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Thursday, 18 June, 2026
होमदेशकोडगु मामला: कर्नाटक हाई कोर्ट ने होमस्टे की सुरक्षा और नियमों को मजबूत करने का निर्देश दिया

कोडगु मामला: कर्नाटक हाई कोर्ट ने होमस्टे की सुरक्षा और नियमों को मजबूत करने का निर्देश दिया

गाइडलाइंस में फायर सेफ्टी, लॉ एंड ऑर्डर, फूड सेफ्टी कानून बनाए रखने और एक स्ट्रक्चर्ड इंस्पेक्शन और एनफोर्समेंट मैकेनिज्म की ज़रूरत के निर्देश शामिल थे.

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नई दिल्ली: होमस्टे की स्थापना, संचालन और निगरानी के लिए एक नई और व्यापक नीति बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए कर्नाटक हाई कोर्ट ने कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जो लंबे समय में पर्यटकों की सुरक्षा बढ़ाने, भरोसा मजबूत करने और राज्य के पर्यटन क्षेत्र के टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं.

इन दिशा-निर्देशों में अग्नि सुरक्षा, स्वच्छता संबंधी आवश्यकताएं, कानून-व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा कानूनों का पालन और एक व्यवस्थित निरीक्षण एवं प्रवर्तन तंत्र की जरूरत जैसे निर्देश शामिल हैं.

यह आदेश अप्रैल में कोडागु जिले के एक होमस्टे में एक अमेरिकी महिला के साथ हुए यौन उत्पीड़न के मामले से जुड़ा है.

अहम बात यह है कि यह आदेश जून के पहले सप्ताह में दिल्ली के एक होमस्टे में लगी भीषण आग की घटना के बाद आया है, जिसमें 23 लोगों की जान चली गई थी. इस घटना ने भारत में बिना अनुमति तेजी से बढ़ रहे होमस्टे पर भी ध्यान खींचा है.

कर्नाटक द्वारा होमस्टे पर औपचारिक नीति बनाए जाने तक लागू रहने वाले ये दिशा-निर्देश अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल का काम कर सकते हैं. भारत में विदेशी और घरेलू दोनों तरह के पर्यटकों के लिए होमस्टे तेजी से पसंदीदा ठहरने का विकल्प बनते जा रहे हैं.

जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल बेंच ने यह भी कहा कि होमस्टे क्षेत्र के बढ़ते महत्व और इससे जुड़े बार-बार होने वाले कानूनी विवादों को देखते हुए कर्नाटक के पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव अन्य विभागों से परामर्श कर सकते हैं और होमस्टे की निगरानी के लिए एक व्यापक नीति बनाने की संभावना पर विचार कर सकते हैं.

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी नीति कई उद्देश्यों को पूरा करेगी, जैसे पड़ोसी समुदायों की सुरक्षा, नियमों के पालन में एकरूपता, नियामक अस्पष्टता को कम करना और संचालकों के लिए नियमों का पालन आसान बनाना, जिससे अनावश्यक मुकदमों में कमी आएगी.

अदालत ने कहा कि यह नीति अधिकारियों को जानकारीपूर्ण और कानूनी रूप से टिकाऊ फैसले लेने में भी मदद करेगी, साथ ही यह सुनिश्चित करेगी कि होमस्टे संचालकों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई निष्पक्ष, पारदर्शी और अनुमानित तरीके से की जाए.

अदालत ने ये टिप्पणियां अपने 11 जुलाई के आदेश में कीं, जिसे बुधवार शाम आधिकारिक रूप से अपलोड किया गया.

ये टिप्पणियां अदालत ने होमस्टे मालिक पी.ए. पोनप्पा की याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं. पोनप्पा विदेशी महिला के साथ बलात्कार की घटना के बाद उनका लाइसेंस रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती दे रहे थे.

होमस्टे मालिक का मामला

वर्तमान मामले में पोनप्पा ने 22 अप्रैल के उस आदेश को रद्द करने की मांग की, जो कर्नाटक सरकार ने जारी किया था और जिसमें उनके होमस्टे चलाने का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था.

उन्होंने इस रद्दीकरण को इस आधार पर चुनौती दी कि यह बिना किसी पूर्व नोटिस या सुनवाई का अवसर दिए किया गया था. होमस्टे मालिक ने कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, और ऑडी आल्टरम पार्टेम के सिद्धांत का भी उल्लंघन है, जो एक लैटिन कानूनी सिद्धांत है जिसका मतलब है कि दूसरे पक्ष को भी सुना जाना चाहिए.

