Saturday, 25 June, 2022
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कमजोर रुपया, उच्च मुद्रास्फीति—क्यों US Fed का दरें बढ़ाना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा बुरी खबर है

दरों में आक्रामक ढंग से वृद्धि मांग को घटाएगी और इससे आर्थिक मंदी के आसार हैं. इस अनिश्चित परिदृश्य में भारत को नीतिगत स्तर पर हथियार डालने वाली प्रतिक्रियाओं से बचना चाहिए और अपने मैक्रो-फंडामेंटल्स को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए.

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अमेरिकी फेडरल रिजर्व (फेड) ने 40 साल की उच्च मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अपनी जून की बैठक में बेंचमार्क ब्याज दरों में 75 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि की है, जो 1994 के बाद से सबसे ज्यादा वृद्धि है.

फेडरल रिजर्व ने इस साल 175 बेसिस प्वाइंट्स की और बढ़ोतरी के संकेत भी दिए हैं. आक्रामक ढंग से ब्याज दरों में की गई यह वृद्धि मांग को घटाएगी और आर्थिक मंदी का कारण बन सकती है. फेड ने 2022 के लिए अपने विकास अनुमान को मार्च में 2.8 प्रतिशत से घटाकर अब 1.7 फीसदी कर दिया है.

ब्याज दर में यह तेज वृद्धि पूंजी का आउटफ्लो (देश से बाहर जाना) बढ़ा सकती है, रुपये को कमजोर कर सकती है और आयातित मुद्रास्फीति का खतरा भी बढ़ा सकती है. आक्रामक ढंग से दरों में बढ़ोत्तरी से अमेरिका में मंदी के आसार बढ़ सकते हैं. इससे भारत के निर्यात-आधारित कुछ क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं.

75 बेसिस प्वाइंट्स की वृद्धि की वजह

अमेरिका में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित मुद्रास्फीति मई में सालाना आधार पर 8.6 प्रतिशत बढ़ गई थी. अप्रैल में सीपीआई मुद्रास्फीति पिछले महीने के उच्च स्तर से धीमी रही थी, जिससे ऐसा माने जाने लगा कि अमेरिका में मुद्रास्फीति चरम पर पहुंच सकती है.

चिंता जताई जा रही थी कि धीमी मुद्रास्फीति के बीच आक्रामक ढंग से दरों में बढ़ोत्तरी बेरोजगारी बढ़ाने के साथ मजदूरी घटा सकती है. ऐसे में मई में मुद्रास्फीति के गंभीर आंकड़ों के मद्देनज़र फेड की तरफ से 75 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी अपेक्षित थी.

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घटता ब्याज अंतर और FII आउटफ्लो में तेजी

अर्थव्यवस्था को कोविड के झटके से उबारने के लिए अमेरिका में ब्याज दरें लगभग शून्य के करीब पहुंचा दी गई थीं. अमेरिका और अन्य उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरें कम होने से ब्याज अंतर बढ़ा तो इसने भारत जैसे उभरते बाजारों में डॉलर के प्रवाह को बढ़ाया.

2021 की दूसरी छमाही के बाद से फेडरल रिजर्व ने संकेत दिया कि वह अपनी अल्ट्रा-एकोमोडेटिव मौद्रिक नीति बदलेगा और अब मुद्रास्फीति पर ध्यान केंद्रित करेगा. जनवरी 2022 से ही यूएस फेड दरें बढ़ा रहा है. ऐसे में वैश्विक स्तर पर ब्याज दर का अंतर कम होता जा रहा है.

फेडरल रिजर्व की तरफ से ब्याज दर में 75 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोत्तरी की वजह से विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा अपना पैसा निकालने में तेजी आएगी. इस कैलेंडर वर्ष में अब तक एफआईआई ने डेट (Debt) और इक्विटी फंड से 26 अरब डॉलर से ज्यादा की निकासी की है. यह आउटफ्लो बड़े पैमाने पर जारी रहने के ही आसार हैं क्योंकि फेड इस साल दरों में और बढ़ोत्तरी का संकेत दे रहा है.

कमजोर रुपया

कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोत्तरी के साथ विदेशी निवेश की निकासी की तेज गति रुपये पर दबाव बढ़ा सकती है. इस कैलेंडर वर्ष में अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में 5 फीसदी की गिरावट आई है.

