scorecardresearch
Thursday, 4 June, 2026
होमफीचरबलिराजगढ़ में चौथी बार खुदाई कर रहा है ASI, प्राचीन बिहार के इतिहास पर क्यों है मोदी सरकार की नज़र

बलिराजगढ़ में चौथी बार खुदाई कर रहा है ASI, प्राचीन बिहार के इतिहास पर क्यों है मोदी सरकार की नज़र

बलिराजगढ़ में खुदाई कर रही टीम बार-बार आने वाले भूजल और कर्मचारियों की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रही है. इन दोनों चुनौतियों के बीच, मानसून के नजदीक आने के कारण उनके पास वक्त भी बहुत कम है.

Text Size:

बलिराजगढ़: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की टीम ने जैसे ही बलिराजगढ़ में खुदाई शुरू की, वैसे ही एक नई परेशानी सामने आ गई. इस बार वजह कुछ घुसपैठिए थे. खुदाई शुरू हुए अभी कुछ ही हफ्ते हुए थे कि बलिराजगढ़ जिसे कई लोग प्राचीन विदेह साम्राज्य का प्रशासनिक केंद्र मानते हैं — पुरातत्व विभाग और स्थानीय लोगों के बीच चिंता का विषय बन गया. स्थानीय लोगों को डर है कि वे उस ज़मीन का बड़ा हिस्सा खो सकते हैं, जिसका इस्तेमाल वे पीढ़ियों से करते आ रहे हैं.

9 और 10 मई की रात कुछ लोग बिहार के मधुबनी ज़िले में, भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित 176 एकड़ में फैले बलिराजगढ़ टीले में घुस आए. उन्होंने खुदाई के लिए बनाई गई खाइयों से छेड़छाड़ की और मिट्टी के बर्तनों के यार्ड में रखी कीमती पुरानी चीज़ों को भी नुकसान पहुंचाया.

अगली सुबह एएसआई की टीम ने खुदाई रोक दी और पूरा ध्यान इस ऐतिहासिक स्थल की सुरक्षा पर लगाया. मधुबनी के एसपी योगेंद्र कुमार, एसडीएम चंदन झा, बीडीओ और सर्किल ऑफिसर (सीओ) समेत सभी अधिकारी तुरंत मौके पर पहुंचे. गांव वाले इस जगह को ‘राजा बलि का गढ़’ कहते हैं, जिनका संबंध पौराणिक कथाओं के असुर राजा बलि से माना जाता है.

एएसआई के पटना सर्किल में सहायक पुरातत्वविद और बलिराजगढ़ खुदाई टीम के सदस्य वैभव श्रीवास्तव ने कहा, “अब यह स्थल ज़िला प्रशासन की सुरक्षा में है और यहां 24 घंटे पुलिस तैनात रहती है. हमारी टीम अब चोरी के डर के बिना आराम से काम कर रही है.” उन्होंने उस मिट्टी के बर्तनों वाले यार्ड को भी दिखाया, जहां छेड़छाड़ की घटना हुई थी.

176 एकड़ में फैले इस बड़े टीले पर एएसआई ने इस साल मार्च में खुदाई शुरू की. इसका मकसद उस सवाल का जवाब खोजना है, जो लंबे समय से प्राचीन मिथिला के इतिहास से जुड़ा हुआ है — क्या यह किलेबंद बस्ती वही प्रशासनिक केंद्र थी, जिसका ज़िक्र पौराणिक कथाओं और शुरुआती ग्रंथों में विदेह साम्राज्य के रूप में मिलता है? यहां मौर्य, शुंग, कुषाण और पाल काल में लोगों के रहने के सबूत पहले ही मिल चुके हैं. अब कोशिश और गहराई तक खुदाई करने की है, ताकि ऐसे सबूत मिल सकें जो मिथिला के लिखित इतिहास को कई सदियों पीछे ले जाएं.

बलिराजगढ़ की यह खुदाई कोई सामान्य पुरातात्विक खुदाई नहीं है. इसे इस बात का सबसे मज़बूत सबूत माना जा रहा है कि प्राचीन मिथिला कभी एक बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र था. इसलिए इस किलेबंद टीले पर हो रही खुदाई अब एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील अभियान बन गई है. पुरातत्वविदों का कहना है कि यहां काम कर रही टीम एक ऐसी सभ्यता के सबूत खोज रही है, जो लौह युग के विदेह साम्राज्य के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह बदल सकती है. इस साम्राज्य का संबंध राजा जनक और रामायण से माना जाता है.

