Saturday, 2 July, 2022
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अर्थव्यवस्था की खातिर मोदी और RBI के लिए 2022 का मंत्र- शांति से सुधार जारी रखें

मोदी सरकार को 2022 में अर्थव्यवस्था के कई मोर्चे पर चुनौतियों और उथलपुथल का सामना करना पड़ेगा इसलिए आर्थिक सुधारों को उसे आगे बढ़ाते रहना होगा.

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भारत जब वर्ष 2022 में प्रवेश कर रहा है, नरेंद्र मोदी सरकार के लिए ये कई चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं- कोविड की नयी लहर, वृहत अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर स्थिरता बनाए रखना, आर्थिक वृद्धि की दर में सुधार के लिए आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाना.

ओमीक्रॉन

भारत को कोविड की नयी लहर का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन व्यापक टीकाकरण, वाइरस से लड़ने की क्षमता में वृद्धि और हमारी बेहतर तैयारियों के कारण इस बार जान और आजीविका की कम हानि होने की उम्मीद है.

2021 के शुरू में भारतीय अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही थी कि कोविड की दूसरी लहर ने इस पर ब्रेक लगा दिया था. लेकिन टीकाकरण की गति बढ्ने और पाबंदियों में ढील दिए जाने के कारण आर्थिक वृद्धि की गति ने रफ्तार पकड़ ली. दूसरी लहर पहली से ज्यादा घातक रही लेकिन इसका असर मुख्यतः अप्रैल-जून की तिमाही पर पड़ा. उस तिमाही में वास्तविक जीडीपी कोविड से पहले वाले स्तर के मुक़ाबले 9.2 प्रतिशत कम थी लेकिन सितंबर वाली तिमाही में उसके बराबर हो गई थी. उम्मीद की जाती है कि ओमीक्रॉन भले तेजी से फैले, उससे लड़ने में हम ज्यादा सक्षम हुए हैं और अर्थव्यवस्था को इस बार कम झटका लगेगा.

वृहत अर्थव्यवस्था से जुड़ी नीतियां

फिलहाल वित्तीय या मौद्रिक प्रसार की गुंजाइश सीमित ही है. इसलिए मुद्रा नीति का सामान्यीकरण ही हो सकता है. नीति निर्माताओं को एक ओर धीमी आर्थिक वृद्धि की चिंताओं और दूसरी ओर कोविड की लहर तथा पाबंदियों के कारण ऊंची मुद्रास्फीति के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा.

विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने महामारी के झटकों का सामना करने के लिए बड़े वित्तीय पैकेज की घोषणा की है. लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं में वित्तीय गुंजाइश कम होने के कारण ज़्यादातर सहारा केंद्रीय बैंकों ने दिया, जिन्होंने आर्थिक नुकसान को कम करने के लिए उधार उपलब्ध कराने के कई कदम उठाए. इन कदमों में सरकारी बॉन्डों की बड़े पैमाने पर खरीद और बैंकों को आसान दरों पर उधार देना शामिल है ताकि वे परिवारों और व्यवसायों को उधार दे सकें.

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टीकाकरण में तेजी और अर्थव्यवस्था में सुधार शुरू होने के बाद सामान तथा सेवाओं की मांग फिर बढ्ने लगी. लेकिन सप्लाई में अड़चनों, कच्चे माल की कमी, जींसों की कीमत में वृद्धि, बंदरगाहों पर जाम, और जहाजों की कमी के कारण महंगाई बढ़ी. अक्टूबर-नवंबर तक साफ हो गया कि मुद्रास्फीति जल्दी जाने वाली नहीं है और वह व्यापक आधार ले चुकी है.

इसके कारण केंद्रीय बैंकों ने संकेत दे दिया कि वे बॉण्ड की खरीद में कमी करने जा रहे हैं और ब्याज दरों में उम्मीद से पहले वृद्धि करने वाले हैं. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बॉण्ड की खरीद में तेजी से कमी लाने की घोषणा कर दी, तो ब्रिटेन ब्याज दरों में वृद्धि करने वाला पहा ‘जी-7’ देश बन गया. आशंका यह है कि ओमिक्रोन के कारण सप्लाइ में अड़चनें बढ़ेंगी, जिससे मुद्रास्फीति में भी वृद्धि होगी. ऐसा होगा तो केंद्रीय बैंकों के पास मुद्रा नीति में ढिलाई बरतने की गुंजाइश नहीं बचेगी.

ऊंचे घाटे और कर्ज के बढ़े बोझ के कारण वित्तीय नीति में कोई गुंजाइश नहीं बची है और ‘रॉलओवर’ के का खतरा बढ़ गया है. इन कमजोरियों ने सरकारों की विस्तारपरक वित्तीय नीति अपनाने की क्षमता कमजोर कर दी है. वित्तीय विस्तार का एक तरीका यह है कि भुगतानों का ट्रांसफर किया जाए, जैसा कि कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने किया है. दूसरा रास्ता यह है कि करों में कटौती की जाए. भारत में अब जबकि जीएसटी स्थापित हो चुका है, तब सरकार अगर वित्तीय विस्तार करना चाहे तो जीएसटी दरों को घटाकर 12 फीसदी करना एक प्रमुख विकल्प हो सकता है.


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अफरातफरी से बचें

ओमीक्रॉन वायरस के कारण बढ़ती चिंताओं, केंद्रीय बैंकों की तीखी टिप्पणियों और अर्थव्यवस्थाओं को सहारा देने की घटती गुंजाइश के कारण बदलावों के कारण बाजारों में उथल-पुथल जारी रह सकती है. लेकिन टीकों के असर के बारे में आश्वासन बढ़ेगा तो इन बाज़ारों में थोड़ी स्थिरता आ सकती है. विनिमय दरों, ब्याज दरों और शेयर बाज़ारों में थोड़ी विस्फोटक स्थिति बनी रह सकती है. नीति निर्माताओं को शांति बनाए रखनी होगी और नीति के मामले में अफरातफरी से बचते हुए वृहत अर्थव्यवस्था के मूल आधारों पर ध्यान देना होगा.

सुधारों के जरिए उत्पादकता बढ़ाएं

‘आत्मनिर्भरता’ के पैकेज के तहत कई सुधारों की घोषणा की गई. राज्यों को उधार लेने की सीमा जीडीपी के 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत के बराबर कर दी गई, और इसे विशेष सुधारों से जोड़ दिया गया. नयी सार्वजनिक उपक्रम नीति की घोषणा की गई ताकि रणनीतिक सेक्टरों में सार्वजनिक क्षेत्र की उपस्थिति कम हो, और बाकी का निजीकरण कर दी जाए.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का प्रस्ताव किया था. वित्तीय व्यवस्था में सुधार के इस कदम का लंबे समय से इंतजार था क्योंकि वह भारत की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए उधार उपलब्ध कराने में असमर्थ थी. भारत में तीन चौथाई बैंकिंग सेक्टर अभी भी सरकार के कब्जे में है. साल-दर-साल बैंकों को नयी पूंजी देने से वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव बढ़ रहा है, खासकर तब जबकि वृहत अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने की जरूरत है.

मोदी सरकार को दो सरकारी बैंकों के निजीकरण के लिए कानून बनाने की पहल करनी चाहिए.

इसी तरह, ‘फाइनैंशियल रिजोलुशन ऐंड डिपॉज़िट इंश्योरेंस बिल’ के जरिए रिजोलुशन ऑथरिटी के गठन, सार्वजनिक ऋण प्रबंधन एजेंसी के गठन, और बॉण्ड मार्केट इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार के कदम उठाना जरूरी है.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडे एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

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