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Saturday, 6 June, 2026
होमफीचरअमेरिका-भारत ट्रेड डील से पोल्ट्री सेक्टर खुश, लेकिन MP के सोयाबीन किसानों की बढ़ी चिंता

अमेरिका-भारत ट्रेड डील से पोल्ट्री सेक्टर खुश, लेकिन MP के सोयाबीन किसानों की बढ़ी चिंता

अमेरिका-भारत व्यापार समझौता मध्य प्रदेश के दंसारी गांव में चर्चा का विषय बन गया है. किसान अपने सामूहिक भविष्य की दिशा तय करने के लिए विचार-विमर्श कर रहे हैं.

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इंदौर/भोपाल: यह पहला सोयाबीन सीजन है जब अंतरिम अमेरिका-भारत व्यापार समझौते की शर्तें सामने आई हैं. इस समझौते में भारत ने सोयाबीन सहित अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारतीय बाजार में ज्यादा पहुंच देने पर सहमति जताई है. मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर स्थित छावनी अनाज मंडी में इस समय अफरातफरी और भ्रम का माहौल है.

समझौते की शर्तें अभी पूरी तरह स्पष्ट भी नहीं हुई हैं, लेकिन कीमतें पहले ही गिरने लगी हैं. मंडी ने भारतीय सोयाबीन किसानों से खरीद का भाव पहले ही कम कर दिया है.

इंदौर जिले के दंसारी गांव के 70-वर्षीय किसान रामकिशन मौर्य ने चिंतित होकर कहा, “पिछले सीजन तक हमें एक क्विंटल सोयाबीन के 6,500 से 7,000 रुपये तक मिल जाते थे, लेकिन बुआई शुरू होने से पहले ही मंडी का भाव करीब 4,500 रुपये रह गया है.”

अमेरिकी सोयाबीन के भारतीय बाज़ार में आने की जमीन काफी समय से तैयार हो रही थी. मांग थी, गुणवत्ता की गारंटी थी और भारतीय उत्पादक उत्पादन के पैमाने पर मुकाबला नहीं कर पा रहे थे.

इसी वजह से पोल्ट्री और डेयरी फीड बनाने वाली सहायक उद्योगों सहित कई क्षेत्र अमेरिका से सस्ते और बेहतर गुणवत्ता वाले सोयाबीन उत्पाद मिलने की उम्मीद कर रहे हैं.

दंसारी के सोयाबीन किसान चिंतित हैं कि अमेरिका-भारत व्यापार समझौता मध्य प्रदेश में सोयाबीन की खेती को खत्म कर सकता है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
दंसारी के सोयाबीन किसान चिंतित हैं कि अमेरिका-भारत व्यापार समझौता मध्य प्रदेश में सोयाबीन की खेती को खत्म कर सकता है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
सोयाबीन, दूसरी फसलों की तरह नहीं है. इसके उत्पादन पर कई सहायक उद्योगों का पूरा नेटवर्क निर्भर करता है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
सोयाबीन, दूसरी फसलों की तरह नहीं है. इसके उत्पादन पर कई सहायक उद्योगों का पूरा नेटवर्क निर्भर करता है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट

मध्य प्रदेश की गिरती रैंकिंग

मध्य प्रदेश के सबसे ज्यादा सोयाबीन उत्पादन करने वाले गांवों में से एक हतोद में किसान टीवी स्क्रीन से चिपके बैठे थे और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के नतीजे का इंतज़ार कर रहे थे. सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि सोयाबीन प्रोसेसर, पोल्ट्री और डेयरी किसान, तथा सोयामील उद्योग से जुड़े लोग भी यह जानने के लिए उत्सुक थे कि आगे क्या होने वाला है.

मध्य प्रदेश में कई ऐसे उद्योग हैं जो इस दलहनी फसल पर निर्भर हैं.

सोयाबीन से बने विभिन्न उत्पाद | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
सोयाबीन से बने विभिन्न उत्पाद | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़े पूरे भारत में सोयाबीन उत्पादन में गिरावट का चिंताजनक रुझान दिखाते हैं. 2025 में भारत में 112.114 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बुआई हुई, जो 2024 में 118.319 मिलियन हेक्टेयर थी. 2025 में अनुमानित उपज 983 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रही और कुल उत्पादन करीब 110.267 मिलियन टन रहा. यह 2024 की 1089 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपज और 128.821 मिलियन टन उत्पादन से कम था.

मध्य प्रदेश की स्थिति खास तौर पर खराब रही है.

1970 के दशक में भारत में आए सोयाबीन बूम के बाद से देश का ‘सोयाबीन बाउल’ कहलाने वाला मध्य प्रदेश अब उत्पादन और उपज के मामले में महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है, जबकि बुआई क्षेत्र अब भी सबसे ज्यादा उसी के पास है.

