18 साल के छात्र हेनरी नोवाक की 3 दिसंबर 2025 को इंग्लैंड के साउथैम्पटन में एक ब्रिटिश सिख व्यक्ति विक्रम डिगवा ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी. कई महीनों बाद, जब जांच आगे बढ़ी, आधिकारिक फैसले सामने आए और मामले से जुड़ी अधिक जानकारी सार्वजनिक हुई, तब साउथैम्पटन में दंगे और हिंसा भड़क गई. बताया गया कि इस हिंसा में 11 पुलिसकर्मी घायल हुए.
उम्मीदों, योजनाओं और संभावनाओं से भरी एक युवा ज़िंदगी एक अपराध की वजह से खत्म हो गई. यह समाज के लिए एक दुखद क्षति थी. उनके पिता मार्क नोवाक ने उस दुख के बारे में बात की, जिसे उनका परिवार “अपनी पूरी ज़िंदगी हर एक दिन” महसूस करेगा. उन्होंने अपील की कि उनके बेटे की मौत का इस्तेमाल और अधिक विभाजन, नफरत या तनाव पैदा करने के लिए न किया जाए.
फिर भी, उस अपील के बावजूद, एक पोलिश प्रवासी के बेटे को अब “व्हाइट लाइव्स मैटर” का चेहरा बना दिया गया है. जो हुआ वह दुखद और भयावह था. लोगों की भावनाओं का एक हिस्सा उस परेशान करने वाले वीडियो से भी जुड़ा हुआ लगता है, जो सोशल मीडिया पर फैल रहा है. बताया जाता है कि उस वीडियो में नोवाक कह रहे थे कि उन्हें चाकू मारा गया है, लेकिन एक पुलिस अधिकारी ने जवाब दिया, “मुझे नहीं लगता कि तुम्हें चाकू मारा गया है, दोस्त.”
व्हाइट विक्टिमहुड नैरेटिव
मैं समझ सकती हूं कि ऐसे वीडियो लोगों में गुस्सा और निराशा क्यों पैदा करते हैं. किसी परेशान व्यक्ति को मदद मांगते हुए देखना और उसकी बात को गंभीरता से न लिया जाना स्वाभाविक रूप से लोगों को परेशान करता है.
लेकिन सवाल यह है कि यह मामला हिंसक प्रतिक्रियाओं और इतने बड़े राजनीतिक विवाद में कैसे बदल गया?
इस सवाल के जवाब का एक हिस्सा ब्रिटेन के सांसद निगेल फ़राज की प्रतिक्रिया में देखा जा सकता है. पहले, जब वेन कूजेंस ने सारा एवरर्ड का अपहरण, बलात्कार और हत्या की थी, तब फैराज ने स्पष्ट रूप से शांति बनाए रखने की अपील की थी और कहा था कि उस त्रासदी का इस्तेमाल पुरुषों या संस्थाओं के खिलाफ व्यापक हमले शुरू करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
लेकिन अब भाषा बिल्कुल अलग दिखाई देती है. शांति की अपील करने के बजाय “कोल्ड आउटरेज” जैसे शब्द सुनने को मिल रहे हैं.
यह भी दिलचस्प है क्योंकि यही नेता पहले भारतीय प्रवासियों को पूर्वी यूरोप से आने वाले प्रवासियों की तुलना में अधिक पसंद करने की बात कर चुके हैं, संभव है कि यह उनकी ब्रेक्जिट राजनीति से भी जुड़ा रहा हो, लेकिन अब एक पोलिश प्रवासी परिवार से आने वाला ब्रिटिश नागरिक अचानक एक बड़े व्हाइट आईडेंटिटी वाले राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बना दिया गया है.
इससे मेरे मन में सवाल उठा कि आखिर बदला क्या है? ऐसा लगता है कि किसी त्रासदी पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं इस बात से तय नहीं होतीं कि घटना में क्या हुआ, बल्कि इस बात से तय होती हैं कि उसमें कौन शामिल था और उसके आधार पर कौन-सी राजनीतिक कहानी बनाई जा सकती है.
त्रासदियों का राजनीतिक फायदा उठाना अब इतना आम हो गया है कि लोग शायद इस पर ध्यान भी नहीं देते.
क्योंकि बड़ा उद्देश्य एक ऐसी कहानी बनाना लगता है जो व्हाइट विक्टिमहुड होने की भावना को मजबूत करे—यानी यह दावा कि बहुसंख्यक श्वेत आबादी संस्थाओं की ओर से किसी तरह के दोहरे मानदंडों का सामना कर रही है. इसे अक्सर “टू-टियर पुलिसिंग” जैसे शब्दों से बताया जाता है.
ऐसे दावों का समर्थन आंकड़े या व्यापक डेटा करते हैं या नहीं, यह अक्सर दूसरी बात बन जाती है. एक घटना, जब किसी बड़े राजनीतिक नैरेटिव से जोड़ दी जाती है, तो अकेले ही काफी मानी जाने लगती है.