यह खुदाई नरेंद्र मोदी सरकार की उस बड़ी पहल का हिस्सा है, जिसका मकसद भारत की प्राचीन जड़ों की गहराई से जांच करना और रामायण व महाभारत काल से जुड़े ठोस सबूत ढूंढ़ना है, लेकिन एएसआई ने बलिराजगढ़ को अब तक अपनी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं किया था, क्योंकि पिछले 100 साल से भी ज़्यादा समय तक उसका ध्यान मगध के इतिहास से जुड़े कामों पर रहा. इसके अलावा, बाढ़ प्रभावित इस दूरदराज़ सीमावर्ती इलाके में पुरातात्विक काम करना भी बेहद मुश्किल है.

जेडीयू सांसद संजय झा 28 मार्च 2026 को मधुबन में बलिराजगढ़ खुदाई के उद्घाटन समारोह में | @SanjayJhaBihar
जेडीयू सांसद संजय झा 28 मार्च 2026 को मधुबन में बलिराजगढ़ खुदाई के उद्घाटन समारोह में | @SanjayJhaBihar

जदयू के राज्यसभा सांसद और परिवहन, पर्यटन व संस्कृति मामलों की संसदीय समिति के अध्यक्ष संजय झा ने कहा, “यह खुदाई परियोजना सिर्फ मधुबनी ज़िले के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे मिथिला क्षेत्र के लिए गर्व और ऐतिहासिक महत्व की बात है. यहां खुदाई के दौरान मिलने वाले पुरातात्विक सबूत इस क्षेत्र के गौरवशाली इतिहास पर रोशनी डालेंगे और मधुबनी में पर्यटन की नई संभावनाएं पैदा करेंगे.”

यहां खुदाई कर रही टीम को दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. पहली, ज़मीन के नीचे का पानी, जो थोड़ी गहराई पर ही निकल आता है. दूसरी, कर्मचारियों की लगातार कमी. इन दोनों समस्याओं के बीच टीम को समय से भी मुकाबला करना पड़ रहा है, क्योंकि मानसून करीब है.

उन्हें उस राजनीतिक समर्थन से भी ताकत मिल रही है, जिसकी शुरुआत ललित नारायण मिश्र के दौर से हुई थी और जो आज नीतीश कुमार और संजय झा तक पहुंची है. इसी दबाव ने एएसआई को उस जगह को गंभीरता से लेने पर मजबूर किया, जिसे मिथिला के कई लोग अपने इतिहास की धरोहर मानते हैं. कांग्रेस और जदयू जैसी पार्टियां लंबे समय से यहां खुदाई की मांग करती रही हैं, लेकिन एएसआई ने पहले इस परियोजना में ज़्यादा रुचि नहीं दिखाई थी.

किंवदंतियों के अनुसार, कमला और बलान नदियों के बीच बसा बलिराजगढ़ कभी राक्षस राजा बलि की राजधानी था. इस जगह की पहचान सबसे पहले 1884 में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने की थी, जो उस समय मधुबनी के सब-डिविज़नल मजिस्ट्रेट थे. उन्होंने इसे ‘राजा बलि का गढ़’ यानी एक विशाल किलेबंदी के रूप में दर्ज किया था.

उनकी रिपोर्ट के बाद यह स्थल औपनिवेशिक काल के पुरातात्विक अध्ययनों में शामिल हुआ और 1938 में इसे ‘राष्ट्रीय महत्व का स्थल’ घोषित कर दिया गया. लेकिन एएसआई के लिए यह कभी प्राथमिकता नहीं बना. उसने न तो खुद से यहां खुदाई शुरू की और न ही विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की. हर बार खुदाई के लिए राजनीतिक हस्तक्षेप की ज़रूरत पड़ी.

मौजूदा खुदाई से पहले आज़ादी के बाद यहां तीन बार खुदाई हो चुकी है — 1962, 1972 और 2013 में. इस बार एएसआई मुख्यालय ने खुदाई के लिए एक साल की मंज़ूरी दी है.

इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) के राज्य सह-संयोजक शिव कुमार मिश्र ने कहा, “1962 से लेकर अब तक बलिराजगढ़ की खुदाई हमेशा राजनीतिक पहल की वजह से हुई है. एएसआई ने अपनी तरफ से इस ऐतिहासिक स्थल में कभी खास रुचि नहीं दिखाई. राजनीतिक नेताओं ने ही संस्कृति मंत्रालय पर दबाव बनाया और बातचीत करके यहां खुदाई शुरू करवाई.”

इस बार एएसआई का लक्ष्य ज़मीन की सबसे नीचे की प्राकृतिक परत तक पहुंचना है, जहां पहले कभी नहीं पहुंचा जा सका. साथ ही खुदाई में मिलने वाली संरचनाओं को सुरक्षित रखना भी उसकी प्राथमिकता है.

