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Friday, 19 June, 2026
होमहेल्थआइसक्रीम Vs फ्रोजन डेजर्ट: क्यों यह विवाद सिर्फ मिल्क फैट और पाम ऑयल तक सीमित नहीं है

आइसक्रीम Vs फ्रोजन डेजर्ट: क्यों यह विवाद सिर्फ मिल्क फैट और पाम ऑयल तक सीमित नहीं है

पिछले महीने क्वालिटी वॉल्स के मिल्क बेस्ड आइसक्रीम अपनाने के फ़ैसले ने दशकों पुरानी बहस को फिर से छेड़ दिया है, लेकिन साथ ही दूसरे अहम पहलुओं पर भी चर्चा को सुर्खियों में ला दिया है.

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नई दिल्ली: आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट में क्या फर्क है? आम लोगों के लिए शायद ज्यादा नहीं. दोनों मीठे होते हैं और दोनों जमे हुए होते हैं.

लेकिन उद्योग से जुड़े कुछ लोगों के लिए दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है. आइसक्रीम डेयरी फैट (दूध की चर्बी) से बनती है, जबकि फ्रोजन डेजर्ट में खाने योग्य वनस्पति तेल का इस्तेमाल होता है. और लगभग तीन दशकों से यही अंतर भारत के फ्रोजन ट्रीट्स उद्योग में एक लंबे विवाद का केंद्र रहा है.

पिछले महीने भारत के सबसे बड़े और सबसे पहचान वाले फ्रोजन डेजर्ट ब्रांडों में से एक क्वालिटी वॉल्स ने घोषणा की कि वह 2027 तक अपने पूरे पोर्टफोलियो को 100 प्रतिशत दूध आधारित आइसक्रीम में बदल देगा. इस बदलाव के तहत मैग्नम और कॉर्नेट्टो जैसे उत्पाद, जो दशकों से वनस्पति फैट से बनाए जाते रहे हैं, अब डेयरी फैट से बनाए जाएंगे.

लेकिन यह कदम सिर्फ सामग्री बदलने तक सीमित नहीं है. इसने आइसक्रीम को लेकर लेबलिंग, मार्केटिंग और उपभोक्ताओं की धारणा पर चल रही उस बड़ी बहस को भी फिर से चर्चा में ला दिया है, जिससे उद्योग दशकों से जूझ रहा है.

द मैग्नम आइसक्रीम कंपनी के ग्लोबल सीईओ पीटर टेर कुल्वे ने कहा, “हम दुनिया में कहीं भी फ्रोजन डेजर्ट कंपनी नहीं हैं. हम एक आइसक्रीम कंपनी हैं. भारत में हमने सब कुछ बदल दिया था. सब कुछ.” क्वालिटी वॉल्स द मैग्नम आइसक्रीम कंपनी के स्वामित्व में है, जो पिछले साल यूनिलीवर से अलग हुई उसकी ग्लोबल आइसक्रीम कंपनी है. भारत में इसके पोर्टफोलियो में मैग्नम, कॉर्नेट्टो, फीस्ट और पैडल पॉप जैसे ब्रांड शामिल हैं, जिनमें से कई ऐतिहासिक रूप से फ्रोजन डेजर्ट के रूप में बेचे जाते रहे हैं.

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के नियमों के अनुसार, आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट दो अलग-अलग श्रेणियां हैं. आइसक्रीम दूध की चर्बी से बननी चाहिए और उसमें कम से कम 10 प्रतिशत मिल्क फैट होना जरूरी है, जबकि फ्रोजन डेजर्ट में फैट का स्रोत खाने योग्य वनस्पति तेल होता है. दोनों में दूध और दूध से बने ठोस पदार्थ होते हैं. फैट का स्रोत ही दोनों के बीच एकमात्र नियामकीय अंतर है.

क्वालिटी वॉल्स का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दोनों श्रेणियां भारत के फ्रोजन ट्रीट्स बाजार के बड़े हिस्से बन चुकी हैं.

