नई दिल्ली: पिछले महीने दिल्ली में CJP के नेतृत्व में संसद तक निकाले गए मार्च और दूसरे राज्यों में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा हिंसा और बल प्रयोग को लेकर उठाई गई चिंता वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि राज्यों के पास FIR बंद करने या वापस लेने का कानूनी अधिकार है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन जजों की बेंच ने कहा, “यह साफ किया जाता है कि अलग-अलग राज्य और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR बंद करने या वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं.”
आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR वापस लेने पर चिंता जताते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया है और प्रदर्शन के नेताओं से संपर्क करने की कोशिश कर रही है, ताकि “शब्दों के अर्थ” को लेकर इस मामले को सुलझाया जा सके.
उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि वह वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर के संपर्क में हैं, जो प्रदर्शनकारियों पर पेलेट गन के इस्तेमाल के खिलाफ मामले में पेश हो रही हैं.
इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि मौजूदा आपराधिक कानून के तहत FIR वापस लेने की अनुमति है. कोर्ट ने कहा, “सरकारी वकील के पास इसे वापस लेने का अधिकार है. इन FIR में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जा सकती है. यह छात्रों के सिर पर लटकी नहीं रह सकती.”
इसके जवाब में मेहता ने कहा कि सभी FIR बंद करने से ऐसी स्थिति बनेगी, जिसमें आपराधिक रिकॉर्ड वाले 2,700 से ज्यादा लोगों के खिलाफ दर्ज मामले, जिनमें गंभीर और जघन्य अपराध भी शामिल हैं, खत्म हो जाएंगे.
इस पर CJI ने मौखिक रूप से कहा कि इस मामले में दो तरह की FIR हैं. उन्होंने कहा, “पहली छात्रों के खिलाफ हैं, जबकि दूसरी आदतन अपराधियों के खिलाफ हैं. सबसे पहले इन्हें अलग-अलग करना होगा.”
ग्रोवर ने बिहार में दर्ज FIR का मुद्दा उठाया, जिसमें एक FIR में 152 लोगों के नाम हैं और यह भी कहा गया है कि 5,000 अज्ञात लोग इसमें शामिल थे. उन्होंने कहा, “हमें सरकार के साथ मिलकर FIR रद्द करने के लिए एक प्रक्रिया तैयार करनी होगी.”
20 जुलाई को छात्रों और अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की बड़ी संख्या ने संसद तक मार्च किया था. उन्होंने परीक्षा पेपर लीक के लिए जवाबदेही तय करने और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की थी. पूरे भारत में हुए ये प्रदर्शन NEET-UG 2026 पेपर लीक के बाद हुए थे.
इससे पहले 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनों के दौरान छात्रों और पुलिस अधिकारियों दोनों के खिलाफ हिंसा के आरोपों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई थी.
इसके लिए कोर्ट ने कहा था कि वह सुप्रीम कोर्ट के किसी पूर्व जज की अध्यक्षता में विशेष जांच टीम (SIT) बना सकता है और बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और केरल समेत दूसरे राज्यों से जवाब मांग सकता है.
सोमवार को भी वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने एक नोट पेश किया, जिसमें बताया गया कि प्रदर्शन के दौरान वकीलों के बच्चों को भी पीटा गया था और कोर्ट के साथ 300 वीडियो साझा किए गए. इसके बाद बेंच ने कहा, “हमें इन सभी मामलों को देखने के लिए एक स्वतंत्र SIT बनानी होगी.”
शंकरनारायणन ने यह भी बताया कि उन्होंने बिना वर्दी के छात्रों के खिलाफ ज्यादती करने वाले कुछ लोगों की पहचान की है. उन्होंने इस मामले में उचित जांच की जरूरत बताई और दिल्ली पुलिस कमिश्नर और RAF को यह बताने का निर्देश देने की मांग की कि पुलिस ने पेलेट गन का इस्तेमाल क्यों किया.
28 जुलाई के आदेश को साफ किया गया
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील शंकरनारायणन ने सोमवार को कोर्ट से कहा कि 28 जुलाई के उसके आदेश में कुछ अस्पष्टता है और उसे साफ करने की जरूरत है.
उस आदेश में अन्य निर्देशों के साथ राज्यों और दिल्ली सरकार को प्रदर्शनों के दौरान दर्ज FIR की जांच करने की अनुमति दी गई थी. लेकिन उन लोगों के खिलाफ कोई जबरदस्ती की कार्रवाई नहीं करने को कहा गया था, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. कोर्ट ने राज्यों को यह भी निर्देश दिया था कि 18 साल से कम उम्र के ऐसे लोगों को रिहा किया जाए, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और जिन्हें केवल प्रदर्शन में शामिल होने के कारण गिरफ्तार या हिरासत में लिया गया था.
उन्होंने कहा, “28 जुलाई के आदेश में अस्पष्टता है. इसमें राज्य को जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई है, लेकिन कहा गया है कि जबरदस्ती की कार्रवाई नहीं की जा सकती.”
वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने भी कहा कि “पहले के आदेश को साफ करने की जरूरत है. आपराधिक रिकॉर्ड एक बहुत व्यापक शब्द है, इसमें छोटे अपराध भी शामिल हो सकते हैं.”
इसके बाद कोर्ट ने साफ किया कि 28 जुलाई के आदेश में इस्तेमाल किए गए “आपराधिक रिकॉर्ड” शब्द का मतलब गंभीर और जघन्य अपराध माना जाएगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि वह केंद्र से हत्यारों के खिलाफ आरोप हटाने के लिए नहीं कह रहा है.
28 जुलाई को CJI की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था, “दिल्ली और दूसरे राज्य दर्ज FIR की जांच आगे बढ़ा सकते हैं. हालांकि, प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ कोई जबरदस्ती की कार्रवाई नहीं की जाएगी. लेकिन यह सुरक्षा उन लोगों को नहीं दी जाएगी जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है.”
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