यदि आज भारतीय राजनेता की छवि अत्यंत निराशाजनक हो गई है, तो भारतीय अर्थशास्त्री की छवि भी उससे प्रतिस्पर्धा करती हुई दिखाई देती है. भारतीय अर्थशास्त्रियों के अग्रणी विद्वानों में से एक, प्रोफेसर सी. एन. वकील, को भारतीय आर्थिक संघ (Indian Economic Association) के स्वर्ण जयंती सम्मेलन में एकत्रित अर्थशास्त्रियों से यह अपील करनी पड़ी कि वे अपने आचरण का ध्यान रखें ताकि अपने पेशे की गरिमा और प्रतिष्ठा को बनाए रख सकें.
उन्होंने कहा: “यह अत्यंत दुखद स्थिति है कि आर्थिक मामलों में किसी व्यक्ति की योग्यता का आकलन इस आधार पर किया जाए कि वह राजनीतिक या अवसरवादी दबावों के बीच अपने विचारों पर कितना दृढ़ रहता है या कितना डगमगा जाता है. आर्थिक योग्यता के मानदंड स्वयं इस पेशे के भीतर निर्धारित होने चाहिए, बाहर से नहीं. यही वह क्षेत्र है जहाँ एक सशक्त आर्थिक संघ लोकतंत्र के लिए एक मजबूत सुरक्षा-कवच बन सकता है.”
राजनेता अपने ही कार्यों के कारण सम्मान खोते हैं. उसी प्रकार भारतीय अर्थशास्त्रियों की प्रतिष्ठा में आई गिरावट भी उनके अपने ही आचरण का परिणाम है.
योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था के युग ने अर्थशास्त्रियों को एक नया अवसर प्रदान किया था. वे अर्थशास्त्र के उपकरणों का उपयोग करके देश की आर्थिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकते थे और जनता के सामने एक उपयोगी भूमिका निभा सकते थे, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह अवसर खो दिया गया.
कई अर्थशास्त्रियों ने अपने आर्थिक ज्ञान और उपकरणों का उपयोग स्पष्ट रूप से राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया और इस प्रक्रिया में उन पेशेवर मानकों का त्याग कर दिया जो उनके पेशे की पहचान होने चाहिए थे. यह धारणा व्यापक रूप से बन गई है कि अनेक अर्थशास्त्री सार्वजनिक पदों के आकर्षण में फंस गए हैं और सरकारी संरक्षण के मक्खन को अपने शोध की रोटी पर लगाने की अनुमति दे बैठे हैं.
यह करियरवाद इतनी दूर तक बढ़ गया है कि आज अर्थशास्त्रियों के बीच भी किसी ऐसे पूर्व शिक्षाविद् का नाम लिया जाए जो अब सरकारी सत्ता में है, तो उसका स्वागत अक्सर व्यंग्य और उपहास से किया जाता है.
कई अर्थशास्त्रियों ने एक से अधिक अवसरों पर जनता की नजर में यह सिद्ध कर दिया है कि उनका वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों से कोई विशेष संबंध नहीं है. यह दो प्रकार से सामने आया.
कुछ अर्थशास्त्री किसी समय सरकार की आर्थिक नीतियों का समर्थन करने के लिए अत्यधिक उत्सुक दिखाई दिए. बाद में वही नीतियाँ व्यवहार में असफल सिद्ध हुईं. जब जनता का रुझान सरकार की नीतियों के विरुद्ध हो गया, तब वही अर्थशास्त्री उन नीतियों की आलोचना करने लगे जिनका वे पहले समर्थन कर चुके थे. इसका एक प्रमुख उदाहरण द्वितीय पंचवर्षीय योजना है.
