गुरुग्राम: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी अदालत के आदेश की खुले कोर्ट में घोषणा हो चुकी है, तो उसकी रिपोर्टिंग करने पर अखबारों के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई नहीं की जा सकती, भले ही उस आदेश पर जज के हस्ताक्षर अभी न हुए हों.
इस फैसले से द ट्रिब्यून की एडिटर-इन-चीफ ज्योति मल्होत्रा और हिंदुस्तान टाइम्स व द टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादकों और रिपोर्टरों को राहत मिली है. इन पर उस खबर को लेकर आपराधिक अवमानना की कार्रवाई चल रही थी, जिसमें हाई कोर्ट द्वारा कोटकपूरा पुलिस फायरिंग मामलों को फरीदकोट से चंडीगढ़ स्थानांतरित करने की जानकारी प्रकाशित की गई थी.
जस्टिस जसगुरप्रीत सिंह पुरी और जस्टिस अमरजोत भट्टी की डिवीजन बेंच ने अवमानना याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि तीनों अखबारों ने जो रिपोर्ट प्रकाशित की थी, वह सही थी और अदालत की कार्यवाही की सही रिपोर्टिंग कानून के तहत संरक्षित है. यह आदेश पिछले महीने दिया गया था, लेकिन गुरुवार को सार्वजनिक किया गया.
मामला दो याचिकाओं से जुड़ा था, जिन्हें हाई कोर्ट की एकल पीठ के समक्ष चरणजीत शर्मा और परमराज सिंह उमरानंगल ने दायर किया था. दोनों ने कोटकपूरा एफआईआर मामलों की सुनवाई फरीदकोट की सेशन कोर्ट से चंडीगढ़ स्थानांतरित करने की मांग की थी. एकल पीठ ने 9 अप्रैल को दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की और खुले कोर्ट में आदेश सुनाते हुए मामलों को चंडीगढ़ भेजने का निर्देश दिया.
हालांकि, आदेश पर अभी हस्ताक्षर नहीं हुए थे. इसके बावजूद द ट्रिब्यून, हिंदुस्तान टाइम्स और द टाइम्स ऑफ इंडिया ने 10 अप्रैल की सुबह खबर प्रकाशित की कि हाई कोर्ट ने कोटकपूरा मामलों को चंडीगढ़ स्थानांतरित कर दिया है.
एकल पीठ ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई. अदालत ने कहा कि आदेश पर हस्ताक्षर नहीं हुए थे, इसलिए पहली नजर में ऐसा लगता है कि खबर बिना आधार के प्रकाशित की गई और यह अदालत की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने तथा न्याय प्रशासन को प्रभावित करने का प्रयास हो सकता है. इसके बाद अदालत ने स्वतः संज्ञान लेते हुए अवमानना की कार्रवाई शुरू की और मामला डिवीजन बेंच को भेज दिया.
डिवीजन बेंच ने अखबारों की रिपोर्ट और अदालत के आदेश का अध्ययन किया और पाया कि अखबारों ने सही तथ्य प्रकाशित किए थे. वास्तव में मुकदमों की सुनवाई फरीदकोट से चंडीगढ़ स्थानांतरित की गई थी. अदालत ने Contempt of Courts Act, 1971 की धारा 4 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि किसी भी चरण में न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्ष और सही रिपोर्ट प्रकाशित करना अवमानना नहीं माना जाएगा. चूंकि रिपोर्टिंग सही थी, इसलिए अखबारों को कानूनी संरक्षण प्राप्त था.
डिवीजन बेंच ने यह कानूनी सवाल भी स्पष्ट किया कि क्या बिना हस्ताक्षर वाला फैसला प्रभावी माना जा सकता है. अदालत ने कहा कि हां, ऐसा फैसला प्रभावी होता है.
अदालत ने 1954 में आए सुरेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी फैसला जैसे ही खुले कोर्ट में सुनाया जाता है, उसी समय प्रभावी हो जाता है. बाद में हस्ताक्षर करना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया है, ताकि निर्णय को रिकॉर्ड पर लाया जा सके. इससे यह तय नहीं होता कि फैसला कब से लागू होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में कहा था कि यदि किसी फैसले पर हस्ताक्षर न हुए हों, लेकिन उसे अदालत में विधिवत सुनाया गया हो, तो उसके आधार पर की गई कार्रवाई वैध मानी जाएगी. बाद के कई आदेशों में भी इस सिद्धांत को दोहराया गया.
इसलिए जब तीनों अखबारों ने 10 अप्रैल को यह खबर प्रकाशित की, तब अदालत का प्रभावी आदेश पहले ही अस्तित्व में आ चुका था. रिपोर्टरों ने किसी काल्पनिक या गलत बात की रिपोर्टिंग नहीं की थी, बल्कि उन्होंने वही प्रकाशित किया था जिसका अदालत पहले ही फैसला कर चुकी थी और जिसकी घोषणा कर चुकी थी.
इसी आधार पर डिवीजन बेंच ने आपराधिक अवमानना याचिका खारिज कर दी. मामले से जुड़ी अन्य सभी अर्जियां भी निपटा दी गईं.
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