4,500 साल पुरानी डांसिंग गर्ल मूर्ति को पहले ढकने और फिर 24 घंटे के अंदर लोगों के गुस्से और विरोध के बाद वापस दिखाने के फैसले ने NCERT की नौकरशाही अव्यवस्था को उजागर कर दिया. ज्यादातर टिप्पणीकारों ने इसे अचानक आई विक्टोरियन नैतिकता के खिलाफ एक छोटी-सी जीत मानकर मजाक उड़ाया. लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा गंभीर है और इसे समझने की जरूरत है. यह कोई अचानक की गई नैतिक पुलिसिंग या रूढ़िवादी शर्म-लिहाज का मामला नहीं था. यह गहरी नौकरशाही, डर और बेहद खतरनाक संस्थागत अलगाव का एक संरचनात्मक लक्षण है.
आज भारत में स्कूल के पाठ्यक्रम को लेकर होने वाली बहसें एक तयशुदा और थके हुए दोराहे में फंसी हुई हैं. मीडिया विश्लेषक और राजनीतिक टिप्पणीकार हर बदलाव को तुरंत “भगवाकरण” के नजरिए से देखते हैं. वे पाठ्यपुस्तकों में संशोधन को सिर्फ एक वैचारिक परियोजना मानते हैं, जिसे एक मजबूत सांस्कृतिक दक्षिणपंथ चला रहा है. लेकिन यह कहानी आधुनिक भारतीय राज्य के असली इंजन को पूरी तरह नजरअंदाज कर देती है – संस्थागत नौकरशाह की गहरी और लकवाग्रस्त कर देने वाली चिंता.
कक्षा 9 की कला की किताब माधुरिमा में मोहनजोदड़ो की इस मूर्ति के साथ जो हुआ, वह सिर्फ आक्रामक सांस्कृतिक दावे का मामला नहीं था. यह एक पारंपरिक, रक्षात्मक प्रशासनिक प्रतिक्रिया थी, जिसे किसी संभावित आपदा को शुरू होने से पहले रोकने के लिए बनाया गया था. यह समझने के लिए कि कोई सरकारी अधिकारी दुनिया भर में प्रसिद्ध, सिर्फ चार इंच ऊंची प्राचीन कांस्य मूर्ति को क्यों ढकना चाहेगा, हमें फरवरी की घटनाओं की ओर देखना होगा.
NCERT को बदल देने वाला डर
एक अभूतपूर्व कदम में, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी और शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक अवमानना का स्वतः संज्ञान लिया. इसकी वजह संशोधित कक्षा 8 की सोशल साइंस की किताब एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड का एक विवादित हिस्सा था. “हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका” के चैप्टर में न्यायिक व्यवस्था में कई स्तरों पर भ्रष्टाचार की समस्या और लंबित मामलों के भारी बोझ का सीधा उल्लेख किया गया था.
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने एक पंक्ति पर कड़ी आपत्ति जताई: “लोग न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं.” अदालत केवल इस पाठ की आलोचना करके नहीं रुकी. उसने किताब की छपाई और डिजिटल प्रसार पर तुरंत और व्यापक रोक लगा दी. अदालत ने इन “आपत्तिजनक पाठ्यपुस्तकों” को देशभर से जब्त करने का आदेश दिया, जिससे इनके लिए जिम्मेदार अकादमिक सदस्यों को भविष्य में सार्वजनिक वित्तपोषित पाठ्यक्रम कार्यों से प्रभावी रूप से बाहर कर दिया गया. अदालत ने आपराधिक अवमानना के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किए. जजों ने इस पाठ को न्यायपालिका की गरिमा को नुकसान पहुंचाने की “गहरी जड़ें जमाए, सुनियोजित साजिश” बताया. संस्थागत सुरक्षा से वंचित NCERT को गंभीर कानूनी सजा से बचने के लिए बिना शर्त सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी.
न्यायपालिका की इस ऐतिहासिक सख्ती ने परिषद की प्रशासनिक व्यवस्था में गहरा डर पैदा कर दिया. इसके बाद NCERT ने चुपचाप एक आंतरिक तंत्र बनाया. इसे आमतौर पर “प्रोजेक्ट ऑफिस” कहा जाता है. इस निकाय को शिक्षा को बेहतर बनाने, स्वतंत्र सोच को बढ़ावा देने या बच्चों में ऐतिहासिक जिज्ञासा जगाने के लिए नहीं बनाया गया था. इसे केवल रक्षात्मक पूर्व-सेंसरशिप के एक इंजन के रूप में बनाया गया था. इसका एकमात्र अनलिखित उद्देश्य किसी भी ऐसे वाक्य, विचार, चित्र या ऐतिहासिक वस्तु को व्यवस्थित रूप से हटाना था, जो जनहित याचिका, वायरल ट्वीट या फिर से सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी चेतावनी को आमंत्रित कर सकता हो.
ऐसे माहौल में, जहां सब कुछ पूर्ण भय से संचालित हो, सूखी और निष्प्राण भाषा से बाहर की हर चीज को एक बड़ा जोखिम और करियर खत्म कर देने वाली जिम्मेदारी माना जाता है. यहां तक कि 10.5 सेंटीमीटर की हड़प्पा काल की एक छोटी मूर्ति भी किसी नौकरशाह के अस्तित्व के लिए खतरा बन जाती है.
