय का विलय करके एक ज्वाइंट मुख्यालय का गठन ITC की व्यवस्था के हिस्से रूप में किया जाना चाहिए. यह एकीकृत डिफेंस स्टाफ का हिस्सा बन सकता है. यह ज्वाइंट मुख्यालय रणनीतिक प्लानिंग लागू करेगा, मिशन सौंपेगा, ITC को संसाधन आवंटित करेगा और ITC में आंतरिक तालमेल स्थापित करेगा. आश्चर्य की बात यह है कि इस अहम मसले पर लगभग कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया है. इस ओर मैंने 2023 में ही ध्यान आकर्षित किया था. ‘सेंटर फॉर लैंड वारफेयर स्टडीज़’ के महानिदेशक, ले.जनरल दुष्यंत सिंह (रिटायर्ड) ने इसकी जरूरत पर ज़ोर दिया है. 

तीन भौगोलिक थिएटर कमांडों को जो सेना सौंपी जाएगी, ऑपरेशन के मामले में उस पर उनका नियंत्रण होगा. हरेक थिएटर कमांड के पास एक एअर कंपोनेंट कमांडर होगा, जो IAF का थ्री-स्टार अफसर होगा और वह हवाई ऑपरेशनों की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए जिम्मेदार होगा. कंपोनेंट कमांडर थिएटर कमांडर को वायुसेना की तैनाती के मामले में सलाह देगा और हवाई ऑपरेशनों को संयुक्त अभियान की योजना से जोड़ने का काम करेगा. यही व्यवस्था नौसेना और थलसेना के संसाधनों के मामले में भी लागू होगी. 

अपने विमानों और कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने, उन्हें हथियारों से लैस करने, रखरखाव करने, अपने कर्मियों को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारियां अपने पास रखनी चाहिए. उसके पेशेगत कौशल, तकनीकी स्टार और ऑपरेशन से संबंधित सिद्धांतों में कोई गिरावट नहीं आणी चाहिए. लेकिन किसी थिएटर में सेना की ऑपरेशन से संबंधित तैनाती की ज़िम्मेदारी थिएटर कमांडर की ही होगी. वरना वह हरेक ऑपरेशन की मांगों के मामले में अलग-अलग सेना हेडक्वार्टर से वार्ता पर निर्भर एक को-ऑर्डिनेटर जैसा बनकर रह जाएगा.  

ऑपरेशन के कंट्रोल और प्रशासनिक तथा तकनीकी कंट्रोल में फर्क को स्पष्ट कर लिया जाना चाहिए. ऑपरेशन से जुड़ी प्राथमिकताएं तय करने का अधिकार थिएटर कमांडर का ही होना चाहिए. हवाई मिशन के तकनीकी तथा सामरिक पहलुओं की ज़िम्मेदारी पेशेवर एअर कमांडरों को ही दी जानी चाहिए. यानी IAF अपनी पेशेगत पहचान या रणनीतिक भूमिका नहीं सरेंडर करेगी. वह संयुक्त ऑपरेशन के कमांड ढांचे का अभिन्न हिस्सा रहेगी. 

ऑपरेशन सिंदूर ने एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया है. एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने कबूल किया है कि संयुक्त ढांचे के तहत अहम संसाधनों का समय पर केंद्रीकृत आवंटन और पुनरावंटन ने ऑपरेशन के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद की. जरूरत यह है कि उपयुक्त डिजाइन वाला थिएटर कमांड इस लचीलेपन को संस्थागत रूप दे, न कि इसे सेना अध्यक्षों के बीच व्यक्तिगत तालमेल के भरोसे छोड़ दे. 

सरकार इच्छाशक्ति जताए 

IAF की अहमियत कोई बड़ी समस्या नहीं है. समस्या सेनाओं की यथास्थिति वाली मानसिकता है, और सेनाओं के बीच के मतभेदों को दूर करने तथा अपनी इच्छाशक्ति जताने में सरकार की कमजोरी है. 

