दरभंगा: दशकों से, बिहार में तरक्की का एक ही तरीका अपनाया गया है. राज्य से बाहर जाकर बसना, पढ़ाई करना, पैसे कमाना और मेट्रो शहर में आरामदायक ज़िंदगी जीना. इसलिए, जब ज़मीन के एक विवाद की वजह से 45 साल के धीरेंद्र कुमार को दरभंगा में अपने घर लौटना पड़ा, तो उन्होंने शहर वाली आरामदायक ज़िंदगी को ही यहां भी अपना लिया. उन्होंने अपने मिट्टी के घर को कंक्रीट के घर में बदल दिया, जिसमें बालकनी, मॉडर्न इंटीरियर और शहर जैसी दूसरी सुविधाएं थीं. और वे अकेले नहीं हैं. बिहार, बिना नए शहर बसाए, घर-घर में शहरीकरण ला रहा है.
कुमार ने कहा, “शहर में 20 साल बिताने के बाद मेरे लिए पुराने तरीके से रहना मुमकिन नहीं था. मेरे लिए, बदलाव का मतलब शहर जैसी जीवनशैली अपनाना है.”
पूरे बिहार में, कुमार जैसे हज़ारों परिवार शहरीकरण को निर्माण के नज़रिए से देखते हैं. बाहर से भेजे गए पैसों (रेमिटेंस) की वजह से निर्माण का काम तेज़ी से होने के बावजूद, राज्य की सिर्फ 11 प्रतिशत आबादी शहरी इलाकों में रहती है, जो राष्ट्रीय औसत 31 प्रतिशत से बहुत कम है. आज़ादी के बाद से ही, राज्य आर्थिक रूप से मज़बूत शहर बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है. इसकी अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचा खेती पर ही टिका रहा, जबकि बाहर जाकर काम करना (माइग्रेशन) एक आर्थिक सहारा बन गया. महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों के उलट, बिहार में कभी मज़बूत औद्योगिक आधार नहीं बन पाया. 2000 में झारखंड के बनने से इसकी औद्योगिक स्थिति और कमज़ोर हो गई, क्योंकि इसके ज़्यादातर खनिज संसाधन, खदानें और भारी उद्योग नए राज्य में चले गए. अब, नए विकास केंद्र बनाने की ज़रूरत को राजनीतिक नेतृत्व भी समझने लगा है.

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के कुछ हफ़्तों बाद, उनके उत्तराधिकारी सम्राट चौधरी ने राज्य भर में 11 सैटेलाइट टाउनशिप बनाने की योजना का ऐलान किया. यह प्रस्ताव नीति में एक बड़ा बदलाव है, जो यह मानता है कि बिहार विकास के लिए हमेशा गांवों, बाहर जाकर काम करने और बाहर से भेजे गए पैसों पर निर्भर नहीं रह सकता. इस बड़े प्रोजेक्ट के लिए राज्य कैबिनेट ने वर्ल्ड बैंक से 500 मिलियन डॉलर के लोन को मंज़ूरी दी है.
खराब इंफ्रास्ट्रक्चर और कानून-व्यवस्था की समस्या ने प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को बिहार से दूर रखा. नतीजतन, पटना, दरभंगा, मुज़फ़्फ़रपुर और गया जैसे शहरों का विस्तार भारत के दूसरे शहरी केंद्रों की तुलना में बहुत धीमी गति से हुआ. शहरी विकास की धीमी गति की एक वजह सरकार की ग्रामीण-केंद्रित नीति भी रही, जिसने सड़क, बिजली और पानी को प्राथमिकता दी.
बिहार के पूर्व मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह ने कहा, “इन्फ्रास्ट्रक्चर के मामले में, 2005 से पहले के बिहार की कल्पना करना भी डरावना लगता है. उसके बाद, बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने पर ध्यान दिया गया और नीतियां भी इसी पर केंद्रित रहीं. नीतीश कुमार की नीतियां ग्रामीण इलाकों पर केंद्रित थीं, जो एक तरह से गांधीवादी सोच के अनुरूप थीं. बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने में ही इतना समय लग गया कि शहरीकरण पीछे छूट गया.”
