नई दिल्ली: ईरान ने मंगलवार को औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सर्वोच्च नेता आयतुल्ला अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार और दफन समारोह में शामिल होने का निमंत्रण दिया. अंतिम यात्रा 4 जुलाई से शुरू होगी और 9 जुलाई को खामेनेई के दफन के साथ समाप्त होगी.
ईरानी सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि प्रधानमंत्री मोदी के नाम भेजा गया यह औपचारिक निमंत्रण एक नोट वर्बेल (कूटनीतिक पत्र) के जरिए विदेश मंत्रालय को सौंपा गया.
एक सूत्र ने कहा, “ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च नेता आयतुल्ला सैयद अली खामेनेई के कई दिनों तक चलने वाले राजकीय अंतिम संस्कार और दफन समारोह में शामिल होने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया है.”
मंगलवार को निमंत्रण सौंपे जाने के बावजूद भारत की ओर से अभी तक यह पुष्टि नहीं की गई है कि प्रधानमंत्री मोदी ने निमंत्रण स्वीकार किया है या नहीं. भारतीय प्रतिनिधिमंडल में कौन शामिल होगा, इस पर भी कोई जानकारी नहीं दी गई है.
28 फरवरी को अमेरिका और इज़रायल के ईरान पर हमले के बाद खामेनेई की मौत हुई थी. भारत ने इस घटना की सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की थी.
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने 5 मार्च को नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास में शोक-पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए थे. खामेनेई की मृत्यु के बाद भारत सरकार की ओर से ईरान के प्रति यह पहला आधिकारिक शोक संदेश था.
अंतिम यात्रा 4 जुलाई को तेहरान से शुरू होगी. खामेनेई के साथ उनके परिवार के चार अन्य सदस्यों—मेसबाह-ओल-होदा बाघेरी, सैयदेह बोशरा हुसैनी खामेनेई, ज़हरा हद्दाद आदेल और ज़हरा मोहम्मदी गोलपायगानी, के शव भी साथ ले जाए जाएंगे.
7 जुलाई को यह यात्रा कोम पहुंचेगी, जहां ईबादत सभा आयोजित की जाएगी. इसके बाद यात्रा नजफ और कर्बला जाएगी और फिर 9 जुलाई को मशहद पहुंचेगी, जहां सभी को दफनाया जाएगा.
अंतिम यात्रा के दौरान कई देशों के प्रतिनिधिमंडलों के श्रद्धांजलि देने की उम्मीद है.
अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच युद्ध लगभग 40 दिनों तक चला था. इसके बाद 8 अप्रैल को एक नाजुक युद्धविराम पर सहमति बनी. 17 जून को ईरान और अमेरिका ने संघर्ष विराम को आगे बढ़ाने और बड़े शांति समझौते पर बातचीत के लिए एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए.
इस समझौते को आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच पहली दौर की बातचीत पिछले वीकेंड स्विट्जरलैंड में हुई थी. इसमें पाकिस्तान और कतर ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी. अमेरिका और इज़रायल के संयुक्त हमलों के जवाब में ईरान ने लगभग चार महीने तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद रखा था.
भारत लगातार अमेरिका और ईरान दोनों के संपर्क में रहा है और उसने औपचारिक रूप से इस समझौता ज्ञापन का स्वागत किया है. इससे वॉशिंगटन और तेहरान के बीच नई प्रत्यक्ष वार्ताओं का रास्ता खुला है.
ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची पिछले महीने ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए नई दिल्ली आए थे.
2019 में ईरान के तेल क्षेत्र पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने तक भारत और ईरान के बीच घनिष्ठ आर्थिक संबंध रहे हैं. दोनों देशों ने चाबहार बंदरगाह को संयुक्त रूप से विकसित करने पर भी सहमति जताई थी. हालांकि, अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताएं पूरी करने के बाद इस परियोजना से पीछे हट गया.
राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन अभी तक भारत की यात्रा पर नहीं आए हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने आखिरी बार मई 2016 में ईरान का दौरा किया था. उस दौरान उन्होंने खामेनेई से मुलाकात की थी और तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी के साथ आधिकारिक वार्ता भी की थी.
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