दशकों तक फ्रोजन डेजर्ट लोकप्रिय रहे क्योंकि वनस्पति फैट, डेयरी फैट की तुलना में सस्ता होता है. इससे कंपनियां कम कीमत पर उत्पाद बेच पाती थीं. लेकिन उद्योग से जुड़े कई लोगों का कहना है कि अब उपभोक्ताओं की मांग धीरे-धीरे दूध आधारित उत्पादों की ओर बढ़ रही है, जिसके कारण कुछ कंपनियां अपनी आइसक्रीम की रेंज बढ़ा रही हैं.

भारत का फ्रोजन ट्रीट्स उद्योग, जिसमें आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट दोनों शामिल हैं, बड़ा और तेजी से बढ़ रहा है. उद्योग के अनुमान के अनुसार 2026 में आइसक्रीम बाजार लगभग 28,000 करोड़ से 35,000 करोड़ रुपये का होगा, जबकि फ्रोजन डेजर्ट बाजार इससे भी बड़ा, लगभग 40,000 करोड़ से 45,000 करोड़ रुपये का है.

इंडियन आइसक्रीम मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IICMA) के उपाध्यक्ष और कोलकाता स्थित पाबराईज़ फ्रेश एंड नेचुरेल आइसक्रीम्स के संस्थापक अनुव्रत पाबराई ने कहा, “दोनों श्रेणियां 6-8 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रही हैं.”

क्वालिटी वॉल्स का यह बदलाव इस संतुलन को काफी हद तक बदल सकता है.

पाबराई ने दिप्रिंट से कहा, “क्वालिटी वॉल्स द्वारा फ्रोजन डेजर्ट से आइसक्रीम की ओर जाने का फैसला बाजार पर बड़ा असर डालेगा. मुझे व्यक्तिगत रूप से उम्मीद है कि फ्रोजन डेजर्ट से आइसक्रीम की ओर दो अंकों वाली प्रतिशत वृद्धि देखने को मिलेगी.”

एक दूध आधारित आइसक्रीम कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी, जिन्होंने अपना नाम न बताने की शर्त पर बात की, ने दिप्रिंट से कहा, “अगर अन्य कंपनियां भी मुख्य रूप से डेयरी आधारित आइसक्रीम की ओर बढ़ रही हैं, तो यह उद्योग के लिए अच्छा है क्योंकि आखिरकार फैसला उपभोक्ता ही करते हैं कि उन्हें क्या चाहिए.” उन्होंने कहा कि अगर मांग बदल रही है, तो कंपनियां भी उसी के अनुसार प्रतिक्रिया देंगी.

पुरानी बहस

भारत के फ्रोजन ट्रीट्स बाजार का बड़ा हिस्सा कुछ बड़ी कंपनियों के नियंत्रण में है. लेकिन कुछ “आइसक्रीम” बेचती हैं, जबकि कुछ “फ्रोजन डेजर्ट”. भारत के प्रमुख दूध आधारित आइसक्रीम ब्रांडों में अमूल, मदर डेयरी, हैवमोर और अरुण शामिल हैं. अधिकांश अन्य बड़े राष्ट्रीय ब्रांड, जैसे क्रीम बेल, वाडीलाल और डेयरी डे, दोनों श्रेणियों में काम करते हैं. वे दूध आधारित आइसक्रीम के साथ-साथ फ्रोजन डेजर्ट भी बेचते हैं. पिछले महीने की घोषणा तक क्वालिटी वॉल्स फ्रोजन डेजर्ट श्रेणी में थी.

कीमत का गणित इस बाजार संरचना को काफी हद तक समझाता है.

क्रीम बेल आइसक्रीम बनाने वाली कंपनी के पूर्व उपाध्यक्ष और वर्तमान में ग्लोबल आइसक्रीम कंसल्टिंग चलाने वाले सी.के. भारद्वाज के अनुसार, वनस्पति तेल की कीमत लगभग 150 से 200 रुपये प्रति किलोग्राम होती है, जबकि डेयरी फैट की कीमत 600 रुपये प्रति किलोग्राम से अधिक होती है.

हालांकि दोनों श्रेणियां संरचना के मामले में उतनी अलग नहीं हैं जितना आम धारणा में माना जाता है.

आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट दोनों एक पाश्चुरीकृत मिश्रण से बनाए जाते हैं, जिसमें दूध और दूध से बने ठोस पदार्थ, चीनी, स्टेबलाइजर और फ्लेवरिंग शामिल होते हैं.

FSSAI के नियमों के अनुसार फैट का स्रोत ही दोनों के बीच एकमात्र अंतर है. आइसक्रीम में कम से कम 10 प्रतिशत मिल्क फैट होना चाहिए, जबकि फ्रोजन डेजर्ट में कम से कम 10 प्रतिशत कुल फैट होना चाहिए, जो पाम ऑयल जैसे वनस्पति तेलों से प्राप्त किया जा सकता है.

इस कारण दोनों उत्पाद स्वाद, बनावट और दिखावट के मामले में अक्सर लगभग एक जैसे लग सकते हैं.

पाम ऑयल को अक्सर नकारात्मक नजरिए से देखा जाता है क्योंकि इसमें संतृप्त वसा (सैचुरेटेड फैट) अपेक्षाकृत अधिक होती है. परंपरागत रूप से इसे खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने और अधिक मात्रा में सेवन करने पर हृदय रोग का जोखिम बढ़ाने से जोड़ा जाता रहा है.

हालांकि उद्योग इस धारणा से सहमत नहीं है कि फ्रोजन डेजर्ट स्वाभाविक रूप से आइसक्रीम से कम स्वस्थ होते हैं. उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि संतृप्त वसा की तुलना उतनी सीधी नहीं है जितनी आम तौर पर समझी जाती है.

पाबराई, जो अपने फ्रोजन डेजर्ट ब्रांड के 40 आउटलेट चलाते हैं, जिनमें से 20 कोलकाता में हैं, ने कहा कि मक्खन और क्रीम में लगभग 66 प्रतिशत संतृप्त वसा होती है, जबकि पाम ऑयल में लगभग 50 प्रतिशत और पामोलीन में 40-42 प्रतिशत होती है.

सिर्फ़ पाम कर्नल ऑयल में ही, जिसमें लगभग 80 प्रतिशत सैचुरेटेड फैट होता है, मक्खन से ज़्यादा सैचुरेटेड फैट पाया जाता है.

पाबराई ने दिप्रिंट से कहा, “पाम ऑयल को अनुचित रूप से बदनाम किया गया है. मैं अपने फ्रोजन डेजर्ट ब्रांड में वनस्पति फैट मिश्रण का उपयोग जारी रखूंगा, भले ही उनकी कीमत डेयरी फैट से ज्यादा हो जाए, क्योंकि मेरे विचार में वनस्पति फैट फ्रोजन उत्पादों में फ्लेवर को बेहतर तरीके से बनाए रखते हैं, खासकर नाजुक फलों वाले फ्लेवर में.”

हालांकि दूध आधारित आइसक्रीम निर्माता इससे सहमत नहीं हैं.

एक दूध आधारित आइसक्रीम कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि डेयरी फैट अधिक समृद्ध और क्रीमी अनुभव देता है, जिसे उपभोक्ता पसंद करते हैं.

उन्होंने कहा, “दूध से बना उत्पाद आपको उस क्रीमी एहसास का आनंद कहीं बेहतर तरीके से देता है, जितना एक फ्रोजन डेजर्ट नहीं दे सकता.”

चेन्नई स्थित अरुण आइसक्रीम्स के संस्थापक और अध्यक्ष आर.जी. चंद्रमोगन, जो भारत की सबसे बड़ी निजी डेयरी कंपनियों में से एक और दूध आधारित आइसक्रीम के प्रमुख निर्माता हैं, ने दिप्रिंट से कहा कि भारत में दूध आधारित आइसक्रीम का बाजार फ्रोजन डेजर्ट बाजार की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है.

उन्होंने कहा, “ज्यादातर कंपनियां जो दोनों उत्पाद बनाती हैं, वे भी अपने कुल बिक्री में दूध आधारित आइसक्रीम का हिस्सा बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं. गुणवत्ता को महत्व देने वाले लोग आम तौर पर दूध आधारित उत्पादों को पसंद करते हैं.”