किसान अनियमित मौसम और सरकार से कम होते समर्थन से जूझ रहे हैं.

48.6 मिलियन हेक्टेयर में बुआई होने के बावजूद मध्य प्रदेश केवल 43.24 मिलियन टन सोयाबीन पैदा कर सका. वहीं 2025 में महाराष्ट्र 44.68 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई के साथ 52.29 मिलियन टन सोयाबीन उत्पादन कर देश का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य बन गया.

सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA) के कार्यकारी निदेशक डी.एन. पाठक ने कहा, “अभी हमें इस समझौते का असर पूरी तरह पता नहीं है. 1960 और 1970 के दशक में सोयाबीन एक संभावनाओं वाली फसल के रूप में आई थी और बहुत तेजी से बड़ा उद्योग बन गई. लेकिन हम उस मौके का पूरा फायदा नहीं उठा पाए. पिछले कुछ वर्षों से घरेलू उत्पादन लगातार घट रहा है और इसे फिर से बढ़ाने के लिए कोई ठोस और केंद्रित कार्ययोजना नहीं बनाई गई है.”

कम उपज की चिंताजनक प्रवृत्ति

1970 के शुरुआती वर्षों में सोयाबीन ने मध्य प्रदेश के खेतों में दस्तक दी थी और बहुत जल्द यह “भारतीय कृषि जगत का शाहरुख खान” बन गया.

1980 तक भारत में सोयाबीन का कुल रकबा 0.5 मिलियन हेक्टेयर तक पहुंच गया था, जो 1990 तक बढ़कर 2.25 मिलियन हेक्टेयर हो गया. राज्य में आने के सिर्फ दो दशक के भीतर ही मध्य प्रदेश देश के कुल सोयाबीन उत्पादन का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पैदा करने लगा था.

सागर के 32-वर्षीय किसान तरुण राजपाल ने कहा, “शायद ही कोई दूसरी फसल इतनी बहुउपयोगी हो.”

राजपाल ने कहा कि इसके तेज़ी से लोकप्रिय होने की वजह यह थी कि जिस तरह बॉलीवुड सुपरस्टार कई तरह की भूमिकाएं निभा सकता है, उसी तरह सोयाबीन भी कई कामों में इस्तेमाल होती है. यह उच्च प्रोटीन वाला खाद्य पदार्थ है, बीज तेल का स्रोत है, पोल्ट्री, डेयरी और मछली पालन के चारे में काम आती है, सोया मिल्क जैसे डेयरी विकल्प बनाने में उपयोग होती है और यहां तक कि बायोफ्यूल के लिए भी इस्तेमाल की जाती है.

SOPA के डी.एन. पाठक ने कहा कि मध्य प्रदेश में सोयाबीन का आना किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था.

पाठक ने कहा, “मध्य प्रदेश में किसानों के पास खरीफ सीजन में बीच के महीनों में उगाने के लिए कोई भरोसेमंद फसल नहीं थी. सोयाबीन की खेती ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था बदल दी. इंदौर जिले का हतोद गांव सोयाबीन खेती का बड़ा केंद्र है. जब सोयाबीन का बूम आया था, तब वहां के किसान साइकिल से चलते थे, और आज उनके पास कई-कई कारें हैं.”

जब भारत में सोयाबीन आई, तब अमेरिकी सोयाबीन बाजार को मॉडल माना गया. सरकारी एजेंसियां किसानों को अच्छे बीज, तकनीकी सहायता, सुनिश्चित खरीद और मूल्य समर्थन देने में जुट गईं. साथ ही पूरे तिलहन उद्योग में सरकारी निवेश को भी बढ़ावा दिया गया. लेकिन शुरुआती उत्साह के कुछ वर्षों बाद सरकार का ध्यान इस क्षेत्र से हट गया.

इस उदासीनता का सबसे बड़ा उदाहरण 2017 की भावांतर भुगतान योजना रही. यह केंद्र सरकार की योजना थी, जिसका उद्देश्य न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और बाजार के सबसे कम दाम के बीच का अंतर किसानों को देना था.

लेकिन यह योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि व्यापारियों ने बाजार कीमतों में हेरफेर किया, किसानों को भुगतान में देरी हुई और सीमित खरीद अवधि के कारण मंडियों में फसल का अंबार लग गया. सरकार ने पिछले साल इस योजना को फिर शुरू किया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. किसानों का कहना है कि सोयाबीन को कभी भी लगातार खरीद, सिंचाई और नीतिगत समर्थन नहीं मिला.

