नई दिल्ली: इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एपिडेमियोलॉजी (ICMR-NIE) का बनाया एक वेब-बेस्ड कैलकुलेटर, कुछ क्लिनिकल मेज़रमेंट का इस्तेमाल करके, ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) के मरीज़ के डायग्नोसिस के समय मरने के रिस्क का अनुमान लगा सकता है.
ICMR-NIE के शोधकर्ताओं का कहना है कि इस मृत्यु-पूर्वानुमान (डेथ प्रेडिक्शन) टूल की मदद से तमिलनाडु में टीबी से होने वाली मौतों को कम करने में सफलता मिली. इसके बावजूद इस कैलकुलेटर को अभी तक केंद्रीय टीबी प्रभाग (सीटीडी) ने नहीं अपनाया है. सीटीडी भारत के राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (National Tuberculosis Elimination Programme) को लागू करने वाली केंद्रीय संस्था है.
हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि इस कैलकुलेटर का तमिलनाडु के बाहर अभी स्वतंत्र रूप से सत्यापन (एक्सटर्नल वैलिडेशन) नहीं हुआ है.
पिछले हफ्ते ब्रिटिश मेडिकल जर्नल बीएमजे ओपन में छपी स्टडी के अनुसार, यह कैलकुलेटर मरीज की पहली जांच के दौरान उपलब्ध सामान्य क्लीनिकल जानकारी के आधार पर टीबी की पहचान के दो महीने के भीतर मौत की संभावना और एक साल के भीतर कुल मृत्यु जोखिम का अनुमान लगाता है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका खासतौर पर उन क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया है जहां संसाधन सीमित हैं और लैब जांच तुरंत उपलब्ध नहीं हो पाती.
Mycobacterium tuberculosis नामक बैक्टीरिया से होने वाली टीबी, रोकी और ठीक की जा सकने वाली बीमारी होने के बावजूद, आज भी दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक है.
वैश्विक टीबी रिपोर्ट 2024 के अनुसार, भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा टीबी मरीज हैं और हर साल टीबी से जुड़ी तीन लाख से अधिक मौतें दर्ज की जाती हैं. इनमें से लगभग 70 प्रतिशत मौतें बीमारी की पहचान होने के पहले दो महीनों के भीतर होती हैं. इसलिए गंभीर रूप से बीमार मरीजों की जल्दी पहचान करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
ICMR-NIE के वरिष्ठ चिकित्सा वैज्ञानिक और अध्ययन के लेखक डॉ. हेमंत दीपक शेवड़े ने द प्रिंट से कहा, “इस पहल ने दिखाया है कि वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए गए टूल और प्रक्रियाओं का पालन करके टीबी से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. ट्रायेजिंग (प्रारंभिक आकलन) के जरिए गंभीर मरीजों की जल्दी पहचान की जा सकती है और बीमारी की पुष्टि होते ही उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया जा सकता है.”
तमिलनाडु के मृत्यु-दर घटाने वाले कार्यक्रम से विकसित हुआ यह कैलकुलेटर
यह कैलकुलेटर Tamil Nadu Kasanoi Erappila Thittam (TN-KET) से विकसित हुआ है. यह 2022 से 2025 के बीच चलाया गया एक राज्यव्यापी कार्यक्रम था, जिसमें टीबी मरीजों की देखभाल के लिए अलग-अलग स्तर की रणनीति अपनाई गई. इसका उद्देश्य उन मरीजों की पहचान करना था, जिनमें मौत का खतरा अधिक था और उन्हें ज्यादा निगरानी व बेहतर इलाज देकर टीबी से होने वाली मौतों को कम करना था.
यह पहल तमिलनाडु राज्य टीबी सेल द्वारा राज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख निदेशालयों के सहयोग से नियमित स्वास्थ्य व्यवस्था के तहत लागू की गई थी. इसमें चेन्नई को छोड़कर राज्य के सभी 38 जिलों को शामिल किया गया था.
TN-KET के तहत, स्वास्थ्यकर्मियों ने टीबी की पहचान होते ही हर नए वयस्क मरीज का पांच आसान क्लीनिकल मापदंडों के आधार पर प्रारंभिक आकलन (ट्रायेजिंग) किया. इनमें बॉडी मास इंडेक्स (BMI), पैरों और टखनों में सूजन (पेडल एडीमा), सांस लेने की दर, ऑक्सीजन सैचुरेशन और मरीज की बिना सहारे खड़े होने की क्षमता शामिल थी.