भारत के आइसक्रीम बाजार में फ्रोजन डेजर्ट कैसे आए

भारत के फ्रोजन डेजर्ट उद्योग की शुरुआत केवल उपभोक्ता मांग से नहीं, बल्कि औद्योगिक नीतियों से भी जुड़ी हुई है.

भारद्वाज ने बताया कि आजादी के बाद कई दशकों तक आइसक्रीम उद्योग को छोटे उद्योगों के लिए आरक्षित रखा गया था. यह नीति छोटे व्यवसायों की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी. इन नियमों के कारण बड़ी कंपनियां वह पूंजी-गहन उत्पादन व्यवस्था नहीं लगा सकती थीं, जिसकी जरूरत राष्ट्रीय स्तर का आइसक्रीम व्यवसाय खड़ा करने के लिए होती है. 1990 के दशक की शुरुआत में जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत के फ्रोजन ट्रीट्स बाजार में रुचि दिखानी शुरू की, तब यह एक बड़ी बाधा बन गया.

भारद्वाज के अनुसार उस समय के नियामकीय ढांचे में पारंपरिक आइसक्रीम का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना कठिन था. उन्होंने कहा, “जब यूनिलीवर ने आइसक्रीम क्षेत्र में आने का फैसला किया, तब वह छोटे उद्योग नियमों के तहत आवश्यक 2-3 करोड़ रुपये के निवेश वाले संयंत्र तक सीमित नहीं रह सकता था. बड़ी कंपनियों को प्रभावी रूप से आइसक्रीम बनाने से रोका गया था. इसलिए उन्होंने एक अलग श्रेणी शुरू की.”

वह श्रेणी थी फ्रोजन डेजर्ट. क्योंकि यह श्रेणी छोटे उद्योग आरक्षण के दायरे से बाहर थी, इसलिए बड़ी कंपनियां इसका उत्पादन और विस्तार बिना उसी प्रकार की पाबंदियों के कर सकती थीं.

इससे हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (HUL), जो तब यूनिलीवर समूह का हिस्सा थी, के लिए रास्ता खुल गया. 1994 में ब्रुक बॉन्ड लिप्टन इंडिया ने वॉल्स फ्रोजन डेजर्ट रेंज लॉन्च की. उसी साल के अंत तक उसने क्वालिटी आइसक्रीम ग्रुप के साथ एक रणनीतिक साझेदारी भी कर ली.

समय के साथ HUL ने कई ब्रांडों को वॉल्स ब्रांड के तहत एकजुट किया और देश के सबसे बड़े फ्रोजन ट्रीट्स वितरण नेटवर्कों में से एक तैयार कर लिया.

उद्योग के अधिकारियों का कहना है कि आर्थिक कारणों ने भी इस श्रेणी के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई. वनस्पति फैट, दूध की चर्बी की तुलना में काफी सस्ता था, जिससे कंपनियां भारत जैसे अत्यधिक मूल्य-संवेदनशील बाजार की जरूरतों को पूरा कर सकीं. भारद्वाज ने कहा, “कीमत का यही अंतर ऐतिहासिक रूप से फ्रोजन डेजर्ट को निर्माताओं के लिए अधिक आकर्षक बनाता रहा है, खासकर 10 से 20 रुपये प्रति यूनिट वाले उत्पादों में, जो भारत में बिक्री का बड़ा हिस्सा बनाते हैं.”

भारद्वाज के अनुसार, वर्तमान में मात्रा के आधार पर फ्रोजन डेजर्ट पूरे फ्रोजन ट्रीट्स बाजार का लगभग 55-60 प्रतिशत हिस्सा हैं. वे डेयरी आइसक्रीम खंड से बड़े हैं क्योंकि कम कीमत के कारण फ्रोजन डेजर्ट ज्यादा लोगों की पहुंच में हैं और अधिकांश बड़ी कंपनियों ने अपने पोर्टफोलियो इन्हीं के आसपास तैयार किए हैं.