बिहार के कई ज़िला संग्रहालयों के प्रमुख रह चुके मिश्रा ने कहा, “यह खुदाई उत्तरी भारत की सबसे कम खोजी गई सभ्यताओं में से एक के बारे में हमारी समझ को पूरी तरह नया रूप दे सकती है.”

कई दशकों से पुरातत्वविद, संग्रहालय विशेषज्ञ और इतिहासकार बलिराजगढ़ में खुदाई की मांग करते रहे हैं. इसके लिए हाई कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई और एएसआई के डायरेक्टर जनरल व संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों को कई पत्र लिखे गए | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
कई दशकों से पुरातत्वविद, संग्रहालय विशेषज्ञ और इतिहासकार बलिराजगढ़ में खुदाई की मांग करते रहे हैं. इसके लिए हाई कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई और एएसआई के डायरेक्टर जनरल व संस्कृति मंत्रालय के अधिकारियों को कई पत्र लिखे गए | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

स्टाफ की कमी, पानी का ऊंचा स्तर

सूरज निकलने से पहले, खुदाई करने वालों की एक छोटी टीम जर्जर आंबेडकर हॉस्टल से निकलती है, जहां उन्होंने अपना अस्थायी ठिकाना बनाया हुआ है. यह जगह खुदाई स्थल से कुछ ही मिनट की पैदल दूरी पर है. एएसआई के पुरातत्व संस्थान के प्रशिक्षु अपने औज़ार उठाते हैं और तेज़ गर्मी शुरू होने से पहले काम में लग जाते हैं.

लेकिन सिर्फ गर्मी ही काम को मुश्किल नहीं बना रही है. खुदाई पर गांव वालों की नज़र और टीले पर एएसआई कर्मचारियों की लगातार आवाजाही भी काम में बाधा डालती है. मई में खुदाई स्थल पर हुई छेड़छाड़ की कोशिश ने यह बात साफ कर दी थी. सदियों से इस बड़े टीले के आसपास रहने वाले गांव वाले इस ज़मीन का इस्तेमाल अपने मवेशियों को चराने, आराम करने और हर साल मेला लगाने के लिए करते रहे हैं. अब उन्हें डर है कि अगर यहां कोई बड़ी खोज हो गई, तो यह ज़मीन उनसे छिन सकती है. हाल की घुसपैठ भी इस परियोजना को रोकने की ऐसी ही एक कोशिश थी. इससे पहले हुई खुदाइयां भी कुछ महीनों से ज़्यादा नहीं चल पाई थीं.

एक और बड़ी चुनौती है पानी. युवा पुरातत्वविद वैभव श्रीवास्तव ने खुदाई की एक खाई की ओर इशारा किया, जहां उनकी टीम को सिर्फ तीन मीटर नीचे ही पानी मिल गया था.

श्रीवास्तव ने कहा, “खुदाई वाली जगह पर पानी का स्तर बहुत ऊंचा है. यहां से दो नदियां—कमला और बलान बहती हैं और परिसर के अंदर एक बड़ा तालाब भी है. ऐसे में खुदाई करना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.”

इससे पहले 2013-14 और 1972-73 की खुदाई में भी काम इसलिए रोकना पड़ा था, क्योंकि पानी लगातार ऊपर आ रहा था.

1962-63 में एएसआई द्वारा की गई खुदाई की एक तस्वीर | विशेष व्यवस्था
1962-63 में एएसआई द्वारा की गई खुदाई की एक तस्वीर | विशेष व्यवस्था

1972-73 की ‘इंडियन आर्कियोलॉजिकल रिव्यू’ रिपोर्ट में कहा गया था, “खुदाई स्थल पर पानी का स्तर ऊंचा होने की वजह से ज़मीन की प्राकृतिक मिट्टी तक नहीं पहुंचा जा सका.”

एएसआई को ऐसी ही दिक्कतें पुडुचेरी के अरिकामेडु, गुजरात के लखापर और तमिलनाडु के पूमपुहार में भी झेलनी पड़ी हैं.

पुरातत्वविद और एएसआई के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक (पूर्वी क्षेत्र) फणीकांत मिश्रा ने कहा, “इन जगहों पर पुरातत्वविदों ने खुदाई की खाइयों में पानी भरने और बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया था. बलिराजगढ़ में भी परत-दर-परत वैज्ञानिक खुदाई के साथ भूजल प्रबंधन की तकनीकें अपनानी चाहिए. इनमें नियंत्रित पंपिंग, ट्यूबवेल के जरिए पानी का स्तर कम करना और वेट सीविंग जैसी तकनीकें शामिल हैं.”

