Thursday, 19 May, 2022
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नकदी की कमी से जूझ रही वोडाफोन-आइडिया में सरकारी हिस्सेदारी ठीक है लेकिन एग्जिट प्लान की भी जरूरत

सरकार को वोडाफोन में 35.8% की हिस्सेदारी की सार्वजनिक बिक्री करने की नियम आधारित व्यवस्था भी तैयार कर लेनी चाहिए ताकि बाद की सरकारें इसे सार्वजनिक उपक्रम न मान बैठें.

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वित्तीय संकट में फंसी टेलिकॉम कंपनी वोडाफोन आइडिया (वीआई) ने अपने समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) पर ब्याज और स्पेक्ट्रम संबंधी बकायों को सरकारी इक्विटी में बदलने का विकल्प चुना है. इस परिवर्तन के बाद सरकार इस कंपनी के 35.8 प्रतिशत शेयर की मालिक हो जाएगी. इस तरह सरकार ‘वीआई’ की सबसे बड़ी शेयरधारक बन जाएगी.

ब्याज भुगतानों को विलंबित स्पेक्ट्रम किस्तों और एजीआर को इक्विटी में परिवर्तित करने का विकल्प सरकार द्वारा पिछले साल घोषित राहत पैकेज का हिस्सा है. नकदी की कमी से परेशान इस कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी उसे फंड जुटाने और निवेशकों को आकर्षित करने में मदद करेगी.

सरकार को इसके अंतरिम केयरटेकर की भूमिका निभानी चाहिए ताकि जब कंपनी को वित्तीय स्थिरता हासिल हो जाए या इसके लिए ठोस समाधान मिल जाए तो सरकार इससे बाहर निकल सके.


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टेलिकॉम कंपनियां वित्तीय संकट में

एजीआर की कानूनी परस्पर विरोधी व्याख्याओं के कारण टेलिकॉम कंपनियों की वित्तीय हालत करीब एक दशक से खराब है. एजीआर के दायरे को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है और नियमन संबंधी दबावों ने उनकी वित्तीय हालत खराब कर रखी है.

इन कंपनियों की अल्पकालिक तथा दीर्घकालिक समस्याओं के समाधान के लिए सरकार ने पिछले साल सितंबर में एक राहत पैकेज के अलावा बकाया भुगतानों पर चार साल के लिए रोक लगाने की घोषणा की थी. लेकिन अगर उन्होंने भुगतान रोकने का विकल्प चुना तो उन्हें ब्याज का भुगतान करना पड़ेगा.

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भारती एअरटेल और वोडाफोन ने ऐसा ही किया. भारती एअरटेल ने सरकार को ब्याज का भुगतान करने का फैसला किया. वोडाफोन ने 16,000 करोड़ रुपये के ब्याज को स्पेक्ट्रम फीस के विलंबित भुगतान में और ‘एजीआर’ को इक्विटी में बदलने का फैसला किया.

जिस सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों में अपनी हिस्सेदारी का विनिवेश करने का इरादा जताया है वह किसी निजी टेलिकॉम कंपनी में बड़ी शेयरधारक बन जाए तो यह एक विरोधाभास लग सकता है लेकिन दुनियाभर में ऐसे उदाहरण मौजूद हैं कि सरकार ने किसी निजी कंपनी की अल्पकालिक मदद के लिए उसकी बड़ी शेयरधारक बनने का फैसला किया.


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कंपनियों का सरकारी अधिग्रहण

वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान कई संस्थानों को सरकारी स्वामित्व में लाया गया था ताकि पूरा सिस्टम ही संकटग्रस्त न हो जाए. सरकारी हस्तक्षेप के कारण इनमें से कुछ संस्थानों ने अपना व्यवसाय संभाल लिया, जबकि बाकी संस्थानों का व्यवस्थित समाधान किया गया.

ब्रिटेन के सरकारी खजाने (ट्रेजरी) ने बैंकिंग सेक्टर में भारी मंडी को रोकने के लिए नैटवेस्ट समूह (पहले रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड के नाम से मशहूर) को 45 अरब पाउंड दिए लेकिन बाद में उसमें 84 फीसदी की हिस्सेदारी ले ली. सरकार उसे 2025-26 तक वापस निजी हाथों में सौंपने वाली है. ट्रेजरी समय-समय पर उसके शेयर बेचती रही है ताकि करदाताओं के स्वामित्व वाले बैंक को निजी स्वामित्व में सौंपा जा सके.