लेबल तो है, लेकिन आसानी से दिखाई नहीं देता

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स रेगुलेशन्स, 2011 ने आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट के बीच अंतर बताने वाले मूल उत्पाद मानक तय किए थे.

2017 में एक विशेष लेबलिंग नियम भी जारी किया गया, जिसके तहत फ्रोजन डेजर्ट की पैकेजिंग पर बॉक्स में यह बताना जरूरी था कि उसमें वनस्पति फैट मौजूद है. हालांकि, इस नियम को लागू करने की समयसीमा कई बार बढ़ाई गई. पहले इसे जनवरी 2019 से बढ़ाकर जनवरी 2020 किया गया, क्योंकि FSSAI की अपनी नामकरण समीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी. जनवरी 2020 के बाद FSSAI ने अंतिम फैसला होने तक इस समयसीमा को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया.

उसी साल दिसंबर में FSSAI ने नए फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (लेबलिंग एंड डिस्प्ले) रेगुलेशन्स 2020 जारी किए. इन नियमों ने 2011 के पैकेजिंग और लेबलिंग नियमों की जगह ले ली और जुलाई 2022 तक पूरी तरह लागू हो गए.

इन नियमों के तहत फ्रोजन डेजर्ट बनाने वाली कंपनियों को पैकेट पर यह लिखना जरूरी है कि उत्पाद “खाने योग्य वनस्पति तेल और/या वनस्पति फैट से बनाया गया है.” “आइसक्रीम” और “फ्रोजन डेजर्ट/फ्रोजन कन्फेक्शन” की अलग-अलग कानूनी श्रेणियां बरकरार रहीं.

सामग्री की सूची में इस्तेमाल किए गए वनस्पति तेल का नाम लिखना जरूरी है और हर पैकेट पर फैट के स्रोत की जानकारी एक अलग और स्पष्ट बॉक्स में देनी होती है. भारद्वाज, जिन्होंने अपने कंसल्टिंग काम में दोनों श्रेणियों के कई ब्रांडों के साथ काम किया है, ने कहा, “सभी बड़े ब्रांड FSSAI के नियमों का पालन कर रहे हैं. वे हमेशा बताते हैं कि इसमें वनस्पति तेल है.”

लेकिन समस्या नियमों के पालन में नहीं, बल्कि उनके दिखाई देने की क्षमता में है. कोई उपभोक्ता अगर शाम को किसी ठेले से कॉर्नेट्टो खरीदकर खोलता है, तो उत्पाद पिघलने से पहले वह शायद ही उसके रैपर पर लिखी छोटी जानकारी पढ़ने के लिए रुकेगा. FSSAI के लेबलिंग नियमों में सारी जानकारी पैकेजिंग पर देने की जिम्मेदारी है, लेकिन फ्रोजन डेजर्ट की श्रेणी को सामने प्रमुखता से दिखाने की कोई अनिवार्यता नहीं है.

भारद्वाज ने कहा, “उत्पाद की प्रकृति ही ऐसी है कि हम आइसक्रीम खरीदते हैं, खोलते हैं और तुरंत खाने लगते हैं. छोटे अक्षरों में लिखी जानकारी पढ़ना वास्तव में बहुत मुश्किल होता है.”

उपभोक्ता अधिकार संगठन VOICE (वॉलंटरी ऑर्गेनाइजेशन इन इंटरेस्ट ऑफ कंज्यूमर एजुकेशन) के मुख्य परिचालन अधिकारी और सचिव आशीम सान्याल ने कहा कि बहुत से उपभोक्ता आज भी आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट के बीच के अंतर से अनजान हैं.

उन्होंने कहा, “कुछ ब्रांड बहुत चालाकी से काम करते हैं. वे ‘फ्रोजन डेजर्ट’ शब्द को लगभग छिपा देते हैं. आपको यह शब्द ब्रांड नाम के पास नहीं मिलेगा.”

