Sunday, 5 December, 2021
होमदेशअर्थजगतभारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था कैसे सिकुड़ रही है और लंबे समय के लिए अच्छी खबर क्यों है

भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था कैसे सिकुड़ रही है और लंबे समय के लिए अच्छी खबर क्यों है

ज्यादा औपचारीकरण हुआ तो अनौपचारिक क्षेत्र में कम वेतन और ज्यादा श्रम वाले रोजगारों की जगह औपचारिक क्षेत्र के ज्यादा उत्पादक रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बेशक इससे कुछ समय के लिए उथलपुथल मचेगी.

Text Size:

पिछले महीने जारी भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, जो 2017-18 में जीडीपी के 52 प्रतिशत के बराबर थी वह 2020-21 में सिकुड़कर 15-20 प्रतिशत के बराबर हो गई है. रिपोर्ट में, अर्थव्यवस्था के औपचारीकरण का आकलन करने के लिए रोजगार और डिजिटाइजेशन को आधार बनाया गया है. रिपोर्ट बताती है कि पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न माध्यमों से औपचारिक अर्थव्यवस्था में 13 लाख करोड़ रुपये आए हैं.

इससे यह अहम सवाल उभरता है कि औपचारिक अर्थव्यवस्था वास्तव में है क्या. औपचारीकरण से प्रायः ये मतलब निकाले जाते हैं- पैसे का लेन-देन बैंक या डिजिटल व्यवस्था से होना, फ़र्मों के उत्पादन का ज्यादा हिस्सा टैक्स नेट में जाना, पंजीकृत उपक्रमों में कर्मचारियों की संख्या में वृद्धि या टैक्स नेट में शामिल उपक्रमों द्वारा जीडीपी में योगदान बढ़ना.

  • ‘औपचारिक’ का आकलन वित्तीय लेन-देन से

एसबीआई की रिपोर्ट डिजिटल माध्यमों या औपचारिक वित्त को आकलन का पैमाना बनाती है. डिजिटल भुगतान, किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए कृषि ऋण के औपचारीकरण और पिछले तीन साल से ऑनलाइन खरीदरियों में वृद्धि ने औपचारिक वित्त के उपयोग से लेन-देन बढ़ाने में योगदान दिया है.

नोटबंदी और जीएसटी के मेल से व्यापार में कैशलेस लेन-देन में तेजी आई है और अर्थव्यवस्था में नकदी के इस्तेमाल में कमी आई है. इन उपायों के कारण, काफी हद तक नकदी से चलने वाली अर्थव्यवस्था में ऐसे बदलाव की प्रक्रिया तेज हुई है जिसमें औपचारिक वित्त या बैंकों और पेमेंट बैंकों की भूमिका बढ़ी है.

इन उपायों ने आधार तो तैयार किया ही, कोविड-19 महामारी ने डिजिटाइजेशन की गति को बढ़ाने का और अवसर जुटाया. इस दौरान डिजिटल लेन-देन में काफी वृद्धि आने से औपचारीकरण को और मजबूती मिली. वायरस के संक्रमण के डर ने बड़े ही नहीं छोटे शहरों में भी लोगों को डिजिटल भुगतान का रास्ता चुनने को मजबूर किया. सभी चैनलों से यूनाइटेड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) और आधार-इनेबल्ड पेमेंट सिस्टम (एईपीएस) के जरिए डिजिटल भुगतान रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

  • ‘औपचारिक’ का आकलन टैक्स नेट से

जीएसटी के प्रावधान पंजीकृत व्यवसायों को अनौपचारिक क्षेत्र के अपंजीकृत उपक्रमों से लेन-देन करने से हतोत्साहित करते हैं.

इसलिए अनौपचारिक क्षेत्र को सप्लाई चेन में बने रहने के लिए अपना पंजीकरण करवाने की जरूरत महसूस होती है. जब जीएसटी लागू की गई, तब अनौपचारिक क्षेत्र से प्रतिस्पर्द्धा कर रहीं फर्मों द्वारा बिक्री बढ़ गई जबकि अनौपचारिक क्षेत्र की फ़र्मों को अनुपालन लागत के कारण नुकसान उठाना पड़ा. इससे, टैक्स नेट की फ़र्मों द्वारा उत्पादन के आधार पर मूल्यांकित की जा रही औपचारिक अर्थव्यवस्था में इजाफा हुआ.