2021 के अपने लेख में मैंने कहा था कि एकीकृत थिएटर कमांडों के गठन के जरिए सेना के बड़े पुनर्गठन की कोशिश को सेना के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता कि वह इसे आम सहमति से आगे बढ़ाए. अंतिम सत्ता सरकार के हाथ में है और उसे ही राजनीतिक निर्देश देना होगा, तीनों सेनाओं के बीच के मतभेदों को दूर करना होगा, और योजना को लागू करना होगा. पिछले सात वर्षों के अनुभव ने इन बातों को सही साबित किया है. 

CDS का पद संयुक्तीकरण और थिएटरीकरण को आसान बनाने के लिए निर्मित किया गया था. लेकिन वह ऑपरेशनों के मामले में तीनों सेनाओं के अध्यक्ष उसके कमांड में नहीं आते. ये तीनों शक्तिशाली संस्था प्रमुख ऑपरेशनों के मामले में अपना अलगा-लग सिद्धांत रखते हैं, उनके अपने-अपने संगठन के अलग-अलग हित हैं और संसाधनों के मामले में भी उनकी प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं. ऐसे में CDS से अपेक्षा की जाती है कि वह इनके बीच सहमति बनाएगा. उसे जिम्मेदारियां तो सौंपी गई हैं लेकिन उस अनुपात में अधिकार नहीं सौंपे गए हैं कि वह कोई समझौता लागू करवा सके. 

एडमिरल अरुण प्रकाश ने हाल में अपने एक लेख में सही ही रेखांकित किया है कि अमेरिका ने इस मसले को राजनीतिक रूप से सुलझाने के लिए 1948 में ‘की वेस्ट एग्रीमेंट’ किया था और 1986 में ‘गोल्डवाटर-निकोलस एक्ट’ नामक कानून बनाया था. 

सबक यह नहीं है कि भारत अमेरिकी व्यवस्था की नकल करे, बल्कि यह है कि राजनीतिक नेतृत्व ही पेशेगत मतभेदों को सुलझाए. सेनाएं अंतहीन विचार-विमर्श करती रहें और सरकार मूक दर्शक बनी रहे, यह नहीं चल सकता. 

आगे का रास्ता 

तीनों सेनाओं का एकीकरण सेना के समग्र परिवर्तन का एक हिस्सा है जिसे सरकार को अपनाना, मंजूर करना, उसे फंड देना और उसकी निगरानी करना होगा. सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा ‘विजन’ और रणनीति को औपचारिक रूप प्रदान करे, जिसके आधार पर ही राष्ट्रीय रक्षा नीति तय की जा सकती है. 

इसके तहत, सुरक्षा मामलों पर कैबिनेट कमिटी (CCS) एकीकृत थिएटर कमांडों के व्यापक फ्रेमवर्क की मंजूरी दे और रक्षा मंत्रालय को औपचारिक राजनीतिक निर्देश दे और कार्यान्वयन की समय सीमाएं तय करे. इस निर्देश में लक्ष्य तय किए जाएं, कमांडों के रिश्ते और समय सीमाएं तय की जाएं. राजनीतिक सत्ता की ओर से थिएटर कमांडरों को कमांड एवं कंट्रोल स्पष्ट किया जाए. यह सीधे या चीफ़्स ऑफ स्टाफ कमिटी/ज्वाइंट हेडक्वार्टर के जरिए दिया जाए. सरकार स्पष्ट करे कि थिएटरीकरण एक राष्ट्रीय निरण्य है, सेना अध्यक्षों की सहमति से किया जाने वाला वैकल्पिक उपाय नहीं है. 

रक्षा मंत्री उस अधिकारसंपन्न संचालन कमिटी का नेतृत्व करें जिसमें CDS, तीनों सेना अध्यक्ष, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, और रक्षा सचिव शामिल हैं. उसे कमांड ऑथरिटी, संसाधनों के आवंटन, रणनीतिक साधनों और सेनाओं की जिम्मेदारियों से संबंधित मसलों का निबटारा करने का अधिकार हो. इसे तय किए जा चुके मसलों के निबटारे का एक और मंच नहीं बनना चाहिए. 

