मुंबई: नंदू यादव ने तीन साल से ज्यादा पहले FM सुनना बंद कर दिया था.
मुंबई के कैब ड्राइवर यादव ने कहा, “ऐसा लगता है कि हर समय विज्ञापन ही चल रहे हैं. आपको मुश्किल से कोई गाना सुनने को मिलता है. कभी-कभी आप आधे घंटे तक सुनते हैं और शायद उसमें पांच मिनट गाने और दो मिनट किसी की बातचीत सुनने को मिलती है और आपको यह भी नहीं पता होता कि वह कब आएगा. इसका कोई फायदा नहीं है.”
अब जब वह रास्ते में संगीत सुनना चाहते हैं, तो फोन का इस्तेमाल करते हैं. जब वह गाड़ी नहीं चला रहे होते, तब यूट्यूब देखते हैं और एक दोस्त के साथ यूट्यूब प्रीमियम का सब्सक्रिप्शन भी शेयर करते हैं क्योंकि दोनों को विज्ञापन बिल्कुल पसंद नहीं हैं.
रेडियो कंपनियां भी इस बदलाव को महसूस कर रही हैं. मई में एचटी मीडिया ने कहा कि वह पांच FM लाइसेंस वापस कर रहा है. इनमें दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में Radio One की फ्रीक्वेंसी, मुंबई में Radio Nasha और चेन्नई में Fever की फ्रीक्वेंसी शामिल हैं. पहले वापस किए गए एक लाइसेंस को मिलाकर, ग्रुप ने अब घाटे में चल रही छह फ्रीक्वेंसी छोड़ दी हैं. कंपनी ने कहा कि ये फ्रीक्वेंसी “आर्थिक और रणनीतिक रूप से चलाने लायक नहीं रह गई थीं.”
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब निजी FM अब भी पूरे देश में फैला हुआ है. मार्च 2026 तक 120 शहरों में 390 चैनल चल रहे थे.
समस्या साफ है. अब लोगों के पास उन घंटों को बिताने के पहले से कहीं ज्यादा तरीके हैं, जो वे पहले FM सुनने में बिताते थे. विज्ञापन देने वाले भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं, जहां लोगों को उनकी पसंद के हिसाब से विज्ञापन दिखाना और उसका असर मापना आसान है, लेकिन रेडियो कंपनियों को अभी भी लाइसेंस, स्पेक्ट्रम, प्रसारण और संगीत के लिए पैसे देने पड़ते हैं. भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निजी FM ने पिछले दो दशकों में शहरों और कस्बों में स्थानीय स्टेशनों का एक बड़ा नेटवर्क बना लिया है. जैसे-जैसे इसका कारोबार कमजोर हो रहा है, कंपनियों को यह तय करना पड़ रहा है कि किन फ्रीक्वेंसी के लिए पैसे देना अभी भी फायदेमंद है और जब श्रोता FM के पास नहीं आता तो रेडियो का कारोबार आगे क्या बनेगा.
दबाव कोविड-19 महामारी से पहले ही शुरू हो गया था. Telecom Regulatory Authority of India (TRAI) के आंकड़ों के मुताबिक, निजी FM का विज्ञापन से होने वाला राजस्व 2018-19 में 2,382 करोड़ रुपये पर पहुंच गया था, लेकिन 2019-20 में घटकर 1,903 करोड़ रुपये रह गया. महामारी के कारण अगले साल यह और गिरकर 941 करोड़ रुपये हो गया. 2024-25 तक इसमें सुधार हुआ और यह 1,819 करोड़ रुपये पहुंच गया, लेकिन यह अब भी लॉकडाउन से पहले के सबसे ऊंचे स्तर से कम था.
एचटी मीडिया के ग्रुप CFO पीयूष गुप्ता ने जून में लाइसेंस वापस करने के बाद निवेशकों से कहा, “एक सेक्टर के तौर पर रेडियो पर काफी दबाव है.”
दिप्रिंट ने Fever Network से लाइसेंस वापस करने और उसकी रेडियो रणनीति को लेकर विस्तार से सवाल भेजे हैं, लेकिन अभी तक उसका जवाब नहीं मिला है.