उन्होंने कहा, “जब आप आइसक्रीम खरीदें, तो आइसक्रीम ही खरीदें. अमूल और मदर डेयरी जैसे ब्रांड्स के पास ‘आइसक्रीम’ शब्द साफ और प्रमुख रूप से लिखा होता है. उसे देखिए.”

लेबलिंग की बहस सिर्फ आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट तक सीमित नहीं है. उद्योग के दोनों पक्षों का कहना है कि मौजूदा नियम चॉकलेट कोटिंग वाले उत्पादों के मामले में भी एक असामान्यता पैदा करते हैं.

इंडियन आइसक्रीम मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (IICMA) के अध्यक्ष सुधीर शाह ने कहा कि सामान्य चॉकलेट कोटिंग में लगभग 50 प्रतिशत पाम ऑयल या नारियल तेल होता है, लेकिन यह तय करते समय कि कोई उत्पाद आइसक्रीम है या फ्रोजन डेजर्ट, इन तत्वों को गिना नहीं जाता.

इसी तरह आइसक्रीम कोन के अंदर इस्तेमाल होने वाली चॉकलेट स्प्रे में भी लगभग 50 प्रतिशत पाम ऑयल हो सकता है. वहीं चोको बार जैसे उत्पादों की चॉकलेट कोटिंग में 50 प्रतिशत या उससे अधिक पाम ऑयल या नारियल तेल हो सकता है.

शाह का कहना है कि इस वजह से उपभोक्ता उन उत्पादों में भी काफी मात्रा में वनस्पति फैट खा सकते हैं, जिन्हें आइसक्रीम के रूप में बेचा जाता है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “सच्चाई यह है कि उपभोक्ता वनस्पति फैट का सेवन कर रहे हैं. यह असामान्यता केवल नामकरण के लिहाज से ही गलत नहीं है, बल्कि नैतिक और सामाजिक रूप से भी गलत है. FSSAI को इसे जल्द से जल्द ठीक करना चाहिए.”

अमूल का ‘प्योर’ आइसक्रीम विज्ञापन जो अदालत तक पहुंच गया

उद्योग का यह पुराना विवाद 2017 में अदालत तक पहुंच गया, जब अमूल ने एक टीवी विज्ञापन अभियान शुरू किया. इसमें उसने अपने “असली दूध” से बने आइसक्रीम की तुलना फ्रोजन डेजर्ट से की.

एक विज्ञापन में दो कप साथ-साथ दिखाए गए थे. एक पर “Amul” लिखा था, जिसमें दूध डाला जा रहा था, जबकि दूसरे पर “Frozen Desserts” लिखा था, जिसमें एक गाढ़ा अर्ध-ठोस पदार्थ डाला जा रहा था. वॉयसओवर में उपभोक्ताओं से कहा गया कि वे “वनस्पति” से बने फ्रोजन डेजर्ट की बजाय “असली दूध” वाली आइसक्रीम चुनें.

इस अभियान के खिलाफ उस समय फ्रोजन डेजर्ट बाजार की अग्रणी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड ने कानूनी चुनौती दी.

जून 2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अमूल को यह विज्ञापन प्रसारित करने से रोक दिया. अदालत ने माना कि ये विज्ञापन पूरे फ्रोजन डेजर्ट वर्ग को बदनाम करने वाले थे.

अदालत की आपत्ति इस बात पर नहीं थी कि फ्रोजन डेजर्ट में वनस्पति फैट इस्तेमाल होता है. बल्कि अदालत का कहना था कि विज्ञापन एक भ्रामक धारणा पैदा कर रहे थे.

पाबराई ने कहा, “उन्होंने दो गलतियां की थीं. पहली, उन्होंने ‘वनस्पति’ शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे फ्रोजन डेजर्ट के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है.”

उन्होंने आगे कहा, “दूसरी गलती तुलना में थी. इससे उपभोक्ताओं को ऐसा लगा कि अमूल आइसक्रीम केवल दूध से बनती है और फ्रोजन डेजर्ट में दूध बिल्कुल नहीं होता, बल्कि वे पूरी तरह वनस्पति से बने होते हैं. आम उपभोक्ता ‘वनस्पति’ शब्द को हाइड्रोजनीकृत वनस्पति फैट से जोड़कर देखते हैं.”