बौद्धिक अलगाव की कीमत
यह संरचनात्मक घबराहट NCERT के लंबे समय से चले आ रहे संस्थागत अलगाव को बढ़ावा भी देती है और उससे और मजबूत भी होती है. दशकों से परिषद ने धीरे-धीरे व्यापक और स्वतंत्र शैक्षणिक नेटवर्क से अपने संबंध तोड़ लिए हैं. इसके बजाय उसने खुद को आज्ञाकारी सरकारी समितियों और रक्षात्मक नौकरशाहों की एक बंद दुनिया में कैद कर लिया है. जब कोई संस्था गंभीर, विशेषज्ञों द्वारा जांचे गए अंतरराष्ट्रीय शोध से खुद को दूर कर लेती है, तो वह अपने विचारों और फैसलों पर भरोसा खोने लगती है.
बाहरी शैक्षणिक सहमति के समर्थन के बिना, दबाव पड़ने पर NCERT की प्रतिक्रिया आमतौर पर दो तरह की होती है: या तो इतिहास को अपने मुताबिक ढाल देना या उसे साफ-सुथरा बनाकर पेश करना. वह अतीत को अध्ययन योग्य वास्तविकता के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक बारूदी सुरंग की तरह देखती है, जिसे हर हाल में साफ करना है. मूर्ति को ढकने या धुंधला करने की कोशिश करके परिषद ने एक तरह का पहले से किया गया नैतिक पर्दा डालने का प्रयास किया, ताकि उसकी कमजोर और अलग-थलग प्रशासनिक व्यवस्था बाहरी दुनिया से सुरक्षित रह सके. यह एक ऐसी संस्था का बचाव तंत्र था, जो ऐतिहासिक जटिलताओं से संवाद करना भूल चुकी है और उसकी जगह अंदर की ओर देखने वाले, सुरक्षात्मक खोल के पीछे छिपना चुन रही है.
अगर NCERT इसी रास्ते पर चलता रहा, तो हमारे सामने एक बेहद अजीब सवाल खड़ा होगा: क्या अगला कदम यह होगा कि स्कूल के बच्चों को नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में जाने से भी रोक दिया जाए, जहां सिंधु घाटी सभ्यता की असली कांस्य मूर्ति दशकों से खुले में प्रदर्शित है? एक आत्मविश्वासी शिक्षा व्यवस्था इन किताबों का इस्तेमाल वास्तविक आलोचनात्मक सोच सिखाने के लिए करती है. वह छात्रों को ऐतिहासिक संदर्भ और प्राचीन दुनिया की अद्भुत धातुकला की जांच करने की चुनौती देती है. लेकिन इसके उलट, लगातार अधिक अलग-थलग होती जा रही NCERT वही कर रही है जो नहीं किया जाना चाहिए. वह शैक्षणिक ईमानदारी को प्रशासनिक घबराहट के बदले छोड़ रही है और ऐतिहासिक सत्य की जगह डिजिटल संपादन की सुरक्षित राह चुन रही है.
किताबों से संकट प्रबंधन तक
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा संस्थागत नुकसान आलोचनात्मक और स्थायी शिक्षण दृष्टिकोण का पूरी तरह खत्म हो जाना है. जब लोगों ने डिजिटल बदलाव को पकड़ लिया, तो परिषद फिर घबरा गई, रातोंरात संशोधन हटा दिया और यह कमजोर सफाई दी कि बदलाव का “कोई विशेष कारण” नहीं था. यह तेज वापसी एक खतरनाक संस्थागत बदलाव को उजागर करती है. NCERT अब ऐसी किताबें तैयार नहीं कर रही जो भारतीय छात्रों की पीढ़ियों को शिक्षित करें और मजबूत आधार दें. इसके बजाय, उसकी सामग्री अब वास्तविक समय में जनसंपर्क संकट प्रबंधन के जरिए बदली जा रही है. उसका पाठ्यक्रम अब एक नाजुक संतुलन से संचालित हो रहा है—एक तरफ न्यायालय की अवमानना का डर और दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले गुस्से का तत्काल खतरा.
जब शिक्षा नीति का संचालन पूरी तरह संस्थागत अस्तित्व बचाने की सोच से होने लगे और शैक्षणिक स्वतंत्रता पीछे छूट जाए, तो पूरी व्यवस्था अपना आधार खो देती है. किताबों के “भगवाकरण” को लेकर होने वाली सामान्य राजनीतिक बहस इस सूक्ष्म प्रशासनिक सड़ांध को समझ नहीं पाती. यह पूरी संरचनात्मक विफलता की कहानी है, जहां स्कूल शिक्षा की सबसे बड़ी संस्था एक प्रतिक्रियात्मक कॉर्पोरेट जनसंपर्क कार्यालय की तरह काम कर रही है.
जब भारत की सर्वोच्च शैक्षणिक संस्था 1926 में जिस रूप में एक ऐतिहासिक कांस्य मूर्ति मिली थी, उसे उसी रूप में छापने से भी डरने लगे, तब वह अपनी बौद्धिक विश्वसनीयता खो चुकी होती है. नौकरशाही डर और बौद्धिक अलगाव के माहौल में काम करने वाली संस्था पर अब अतीत को पढ़ाने का भरोसा नहीं किया जा सकता.
निखिल संजय-रेखा अडसुले कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ के एक्सपर्ट और IIT दिल्ली में सीनियर रिसर्च स्कॉलर हैं. वे @Surajya_Raje_ पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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