जब फ्रीक्वेंसी ही सब कुछ थी
भारत में सदी की शुरुआत के समय निजी FM अभी नया था. सरकार ने 1999 में निजी कंपनियों के लिए FM प्रसारण खोल दिया था. पहले चरण में 12 शहरों में 21 निजी चैनल शुरू हुए. 2011 तक इनकी संख्या बढ़कर 85 शहरों में 242 चैनल हो गई थी. यह कारोबार भी बढ़ रहा था: FICCI-KPMG ने 2010 में इस उद्योग का आकार 1,000 करोड़ रुपये और 2014 तक 1,720 करोड़ रुपये आंका था.
The Deshbhakt के पीछे राजनीतिक व्यंग्यकार बनने से बहुत पहले, आकाश बनर्जी देर रात दिल्ली के रेडियो पर ‘Dr Love’ थे. उन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में कॉलेज में रहते हुए Radio Mirchi पर Dil Chahta Hai की हॉस्टिंग शुरू की थी.
बनर्जी ने बताया कि व्यस्त दिन में वह श्रोताओं के करीब 400 रिकॉर्ड किए गए संदेश और लगभग 50 ईमेल देख सकते थे. फोन करने वाले लोग शहर के बारे में जानकारी देने में भी उनकी मदद कर सकते थे. अगर उन्हें पता करना होता था कि ITO या दिल्ली की किसी दूसरी जगह पर ट्रैफिक कैसा है, तो लोगों के जवाब जल्दी ही रेडियो पर अपडेट बन जाते थे.
बनर्जी ने कहा, “इससे आपको लगता है कि यह रेडियो स्टेशन मेरी बात सुन रहा है. यह रेडियो स्टेशन मेरी आवाज लोगों तक पहुंचा रहा है और यही रेडियो की खूबसूरती है. यह बहुत ज्यादा स्थानीय स्तर का माध्यम है.”
रेडियो लोगों को अपनी ओर खींचने के दूसरे तरीके भी खोज रहा था. जब पत्रकार और कहानीकार नीलेश मिसरा ने 2011 में Yaadon Ka Idiot Box शुरू किया, तो उन्हें याद है कि उनसे कहा गया था कि रेडियो पर किसी कार्यक्रम को तय समय पर सुनने की आदत नहीं है, यह माध्यम सिर्फ बॉलीवुड के बारे में है और कोई वहां कहानियां नहीं सुनना चाहता.
मिसरा ने कहा, “रेडियो ने खुद को नुकसान पहुंचाया है. रेडियो के अधिकारियों ने रेडियो के कारोबार को खत्म करने के लिए बहुत मेहनत की, क्योंकि उन्होंने कंटेंट पर काम नहीं किया. उन्होंने दर्शकों को हल्के में लिया.”
कार्यक्रम लोकप्रिय होने के बाद, मिसरा ने कहा कि उसके आसपास विज्ञापन बढ़ने लगे. उन्हें याद है कि जब किसी कहानी का चार मिनट का हिस्सा खत्म होने के बाद 12 मिनट का विज्ञापन ब्रेक आता था, तो उन्होंने इस पर आपत्ति जताई थी. कई साल बाद, लखनऊ के पास गाड़ी चलाते समय उन्हें एहसास हुआ कि बैकग्राउंड में चल रहे स्टेशन ने करीब एक घंटे तक लगभग सिर्फ विज्ञापन ही चलाए थे.
उन्होंने कहा, “तो आप एक घंटे तक विज्ञापन चला रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि यह माध्यम चलता रहेगा.”
आज हाजी अली के ट्रैफिक में फंसे यादव भी अपनी कैब से यही शिकायत करते हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब वह वहां से जा सकते हैं.
इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के सीईओ सलिल कुमार इस बदलाव को लोगों के पास मौजूद नियंत्रण से जोड़कर देखते हैं. श्रोता अपनी खुद की प्लेलिस्ट बना सकता है और वही सुन सकता है जो वह चाहता है. रेडियो अभी भी सभी लोगों के लिए एक ही कार्यक्रम चलाता है.
विज्ञापन देने वालों के पास भी ज्यादा विकल्प हैं. कुमार ने कहा, “रेडियो मुझे बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच दे सकता है, लेकिन समस्या यह है कि उससे विज्ञापन के असर का सही पता लगाना बहुत मुश्किल है.”