CDS को योजनाओं को लागू करने के लिए जवाबदेह बनाया जाए. उसे सरकार के फैसलों को संगठन एवं ऑपरेशन के लिहाज से लागू करने, संयुक्त सिद्धांत तय करने और सेनाओं द्वारा उस पर अमल करवाने का अधिकार सौंपा जाए. तीनों सेना अध्यक्ष फोर्स बढ़ाने की ज़िम्मेदारी अपनेपास रखें लेकिन कमांड के ऑपरेशन की चेन स्पष्ट होनी चाहिए. 

क्रियान्वयन की निगरानी कसौटियों और नियमित ऑडिटों के आधार पर की जाए और इन पर संसद की नजर रहे. लक्ष्य केवल नये हेडक्वार्टरों का गठन न हो बल्कि ऑपरेशन से संबंधित प्लानिंग, खुफिया व्यवस्था, संचारतंत्र, साजोसामान, प्रशिक्षण, फोर्स तैनाती आदि का एकीकरण हो. 

थिएटराइजेशन क्रमिक रूप से किया जाए, जिसमें ऑपरेशन के लिए तैयारी के साथ कोई समझौता न किया गया हो. 2023 के अपने एक लेख में मैंने सुझाव दिया था कि कमांड के नये ढांचे को मौजूदा ढांचे पर शुरू में चार-पांच वर्षों के लिए ही लादा जाए. एकीकृत थिएटर कमांड ऑपरेशन की जिम्मेदारियां धीरे-धीरे ले सकते हैं, जबकि मौजूदा अलग-अलग सेना के कमांड अपने प्रशासनिक, तकनीकी और फोर्स बढ़ाने के काम करते रह सकते हैं. 

तब तक संयुक्त सिद्धांत बनाने, संचारतंत्र और खुफिया नेटवर्क के एकीकरण, संयुक्त नियुक्ति के लिए अफसरों को प्रशिक्षित करने और सैन्य अभ्यासों के जरिए कमांड के ढांचे का परीक्षण करने का समय मिल जाएगा. तब, अलग-अलग सेनाओं के मौजूदा 17 कमांड्स को धीरे-धीरे पुनर्गठित या समाहित किया जा सकता है. 

थिएटराइजेशन संगठन से जुड़ा मामला या सेनाओं के अधिकार क्षेत्र के पुनर्निर्धारण का मामला नहीं है. यह मामला यह है कि भारत भविष्य के युद्ध किस तरह लड़ेगा. आधुनिक लड़ाइयां निरंतर संयुक्त, बहु-आयामी और अधिक टेक्नोलॉजी-केंद्रित होती जा रही हैं. निर्णय में तेजी, और क्षमताओं को विभिन्न दायरों में केंद्रित करने के कौशल से ही ऑपरेशनों के नतीजे तय होंगे. भौगोलिक रूप से बिखरे सिंगल-सर्विस कमांडों के मौजूदा 17 ढांचे इस व्यवस्था के लिए अनुकूल नहीं हैं. 

सात वर्षों से जारी अंतहीन विचार-विमर्श काफी हैं. सेनाओं ने अपना काम कर दिया है. व्यापक प्रस्ताव सरकार के सामने है. अब राजनीतिक नेतृत्व को फैसला करना, निर्देश देना और योजना के क्रियान्वयन पर निगरानी रखना है. सुरक्षा का अगला कोई संकट यह इंतजार नहीं करेगा कि तीनों सेनाएं अपने मतभेद सुलझाएं. और भारतीय सेना का कायाकल्प भी यह इंतिजार नहीं करेगा.   

लेफ्टिनेंट जनरल एच एस पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वह नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC थे. रिटायरमेंट के बाद वह आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. उनका एक्स हैंडल @rwac48 है. व्यक्त किए गए विचार निजी है.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: भारतीय IBG का भविष्य तैनाती और तकनीक पर टिका है, इतिहास इंतिज़ार करने वाली सेनाओं का साथ नहीं देता


 

share & View comments