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Monday, 15 June, 2026
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हिंदी साहित्य कभी पैरलल सिनेमा की जान था, आज इसकी जगह सिर्फ OTT पर बची है

आज पश्चिमी देशों में बनने वाली हर दूसरी फिल्म किसी किताब पर आधारित होती है. वहीं बॉलीवुड दक्षिण भारत, चीन, दक्षिण कोरिया या हॉलीवुड की हिट फिल्मों के रीमेक बनाने में व्यस्त है.

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नई दिल्ली: अपने पब्लिकेशन के लगभग एक दशक बाद मुसाफिर कैफे आखिरकार स्क्रीन पर आने जा रही है. दिव्य प्रकाश दुबे द्वारा लिखित और 2016 में हिंदी युग्म से प्रकाशित इस उपन्यास पर आधारित एक नेटफ्लिक्स सीरीज़ इस साल रिलीज होगी. इसका निर्देशन रुचिर अरुण कर रहे हैं और इसमें विक्रांत मैसी मुख्य भूमिका में नज़र आएंगे. यह इस बात का संकेत है कि हिंदी की वे कहानियां, जिन्होंने कभी बॉलीवुड को उसकी सबसे प्रभावशाली रचनाएं दी थीं, अब ओवर द टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म तक सीमित हो गई हैं.

हिंदी साहित्य लंबे समय से भारतीय फिल्मकारों के लिए कहानियों का समृद्ध स्रोत रहा है. उस दौर में, जब भारतीय सिनेमा में पैरलल सिनेमा आंदोलन चरम पर था, तब सत्यजीत रे, मणि कौल, श्याम बेनेगल और अवतार कृष्ण कौल जैसे निर्देशकों ने साहित्यिक कृतियों का सहारा लिया.

गबन (1966), सारा आकाश (1969), शतरंज के खिलाड़ी (1977), सूरज का सातवां घोड़ा (1992) और नौकर की कमीज (1999) जैसी फिल्मों ने चर्चित साहित्यिक रचनाओं को पर्दे पर उतारा, लेकिन 1990 के दशक के बाद ऐसी फिल्मों की संख्या कम होने लगी. निर्माता उन कहानियों में निवेश करने से हिचकने लगे जिनके पाठक सीमित थे. बॉक्स ऑफिस कमाई पर आधारित फिल्म उद्योग में साहित्यिक कृतियों पर बनी फिल्मों को धीरे-धीरे फ्रेंचाइजी फिल्मों, रोमांटिक फिल्मों और रीमिक्स से ज्यादा जोखिम भरा माना जाने लगा.

लेखक दिव्य प्रकाश दुबे ने दिप्रिंट से हिंदी में बातचीत करते हुए कहा, “अगर आप आज अमेरिका या पश्चिमी देशों को देखें, तो वहां बनने वाली हर दूसरी या तीसरी परियोजना किसी न किसी अंग्रेज़ी किताब पर आधारित होती है.”

मुसाफिर कैफे की कहानी चंदर और सुधा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो दोनों शादी में दिलचस्पी नहीं रखते, लेकिन परिवार के दबाव में वे हर वीकेंड मिलते हैं. आधुनिक दौर में प्रेम का मतलब समझने की कोशिश करते हुए दोनों की ज़िंदगी अलग-अलग रास्तों पर चली जाती है. करीब दस साल बाद वे फिर मिलते हैं और अपने रिश्ते को दोबारा पहचानते हैं.

दुबे ने कहा कि उन्होंने यह उपन्यास इस उम्मीद से नहीं लिखा था कि इस पर कभी फिल्म या सीरीज़ बनेगी. उनके अनुसार, ऐसा सोचने से लेखक की किताब लिखने में लगी मेहनत का असर कम हो सकता है.

उन्होंने कहा, “किताब एक अलग मीडियम है. इसमें सिर्फ शब्द होते हैं, कागज़ पर छपे काले शब्द, जिनसे आपको एक पूरी दुनिया बनानी होती है और यह अपने आप में एक संपूर्ण माध्यम है. अगर इससे आगे कुछ न भी बने, तब भी यह अपने मूल रूप में सबसे बेहतर होती है.”

लेखक ने कहा कि विवेक कुमार का अर्थला (2016) और नीलोत्पल मृणाल का विश्वगुरु (2026) जैसे कई समकालीन हिंदी उपन्यास भी फिल्म या वेब सीरीज बनने के योग्य हैं. दुबे का मानना है कि हिंदी साहित्य पर आधारित फिल्मों में आई कमी के लिए लेखक, निर्देशक या अभिनेता जिम्मेदार नहीं हैं. इसके बजाय स्टूडियो में फैसले लेने वाले लोग समकालीन हिंदी कहानियों से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं.

पिछले कुछ दशकों में किसी किताब को फिल्म या सीरीज बनने से पहले व्यावसायिक रूप से सफल होना और बेस्टसेलर बनना ज़रूरी हो गया है. सोच यह होती है कि जिस किताब से लाखों पाठक जुड़े हैं, वे उस पर बनी फिल्म या सीरीज़ भी देखेंगे.