राज्य के शहरी विकास और आवास विभाग से दिप्रिंट को मिले आंकड़ों से पता चलता है कि 20.61 लाख की आबादी के साथ पटना राज्य का प्रमुख शहरी केंद्र बना हुआ है, जबकि गया (4.74 लाख), भागलपुर (4.12 लाख) और मुज़फ़्फ़रपुर (3.54 लाख) आबादी के मामले में काफी पीछे हैं. फिर भी, इनमें से कोई भी शहर ऐसे आर्थिक केंद्र के तौर पर नहीं उभरा है, जो गुजरात, महाराष्ट्र या तमिलनाडु जैसे राज्यों के शहरों की तरह हो.

नए सैटेलाइट शहर
पटना में बिहार के शहरी विकास विभाग में, सैटेलाइट टाउनशिप प्रोजेक्ट पर खास ध्यान दिया जा रहा है. मई में पद संभालने के तुरंत बाद, शहरी विकास मंत्री नीतीश मिश्रा ने शहरी विकास के लिए एक व्यवस्थित और लंबे समय तक चलने वाले नज़रिए की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.
मधुबनी के झंझारपुर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले मिश्रा ने कहा, “शहर किसी राज्य के शासन और विकास को दर्शाते हैं.”
सरकार अभी प्रस्तावित टाउनशिप के लिए विस्तृत टाउन-प्लानिंग योजनाएं तैयार करने के लिए कंसल्टेंट नियुक्त करने की प्रक्रिया में है. शहरी विकास विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी, जो सैटेलाइट टाउनशिप पर हुई बैठकों में शामिल थे, ने कहा कि विभाग के भीतर चर्चाएं इस बात पर केंद्रित हैं कि ये सैटेलाइट शहर बिहार के शहरी भविष्य को कैसे नया रूप दे सकते हैं. अधिकारी ने बताया कि राज्य सरकार के पास इन सभी टाउनशिप के लिए अलग-अलग योजनाएं हैं, जैसे कि एयरपोर्ट, इंडस्ट्रियल पार्क और फिल्म सिटी.

कई दौर की बैठकों के बाद, शहरी विकास विभाग के प्रधान सचिव ने मई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की.
विनय कुमार ने कहा, “इन टाउनशिप के आस-पास एयरपोर्ट, इंडस्ट्रियल पार्क और फिल्म सिटी बनाने की योजना है, जो उस इलाके के विकास को गति देंगे. विकास की योजना व्यवस्थित ढंग से बनाई जाएगी ताकि टाउनशिप आर्थिक रूप से टिकाऊ हों, रोज़गार पैदा हों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिले.”
टाउनशिप के लिए चुने गए नाम बिहार के प्राचीन अतीत की याद दिलाते हैं. दरभंगा में मिथिला, गया में मगध, पटना में पाटलिपुत्र, भागलपुर में विक्रमशिला, सहरसा में कोसी, सीतामढ़ी में सीतापुरम और मुंगेर में अंग का विकास होगा.
दरभंगा में प्रॉपर्टी डीलर राजन झा इन घटनाक्रमों पर बारीकी से नज़र रखे हुए हैं. पिछले छह सालों से वे शहर के रियल एस्टेट सेक्टर में काम कर रहे हैं और उन्होंने कई प्राइवेट टाउनशिप का विकास देखा है.
झा ने कहा, “सरकारी प्रोजेक्ट का मकसद शहरी बुनियादी ढांचा तैयार करना है. दरभंगा में प्राइवेट कंपनियां लगभग एक दशक से ऐसा कर रही हैं. सरकार को सिर्फ हाउसिंग प्रोजेक्ट से आगे बढ़कर इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट पर ध्यान देना चाहिए, जिससे नौकरियां और रेवेन्यू पैदा हो सकें.”
उनकी बात टाउनशिप प्रोजेक्ट को लेकर आम लोगों में मौजूद संदेह को दर्शाती है. हालांकि बेहतर सड़कें, आवास और नागरिक सुविधाएं स्वागत योग्य हैं, लेकिन बिना रोज़गार पैदा किए शहरीकरण से बिहार की अर्थव्यवस्था में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आएगा. मोदी सरकार ने 2023 में राज्यसभा को बताया कि 2020-21 में काम और रोज़गार के लिए बिहार से 7.06 लाख मज़दूर दूसरे राज्यों में गए.