मैंने इन चर्चाओं के दौरान एक और बात भी देखी है. भारतीय पृष्ठभूमि के कुछ लोग—सिख, हिंदू और अन्य—अक्सर रिफॉर्म पार्टी या यहां तक कि दक्षिणपंथी विचारों से सहमत दिखाई देते हैं, क्योंकि वे सचमुच मानते हैं कि मुस्लिम प्रवासन या इस्लाम ही मुख्य समस्या है.
उनमें से कुछ खुद को बहुत मजबूती से ब्रिटिश मानते हैं और विडंबना यह है कि वे दक्षिण एशिया से नए प्रवासियों के आने को भी पसंद नहीं करते. उनके लिए कभी-कभी एक शब्द भी इस्तेमाल किया जाता है—“फ्रेशीज़”. अक्सर उनकी सोच यह होती है कि हम अलग हैं, यह हमारे बारे में नहीं है, यह हमारी ब्राउन स्किन के बारे में नहीं है.
यही कारण है कि यह देखना दिलचस्प है कि ऐसे फर्क कितनी जल्दी गायब हो जाते हैं. टॉमी रॉबिन्सन एक पुलिस स्टेशन के बाहर खड़े हुए और उन्होंने बहुत जल्दी नोवाक की हत्या को पाकिस्तानी मुसलमानों और ग्रूमिंग गैंग वाले नैरेटिव से जोड़ दिया. इस प्रक्रिया में असली त्रासदी लगभग पीछे छूट गई.
परिवार बनाम दुनिया
जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह यह थी कि कैसे एक व्यक्तिगत त्रासदी बहुत जल्दी एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन गई, जिसमें यह कहा जाने लगा कि संस्थाएं और राज्य व्हाइट लोगों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं और ऐसी राजनीति में मुझे कभी-कभी यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या मुस्लिम, भारतीय, सिख, प्रवासी या सिर्फ भूरे रंग की त्वचा वाले लोगों के बीच का फर्क उतना मायने रखता है, जितना लोग समझते हैं.
इस त्रासदी से जुड़ी एक और बहस सार्वजनिक जगहों पर कृपाण पर प्रतिबंध लगाने को लेकर सामने आई है. ब्रिटेन में पारंपरिक रूप से धार्मिक प्रतीकों और धार्मिक छूट को सार्वजनिक जीवन में जगह दी जाती रही है, लेकिन हेनरी नोवाक का मामला एक बार फिर सिखों द्वारा धार्मिक रूप से धारण की जाने वाली कृपाण को लेकर दी गई छूट पर सवाल खड़े कर रहा है.
निष्पक्ष रूप से देखें तो यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बहस है, जिसमें धर्म, सुरक्षा, सुविधाएं, अल्पसंख्यकों के अधिकार और समाज अपनी सीमाएं कहां तय करता है जैसे सवाल शामिल हैं. शायद इस विषय पर अलग से एक पूरा लेख लिखा जा सकता है.
इसके अलावा, एक बात जिस पर मुझे लगता है कि पर्याप्त चर्चा नहीं हो रही है, वह खुद यह घटना और उससे जुड़ा व्यवहार है. परिवार के कुछ सदस्यों पर यह आरोप कि उन्होंने घटना को छिपाने की कोशिश की, अपने बेटे को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए, मामले में नस्लवाद के आरोप जोड़ने की कोशिश की, या सबूत छिपाने का प्रयास किया—ये सब राजनीति से परे कुछ असहज सवाल खड़े करते हैं.
इसने मुझे एक और व्यक्तिगत बात के बारे में सोचने पर मजबूर किया. दक्षिण एशियाई समाज में बड़े होते हुए हममें से कई लोगों को बचपन से कुछ मूल्य सिखाए जाते हैं—हर हाल में अपने खून के रिश्तों का साथ देना, परिवार की रक्षा करना, चाहे कुछ भी हो जाए और यह मानना कि आखिरकार दुनिया के खिलाफ हम और हमारा परिवार ही हैं.
लेकिन कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्या यही सोच हमें किसी बड़ी बात से दूर भी कर देती है. जब परिवार के प्रति वफादारी ही सबसे बड़ी चीज़ बन जाती है, तो हम भूल जाते हैं कि हम एक बड़े समाज और साझा मानवता का भी हिस्सा हैं.
और यही इस मामले का सबसे असहज सवाल है: अगर आपके अपने परिवार का कोई सदस्य ऐसा अपराध कर दे, तो उस पल आप क्या करेंगे?
क्या आप परिवार के प्रति वफादारी चुनेंगे, या फिर सही बात का साथ देंगे?
आमना बेगम अंसारी एक स्तंभकार और टीवी समाचार पैनलिस्ट हैं. वह ‘इंडिया दिस वीक बाय आमना एंड खालिद’ नाम से एक साप्ताहिक यूट्यूब शो चलाती हैं. उनका एक्स हैंडल @Amana_Ansari है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.
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