भारतीय रुपये में मूल्यह्रास की प्रवृत्ति अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं से अलग नहीं है. युद्ध को लेकर जारी अनिश्चितता के बीच पूंजी प्रवाह अमेरिका जैसे सुरक्षित पनाहगाहों की ओर हो रहा है, जिससे डॉलर को मजबूती मिल रही है. केंद्रीय बैंक के पूरी जोरदारी से दखल देने के बावजूद रुपया पहले ही 78 प्रति डॉलर का स्तर पार कर चुका है.

रुपये के लगातार कमजोर होने और वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि से एक्सटर्नल कॉमर्शियल बॉरोइंग रूट के माध्यम से धन जुटाने वाली कंपनियों की उधार लागत बढ़ेगी. इससे कंपनियों के विदेशी फंड जुटाने पर ब्रेक लग सकता है.

हालिया वर्षों में नई परियोजनाओं के वित्तपोषण या मौजूदा परियोजनाओं के आधुनिकीकरण के लिए ईसीबी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. पिछले दो वर्षों में कंपनियों ने कम ब्याज व्यवस्था का लाभ उठाया और इस रूट से बड़े पैमाने पर उधार लिया. आगे चलकर, ब्याज दरों में वृद्धि और रुपये के कमजोर होने से इस व्यवस्था के प्रति आकर्षण घट जाएगा.


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आयातित मुद्रास्फीति का खतरा

रुपये में लगातार कमजोरी से आयातित महंगाई की समस्या और बढ़ जाएगी. भले ही वैश्विक कीमतें अपरिवर्तित रहें, कमजोर रुपया आयातित इनपुट की कीमतों में वृद्धि करेगा.

भारत कच्चे तेल का एक बड़ा आयातक है. रुपया कमजोर होने से तेल का आयात महंगा हो जाएगा. तेल के आयात में वृद्धि पहले से ही भारत के चालू खाते के घाटे पर दबाव डाल रही है. चालू खाता घाटा 2022-23 में बढ़कर 3 प्रतिशत पर पहुंच जाने की उम्मीद है.

हल्की मंदी के आसार और भारत पर प्रभाव

अमेरिका में आक्रामक ढंग से दरों में बढ़ोतरी के बाद मंदी का खतरा बढ़ गया है. एक इनवर्टेड या फ्लैट यील्ड कर्व से संभावित मंदी के आसार नजर आ रहे हैं.

सामान्य तौर पर, यील्ड कर्व समय के साथ लाभ में वृद्धि को दर्शाने वाला होना चाहिए. आमतौर पर, निवेशक अपना फंड लंबी अवधि के लिए लॉक करने के बदले में अधिक लाभ की अपेक्षा करते हैं. लेकिन जब वे ग्रोथ को लेकर चिंतित होते हैं, तो लंबी अवधि के लिए कम लाभ को भी स्वीकारने के लिए तैयार होते हैं. लेकिन यील्ड कर्व उलट जाना अल्पावधि में अनिश्चितता का संकेत देता है.

अमेरिका में, हाल के महीनों में कई बार घटनाक्रम ऐसा रहा जिसमें यील्ड कर्व उलट गया है—जिसका मतलब है कि अल्पकालिक बॉन्ड पर लाभ लंबी अवधि के बॉन्ड्स की तुलना में तेजी से बढ़ा है. फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ शिकागो का शोध बताता है कि एक उल्टा यील्ड कर्व आमतौर पर निकट भविष्य में मंदी का संकेत देता है.

यद्यपि यह कहना जल्दबाजी होगा कि क्या अमेरिकी अर्थव्यवस्था एक लंबी मंदी के दौर में पहुंच जाएगी लेकिन मंदी या विकास की गति धीमी होने की संभावना भारत के निर्यात-आधारित क्षेत्रों, खासकर आईटी क्षेत्र को काफी ज्यादा प्रभावित करेगी.

आईटी कंपनियां जो राजस्व अर्जित करती हैं, उसमें अमेरिका का योगदान 40 से 80 प्रतिशत के बीच होता है. मंदी या आर्थिक विकास धीमा होने का असर भारतीय आईटी क्षेत्र के राजस्व पर पड़ेगा. निर्यात में विविधता लाने की रणनीति अमेरिका में मंदी के प्रतिकूल प्रभाव को घटाने में मददगार हो सकती है.

इस अनिश्चित परिदृश्य में भारत को नीतिगत मामलों में घुटने टेकने वाली प्रतिक्रियाओं से बचना चाहिए और अपने मैक्रो-फंडामेंटल को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.

(राधिका पांडे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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