‘मल्टी-डायमेंशनल पॉवर्टी एंड माइग्रेशन–ए केस स्टडी ऑफ़ दरभंगा’ नाम के 2019 के एक पेपर के अनुसार, यह ज़िला बिहार में सबसे ज़्यादा पलायन करने वाले ज़िलों में से एक है, जहां से लगभग 6 प्रतिशत पुरुष काम के लिए बाहर जाते हैं.
प्रस्तावित योजना के अनुसार, विकास के लिए लगभग 17,400 एकड़ ज़मीन को ‘स्पेशल एरिया’ और 1,600 एकड़ ज़मीन को ‘कोर एरिया’ के तौर पर चुना गया है.
दरभंगा में, बहादुरपुर और केवटी-रनवे जैसे ब्लॉक में फैले 102 गांवों को प्रस्तावित टाउनशिप एरिया में शामिल किया गया है. उम्मीद है कि इस नियोजित शहर का मुख्य केंद्र दरभंगा एयरपोर्ट और बनने जा रहे एम्स, दरभंगा के आस-पास विकसित होगा.

‘इन टाउनशिप में रहेगा कौन?’
इन इलाकों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए, इस बदलाव से मौके भी मिलेंगे और परेशानियां भी.
दरभंगा के रहने वाले 57 साल के आशुतोष मिश्रा ने पिछले महीने अपनी बेटी की शादी के लिए अपनी पुश्तैनी ज़मीन बेचने की कोशिश की थी. उन्हें पता नहीं था कि सरकार ने ज़मीन की बिक्री पर रोक लगा दी है.
मिश्रा ने कहा, “मुझे इस बात से कोई दिक्कत नहीं है कि सरकार हमारी ज़मीन पर टाउनशिप बनाने की योजना बना रही है. लेकिन इससे ज़मीनी स्तर पर लोगों को परेशानी नहीं होनी चाहिए. मुझे अपनी बेटी की शादी के लिए पैसे की ज़रूरत है, लेकिन आखिरी समय में पता चला कि मैं इसे अगले एक साल तक बेच नहीं सकता.”
राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार सरकार ने अपने शहरी विकास मंत्रालय का बजट 227 प्रतिशत बढ़ाया है, जो 2019-20 में 3,587.6 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 11,742.6 करोड़ रुपये हो गया है. हालांकि, बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया, भले ही खर्च का प्रतिशत 2019-20 में 34.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 77.4 प्रतिशत हो गया है.

हालांकि, कुछ शहरी योजनाकार और अर्थशास्त्री टाउनशिप परियोजना को लेकर उत्साहित नहीं हैं.
मुंबई के NMIMS में स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर की शहरी योजनाकार और आर्किटेक्ट शीमा फ़ातिमा, जिन्होंने पटना के शहरी विकास का अध्ययन किया है, ने कहा, “सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन टाउनशिप में कौन रहेगा? क्या ये आर्थिक रूप से इतने फायदेमंद होंगे कि लोगों को पलायन करने से रोक सकें? लोगों को इन टाउनशिप की ओर आकर्षित करने के लिए कोई ठोस वजह होनी चाहिए.”
उन्होंने कहा कि शहरी प्रशासन राज्य सरकार की प्राथमिकता कभी नहीं रही है.
फ़ातिमा ने कहा कि भारत में राउरकेला, भिलाई और जमशेदपुर जैसी टाउनशिप बनाने का लंबा इतिहास रहा है और ये शहर बड़े उद्योगों के कारण विकसित हुए. उन्होंने सवाल किया कि सहरसा और मुंगेर जैसे इलाकों में, जहां आर्थिक गतिविधियां बहुत कम हैं, तो ऐसे में शहर में कौन रहेगा?
पिछले कुछ वर्षों में दरभंगा में कृषि-आधारित और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, खासकर मखाना प्रसंस्करण उद्योग शुरू हुए हैं. फिर भी, इनकी संख्या बहुत कम है. फ़ातिमा ने आरोप लगाया कि “यह प्रोजेक्ट ज़मीन की कीमतें बढ़ाकर पैसा कमाएगा,” और साथ ही कहा कि कंस्ट्रक्शन राज्य का सबसे बड़ा उद्योग है.