जिन मरीजों को गंभीर रूप से बीमार पाया गया, उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने और उन पर अधिक निगरानी रखने को प्राथमिकता दी गई.
टीबी डेथ प्रेडिक्शन कैलकुलेटर के लिए जुलाई 2022 से जून 2023 के बीच राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में टीबी से पीड़ित 55,971 वयस्क मरीजों के आंकड़ों का उपयोग किया गया.
कुल मृत्यु दर 7.4 प्रतिशत रही, जबकि 67.9 प्रतिशत मौतें इलाज शुरू होने के पहले दो महीनों के भीतर हुईं.
जिन मरीजों को गंभीर रूप से बीमार चिन्हित किया गया था, उनमें मृत्यु दर 19.8 प्रतिशत रही, जबकि गंभीर श्रेणी में नहीं आने वाले मरीजों में यह दर 5.1 प्रतिशत थी.
इस पहल का असर ज़मीनी स्तर पर भी स्पष्ट दिखाई दिया. धर्मपुरी जिले में टीबी मृत्यु दर 12.5 प्रतिशत से घटकर 7.8 प्रतिशत हो गई. करूर में यह 7.1 प्रतिशत से घटकर 5.3 प्रतिशत और विलुप्पुरम में 6.1 प्रतिशत से घटकर 5.2 प्रतिशत रह गई.
TN-KET के एक पहले विश्लेषण में यह भी पाया गया था कि अप्रैल 2022 में कार्यक्रम शुरू होने के छह महीने के भीतर कुल टीबी मौतों में लगभग 10 प्रतिशत की कमी आई, जबकि शुरुआती दो महीनों में होने वाली टीबी मौतों में करीब 20 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.
कार्यक्रम के दो साल पूरे होने के बाद, 2024 और 2025 में पूरे राज्य में टीबी मृत्यु दर में लगातार कम से कम 30 प्रतिशत की कमी देखी गई.
यह नि-क्षय से कैसे अलग है?
भारत के राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम में पहले से ही नि-क्षय (Ni-kshay) के भीतर एक अलग देखभाल (Differentiated Care) मॉड्यूल मौजूद है. नि-क्षय सरकार का डिजिटल टीबी मरीज प्रबंधन और निगरानी प्लेटफॉर्म है. हालांकि, शोधकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा जोखिम आकलन प्रणाली का पहले से उपयोग करना मुश्किल है, क्योंकि यह 16-20 अलग-अलग मानकों पर निर्भर करती है, जिनमें से कई के लिए लैब जांच की ज़रूरत होती है.
इसके मुकाबले, नया कैलकुलेटर केवल पांच आसान क्लीनिकल मापदंडों का उपयोग करता है. इसके साथ उम्र, लिंग, टीबी का प्रकार, पहले इलाज का इतिहास और माइक्रोबायोलॉजिकल पुष्टि जैसी बुनियादी जानकारी जोड़कर मरीज की पहचान के समय ही मौत की संभावना का अनुमान लगाया जाता है.
स्टडी में पाया गया कि केवल पांच साधारण क्लीनिकल मापदंडों पर आधारित मॉडल, गंभीर रूप से बीमार मरीजों की पहचान करने में लगभग उतना ही प्रभावी था जितना वह मॉडल जो मरीज की पहचान के समय नि-क्षय में दर्ज की जाने वाली सभी जानकारियों का उपयोग करता है.
स्टडी के अनुसार, पहचान के समय उपलब्ध मरीज की कुछ अतिरिक्त विशेषताएं जोड़ने से इसकी सटीकता और बढ़ गई, जबकि नि-क्षय की बाकी जानकारी जोड़ने से अनुमान में कोई खास सुधार नहीं हुआ.
डॉ. हेमंत दीपक शेवड़े ने दिप्रिंट से कहा, “नि-क्षय के डिफरेंशिएटेड टीबी केयर मॉड्यूल में मौजूदा जोखिम वर्गीकरण ऐसी जानकारी पर आधारित है जो अक्सर बीमारी की पहचान के समय उपलब्ध नहीं होती. टीबी से होने वाली 70 प्रतिशत मौतें शुरुआती दौर में होती हैं. इसलिए मरीजों को बाहरी स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज के लिए भेजने से पहले, बीमारी की पहचान के समय ही ऐसा आकलन जरूरी है जिस पर तुरंत कार्रवाई की जा सके.”