कर्नाटक टूरिज्म ट्रेड (फैसिलिटेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 2015 का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि इस कानून की धारा 13 में पंजीकरण और मान्यता रद्द करने की प्रक्रिया बताई गई है, अगर किसी संस्थान द्वारा पंजीकरण, मान्यता या ग्रेडिंग की शर्तें पूरी नहीं की जाती हैं.

लेकिन इस प्रावधान में एक सुरक्षा व्यवस्था भी है, जिसमें कम से कम 30 दिन का नोटिस देना जरूरी है. पोनप्पा ने कहा कि उनके मामले में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई.

होमस्टे मालिक ने यह भी कहा कि रद्दीकरण आदेश उन्हें किसी भी कमी, दोष या उन पर लगाए गए आरोपों की जानकारी दिए बिना जारी कर दिया गया.

चूंकि 2015 का यह कानून कर्नाटक में पर्यटन से जुड़े संस्थानों को नियंत्रित करता है, इसलिए उनके अनुसार किसी भी कार्रवाई को निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है.

उन्होंने कहा कि यह कानून पर्यटन क्षेत्र में नियामक शक्तियों के प्रयोग में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने के उद्देश्य से लाया गया था. साथ ही उन्होंने कहा कि इस कानून में मौजूद प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय “सिर्फ औपचारिकता नहीं हैं”.

ये सुरक्षा उपाय संचालकों को मनमानी कार्रवाई से बचाने और यह सुनिश्चित करने के लिए हैं कि कोई भी प्रतिकूल निर्णय सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद ही लिया जाए.

अदालत का फैसला

हाई कोर्ट ने माना कि 2015 का यह कानून पर्यटन संस्थानों, जिनमें होमस्टे भी शामिल हैं, के नियमन का प्रावधान करता है. लेकिन अदालत ने कहा कि ऐसे होमस्टे का संचालन कई ऐसे पहलुओं से जुड़ा है जिन्हें केवल इस कानून के तहत पंजीकरण से पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता.

अदालत ने कहा कि “होमस्टे सिर्फ एक व्यावसायिक संस्थान नहीं है, यह ऐसा स्थान है जहां आम लोग रहते हैं, अक्सर लंबे समय तक, और जहां भोजन, आवास और संबंधित सेवाएं प्रदान की जाती हैं.”

इसके साथ अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सार्वजनिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सुरक्षा, उपभोक्ता संरक्षण और नागरिक अनुपालन जैसे मुद्दे बहुत महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

सबसे पहले अदालत ने कहा कि अग्नि सुरक्षा का मुद्दा गंभीर है क्योंकि कई होमस्टे आवासीय इमारतों में चलते हैं, जिन्हें अस्थायी मेहमानों के लिए डिजाइन नहीं किया गया होता.

अदालत ने कहा कि “पर्याप्त अग्नि रोकथाम उपाय, आपातकालीन निकास, फायरफाइटिंग उपकरण, निकासी प्रोटोकॉल और समय-समय पर निरीक्षण जरूरी हैं ताकि मेहमानों और रहने वालों की जान सुरक्षित रहे.”

दूसरे, जहां भोजन तैयार और परोसा जाता है, वहां खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी है. रसोई को स्वच्छता मानकों, भंडारण नियमों और खाद्य सुरक्षा कानूनों के तहत तय गुणवत्ता मानकों का पालन करना होगा.

इसके अलावा अदालत ने कहा कि जोनिंग नियमों, बिल्डिंग बायलॉज, ऑक्यूपेंसी नियमों, स्वच्छता मानकों और कचरा प्रबंधन नियमों का पालन भी जरूरी है. साथ ही मेहमानों को ठहराने से पहले उनके आपराधिक रिकॉर्ड की जांच भी की जानी चाहिए.

अदालत ने यह भी कहा कि स्वच्छता, साफ-सफाई, पीने का पानी, कचरा निपटान, सीवेज प्रबंधन और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए न्यूनतम मानकों का पालन होना चाहिए.

इसके बाद जज ने 22 अप्रैल के डिप्टी कमिश्नर और जिला पर्यटन एवं विकास समिति के अध्यक्ष द्वारा जारी आदेश को संशोधित करते हुए कहा कि अब इसे शो-कॉज नोटिस माना जाएगा.

पोनप्पा को 24 जून तक इस नोटिस का जवाब देना होगा.

मामले की अगली सुनवाई 20 जून को होगी ताकि पर्यटन विभाग के प्रधान सचिव नीति तैयार कर रिकॉर्ड पर प्रस्तुत कर सकें.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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