विशेषज्ञों और शहरी योजनाकारों के लिए, दशकों से बिहार का शहरीकरण अध्ययन का विषय रहा है.
शहरी मामलों के सलाहकार मनोज कुमार पांडे के एक पेपर, जिसका शीर्षक है ‘बिहार: अव्यवस्थित शहरीकरण की स्थिति – आगे का रास्ता’, में लिखा है, “बिहार में शहरी योजना अभी शुरुआती दौर में है. यह विडंबना है कि अभी सिर्फ राजधानी पटना के लिए ही एक मास्टर प्लान है, और वह भी ठीक नहीं है, यह शहर के बेतरतीब विकास को रोक नहीं पाया.”

नाकाम कोशिशें
बिहार में नए सैटेलाइट टाउनशिप की योजनाएं बनने से बहुत पहले ही, राज्य ने अपने शहरी दायरे को बढ़ाना शुरू कर दिया था – और यह सब सरकारी नोटिफ़िकेशन के ज़रिए हुआ. इसके लिए कोई नए शहर, फ़ैक्ट्रियां या आर्थिक केंद्र नहीं बनाए गए, बस कानून में बदलाव किया गया.
2020 में, नीतीश कुमार सरकार ने बिहार म्युनिसिपल एक्ट में संशोधन किया, जिससे बस्तियों को शहरी इलाके के तौर पर वर्गीकृत करने के नियम आसान हो गए. बदले हुए कानून में किसी इलाके के शहरी होने के लिए ज़रूरी गैर-कृषि कामगारों की संख्या की सीमा कम कर दी गई, जिससे राज्य के इतिहास में शहरी स्थानीय निकायों का सबसे बड़ा विस्तार हुआ.
रातों-रात, बिहार का शहरी प्रशासन 142 शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) से बढ़कर 261 हो गया, और दर्जनों गांव तथा अर्ध-ग्रामीण बस्तियां नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत की श्रेणी में आ गईं.
कागज़ों पर तो बिहार काफी ज़्यादा शहरी हो गया. लेकिन ज़मीनी स्तर पर, यह बदलाव उतना बड़ा नहीं रहा. नए घोषित शहरी स्थानीय निकायों में से कई में अभी भी शहरी जीवन से जुड़ी बुनियादी चीज़ों की कमी है – जैसे मास्टर प्लान, स्वतंत्र राजस्व का आधार, औद्योगिक गतिविधियां या रोज़गार के अच्छे अवसर.
नाम और हकीकत के बीच का यह फर्क सहरसा ज़िले के सबसे बड़े गांवों में से एक, बनगांव में साफ दिखता है, जिसकी आबादी लगभग 30,000 है. 2023 में, इसे आधिकारिक तौर पर नगर पंचायत घोषित किया गया था.

बनगांव के प्रवेश द्वार पर एक हरा स्वागत बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है, “नगर पंचायत बनगांव में आपका हार्दिक स्वागत है.” इस संदेश के दोनों ओर महात्मा गांधी की तस्वीरें और आधुनिक शहरी जीवन की झलक दिखाने वाले चित्र बने हैं.
फिर भी, उस साइनबोर्ड के आगे बहुत कुछ वैसा ही है जैसा पहले था.
बनगांव के निवासी कमल मिश्रा ने कहा कि जब से यह इलाका नगर पंचायत बना है, तब से सबसे साफ दिखने वाला बदलाव यह है कि हर सुबह उनके दरवाज़े पर कचरा उठाने वाला आता है.
मिश्रा ने कहा, “इसके अलावा कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है. बनगांव से कोई राजस्व नहीं मिल रहा है और यहां रोज़गार के कोई अवसर भी नहीं हैं.”