फिलहाल इनमें से कोई भी तरीका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है.

जब 28 मार्च को खुदाई शुरू हुई थी, तब मधुबनी प्रशासन ने एएसआई को भरोसा दिया था कि भूजल विभाग की मदद से पानी की समस्या से निपटा जाएगा, लेकिन हाल के दिनों में लगातार बारिश होने से यह समस्या और बढ़ गई है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
जब 28 मार्च को खुदाई शुरू हुई थी, तब मधुबनी प्रशासन ने एएसआई को भरोसा दिया था कि भूजल विभाग की मदद से पानी की समस्या से निपटा जाएगा, लेकिन हाल के दिनों में लगातार बारिश होने से यह समस्या और बढ़ गई है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

वैभव श्रीवास्तव ने कहा, “हम खाइयों से पानी निकालते हैं और फिर खुदाई करते हैं, लेकिन रात भर में खाई फिर से पानी से भर जाती है, क्योंकि इस इलाके में भूजल स्तर काफी ऊपर है.”

उन्होंने बताया कि इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन से बातचीत की जा रही है.

मिश्रा ने कहा कि सर मॉर्टिमर व्हीलर द्वारा अरिकामेडु में इस्तेमाल किया गया ‘व्हीलर बॉक्स-ग्रिड सिस्टम’ बलिराजगढ़ में भी उपयोगी साबित हो सकता है.

उन्होंने कहा, “इस तरीके में नियंत्रित चौकोर ग्रिड बनाकर खुदाई की जाती है और मिट्टी के कुछ हिस्सों को वैसे ही छोड़ा जाता है. इससे खाइयों के गिरने का खतरा कम होता है और गीली मिट्टी वाली परिस्थितियों में भी वैज्ञानिक तरीके से खुदाई करना आसान हो जाता है.”

यह खुदाई एएसआई के पटना सर्किल के अधीक्षक पुरातत्वविद हरि ओम सरन की देखरेख में हो रही है. ज़मीन पर दो सहायक पुरातत्वविद, दो प्रशिक्षु और कुछ स्थानीय मज़दूर काम कर रहे हैं.

बलिराजगढ़ के काम से जुड़े एएसआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “इस तरह का किलेबंद टीला बहुत दुर्लभ है और यह बिहार के सबसे बड़े पुरातात्विक स्थलों में से एक है. यहां कई चुनौतियां हैं, लेकिन हमारा मुख्य लक्ष्य उस प्राकृतिक मिट्टी तक पहुंचना है, जहां तक पिछली किसी भी खुदाई में नहीं पहुंचा जा सका था.”

हालांकि, श्रीवास्तव ने माना कि इतने बड़े क्षेत्र के लिए कर्मचारियों की संख्या कम है, लेकिन उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में और लोगों को काम पर लगाया जाएगा.

किंवदंतियों के अनुसार, यह स्थल मिथिला साम्राज्य का हिस्सा था, जहां सीता के पिता राजा जनक का शासन था. हालांकि, अभी तक ऐसा कोई पुरातात्विक सबूत नहीं मिला है, जिससे इस जगह का संबंध सीधे रामायण काल से जोड़ा जा सके.

खुदाई करने वालों को अगर एनबीपीडब्ल्यू (उत्तरी काले पॉलिश वाले मृदभांड) के बड़ी संख्या में अवशेष मिलते हैं और इसके लिए उन्हें और गहराई तक खुदाई करनी होगी — तभी वे इस प्राचीन स्थल के इतिहास को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे.

इस बार एएसआई ने तीन बड़े लक्ष्य तय किए हैं. दिप्रिंट को इस स्थल से जुड़ी एएसआई की एक आंतरिक प्रस्तुति मिली है. इसके अनुसार, सबसे बड़ा उद्देश्य यहां की पूरी बसावट के स्वरूप को समझना है, जिसके लिए बड़े पैमाने पर खुदाई की जाएगी.

पिछली तीन खुदाइयों में पुरातत्वविदों ने केवल कुछ खाइयां खोदी थीं, ताकि इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व का अंदाज़ा लगाया जा सके. वहां उन्हें अलग-अलग संस्कृतियों से जुड़ी पुरानी वस्तुएं मिली थीं.

लेकिन इस बार 20 खाइयां खोदने की योजना है, जो काफी बड़ी संख्या है, ताकि पूरे टीले को बेहतर तरीके से समझा जा सके.

