Monday, 24 January, 2022
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ग्लोबल उथल पुथल के बीच अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए बुनियादी बातों पर भी ध्यान देना जरूरी

आर्थिक वृद्धि की गति अभी धीमी ही है इसलिए ज़्यादातर केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति पर ही नज़र रख रहे हैं इसलिए रिजर्व बैंक को भी कड़े नीतिगत कदम उठाने से बचना चाहिए.

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दुनियाभर में मौद्रिक नीति में बदलावों के कारण शेयर बाजारों में इन दिनों उथलपुथल चल रही है. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी मौद्रिक नीति में सामान्यीकरण का संकेत दिया तो रुपये पर दबाव बढ़ गया.

पिछले कुछ महीनों से कीमतों में तेजी के कारण कई बड़े देशों के केंद्रीय बैंक सामान्यीकरण की नीति अपनाने लगे हैं. मुद्रास्फीति जब नयी ऊंचाई को छूने लगी तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने इस महीने आर्थिक पैकेज को घटाने की गति तेज करने का फैसला कर लिया.

बड़े बैंकों की नयी नीति

फेड रिजर्व ने नवंबर में घोषणा की कि वह मासिक बॉण्ड ख़रीदारी में 15 अरब डॉलर प्रति माह की कटौती करेगा. लेकिन अमेरिकी सीपीआइ मुद्रास्फीति नवंबर में पिछले 39 साल के अधिकतम स्तर 6.8 प्रतिशत पर पहुंच गई, तो उसने बॉण्ड ख़रीदारी में 30 अरब डॉलर प्रति माह की कटौती करने का फैसला कर लिया.

ऊंची मुद्रास्फीति से निबटने के लिए उसने अगले साल ब्याज दरों में तीन बार वृद्धि करने की अपनी योजना का संकेत भी दिया. माना जा रहा है कि कोविड महामारी के बीच अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए केंद्रीय बैंक ने जो विस्तारवादी मौद्रिक नीति बनाई थी उसे उलटने की गति को तेज करने के लिए ही यह फैसला किया गया है.

अमेरिका ने राहत पैकेज में समय से पहले कटौती करने का फैसला कर लिया है, तो ब्रिटेन ब्याज दरों में वृद्धि करने वाला ग्रुप-7 का पहला देश बन गया है.

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बैंक ऑफ इंग्लैंड ने पिछले सप्ताह पॉलिसी रेट को 0.1 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.24 प्रतिशत कर दिया क्योंकि मुद्रास्फीति अप्रैल 2022 में उसके लक्ष्य से तीन गुना बढ़कर 6 प्रतिशत होने जा रही है.

यूरोपीयन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) ने 2022 की पहली तिमाही शुरू होते ही ‘एसेट’ खरीद में चरणबद्ध कटौती करने का फैसला किया है.

अब जबकि ओमिक्रोन वाइरस वैश्विक आर्थिक वृद्ध के लिए खतरा बनकर उभर रहा है, केंद्रीय बैंकों के पास इतनी गुंजाइश नहीं है कि वे ढीलीढाली मौद्रिक नीति अपनाएं क्योंकि मुद्रास्फीति मजबूत हो रही है.

आर्थिक वृद्धि की गति फिलहाल चूंकि कमजोर ही रहने वाली है, इसलिए तमाम केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति पर ही नज़र रख रहे हैं. भारतीय रिजर्व बैंक की इस महीने की बैठक के मिनट्स बताते हैं मुद्रा नीति कमिटी (एमपीसी) के सदस्य भी नीति के सामान्यीकरण पर विचार कर रहे हैं क्योंकि मुद्रास्फीति का दायरा फ़ेल रहा है.


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भारत पर असर

प्रायः ऐसा होता है कि अमेरिका में जब दरें बधाई जाती हैं तब भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं से विदेशी निवेश बाहर जाने लगता है क्योंकि उनके यहां विकसित देशों की तुलना में मुद्रस्फीति और ब्याज दरों का स्तर ऊंचा होता है.