नई दिल्ली की मार्केटिंग एजेंसी द कम्युनिकेशन काउंसिल की पीआर डायरेक्टर श्वेता कुमार भी मानती हैं कि रेडियो “अब शायद ब्रांड के कुल विज्ञापन खर्च में उतनी हिस्सेदारी नहीं रखता, जितनी पहले रखता था”, खासकर बड़े शहरों में, जहां डिजिटल, सोशल मीडिया और इन्फ्लुएंसर वाले प्लेटफॉर्म ने ज्यादा हिस्सेदारी ले ली है.
ऑडियंस के आंकड़े भी बताते हैं कि रेडियो को उम्रदराज श्रोता ज्यादा सुनते हैं. इंडियन म्यूजिक इंडस्ट्री की 2022 की डिजिटल म्यूजिक स्टडी में पाया गया कि 54.9 प्रतिशत लोगों ने रेडियो सुना. 35-44 साल की उम्र के लोगों में यह आंकड़ा बढ़कर 68 प्रतिशत और 25-34 साल के लोगों में 62 प्रतिशत हो गया.
समय के साथ रेडियो सुनने वालों की संख्या में कितना बदलाव आया है, इसे मापना मुश्किल है. अप्रैल 2024 के एक consultation paper में TRAI ने कहा था कि भारत में AIR और निजी FM के लिए सुनने वालों से जुड़ा कोई एकीकृत आंकड़ा नहीं है. मौजूदा रेडियो श्रोता मापन सिस्टम सिर्फ चार बड़े शहरों को कवर करता है, जबकि इंडियन रीडरशिप सर्वे के जरिए व्यापक ऑडियंस मापने के आंकड़े 2019 के बाद से रेडियो के लिए अपडेट नहीं किए गए हैं.
रेडियो पर बने रहने की कीमत
ज्यादातर Phase 3 स्टेशनों के लिए सरकार को हर साल दी जाने वाली फीस कुल कमाई के 4 प्रतिशत से ज्यादा या नीलामी के जरिए तय की गई एक बार की एंट्री फीस के 2.5 प्रतिशत से ज्यादा होती है. कमाई घट सकती है, लेकिन नीलामी से जुड़ी न्यूनतम फीस कम नहीं होती. सितंबर 2023 में प्रकाशित अपनी सिफारिशों में TRAI ने कहा था कि इस व्यवस्था के कारण रेडियो चलाने वाली कंपनियों को सिर्फ प्रसारण जारी रखने के लिए अपनी कमाई का बहुत ज्यादा हिस्सा देना पड़ सकता है. TRAI ने 4 प्रतिशत राजस्व-हिस्सेदारी के फॉर्मूले पर जाने की सिफारिश की थी.
सलिल कुमार ने कहा, “असल में आप लाइसेंस, स्पेक्ट्रम और प्रसारण की बहुत बड़ी लागत देख रहे हैं और इसके ऊपर आपको संगीत के लिए रॉयल्टी भी देनी पड़ती है.”
बनर्जी के मुताबिक, निजी FM को कभी भी ऐसा एक तरह का प्रोग्राम नहीं मिला, जो उसकी स्थानीय पहुंच को मजबूत कर सकता था: स्वतंत्र रूप से तैयार की गई खबरें. सरकार की Phase 3 नीति के तहत निजी स्टेशन अपनी खबरें और मौजूदा घटनाओं से जुड़े कार्यक्रम खुद तैयार नहीं कर सकते. हालांकि, ट्रैफिक, मौसम और कुछ स्थानीय जानकारियां देने की अनुमति है.
बनर्जी ने कहा, “मेरे इलाके में ट्रैफिक कैसा है? मेरे इलाके में बारिश की क्या स्थिति है?” उन्होंने कहा कि बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान “रेडियो स्टेशन बहुत, बहुत अच्छा काम करते हैं.”
मिसरा इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि खबरों पर लगी रोक रेडियो के गिरते असर की वजह है.
उन्होंने कहा, “रेडियो पर लगातार मौजूदा घटनाओं पर चर्चा होती रही है.” उन्होंने कहा कि रेडियो की समस्याओं के लिए खबरों की कमी को जिम्मेदार ठहराना “बहुत ज्यादा सरल तरीके से समझाना” है.