उनकी यह बात बिहार के शहरीकरण अभियान के सामने मौजूद एक बड़ी चुनौती को दिखाती है. पटना में एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज के पूर्व डायरेक्टर और प्लानिंग कमीशन के पूर्व सदस्य डीएम दिवाकर ने कहा, “प्रशासनिक तौर पर शहरी दर्जा देने से शहरी निकाय तो बन सकते हैं, लेकिन इससे अपने-आप शहरी अर्थव्यवस्थाएं नहीं बनतीं. रोज़ी-रोटी का ज़रिया देना बहुत ज़रूरी है. सिर्फ बिजली और सड़कें देने से गांव शहर नहीं बन जाएंगे.”
एक दशक से भी ज़्यादा समय पहले, ऐसा लगा था कि बिहार शहरीकरण पर गंभीरता से बात करने के लिए तैयार है. 2010 के आसपास, शहरी विकास विभाग और एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ ने राज्य के शहरी भविष्य की रूपरेखा तैयार करने के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया था. लेकिन यह प्रोजेक्ट रोक दिया गया.
दिवाकर ने कहा, “शहरीकरण को लेकर कभी कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई, इसीलिए बिहार की तस्वीर नहीं बदली.”
इसके बजाय, बिहार के विकास की कहानी ने एक अलग रास्ता अपनाया.
2015 में, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महत्वाकांक्षी ‘सात निश्चय योजना’ शुरू की. यह प्रोग्राम राज्य की सबसे बुनियादी कमियों को दूर करने के लिए बनाया गया था. इसका मकसद नए शहर बसाना नहीं, बल्कि गांवों और छोटे कस्बों तक ज़रूरी सुविधाएं पहुंचाना था – जैसे सड़कें, बिजली, पाइप से पीने का पानी, ड्रेनेज नेटवर्क और अन्य नागरिक सुविधाएं, जिनकी राज्य के ज़्यादातर हिस्सों में लंबे समय से कमी थी.
पटना यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अविरल पांडे ने कहा, “चूंकि राज्य की आधी से ज़्यादा वर्कफोर्स अभी भी खेती पर निर्भर है, इसलिए चुनौती सिर्फ नए शहर बसाने की नहीं है, बल्कि ऐसे आर्थिक अवसर पैदा करने की है जिनसे मज़दूर खेती से हटकर दूसरे काम कर सकें. सरकार को अपनी वर्कफ़ोर्स को नॉन-फार्म सेक्टर (खेती-बाड़ी से अलग क्षेत्रों) की ओर ले जाना होगा, तभी शहरीकरण हो पाएगा.”

गुज़रा हुआ वक्त
बिहार के शहरीकरण की दौड़ में पीछे रह जाने की कहानी कई दशक पुरानी है. आज़ादी के बाद के दशकों में, अविभाजित बिहार भारत की अर्थव्यवस्था में एक अहम जगह रखता था. खनिजों के भंडार, औद्योगिक केंद्र और उपजाऊ कृषि भूमि ने इसे काफी आर्थिक महत्व दिया था.
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (PM-EAC) के 2024 के एक वर्किंग पेपर से पता चलता है कि 1960 के दशक की शुरुआत में, अविभाजित बिहार का भारत की जीडीपी में 7.8 प्रतिशत हिस्सा था—जो भारतीय राज्यों में पांचवां सबसे बड़ा हिस्सा था, और यह गुजरात और कर्नाटक से भी आगे था.
पेपर में कहा गया है, “पिछले दो दशकों में बिहार की स्थिति स्थिर हुई है, लेकिन यह अभी भी दूसरे राज्यों से काफी पीछे है और बराबरी करने के लिए इसे बहुत तेज़ी से विकास करने की ज़रूरत है.”
1960 के दशक से, नीतिगत विफलताएं, कमज़ोर औद्योगीकरण, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और खराब शहरी योजना ने धीरे-धीरे बिहार के बदलाव की गति को धीमा कर दिया. जहां महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु और कर्नाटक ने अपने औद्योगिक आधार का विस्तार किया और फलते-फूलते शहर बसाए, वहीं बिहार कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से ही जुड़ा रहा.
कई अर्थशास्त्री इस स्थिति की जड़ें और भी पीछे मानते हैं.
पटना विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर अविरल पांडे ने कहा, “मुख्य रूप से औपनिवेशिक काल की नीतियों के कारण, बिहार एक कृषि-प्रधान राज्य के रूप में उभरा, जहां ज़मींदारी व्यवस्था की जड़ें बहुत गहरी थीं.”