हाल के साल इस फसल के लिए खास तौर पर खराब रहे हैं. 2025 में येलो मोज़ेक वायरस (YMV) का प्रकोप फैला, जो दलहनी फसलों को प्रभावित करने वाला एक वायरल संक्रमण है. इससे मध्य प्रदेश में 20 से 60 प्रतिशत तक उत्पादन प्रभावित हुआ. मंदसौर जिले में, जो इस वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित था, कई खेत पूरी तरह सूख गए.

किसानों का कहना है कि पिछले पांच वर्षों का अनियमित मौसम भी बड़ी चिंता का कारण है. हाल के सीजनों में देर से मानसून आने और कटाई के समय ज्यादा बारिश होने से फसल को नुकसान पहुंचा है.

पिछले साल सितंबर में SOPA की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि अधिक बारिश के कारण मध्य प्रदेश की लगभग 6 प्रतिशत सोयाबीन फसल खराब हो गई थी. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि करीब 15 प्रतिशत क्षेत्रों में फसल की बढ़त कमजोर रही. 2024 में भी मानसून के दूसरे हिस्से में हुई अत्यधिक बारिश ने उत्पादन को भारी नुकसान पहुंचाया था. हालांकि, इस दौरान हुई अनिश्चित बारिश ने दूसरी फसलों को भी नुकसान पहुंचाया, लेकिन सोयाबीन के संवेदनशील बीजों के कारण इस फसल पर असर ज्यादा पड़ा.

SOPA में सोयाबीन के बीजों की जांच की जा रही है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
SOPA में सोयाबीन के बीजों की जांच की जा रही है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट

लेकिन आंकड़े बताते हैं कि बड़े रकबे के बावजूद मध्य प्रदेश कई वर्षों से कम उत्पादन की समस्या से जूझ रहा है. उदाहरण के लिए, 2020 में मध्य प्रदेश ने 58.54 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में बुआई करके 41.77 मिलियन टन सोयाबीन पैदा की थी. इसके मुकाबले महाराष्ट्र ने सिर्फ 40.39 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में 45.44 मिलियन टन उत्पादन किया था.

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद दूसरे राज्य काफी पीछे हैं.

2020 में राजस्थान ने 8.58 मिलियन टन और कर्नाटक ने केवल 3.73 मिलियन टन सोयाबीन उत्पादन किया था. पिछले पांच वर्षों में इन राज्यों का उत्पादन भी घटा है.

पिछले साल राजस्थान ने 6.39 मिलियन टन और कर्नाटक ने 3.65 मिलियन टन सोयाबीन का उत्पादन किया.

क्रेडिट: SOPA
क्रेडिट: SOPA
क्रेडिट: SOPA
क्रेडिट: SOPA

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कम उत्पादन के पीछे कई कारण हैं. उन्होंने कहा कि सरकार ने 100 किलोग्राम सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,892 रुपये तय किया है.

शुरुआती बढ़ावा मिलने के बावजूद भारत में सोयाबीन का उत्पादन कम रहा है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
शुरुआती बढ़ावा मिलने के बावजूद भारत में सोयाबीन का उत्पादन कम रहा है | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट

अधिकारी ने कहा, “सिर्फ ज्यादा या कम बारिश ही नहीं, बल्कि बारिश का असमान वितरण भी फसल चक्र को प्रभावित करता है. इसके अलावा अब कई किसान मक्का और गन्ने जैसी दूसरी फसलों की ओर भी जा रहे हैं.”

सिर्फ बुरी खबर ही नहीं

हालांकि, पोल्ट्री और डेयरी फीड बनाने वाले लोग अमेरिका-भारत व्यापार समझौते के तहत आयात में ढील मिलने की संभावना से काफी खुश हैं.

अभी भारतीय फीड निर्माता स्थानीय स्तर पर बने डी-ऑयल्ड केक (DOC) पर निर्भर हैं, जो सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचता है. लागत और गुणवत्ता के मामले में ये उत्पाद अमेरिकी DDGS का मुकाबला नहीं कर पाते.

किसानों की चिंता के बीच पोल्ट्री और डेयरी फीड उत्पादक अमेरिका से आयात का इंतज़ार कर रहे हैं | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
किसानों की चिंता के बीच पोल्ट्री और डेयरी फीड उत्पादक अमेरिका से आयात का इंतज़ार कर रहे हैं | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट

दंसारी के बड़े पोल्ट्री फार्मों में इस समझौते के समर्थन का माहौल साफ दिखाई देता है. मुर्गियों की आवाजों के बीच गांव के पोल्ट्री किसान घनश्याम दास आयातित DDGS को अपना “100 फीसदी समर्थन” देने की बात करते हैं. वह हमेशा अपनी मुर्गियों को अच्छी गुणवत्ता वाला चारा देते रहे हैं और अब कम कीमत पर ऐसा कर पाने की उम्मीद कर रहे हैं.