पंजीकृत उपक्रमों में रोजगार देंगे ‘औपचारीकरण’ का अंदाजा

‘औपचारिक’ की तीसरी तरह से परिभाषा पंजीकृत इकाइयों में कामगारों के अनुपात से तय हो सकती है. अनौपचारिक अर्थव्यवस्था उन उपक्रमों का प्रतिनिधित्व करती है जो पंजीकृत नहीं हैं, जिनमें कामगारों को सामाजिक सुरक्षा नहीं हासिल होती.

भारत में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) उद्योगों का वार्षिक सर्वे (एएसआई) करता है जिसमें ‘पंजीकृत’ या औपचारिक क्षेत्र की फ़र्मों के बारे में जानकारियां इकट्ठा की जाती है. इन फ़र्मों में प्रायः 10 से ज्यादा कामगार काम करते हैं. ‘एएसआई’ में असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र की फ़र्मों को शामिल नहीं किया जाता. उनका सर्वे नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) गैर-निगमित गैर-कृषि उपक्रमों के सर्वे के दौरान किया जाता है.

औपचारीकरण कितना हुआ है इसका विश्लेषण करने का एक स्रोत ईपीएफओ पे-रोल रिपोर्ट है. यह रिपोर्ट उपक्रमों द्वारा दायर इलेक्ट्रोनिक मासिक रिटर्न यानी प्रथम ईसीआर (इलेक्ट्रोनिक चालान-कम-रिटर्न) के बारे में डेटा उपलब्ध कराती है. इसमें हरेक सदस्य के हर माह के वेतन और योगदान का ब्योरा होता है. इस डेटा के आधार पर एसबीआइ रिपोर्ट का अनुमान है कि 2017-18 के बाद से 21 जुलाई तक करीब 36.6 लाख रोजगारों का औपचारीकरण हो चुका है.

औपचारीकरण का दूसरा स्रोत ई-श्रम पोर्टल है. यह भारत में असंगठित कामगारों का पहला राष्ट्रीय डेटाबेस है. यह सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं का लाभ असंगठित क्षेत्र के कामगारों तक पहुंचाने का काम आसान बनाता है. 30 अक्तूबर तक 5.3 करोड़ से ज्यादा कामगारों ने पंजीकरण करवा लिया था. पंजीकृत कामगारों की मासिक आय के आधार पर यह रिपोर्ट अनुमान लगाती है कि 13 लाख करोड़ रु. के करीब आधे का औपचारीकरण ई-श्रम पोर्टल के जरिए हुआ. इस मामले में कामगार ‘पंजीकृत’ हैं.


यह भी पढ़ें : आर्थिक स्थिति सुधरने लगी है लेकिन दुनियाभर में हो रहे बदलावों पर भारत को रखनी होगी नजर


सरकार ने रोजगार के औपचारिक निर्माण को और अनौपचारिक इकाइयों को औपचारिक अर्थव्यवस्था में लाने को प्रोत्साहन देकर अर्थव्यवस्था के औपचारीकरण के कई कदम उठाए हैं. ईपीएफओ के अंतर्गत जो उपक्रम हैं उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहन देने की एक योजना भी लागू की गई कि वे ज्यादा-से-ज्यादा कामगारों को सामाजिक सुरक्षा की लाभ देते हुए नियुक्त करें. इस योजना के तहत सरकार दो साल के लिए कर्मचारी और नियोक्ता की ओर से दिए जाना वाला योगदान खुद ही जमा कर रही है. यह ईपीएफओ में पंजीकृत उपक्रमों की रोजगार देने की क्षमता पर निर्भर होगा.