इसी तरह, ब्रिटेन के पांचवें सबसे बड़े मोर्गेज कर्जदाता नॉर्दर्न रॉक का 2008 में राष्ट्रीयकरण किया गया, जब वैश्विक मुद्रा बाज़ार संकट में आ गया था. उसकी अधिकांश परिसंपत्तियां नयी एजेंसी यूके एसेट रिजोलुशन लिमिटेड से मुक्त हुई थीं जिसने अपनी दुकान समेटकर अपनी परिसंपत्तियों को बेच दिया था. नॉर्दर्न रॉक को एक खराब और एक अच्छे बैंक में बांट दिया गया ताकि दुकान को व्यवस्थित तरीके से समेटा जा सके. परिसंपत्तियों की कई चरणों में बिक्री के जरिए कंपनी का पिछले साल पूरी तरह निजीकरण कर दिया गया.

अमेरिका में आर्थिक मंदी के कारण प्रमुख ऑटो वाहन कंपनी जनरल मोटर्स को नकदी का संकट हो गया. कंपनी ने सरकार की मदद से दिवालिया होने की अर्जी दी, जिसके तहत सरकार ने उसे दिवालिया होने से बचाने के लिए 30 अरब डॉलर दिए और उसमें 60 फीसदी की हिस्सेदारी ले ली. इससे पहले सरकार उसे 20 अरब डॉलर दे चुकी थी. कंपनी के बोर्ड में सरकार के किसी अधिकारी को शामिल नहीं किया गया. सरकार के पास कंपनी के शेयर तो थे मगर उसने उसके कामकाज में बहुत दखल नहीं दी. इस दौरान कंपनी ने अपने नेतृत्व को पुनर्गठित किया, घाटे दे रहे ब्रांडों को बेच दिया और ईंधन की कम खपत करने वाली कारों और ट्रकों का उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर दिया. 2013 तक अमेरिकी सरकार ने जनरल मोटर्स के अपने शेयर जनता के बीच बेच डाले.

ये उदाहरण बताते हैं कि किसी कंपनी का मौजूदा कानूनी स्वरूप खत्म करने के बावजूद उसको चलाया जा सकता है और उसे अस्थायी सरकारी स्वामित्व के अधीन भी पुनर्गठित किया जा सकता है. समाधान की व्यवस्था में इसे ‘ब्रिज संस्था’ कहा जात है, जो निजी स्वामित्व के एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन के बीच ब्रिज का काम करती है. ‘ब्रिज संस्था’ की स्थापना अस्थायी तौर पर की जाती है और संकटग्रस्त संस्था के अंतिम समाधान तक इसकी सभी परिसंपत्तियों और देनदारियों के अधिग्रहण का काम इसके जरिए किया जाता है.


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वोडाफोन आइडिया को राहत

सितंबर तक वोडाफोन आइडिया पर कुल 1,94,000 करोड़ रुपए का कर्ज था. अब सरकार इसकी सबसे बड़ी शेयरधारक बन जाएगी और वह इसके कर्ज को इक्विटी में बदलने का विकल्प चुन सकती है. उसने संकेत दिया है कि वह टेलिकॉम व्यवसाय चलाने का कोई इरादा नहीं रखती है. सरकारी मदद इस कंपनी को जरूरी नकदी जुटा सकती है और फंड उगाहने में सहायता भी कर सकती है लेकिन सरकार को इससे बाहर निकलने का समयबद्ध रणनीति भी तैयार कर लेनी चाहिए.

कंपनी से बाहर निकलने और उसके सरकारी शेयरों की सार्वजनिक बिक्री का नियम आधारित मजबूत फ्रेमवर्क सामने रख देना जरूरी है. यह आगे की किसी सरकार या राजनीतिक नेतृत्व को इसे सरकारी कंपनी मान लेने और इसे करदाताओं पर स्थायी बोझ बनाने से रोकेगा.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडे एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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