सरकारी प्रकाशन “द्वितीय योजना के निर्माण से संबंधित दस्तावेज” में अर्थशास्त्रियों के पैनल और योजना आयोग के विचार संकलित हैं. प्रोफेसर बी. आर. शेनॉय को छोड़कर, जिनकी असहमति बाद में भविष्यवाणी जैसी सही सिद्ध हुई, लगभग सभी ने योजना का समर्थन किया था. बाद में जब यह योजना देश के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई, तो उन्हीं में से कुछ अर्थशास्त्री उसकी तीखी आलोचना करने लगे.
जनता के लिए निष्कर्ष निकालना आसान था. या तो इन अर्थशास्त्रियों ने सरकार को प्रसन्न करने के लिए योजना का समर्थन किया था और जनता के असंतोष के बाद ही आलोचना करने का साहस जुटाया, अथवा वे केवल सैद्धांतिक विद्वान थे जिन्हें वास्तविक परिस्थितियों की कोई समझ नहीं थी.
अर्थशास्त्रियों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने का दूसरा तरीका तब सामने आया जब उन्हें सत्ता के पदों पर बैठकर आर्थिक मामलों का संचालन करने का अवसर मिला. आर्थिक विषयों पर लंबे-लंबे व्याख्यान देने वाले कुछ अर्थशास्त्रियों ने अपने मंत्रालयों और विभागों का ऐसा बुरा हाल किया कि उनकी सारी विद्वत्ता संदेह के घेरे में आ गई.
संयम की कमी भी जनता की नजर में भारतीय अर्थशास्त्री की गिरती प्रतिष्ठा का एक कारण है. इसका एक उदाहरण औद्योगिक लाइसेंसिंग पर हाल ही में आई रिपोर्ट है. यह रिपोर्ट एक मूल्यवान विश्लेषण थी, लेकिन विश्लेषण की प्रक्रिया में ऐसा आभास दिया गया कि यह किसी एक औद्योगिक घराने पर हमला है, जिससे इसकी उपयोगिता कम हो गई. लोकनीति का मूल सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति या संस्था को तब तक विशेष रूप से निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए जब तक उसने देश के कानूनों का उल्लंघन न किया हो. और यदि उसने कानून तोड़ा है, तो उसके लिए स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए.
इसी प्रकार, एक आधिकारिक दस्तावेज़ में “मारवाड़ी पूंजी”, “गुजराती पूंजी” और “पारसी पूंजी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया. ऐसे समय में जब उप-राष्ट्रीयता के बढ़ते प्रभाव के बीच राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पहले से अधिक है, पूँजी के स्वामित्व के सामुदायिक पहलुओं पर जोर देना रिपोर्ट के लेखक की एक गंभीर भूल थी. उन्हें इससे बेहतर समझ दिखानी चाहिए थी.
संयम की कमी और संभवतः प्रचार पाने की इच्छा उसी रिपोर्ट में फिर दिखाई देती है, जब अर्थशास्त्री स्वयं स्वीकार करता है कि वह अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र से आगे बढ़कर वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण की सिफारिश करता है.
आर्थिक समस्याओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण को त्यागने का एक और स्पष्ट उदाहरण बैंक राष्ट्रीयकरण पर चार अर्थशास्त्रियों की तथाकथित रिपोर्ट में देखा जा सकता है. यह वास्तव में कोई शोध दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक ऐसा पैम्फलेट है जो उसके लेखकों के बैंक राष्ट्रीयकरण के पक्ष में वैचारिक झुकाव पर आधारित है.
अन्य नागरिकों की तरह अर्थशास्त्रियों को भी अपनी कोई भी विचारधारा रखने की स्वतंत्रता है, लेकिन उन्हें यह सावधानी रखनी चाहिए कि वे अपनी वैचारिक मान्यताओं को वैचारिक प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत करें, न कि शोध दस्तावेज़ के रूप में. जब उन्होंने इसे “चार अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट” के रूप में प्रस्तुत किया, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो उन्होंने स्वयं को पेशेवर राजनेताओं के हाथों एक उपकरण बनने दिया हो.