अन्य लोग आज़ादी के बाद की उन आर्थिक नीतियों की ओर इशारा करते हैं जिन्होंने बिहार के प्राकृतिक फायदों को कमज़ोर कर दिया.
अर्थशास्त्री दिवाकर ने कहा, “पहला, ‘फ्रेट इक्वलाइज़ेशन पॉलिसी’ (माल ढुलाई समानकरण नीति) ने खनिज संपदा के बावजूद बिहार के भौगोलिक लाभ को खत्म कर दिया. दूसरा, जीएसटी ने बिहार को उत्पादक राज्य के बजाय उपभोक्ता राज्य बना दिया.”
इस नीति के तहत प्रमुख औद्योगिक संसाधनों के परिवहन पर सब्सिडी दी जाती थी, जिससे देश में कहीं भी उनकी कीमत एक समान रहती थी. इससे खनिज-समृद्ध पूर्वी राज्यों में औद्योगिक विकास रुक गया क्योंकि उद्योगों ने बंदरगाहों के पास अपने प्लांट लगाए और खनिज-समृद्ध क्षेत्रों से सब्सिडी वाली दरों पर संसाधन खरीदे.
1973 बैच के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी और बिहार के पूर्व योजना सचिव शंकर प्रसाद ने कहा, “कई दशकों तक बिहार दक्षिण बिहार से मिलने वाली रॉयल्टी के सहारे चलता रहा. हम एक नियोजित अर्थव्यवस्था में काम कर रहे थे और 1990 के दशक में हमारे पास सीमित संसाधन थे. राज्य के राजनेताओं की प्राथमिकताओं की सूची में शहरीकरण कभी शामिल नहीं रहा.”
प्रसाद ने कहा कि राज्य के पुराने शहर टिक नहीं पाए और विफल हो गए. प्रसाद ने कहा, “सरकार को उनके कारणों पर गौर करना चाहिए. नए टाउनशिप की घोषणा के साथ-साथ, प्रतीकात्मकता के पीछे असल काम भी दिखना चाहिए.”
आर्थिक असंतुलन
सबसे बड़ा झटका 2000 में लगा. झारखंड के बनने से बिहार ने अपनी ज़्यादातर खनिज संपदा, माइनिंग बेल्ट और भारी उद्योग खो दिए. इस बंटवारे ने न सिर्फ राजनीतिक सीमाएं बदलीं, बल्कि पूर्वी भारत का आर्थिक नक्शा भी बदल दिया.
पांडे ने कहा, “जब राज्य का बंटवारा हुआ, तो इसके खनिज-समृद्ध इलाके कम आबादी वाले राज्य झारखंड को दे दिए गए, जिससे ज़्यादा आबादी वाले बचे हुए इलाके में लगभग कोई संसाधन नहीं बचा.”
दोनों के बीच का अंतर साफ दिखता है. अविभाजित बिहार के कई बड़े औद्योगिक शहर – जमशेदपुर, बोकारो और धनबाद – झारखंड का हिस्सा बन गए. जहां ये शहर काफी औद्योगिक राजस्व पैदा करते रहे, वहीं बिहार के पास कुछ ऐसे औद्योगिक केंद्र बचे जो गिरावट का सामना कर रहे थे और खुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश में लगे थे.

अर्बन प्लानर फ़ातिमा याद करती हैं कि कैसे औद्योगीकरण ने कभी बरौनी जैसी जगहों की कायापलट कर दी थी.
उन्होंने कहा, “जब 1965 में रूसी सहयोग से बरौनी रिफाइनरी शुरू हुई, तो इसने पूरे इलाके को बदल दिया. इसके आस-पास अच्छे स्कूल, कॉलेज और नौकरियां आईं.”
लेकिन इसके फ़ायदे एक खास इलाके तक ही सीमित रहे. उन्होंने आगे कहा, “इस उद्योग का एक खास इलाके से बाहर बहुत कम असर पड़ा.”