दास ने कहा, “भारत में बना DOC अमेरिकी विकल्प की तुलना में कम से कम 30 फीसदी महंगा है. इसमें प्रोटीन ज्यादा होता है, लेकिन अमेरिकी किस्मों की गुणवत्ता बेहतर है. फिर भारतीय पोल्ट्री किसान आयातित विकल्प क्यों न अपनाएं?”

पिछले साल तक सोयाबीन DOC की कीमत 43-45 रुपये प्रति किलो थी. इसके मुकाबले चावल से बना DDGS लगभग 30 रुपये प्रति किलो मिलता है. वहीं मक्का से बने DDGS की कीमत और भी कम, करीब 24 रुपये प्रति किलो है. इसमें प्रोटीन कम होता है, लेकिन बड़े स्तर पर फीड तैयार करने के लिए इसे पसंद किया जाता है.

अमेरिकी DDGS मक्का, चावल और ज्वार से शराब बनाने की प्रक्रिया का उप-उत्पाद है. इसमें स्टार्च को अल्कोहल में बदलने के लिए एंजाइम का इस्तेमाल किया जाता है. आयातित DDGS को लेकर एक चिंता यह है कि इसमें जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) मक्का का इस्तेमाल होता है, जिसका कुछ लोग विरोध करते हैं.

अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) की 2025 की रिपोर्ट ‘द ग्रोइंग डिमांड फॉर एनिमल प्रोडक्ट्स एंड फीड इन इंडिया’ के अनुसार, भारत में सोयाबीन मील की खपत 2022-23 के 63 लाख टन से बढ़कर 2040 तक 1.77 करोड़ टन और 2050 तक करीब 2.83 करोड़ टन हो सकती है.

मारुति बनाम फेरारी

अमेरिका-भारत व्यापार समझौता दनसारी गांव में शाम को होने वाले ताश के खेलों की चर्चा का मुख्य विषय बन गया है. किसान अपनी चिंताओं पर बात करते हैं और मंडियों से मिली जानकारी साझा करते हैं. वे मिलकर यह तय करने की कोशिश कर रहे हैं कि आगे क्या किया जाए. जो खेती कभी गांव के अधिकांश लोगों के लिए अतिरिक्त आय का भरोसेमंद जरिया थी, वह अब चिंता का विषय बन गई है.

इंदौर के दनसारी गांव के सोयाबीन किसान | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट
इंदौर के दनसारी गांव के सोयाबीन किसान | फोटो: सौम्या पिल्लई/दिप्रिंट

सोयाबीन की बुवाई जून के आखिर से शुरू होगी. इसकी ज्यादातर किस्मों का फसल चक्र 60 से 90 दिन का होता है.

अमेरिका-भारत व्यापार वार्ता को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण कई किसान इस बार सोयाबीन की खेती से दूरी बना रहे हैं. इसका मतलब है कि उत्पादन और भी कम हो सकता है.

कई किसान पहले ही मक्का और अरहर जैसी दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं.

70 वर्षीय राम किशन मौर्य मानते हैं कि भारत के सोयाबीन खेत अमेरिका की विशाल कृषि भूमि का मुकाबला नहीं कर सकते. लेकिन उनका कहना है कि इसके लिए सरकार की उदासीनता भी काफी हद तक जिम्मेदार है. भारत में मिलने वाली सब्सिडी, जमीन का आकार और बाजार समर्थन, अमेरिका के मुकाबले कहीं कम है.

मौर्य और उनके किसान साथी मांग कर रहे हैं कि अगर सरकार अमेरिका के साथ समझौता करने पर अड़ी है, तो कम से कम उच्च गुणवत्ता वाले सोयाबीन बीजों के आयात तक ही इसे सीमित रखे. उनका कहना है कि इससे भारतीय किसानों को मदद मिलेगी और उत्पादकता बढ़ेगी.

मौर्य ने कहा, “आप (सरकार) ने पिछले कई दशकों में हमें कोई खास समर्थन नहीं दिया और अब कम उत्पादन के लिए हमें ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. अब आप हमें दुनिया के सबसे बड़े खिलाड़ियों से मुकाबला करने के लिए कह रहे हैं.”

उन्होंने हंसते हुए कहा, “यह ऐसा होगा जैसे मारुति 800 को Ferrari से मुकाबला करने के लिए उतार दिया जाए.”

यह कहते हुए उन्होंने अपनी चिंता छिपाने की कोशिश की.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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