निवेशक ब्याज दरों में फर्क का लाभ उठाते हुए अमेरिका से डॉलर के आधार पीआर कम ब्याज दरों पर उधार लेते हैं और भारत जैसे देशों में रुपये के आधार पर बॉन्डों में निवेश करके ऊंची ब्याज दर हासिल करते हैं. जब फेडरल रिजर्व दरें बढ़ता है तब दोनों देशों के बीच ब्याज दरों का फर्क सिकुड़ जाता है और विदेशी निवेशकों को रुपये वाली एसेट्स आकर्षक नहीं लगने लगते हैं.

राहत पैकेजों की वापसी के कारण दुनियाभर में तरलता का जो संकट पैदा हुआ है वह उभरती अर्थव्यवस्थाओं के वित्त बाज़ारों के लिए तरलता के स्रोत को बंद कर देगा.

केंद्रीय बैंकों द्वारा बॉन्ड की खरीद ने वित्तीय स्थिति में जो गुंजाइश बनाई उसके कारण अतिरिक्त तरलता पैदा हुई और यह उभरती अर्थव्यवस्थाओं के शेयर बाज़ारों में पहुंच गई.

अब बॉन्ड खरीद में तेजी से आई कमी तरलता का संकट पैदा करेगी और विदेशी फंड बाहर जाने लगेंगे. पिछले दो महीने से विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी और डेट में पैसा लगाने से परहेज कर रहे हैं. अगस्त-सितंबर में विदेशी निवेशक पैसा लगा रहे थे मगर अक्तूबर-नवंबर में वे बिक्रेता बन गए.

मौद्रिक राहत में तेज कटौती की घोषणा के बाद विदेशी फंड तेजी से बाहर जा रहा है. अक्तूबर-नवंबर के मुक़ाबले दिसंबर में विदेशी निवेशकों द्वारा बिकवाली की गति कहीं ज्यादा हो गई. 22 दिसंबर तक विदेशी निवेशक 3 अरब डॉलर से ज्यादा वापस ले गए थे. ओमीक्रॉन के बढ़ते मामलों और विकसित अर्थव्यवस्थाओं द्वारा मुद्रा के मामले में हाथ तंग किए जाने के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफपीआइ) की स्थिति विस्फोटक बनी रह सकती है.

अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें विदेशी निवेशकों को आकर्षित करेंगी, और डॉलर मजबूत होता जाएगा.

बाज़ारों की विस्फोटक स्थिति का असर रुपये पर भी पड़ेगा. विदेशी फंड के बाहर जाने और ओमीक्रॉन को लेकर आशंकाओं के चलते रुपया पिछले सप्ताह प्रति डॉलर 76 के स्तर से भी नीचे चला गया.

अनुमान है कि रुपये की गिरावट को रोकने के लिए रिजर्व बैंक ने डॉलर बेचे. राहत पैकेज में फेडरल रिजर्व द्वारा कटौती किए जाने, ब्याज दरों में वृद्धि तथा विदेशी निवेशकों द्वारा फंड वापस ले जाने की उम्मीद के चलते करेंसी की स्थिति अभी विस्फोटक बनी रह सकती है. यह मध्य अवधि के लिए चिंता का कारण नहीं बन सकता है.

पैकेज की कटौती में तेजी बाजार की उम्मीदों के अनुरूप थी. फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष ने बैठक से पहले ही संकेत दिया था कि मुद्रास्फीति चूंकि अस्थायी नहीं है इसलिए कटौती अपेक्षा से पहले बंद की जा सकती है.

रुपये में गिरावट को रोकने के लिए रिजर्व बैंक को सख्त नीतिगत कार्रवाई करने से बचना चाहिए. 2013 में केंद्रीय बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति और पूंजी पर नियंत्रणों के जरिए रुपये में गिरावट को रोकने की कोशिश की थी. हड़बड़ी में की गई यह कोशिश कुल मिलाकर बेअसर रही थी और इसने गिरावट को और तेज कर दिया था. आगे का रास्ता यही है कि आधारभूत तत्वों पर ध्यान दिया जाए और व्यापक अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान की जाए.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडे एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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