‘औपचारिक’ का आकलन पंजीकृत उपक्रमों के आउटपुट से

अर्थव्यवस्था की औपचारिकता का अंदाजा लगाने का एक उपाय यह भी है कि भारत के गैर-कृषि उपक्रमों के संपूर्ण जगत और जीडीपी में उसके योगदान का जायजा लिया जाए. ताजा सर्वे के मुताबिक, भारत में अनौपचारिक तथा औपचारिक क्षेत्रों के उपक्रमों की कुल संख्या 6.36 करोड़ है. 99.7 प्रतिशत उपक्रम असंगठित क्षेत्र में हैं और यह आंकड़ा 2011-12 से 2015-16 तक स्थिर रहा. पंजीकृत या औपचारिक क्षेत्र की फ़र्मों का अनुपात मात्र 0.3 प्रतिशत है और संख्या 1.7 लाख है. असंगठित क्षेत्र के ज़्यादातर उपक्रम ‘एमएसएमई सेक्टर’ के ‘माइक्रो’ श्रेणी के हैं. एमएसएमई के बारे में वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, वे भारत के जीडीपी में 30 फीसदी से ज्यादा का योगदान देते हैं.

औपचारिक क्षेत्र का आकलन करने का एक उपयोगी उपाय यह है कि कुल ‘ग्रौस वैल्यू ऐडेड’ (जीवीए) में निजी कॉर्पोरेट सेक्टर की हिस्सेदारी को देखा जाए. जीवीए में निजी कॉर्पोरेट सेक्टर की हिस्सेदारी 2016-17 से 2019-20 तक करीब 37 फीसदी पर स्थिर रही है.

सरकार ने लघु व्यवसायों के पंजीकरण की एक नयी प्रक्रिया 1 जुलाई 2020 को शुरू की. यह ‘उद्यम’ पंजीकरण इस क्षेत्र के औपचारीकरण में अहम भूमिका निभेगा. यह सरकार को इस क्षेत्र के बारे में डेटा इकट्ठा करने में भी मदद करेगा और लघु व्यवसायों (एमएसएमई) को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में भी मदद करेगा. इस नये प्लेटफॉर्म पर 50 लाख से ज्यादा एमएसएमई ने अपना पंजीकरण करवा लिया है.

उपरोक्त परिभाषाओं में आपस में काफी हद तक तालमेल है. उदाहरण के लिए, पंजीकृत की जाने वाली टैक्स नेट में आ सकती है, कामगारों की सामाजिक सुरक्षा के लिए अपना योगदान दे सकती है, और बैंकिंग व्यवस्था का इस्तेमाल कर सकती है. अनौपचारिक क्षेत्र का 15-20 फीसदी योगदान उनका है जो बैंकिंग व्यवस्था का इस्तेमाल करते हैं. यह अपंजीकृत फ़र्मों द्वारा जीडीपी में योगदान के बराबर हो सकता है. हम उम्मीद करते हैं कि नोटबंदी, जीएसटी और कोविड के बावजूद बड़ी संख्या में फ़र्में अपंजीकृत रहेंगी. इसलिए दूसरे पैमानों से मूल्यांकित योगदान छोटा हो सकता है.

औपचारीकरण का ‘मनरेगा’ पर असर

अनौपचारिक क्षेत्र को जबकि परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, औपचारीकरण का असली लाभ ऊंची उत्पादकता, औपचारिक रोजगारों, और अर्थव्यवस्था में बेहतर प्रतिस्पर्द्धा के रूप में सामने आएगा.

ज्यादा औपचारीकरण हुआ तो अनौपचारिक क्षेत्र में कम वेतन और ज्यादा श्रम वाले रोजगारों की जगह औपचारिक क्षेत्र के ज्यादा उत्पादक रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बेशक इससे कुछ समय के लिए उथलपुथल मचेगी क्योंकि औपचारिक रोजगार अनौपचारिक क्षेत्र के रोजगारों से ज्यादा पूंजीखोर होते हैं. इसलिए, ज्यादा औपचारीकरण की ओर जाने से अधिक उत्पादक तथा पूंजीखोर रोजगार पैदा होंगे तो बेरोजगारी निश्चित तौर पर बढ़ेगी. इसका फरमान यह है कि ‘मनरेगा’ के अंतर्गत रोजगार की मांग बढ़ी है.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडे एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

share & View comments