नतीजा यह हुआ कि शहरी परिदृश्य पर एक ही शहर का दबदबा बन गया. बिहार में ‘अर्बन प्राइमसी’ (शहरी प्रधानता) काफी ज़्यादा है, जहां पटना राज्य के आर्थिक, प्रशासनिक और संस्थागत जीवन पर पूरी तरह हावी है. सरकारी दफ़्तर, विश्वविद्यालय, अस्पताल, कारोबार और सर्विस सेक्टर की नौकरियां राजधानी में ही केंद्रित हैं, जबकि दूसरे शहर स्वतंत्र विकास केंद्र के तौर पर उभरने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
‘अर्बन प्राइमसी: दि कॉन्टेक्स्ट ऑफ बिहार, इंडिया’ नाम के एक पेपर में, स्कूल ऑफ़ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के लक्ष्य गुप्ता का तर्क है कि इस तरह का केंद्रीकरण क्षेत्रीय असंतुलन पैदा करता है, शहरी सेवाओं पर दबाव डालता है और कुछ ही शहरी केंद्रों की ओर पलायन को बढ़ावा देता है.
पेपर में लिखा है, “पटना सरकारी सेवाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और व्यापार का केंद्र है. बड़े उद्योग और सर्विस सेक्टर पटना में केंद्रित हैं, जबकि दूसरे शहर अविकसित ही रह गए हैं.”
यह असंतुलन रोज़मर्रा के आंकड़ों में भी दिखता है.
पटना की प्रति व्यक्ति सालाना आय 2.2 लाख रुपये से ज़्यादा हो गई है. बिहार के सबसे ग्रामीण ज़िलों में से एक, शिवहर में यह आंकड़ा लगभग 34,000 रुपये है. यह अंतर सिर्फ नंबरों का नहीं है, बल्कि यह दो बहुत अलग-अलग दुनियाओं को दिखाता है. एक दुनिया संस्थानों, बाज़ारों और सेवाओं से जुड़ी है, जबकि दूसरी खेती, बाहर से भेजे जाने वाले पैसे (रेमिटेंस) और मौसमी पलायन पर निर्भर है.
हाल के वर्षों में, बिहार कुछ नए औद्योगिक निवेश लाने में कामयाब रहा है. कुछ खास इलाकों में कारखाने और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स दिखने लगी हैं. नीतीश कुमार के कार्यकाल में, इन्वेस्टर समिट और औद्योगिक प्रोत्साहन पहलों के ज़रिए प्राइवेट इन्वेस्टमेंट लाने की कोशिशें की गईं. फिर भी, इन्वेस्टर पटना क्षेत्र से दूर जाने में हिचकिचाते हैं, जिससे राज्य में विकास के एक ही जगह केंद्रित होने का पैटर्न बना हुआ है.
जानकारों और योजना बनाने वालों के लिए, चुनौती अब सिर्फ शहरी आबादी बढ़ाने की नहीं है. चुनौती ऐसे शहरों का नेटवर्क बनाने की है जो अलग-अलग क्षेत्रों में नौकरियां और आर्थिक गतिविधियां पैदा कर सकें.
पांडे ने कहा, “शहरीकरण के लिए एक थीम-बेस्ड अप्रोच अपनाने की ज़रूरत है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि इसका विकास एक व्यवस्थित और थीम-बेस्ड तरीके से हो.”
उन्होंने कहा कि शहरीकरण अब एक जरूरत और समय की मांग बन गया है.
उन्होंने कहा, “बिहार को अब यह तय करना होगा कि वह मैन्युफैक्चरिंग के साथ शहरीकरण को आगे बढ़ाए या उसके बिना.”
पटना के बीचों-बीच मौर्य लोक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में दोस्तों के साथ बर्गर खाते हुए, 22 साल के राजीव यादव ने राज्य की राजधानी और दूसरे बड़े शहरों के बीच के अंतर पर बात की.
यादव ने कहा, “फिर भी, यहां शहर भारत के बड़े मेट्रो शहरों की तुलना में बहुत पहले ही शांत हो जाता है. बिहार में नाइट-लाइफ कल्चर की कमी है. कुछ बदलाव हुए हैं लेकिन उनकी रफ्तार बहुत धीमी है. बिहार के शहर रात शुरू होने से बहुत पहले ही सो जाते हैं.”
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