एएसआई की आंतरिक प्रस्तुति में कहा गया है, “इसके साथ-साथ संरक्षण का काम भी किया जा रहा है. इस जगह को वैशाली, नालंदा और विक्रमशिला की तरह एक बड़े पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाएगा.”

बलिराजगढ़ खुदाई स्थल पर मिट्टी के बर्तनों का यार्ड | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
बलिराजगढ़ खुदाई स्थल पर मिट्टी के बर्तनों का यार्ड | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

एक खोज

दो महीने की खुदाई में, श्रीवास्तव की टीम ने पांच नई खाइयां खोदी हैं, जिन्हें पिछली खुदाइयों में छुआ भी नहीं गया था. पुरातत्वविद इन खाइयों के सात हिस्सों (क्वाड्रेंट्स) पर काम कर रहे हैं — इनमें से एक खाई को चार हिस्सों में बांटा गया है. इन खाइयों के पास ही बच्चे क्रिकेट खेलते हैं.

विद्वानों और पुरातत्वविदों का मानना है कि यह किलेबंद इलाका प्राचीन समय का कोई बड़ा किला हो सकता है, क्योंकि बिहार में कहीं और इतनी बड़ी किलेबंदी नहीं मिलती.

बलिराजगढ़ किले में प्रवेश के लिए चार दरवाज़े हैं. इनमें से एक दरवाज़े पर, जो अंबेडकर हॉस्टल के पास है, नीले रंग का जंग लगा लोहे का बोर्ड लगा है. इस पर लिखा है कि यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित स्मारक है.

मिश्रा के अनुसार, यह किलेबंद इलाका बहुत विशाल है और इससे साफ पता चलता है कि प्राचीन समय में यह किसी साधारण राजा का किला नहीं रहा होगा. वह वाल्मीकि रामायण का ज़िक्र करते हैं, जिसमें बताया गया है कि गौतम आश्रम जाने के बाद भगवान राम ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर गए थे. रामायण में गौतम आश्रम वह पवित्र स्थान है, जहां भगवान राम ने ऋषि गौतम की पत्नी अहल्या को श्राप से मुक्त कराया था. वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यह आश्रम मिथिला क्षेत्र में स्थित था.

मिश्रा ने कहा, “उत्तर-पूर्व दिशा में बलिराजगढ़ ही ऐसी एकमात्र जगह है और संभव है कि यह सीता के पिता राजा जनक का स्थान रहा हो. लेकिन हमारे पास इसे साबित करने वाला कोई पुरातात्विक सबूत नहीं है. यहां लंबे समय तक खुदाई होनी चाहिए.”

स्थानीय अखबारों में वर्षों से बलिराजगढ़ पर लेख छपते रहे हैं — ‘दबी हो सकती है मिथिला नगरी, खोद निकालने वाला कोई नहीं’. एक अन्य लेख का शीर्षक था — ‘बलिराजगढ़ में 2,500 साल पुरानी सभ्यता के प्रमाण मिले’. इस खबर में ज़मीन से मिली ईंटों की दीवारों और शुंग व कुषाण काल की कलाकृतियों का उल्लेख किया गया था.

टीले पर गांववालों ने अतिक्रमण करके जो ढांचा बनाया है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
टीले पर गांववालों ने अतिक्रमण करके जो ढांचा बनाया है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

हिंदी दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, “इससे उस शहरी सभ्यता के बारे में सुराग मिले हैं जो प्राचीन समय में विकसित हुई थी. उम्मीद है कि यह पुरातात्विक खज़ाना मिथिला के गौरवशाली इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगा.” इस बड़े टीले के आसपास घनी आबादी होने के बावजूद, यहां मौजूद पुरातात्विक अवशेषों को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा है.

इस स्थल को एक स्थानीय अंधविश्वास का भी फायदा मिला है, जिसने इसे नष्ट होने से बचा लिया.

खुदाई करने वाले सीता राम रॉय ने 1972-73 की खुदाई पर लिखे अपने लेख ‘बलिराजगढ़ – एक अनोखी ऐतिहासिक जगह’ में इसका ज़िक्र किया था. यह लेख 1978 में ‘द हेरिटेज ऑफ इंडिया: एल. एन. मिश्रा कमेमोरेशन वॉल्यूम’ में प्रकाशित हुआ था.

उन्होंने लिखा, “स्थानीय लोगों का मानना है कि राजा और उनकी सेना के भूत आज भी वहां रहते हैं. अगर कोई ‘गढ़’ से एक भी ईंट चुरा लेता है, तो वे भूत उसे नुकसान पहुंचाते हैं. लोगों को दूर रखने के लिए इतना ही काफी है.”