दिप्रिंट ने अमूल को कई सवालों के साथ प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया. हालांकि कई बार याद दिलाने के बावजूद कंपनी ने कोई जवाब नहीं दिया.

FSSAI की उलझन

2017 में अमूल और हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड के बीच अदालत में चला विवाद केवल विज्ञापन मामले तक सीमित नहीं रहा. इसने FSSAI के भीतर चल रही उस पुरानी बहस को भी फिर से जगा दिया कि फ्रोजन डेजर्ट खुद को क्या कह सकते हैं.

बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के बाद FSSAI ने एक हितधारक बैठक बुलाई. इसमें अमूल, मदर डेयरी, क्वालिटी वॉल्स, अन्य फ्रोजन डेजर्ट निर्माता और उपभोक्ता समूहों के प्रतिनिधि शामिल हुए.

सान्याल, जो इस बैठक में शामिल थे, के अनुसार फ्रोजन डेजर्ट कंपनियों का तर्क था कि उनके उत्पादों को भी “आइसक्रीम” कहलाने की अनुमति मिलनी चाहिए. जबकि दूध आधारित आइसक्रीम निर्माता इसका विरोध कर रहे थे.

फ्रोजन डेजर्ट उद्योग ने प्रस्ताव दिया कि सभी फ्रोजन ट्रीट्स को “आइसक्रीम” श्रेणी में रखा जाए और दूध की चर्बी वाले उत्पादों को विशेष रूप से “डेयरी आइसक्रीम” कहा जाए.

उद्योग प्रतिनिधियों का कहना था कि ऐसी शब्दावली कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इस्तेमाल होती है और उत्पादों की वास्तविक प्रकृति को बेहतर ढंग से दर्शाती है.

सान्याल ने दिप्रिंट से कहा, “उस बैठक में शामिल एकमात्र उपभोक्ता समूह होने के नाते हमने कहा कि उत्पादों के नाम उनकी सामग्री के अनुसार होने चाहिए. आप किसी ऐसी श्रेणी में नहीं जा सकते जिसमें आप आते ही नहीं हैं, क्योंकि पूरा मामला सामग्री का है.”

पाबराई ने कहा कि बाद में चर्चा इस बात पर पहुंची कि गैर-डेयरी विकल्पों वाले उत्पादों को “एनालॉग” श्रेणी में रखा जाए या नहीं. इस प्रस्ताव का भी विरोध हुआ.

आखिरकार FSSAI ने आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट के बीच का अंतर बनाए रखा और नाम बदलने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया.

IICMA के अध्यक्ष शाह ने कहा कि उद्योग का रुख हमेशा यही रहा है कि उपभोक्ताओं को पूरी जानकारी के साथ फैसला लेने का अवसर मिलना चाहिए.

उन्होंने कहा, “दोनों श्रेणियां कानूनी हैं, उनके अपने नियामकीय मानक और विनिर्देश हैं, और दोनों पर समान खाद्य सुरक्षा, गुणवत्ता और स्वच्छता मानक लागू होते हैं.”

उन्होंने आगे कहा, “अंत में चाहे जो भी नाम अपनाया जाए, पारदर्शिता और उपभोक्ताओं में भ्रम से बचाव ही सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत होने चाहिए.”

दिप्रिंट ने क्वालिटी वॉल्स से भी प्रतिक्रिया मांगी, लेकिन कंपनी ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

क्या पाम ऑयल सच में दोषी है?

इस बहस को अक्सर डेयरी फैट और वनस्पति तेल के बीच एक साधारण चुनाव के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन पोषण विशेषज्ञों और उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि हकीकत इससे कहीं ज्यादा जटिल है.