रेडियो का नया मॉडल
अब रेडियो कंपनियां प्रसारण के अलावा भी पैसे कमाने के ज्यादा तरीके खोज रही हैं.
लखनऊ में Radio Mirchi की आरजे खुशबू पांडे ने इसे करीब से देखा है. अडाणी एयरपोर्ट होल्डिंग्स लिमिटेड के लिए एक कैंपेन के दौरान उन्होंने सबसे पहले रेडियो पर श्रोताओं से उनकी पहली फ्लाइट को याद करने के लिए कहा. इसके बाद Mirchi ने लखनऊ एयरपोर्ट के बाहर एक “म्यूजिक टैक्सी” खड़ी की, जहां पांडे अपना शाम का शो करती थीं. यह कैंपेन सोशल मीडिया पर भी गया, जहां RJ ने अपने-अपने अकाउंट पर ब्रांड के लिए कंटेंट बनाया.
पांडे ने कहा, “यह RJ के पेज के साथ जाना चाहिए. ब्रांड RJ की पहुंच चाहते हैं.”
Mirchi की पैरेंट कंपनी, Entertainment Network (India) Limited, भी लगभग इसी रणनीति पर काम करती है. मई 2026 की एक निवेशक प्रस्तुति में उसने अपनी सेवाओं को “Radio + Digital + Ground” के तहत “एक साथ दी जाने वाली स्थानीय सेवाएं” बताया और 130 से ज्यादा RJ को “बहुत ज्यादा स्थानीय स्तर के इन्फ्लुएंसर” बताया. 2025-26 में उसके डिजिटल कारोबार में 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जबकि डिजिटल कमाई मुख्य रेडियो कमाई के 48.4 प्रतिशत के बराबर थी. एक साल पहले यह 26.3 प्रतिशत थी.
दिप्रिंट ने Mirchi और ENIL से उसके प्रोग्राम, डिजिटल रणनीति, विज्ञापन और RJ की बदलती भूमिका को लेकर सवाल भेजे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
श्वेता कुमार ने पुष्टि की कि रेडियो का इस्तेमाल अब बढ़ते तौर पर “एक साथ चलने वाले कैंपेन के हिस्से के रूप में, अक्सर डिजिटल और इन्फ्लुएंसर कैंपेन के साथ” किया जा रहा है.
कभी-कभी सोशल मीडिया श्रोताओं को वापस FM तक भी लाता है. पांडे की एक इंस्टाग्राम रील को करीब 1.8 करोड़ व्यू मिले. इसके बाद, उन्होंने बताया कि लोगों ने मैसेज करके पूछा कि क्या वह आरजे हैं और फिर उनका शो सुनना शुरू कर दिया. उनके श्रोताओं में से एक, 12 साल के अवान ने उन्हें सबसे पहले इंस्टाग्राम पर देखा था.
बीस साल पहले, अक्सर फ्रीक्वेंसी ही वह जरिया होती थी, जिससे कोई श्रोता RJ तक पहुंचता था, लेकिन अवान जैसे युवा श्रोताओं के मामले में अब रास्ता उल्टा हो गया है.
रेडियो कंपनियों को अब पैसे कमाने के लिए यह जरूरी नहीं है कि FM छोड़कर जाने वाला हर व्यक्ति वापस आए. वे RJ की सोशल मीडिया पहुंच, कार्यक्रमों और डिजिटल कैंपेन से कमाई कर सकती हैं. और जब कोई फ्रीक्वेंसी खुद आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं रह जाती, जैसा कि एचटी मीडिया के मामले में हुआ, तो उसे वापस किया जा सकता है.
यादव ने सड़क पर बिताए जाने वाले घंटों को भरने के दूसरे तरीके पहले ही खोज लिए हैं. अगर वह किसी RJ को सुनना चाहते हैं, तो उन्हें उसके शो के शुरू होने का इंतजार नहीं करना पड़ता.
वह उसे यूट्यूब पर खोज सकते हैं.
तारिणी उन्नीकृष्णन दिप्रिंट स्कूल ऑफ जर्नलिज़्म की पूर्व छात्रा हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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