लेकिन भीषण गर्मी और बीच-बीच में होने वाली बारिश ने खुदाई को मुश्किल बना दिया है. सिर्फ मई महीने में यहां तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच गया था और कई दिनों तक रुक-रुक कर बारिश भी हुई.

एक छोटी टीम तेज धूप में लगातार मेहनत कर रही है. वे बीच-बीच में रुककर पानी और ग्लूकोज़ पीते हैं और माथे से बहता पसीना पोंछते रहते हैं.

बलिराजगढ़ साइट का 1963 का खुदाई का नक्शा | स्पेशल अरेंजमेंट
बलिराजगढ़ साइट का 1963 का खुदाई का नक्शा | स्पेशल अरेंजमेंट

काम करने के लिए जगह की कमी नहीं है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती भूजल और ज़मीन की प्राकृतिक परत तक पहुंचना है.

इस बड़े टीले का इस्तेमाल गांव वाले अपने मवेशियों को चारा खिलाने के लिए करते हैं. हर साल अप्रैल में परिसर के अंदर बने एक टीले पर स्थानीय ‘चैती मेला’ भी लगाया जाता है.

रमनिपट्टी गांव के निवासी मुकेश यादव, जिन्होंने 2013-14 की खुदाई देखी थी, कहते हैं, “पहले हमारे पूर्वज और अब हम इस जगह का इस्तेमाल करते हैं. हर साल रामनवमी मेले के दौरान हम यहां उत्सव मनाते हैं.”

लेकिन इस बार खुदाई करने वाले एक बहुत महत्वपूर्ण खोज के मिशन पर हैं.

श्रीवास्तव ने कहा कि अगर यह वास्तव में प्राचीन समय का किला था, तो इसका मुख्य प्रवेश द्वार भव्य रहा होगा. इसी सोच के आधार पर किलेबंदी वाली दीवार के पास एक खाई खोदी गई.

श्रीवास्तव ने कहा, “हमें किलेबंदी वाली दीवार से जुड़ी एक और दीवार के कुछ सबूत मिल रहे हैं.”

उन्होंने बताया कि खुदाई के दौरान उनकी टीम को गेंद जैसा एक गोल पत्थर का हथियार मिला है. उनके अनुसार, इस तरह के पत्थर के हथियार को ‘महाशिला कंटक’ कहा जाता था और 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में मगध के राजा अजातशत्रु युद्धों में इसका इस्तेमाल करते थे.

श्रीवास्तव का मानना है कि अगर यह हथियार इसी इलाके से मिला है, तो संभव है कि किले का मुख्य प्रवेश द्वार भी यहीं कहीं रहा हो. पिछली किसी भी खुदाई में ऐसा सबूत नहीं मिला था.

कुछ घुसपैठियों ने मिट्टी के बर्तनों वाले अहाते से पत्थर के कुछ टूटे-फूटे हथियार उठाकर उन्हें पानी से भरी एक खाई में फेंक दिया था.

किलेबंदी वाला यह इलाका बहुत बड़ा है और इससे साफ पता चलता है कि प्राचीन समय में यह किसी साधारण राजा का किला नहीं रहा होगा. अधिकारी वाल्मीकि रामायण का हवाला देते हैं, जिसमें बताया गया है कि गौतम आश्रम के दर्शन के बाद भगवान राम 'ईशान कोण' (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर गए थे | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
किलेबंदी वाला यह इलाका बहुत बड़ा है और इससे साफ पता चलता है कि प्राचीन समय में यह किसी साधारण राजा का किला नहीं रहा होगा. अधिकारी वाल्मीकि रामायण का हवाला देते हैं, जिसमें बताया गया है कि गौतम आश्रम के दर्शन के बाद भगवान राम ‘ईशान कोण’ (उत्तर-पूर्व दिशा) की ओर गए थे | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

हालांकि, खुदाई स्थल पर नियमों का पूरी तरह पालन नहीं हो रहा है. आमतौर पर खुदाई करने वाले मिट्टी की अलग-अलग परतों (स्ट्रैटिग्राफिक लेवल) पर निशान लगाते हैं, लेकिन बलिराजगढ़ में खाइयों पर ऐसे निशान नहीं लगाए गए हैं.

इसके अलावा, पुरातत्वविदों द्वारा मिट्टी के बर्तनों को रखने के लिए बनाया गया अहाता भी खुले में पड़ा है और वहां सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है.

फिर भी, बलिराजगढ़ की खुदाई के लिए धन की कोई कमी नहीं है. इस परियोजना के लिए लगभग 3.26 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया गया है. इसमें से करीब आधी राशि खुदाई में मिली संरचनाओं और किलेबंदी वाली दीवारों के संरक्षण और मरम्मत के लिए रखी गई है.