डाइट मैनेजमेंट और वजन घटाने के लिए विशेषज्ञ सलाह देने वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म फिटेलो की डाइटीशियन फातिमा ज़ोहरा के अनुसार, आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट के बीच पोषण संबंधी अंतर को अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है. दोनों उत्पादों में लगभग समान सामग्री होती है और दोनों ही काफी प्रोसेस्ड होते हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “इनकी पोषण संरचना लगभग एक जैसी है. इनमें ज्यादा अंतर नहीं है. यह पूरी तरह उत्पाद की संरचना, उसमें मौजूद चीनी की मात्रा और इस्तेमाल की गई अन्य सामग्री पर निर्भर करता है.”

बेंगलुरु के फोर्टिस नेटवर्क के ग्लेनईगल्स अस्पताल में जनरल मेडिसिन के कंसल्टेंट डॉ. प्रज्वल के. सी. ने भी इस बात से सहमति जताई. उन्होंने कहा कि उपभोक्ताओं को सिर्फ फैट के स्रोत के आधार पर यह नहीं मान लेना चाहिए कि एक श्रेणी दूसरी से अपने आप ज्यादा स्वस्थ है.

उन्होंने कहा, “तुलना करने का बेहतर तरीका यह है कि पूरे पोषण प्रोफाइल को देखा जाए. इसमें फैट की मात्रा और प्रकार, अतिरिक्त चीनी, कैलोरी और अन्य पोषक तत्व शामिल हैं.” उन्होंने यह भी कहा कि संतुलित आहार के हिस्से के रूप में दोनों उत्पादों का कभी-कभार आनंद लिया जा सकता है.

हालांकि, ज़ोहरा ने पाम ऑयल की आलोचना की, जो भारत में फ्रोजन डेजर्ट में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला वनस्पति फैट है.

उन्होंने कहा, “पाम ऑयल बिल्कुल अच्छा नहीं है. इसमें बहुत ज्यादा ट्रांस फैट होता है और इसे न खाने की सलाह अक्सर दी जाती है.”

उद्योग से जुड़े लोग इस सोच का विरोध करते हैं.

भारद्वाज ने कहा कि भारतीय लोग रोजमर्रा के खाना पकाने में मक्खन, जो एक डेयरी फैट है, और रिफाइंड वनस्पति तेल, दोनों का नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं. दोनों में से किसे चुनना है, यह आमतौर पर व्यक्तिगत पसंद का मामला माना जाता है.

उन्होंने कहा कि केवल तब, जब वनस्पति तेल किसी फ्रोजन ट्रीट में इस्तेमाल होता है, उसे गलत तरीके से बदनाम किया जाता है. उनके अनुसार यही तर्क आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट दोनों पर समान रूप से लागू होना चाहिए.

उन्होंने कहा, “आइसक्रीम के अपने फायदे हैं, फ्रोजन डेजर्ट के अपने फायदे हैं.”

ज़ोहरा ने कहा कि जिन लोगों को लैक्टोज असहिष्णुता, डेयरी से संवेदनशीलता या कुछ पाचन संबंधी समस्याएं होती हैं, वे कभी-कभी गैर-डेयरी विकल्पों को पसंद कर सकते हैं. लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि उपभोक्ताओं को केवल एक सामग्री पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि पूरे उत्पाद के पोषण प्रोफाइल को देखना चाहिए.

उन्होंने कहा, “चीनी की मात्रा, कैलोरी, स्टेबलाइजर, इमल्सीफायर और सर्विंग साइज सभी महत्वपूर्ण बातें हैं. जब हम पोषण संबंधी लेबल पढ़ते हैं, तभी किसी उत्पाद के स्वास्थ्य पर कुल प्रभाव को समझ सकते हैं.”

आखिरकार, आइसक्रीम और फ्रोजन डेजर्ट दोनों ही स्वाद और आनंद के लिए खाए जाने वाले उत्पाद हैं. हालांकि बहस अक्सर इस बात पर केंद्रित रहती है कि फैट दूध से आया है या वनस्पति तेल से, लेकिन पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि उपभोक्ताओं को चीनी की मात्रा, कैलोरी और खाने की मात्रा पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए.

ज़ोहरा ने कहा, “इनमें से किसी भी श्रेणी को स्वास्थ्यवर्धक भोजन नहीं माना जाना चाहिए और दोनों का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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