हाल के सम्मेलन में प्रोफेसर वकील ने उचित ही कहा: “हमें याद रखना चाहिए कि अर्थशास्त्री संत नहीं होते. उनके भी अपने करियर संबंधी लक्ष्य और महत्वाकांक्षाएं होती हैं. वे भी पद के आकर्षण और सत्ता तथा अधिकार रखने वालों के साथ जुड़ने से मिलने वाली प्रतिष्ठा के मोह में पड़ सकते हैं. सभी अर्थशास्त्रियों के सपने केवल विद्वत्ता के क्षेत्र तक सीमित नहीं होते.
इसलिए किसी भी अर्थशास्त्री के दृष्टिकोण को हर परिस्थिति में अंतिम आर्थिक दृष्टिकोण मान लेना उचित नहीं है. इसी कारण यह सभी अर्थशास्त्रियों का विशेष दायित्व है और होना भी चाहिए कि वे एक-दूसरे के विचारों की कठोर और निष्पक्ष आलोचना करें. उन्हें किसी भी आर्थिक प्रश्न के विभिन्न पक्षों को लगातार अपने पेशे और जनता के सामने रखना चाहिए.
तभी जनता यह समझ सकेगी कि कब और कहाँ कोई अर्थशास्त्री नीति-निर्माण की दुनिया में प्रवेश करते समय अपने गैर-आर्थिक पूर्वाग्रहों या अन्य प्रभावों के आधार पर निष्कर्ष निकाल रहा है.
यह सर्वविदित है कि सत्ता में बैठे लोग हमेशा ऐसे व्यक्तियों की तलाश में रहते हैं जो उनके विचारों और नीतियों का समर्थन करें. जनता कभी-कभी यह मान बैठती है कि कोई विशेष अर्थशास्त्री राजनेताओं या अधिकारियों को प्रभावित कर रहा है, जबकि अधिकतर मामलों में वास्तविकता इसके विपरीत होती है. अधिकारी अपने अनुकूल सलाहकार चुनकर अपने विचारों के समर्थन में तकनीकी तर्क जुटा लेते हैं.”
कई अर्थशास्त्रियों की स्वतंत्रता गंभीर रूप से प्रभावित हुई है क्योंकि उन्होंने सरकारी संस्थाओं, विशेषकर योजना आयोग, से शोध कार्य और परियोजनाएँ स्वीकार की हैं. निजी बातचीत में कुछ अर्थशास्त्री स्वयं स्वीकार करते हैं कि उनके साथ ऐसा हुआ है. वे इस बात पर खेद व्यक्त करते हैं कि वे सार्वजनिक मंचों पर ऐसे विचार रखने में असमर्थ हैं जो सत्ता में बैठे लोगों को अप्रिय लग सकते हैं, क्योंकि ऐसा करने से उन्हें मिलने वाला सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन खतरे में पड़ सकता है.
कई भारतीय अर्थशास्त्री एक और जाल में भी फँस गए हैं. उन्होंने लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए स्वयं राजनेता बनने का प्रयास किया. परिणामस्वरूप वे न तो अच्छे राजनेता बन सके और न ही अच्छे अर्थशास्त्री. वे आधे-अधूरे राजनेता बनकर रह गए, ठीक वैसे ही जैसे कई पूर्णकालिक राजनेता आधे-अधूरे अर्थशास्त्री बन गए हैं. दोनों के संयुक्त प्रयासों का परिणाम देश की वर्तमान आर्थिक अव्यवस्था के रूप में सामने आया है.
यदि अर्थशास्त्री कोई आचार-संहिता नहीं अपनाते, अपनी सोच की स्वतंत्रता को स्थापित नहीं करते और अपनी बौद्धिक ईमानदारी तथा नैतिकता को बनाए नहीं रखते, तो वे अपने कर्तव्य की उपेक्षा के लिए जनता के रोष का सामना करेंगे.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ़्रीडम फ़र्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “भारतीय अर्थशास्त्री की छवि” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से मार्च 1968 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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