फणीकांत मिश्रा ने कहा, “एएसआई को वरिष्ठ पुरातत्वविदों की नियुक्ति करनी चाहिए, ताकि यह काम पूरी तरह पेशेवर तरीके से किया जा सके.”

मिश्रा मिथिला के पुरातत्वविद हैं और उनका पुश्तैनी घर खुदाई स्थल से सिर्फ कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.


यह भी पढ़ें: नोएडा में ASI का वीरान कैंपस—289 करोड़ की लागत से बनी भव्य इमारत, 15 छात्र लेकिन कोई फैकल्टी नहीं


चौथी खुदाई

टीले के बीचों-बीच ईंटों का एक अस्थायी ढांचा बना हुआ है, जिस पर एस्बेस्टस और बांस की छत डाली गई है. यह ढांचा हर साल लगने वाले चैती मेले के दौरान एक अस्थायी मंदिर का काम करता है. मई की एक धूप भरी दोपहर में कुछ महिलाएं इस ढांचे के बाहर बैठी थीं. उनके हाथों में अगरबत्तियां थीं और वे उस जगह की पूजा कर रही थीं. कमरे के पास बांस से बंधी एक छोटी लाल झंडी भी लहरा रही थी.

गांव के रहने वाले मुकेश यादव ने बताया कि यह जगह उनके लिए पवित्र है और महिलाएं अक्सर यहां पूजा करने आती हैं.

यहां एएसआई द्वारा 1960 के दशक में बनाया गया एक पक्का ढांचा भी मौजूद है. इसे खुदाई करने वाले कर्मचारियों के रहने के लिए बनाया गया था. ईंटों से बना यह छोटा ढांचा अब खंडहर जैसा हो चुका है. इसकी दीवारें और छत टूट चुकी हैं. गांव के लोग, जो टीले पर अपने मवेशी चराते हैं, इसका इस्तेमाल आराम करने के लिए करते हैं. आजकल, अवैध घुसपैठ की कोशिश के बाद तैनात पुलिसकर्मी भी यहां आराम करते हैं.

ढांचा बने पांच दशक से ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन एएसआई ने इसके रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया. टीले की चारदीवारी भी गोबर के उपलों से ढकी हुई है.

दो महीने बीत जाने के बाद भी यहां कोई बड़ी खोज नहीं हुई है. खुदाई में मिली चीज़ें वही हैं जो पहले की खुदाइयों में भी मिल चुकी थीं—मिट्टी की तख्तियां, जिन पर गहने पहने स्त्री-पुरुषों की आकृतियां बनी हैं, कीमती पत्थरों के मनके, गुलेल के पत्थर, चूड़ियों के टुकड़े, तांबे की सुरमादानी और एनबीपीडब्ल्यू (उत्तरी काले पॉलिश वाले मृद्भांड), ब्लैक स्लिप्ड वेयर, ग्रे वेयर और रेड वेयर श्रेणी के मिट्टी के बर्तन.

एएसआई के एक अधिकारी के अनुसार, पुरातात्विक सबूतों के आधार पर पहला किला दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बनाया गया था और पाल काल तक इसका इस्तेमाल होता रहा.

1962-63 में पहली खुदाई एएसआई के मध्य-पूर्वी मंडल ने की थी. 1972-73 में बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय ने खुदाई कराई थी. इसके बाद 2013-14 में एएसआई के पटना मंडल ने यहां खुदाई की.

फणीकांत मिश्रा ने बताया कि खुदाई में चार सांस्कृतिक कालों के अवशेष मिले हैं—उत्तरी काले पॉलिश वाले मृद्भांड (NBPW) काल से लेकर शुंग-कुषाण काल तक और फिर गुप्त काल से पाल काल तक.

प्रसिद्ध पुरातत्वविद बीबी लाल ने अन्य जगहों पर रामायण से जुड़े स्थलों और घटनाओं का समय तय करने के लिए NBPW की मौजूदगी को एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक आधार माना था.

एएसआई ने आज तक इस स्थल की खुदाई की कोई विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की है. हालांकि, खुदाई का एक छोटा सारांश ‘इंडियन आर्कियोलॉजिकल रिव्यू’ (IAR) में प्रकाशित किया गया था.

1962-63 की IAR रिपोर्ट में कहा गया था, “रक्षा-पूर्व जमाव से उत्तरी काले पॉलिश वाले बर्तनों (Northern Black Polished Ware) के टुकड़े मिले. ऐसा लगता है कि किलेबंदी का निर्माण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास हुआ था और इसका उपयोग पाल काल तक जारी रहा.”