उन्होंने आगे कहा, “यह कैलकुलेटर मरीजों को केवल अलग-अलग जोखिम श्रेणियों में रखने के बजाय मौत की अनुमानित संभावना बताता है. इससे डॉक्टर मरीज के जोखिम और अस्पताल में उपलब्ध बिस्तरों की संख्या को देखते हुए भर्ती को प्राथमिकता दे सकते हैं.”
राष्ट्रीय कार्यक्रम में अभी तक नहीं मिला स्थान
ICMR के समर्थन, विश्व स्वास्थ्य संगठन के सामने प्रस्तुतियों और अन्य राज्यों को तकनीकी सहायता देने के प्रस्तावों के बावजूद, इस कैलकुलेटर को अभी तक केंद्रीय टीबी प्रभाग (CTD) ने नहीं अपनाया है.
राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP) की प्रमुख सलाहकार डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि टीबी से होने वाली मौतों को कम करना राष्ट्रीय प्राथमिकता है, लेकिन कार्यक्रम ने इस खास टूल को मंजूरी नहीं दी है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “इसे सभी राज्यों ने नहीं अपनाया है. CTD ने मृत्यु दर कम करने को प्राथमिकता दी है, लेकिन इस विशेष टूल की सिफारिश नहीं की है. कई राज्यों में संक्रामक मरीजों के लिए अस्पतालों में बिस्तरों की कमी एक बड़ी समस्या है, इसलिए गंभीर मरीजों को भर्ती नहीं किया जा पाता.”
शेवड़े ने कहा कि यह स्वतंत्र कैलकुलेटर अन्य राज्यों को पूरे TN-KET कार्यक्रम को लागू किए बिना भी तमिलनाडु मॉडल को अपनाने में मदद कर सकता है.
उन्होंने कहा, “हमें लगता है कि पूरे भारत में इस मॉडल का विस्तार करने से हर साल टीबी से होने वाली मौतों की संख्या कम करने में मदद मिलेगी.”
TN-KET कार्यक्रम अब समाप्त हो चुका है और तमिलनाडु फिर से राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम की रिपोर्टिंग प्रणाली का उपयोग कर रहा है. हालांकि, गंभीर टीबी मरीजों की पहचान और प्रबंधन के लिए TN-KET के तहत शुरू की गई कई प्रक्रियाएं आज भी पूरे राज्य में लागू हैं.
स्टडी की सावधानियां
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस स्टडी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे तमिलनाडु के 30 जिलों में इलाज करा रहे लगभग 56,000 वयस्क टीबी मरीजों के नियमित कार्यक्रम संबंधी आंकड़ों के आधार पर तैयार किया गया है. इससे यह सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में इलाज कराने वाले मरीजों का व्यापक प्रतिनिधित्व करता है.
क्योंकि अधिकांश टीबी मौतें बीमारी की पहचान के पहले दो महीनों के भीतर होती हैं, इसलिए शोधकर्ताओं का मानना है कि शुरुआती क्लीनिकल जांच में उपलब्ध जानकारी पर आधारित यह टूल वास्तविक परिस्थितियों में ज्यादा उपयोगी है, बजाय उन मॉडलों के जिनमें विस्तृत लैब जांच की जरूरत होती है.
हालांकि, स्टडी के लेखकों ने चेतावनी दी है कि इस कैलकुलेटर को कुछ सीमाओं के साथ समझा जाना चाहिए.
करीब 17 प्रतिशत योग्य मरीजों को स्टडी से बाहर रखा गया क्योंकि उनका ट्रायेज (प्रारंभिक आकलन) नहीं किया गया था. इन मरीजों की कुछ क्लीनिकल विशेषताएं स्टडी में शामिल मरीजों से अलग थीं.
यह मॉडल केवल बीमारी की पहचान के समय उपयोग के लिए बनाया गया है और इलाज के दौरान बाद में मरीज के जोखिम में होने वाले बदलावों का अनुमान नहीं लगा सकता.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शोधकर्ताओं के अनुसार, इस कैलकुलेटर का अभी तक तमिलनाडु के बाहर स्वतंत्र रूप से सत्यापन (एक्सटर्नल वैलिडेशन) नहीं हुआ है.
शोधकर्ताओं ने कहा, “चूंकि यह पहला राज्यव्यापी कार्यक्रम है जिसमें बीमारी की पहचान के समय इन विशेष ट्रायेज मानकों को दर्ज किया गया, इसलिए तुलना के लिए कोई स्वतंत्र डेटा उपलब्ध नहीं था. भविष्य के स्टडीज़ में अलग-अलग क्षेत्रों में इन मॉडलों के प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन्हें व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकता है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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