एक राजनीतिक खुदाई

पुरातत्वविदों और संग्रहालय विशेषज्ञों को बलिराजगढ़ के ऐतिहासिक महत्व पर कोई संदेह नहीं है, लेकिन यह अब तक एएसआई की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं रहा.

28 मई को संग्रहालय विशेषज्ञ शिव कुमार मिश्रा इतिहास के कुछ छात्रों के साथ बलिराजगढ़ पहुंचे थे.

मिश्रा ने कहा, “विद्वानों के बीच बलिराजगढ़ के ऐतिहासिक महत्व को लेकर कोई संदेह नहीं है. एएसआई को इस स्थल के लिए अलग से विशेष खुदाई परियोजना बनानी चाहिए, जैसी नालंदा, वैशाली और विक्रमशिला के लिए बनाई गई थी. तभी स्थिति बदलेगी.”

जब 1963 में यहां पहली बार खाइयां खोदी गईं, तब यह काम तत्कालीन रेल मंत्री और दरभंगा के सांसद ललित नारायण मिश्र के प्रयासों से हुआ था. दरभंगा बड़े मिथिला क्षेत्र का हिस्सा है. उस समय बिहार सरकार ने अपना प्रस्ताव केंद्रीय पुरातत्व सलाहकार बोर्ड की स्थायी समिति को भेजा था.

करीब 50 साल बाद, 2012 में अपनी चार दिन की ‘सेवा यात्रा’ के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मधुबनी में एक जनसभा को संबोधित किया. उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार उन मामलों में भी बिहार के साथ भेदभाव कर रही है, जो राष्ट्रीय गौरव से जुड़े हैं. इसके बाद उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा.

नीतीश कुमार ने 2012 में कहा था, “मधुबनी जिले में स्थित बलिराजगढ़ किले और अन्य पुरातात्विक महत्व के स्थलों की एएसआई द्वारा की जा रही उपेक्षा इसका एक बड़ा उदाहरण है.”

2013 में एएसआई ने एम.एस. चौहान की निगरानी में यहां खुदाई शुरू की. उस दौरान गुप्त और पाल काल से जुड़ी पांच संरचनाएं मिलने की जानकारी सामने आई थी. लेकिन यह खुदाई केवल एक महीने तक ही चल सकी.

खुदाई बंद होने के एक साल बाद, इसे दोबारा शुरू कराने के लिए पटना हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई. याचिका में कहा गया था कि एएसआई पूरे देश में राम, कृष्ण और अन्य महान राजाओं के जन्मस्थलों की खोज में लगा है, लेकिन वह सीता के जन्मस्थान की खोज को नजरअंदाज कर रहा है.

2014 में बिहार के संग्रहालय एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व निदेशक उमेश चंद्र द्विवेदी ने तत्कालीन एएसआई महानिदेशक राकेश तिवारी को पत्र लिखकर खुदाई दोबारा शुरू करने का अनुरोध किया था.

इस नए प्रयास के तहत जदयू सांसद संजय झा ने केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र शेखावत, संस्कृति सचिव और एएसआई के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई बैठकें कीं.

झा परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष भी हैं. उन्होंने 28 मार्च को हिंदू रीति-रिवाजों के साथ खुदाई कार्य का उद्घाटन किया था.

उन्होंने कहा, “यह मिथिला की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को सामने लाने और उसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.”

संजय झा केवल मंजूरी मिलने तक ही सीमित नहीं रहे. मई में उन्होंने फिर से गजेंद्र शेखावत से मुलाकात की और बलिराजगढ़ में चल रही खुदाई पर चर्चा की. उन्होंने एक पत्र सौंपकर मांग की कि बलिराजगढ़ को एएसआई के तहत एक स्वतंत्र उप-सर्किल के रूप में विकसित किया जाए.

उन्होंने कहा, “हमें पूरा विश्वास है कि बलिराजगढ़ में बड़े पैमाने पर, योजनाबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से खुदाई और संरक्षण का काम होने पर इसे नई पहचान मिलेगी.”

झा की हालिया राजनीतिक पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि एएसआई लंबे समय तक इस परियोजना से जुड़ा रहे.

शेखावत के साथ अपनी एक बैठक में उन्होंने कम से कम अगले 10 वर्षों तक चरणबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से खुदाई जारी रखने का आग्रह किया.

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: नालंदा म्यूज़ियम के सीक्रेट मेकओवर की कहानी: भारत के गर्व और पीड़ा का संगम


 

share & View comments