यह मॉडल अंग्रेज़ी की कई बेस्टसेलर किताबों के साथ सफल रहा है. झुम्पा लाहिड़ी की द नेमसेक (2003) पर 2006 में मीरा नायर ने इसी नाम से फिल्म बनाई. चेतन भगत की द 3 मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ (2008) से प्रेरित होकर काई पो चे! (2013) बनी. हाल के वर्षों में अरविंद अडिगा की द व्हाइट टाइगर (2008) पर बनी फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहना मिली. हालांकि, समकालीन हिंदी साहित्य के मामले में ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं.

दुबे ने कहा, “निर्माता को भरोसा मिलता है कि यह चीज़ इतनी हिट हो रही है, तो इस पर फिल्म ज़रूर बनानी चाहिए, लेकिन अगर आंकड़ों की बात करें, तो 2001 से 2015 के बीच हिंदी किताबें उस स्तर तक नहीं पहुंच पा रही थीं.”

युवा पाठकों तक हिंदी किताबों को पहुंचाने के लिए उनकी दुनिया और भाषा को समझना ज़रूरी था. दुबे इसे “नई वाली हिंदी” कहते हैं, जो आज के समय और वास्तविकताओं को दर्शाती है.

उन्होंने बताया कि हिंदी युग्म ने युवा और मध्यमवर्गीय पाठकों तक किताबें पहुंचाने के लिए उनकी कीमत भी कम रखी.

उन्होंने कहा, “प्रकाशक पहले बड़ी संख्या में लाइब्रेरी खरीद पर निर्भर रहते थे, लेकिन जब हमारी किताबें आईं, तो उनकी कीमत करीब 100 या 120 रुपये रखी गई, ताकि हम सीधे आम पाठकों तक पहुंच सकें.”

हिंदी की ज्यादा किताबें पर्दे तक क्यों नहीं पहुंच रहीं?

हिंदी युग्म के प्रधान संपादक शैलेश भारतवासी के अनुसार, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी हिंदी किताबों पर आधारित कंटेंट अभी बहुत कम बनता है. भारतवासी का कहना है कि यह बदलाव लेखन शैली में किसी बड़े परिवर्तन की वजह से नहीं, बल्कि फिल्मकारों द्वारा असली और जमीन से जुड़ी कहानियों की तलाश के कारण हो रहा है.

जैसे-जैसे दर्शक छोटे शहरों और स्थानीय संस्कृति से जुड़ी कहानियां पसंद करने लगे हैं, वैसे-वैसे कंटेंट बनाने वाले लोग फिर से किताबों की ओर देखने लगे हैं.

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस समय जमीन से जुड़ा कंटेंट काफी लोकप्रिय हो रहा है. खासकर ओटीटी प्लेटफॉर्म आने के बाद दर्शकों के बीच पंचायत, गुल्लक और जामताड़ा जैसे स्थानीय और वास्तविक माहौल वाले कंटेंट की मांग बढ़ी है.”

भारतवासी का मानना है कि किताबें अक्सर वही वास्तविकता और विश्वसनीयता देती हैं, जिसकी तलाश फिल्मकार करते हैं.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि मुसाफिर कैफे जैसी किताबों पर काम इसलिए हो रहा है क्योंकि दर्शक खुद को इन कहानियों से जोड़ पाते हैं.”

हिंदी युग्म से प्रकाशित दूसरी किताबें, जैसे निखिल सचान का UP 65 (2017) और सत्य व्यास का चौरासी (2018), भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर वेब सीरीज के रूप में रूपांतरित की जा चुकी हैं.

हालांकि, इन कृतियों को ओटीटी पर दर्शक मिले हैं, लेकिन समकालीन हिंदी उपन्यास अब भी बहुत कम संख्या में बड़े पर्दे यानी सिनेमाघरों तक पहुंच पाए हैं.

गिरावट के पीछे की आर्थिक वजह

दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर मिहिर पांडे का मानना है कि साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों और समानांतर सिनेमा को बनाए रखने में फिल्म उद्योग की आर्थिक व्यवस्था की बड़ी भूमिका रही है.

जैसे-जैसे भारत समाजवादी आर्थिक ढांचे से उदारीकरण और वैश्वीकरण की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे सिनेमा के लिए सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद कम होती गई. इसी दौरान मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र में विदेशी निवेश भी आने लगा, जिससे फिल्मकारों पर मुनाफा कमाने का दबाव बढ़ गया. हालांकि, समानांतर सिनेमा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, लेकिन व्यावसायिक सोच बढ़ने के साथ उसका प्रभाव कम होता गया.

पांडे ने कहा, “समानांतर सिनेमा के उभार की एक बड़ी वजह यह थी कि फिल्मकारों को सरकार और नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NFDC) जैसी स्वायत्त संस्थाओं से आर्थिक सहायता मिलती थी.”

माया दर्पण (1972), दुविधा (1973) और एक डॉक्टर की मौत (1990) जैसी फिल्मों को इसी व्यवस्था का फायदा मिला था. अवतार कृष्ण कौल द्वारा निर्देशित 27 डाउन (1974), रमेश बक्षी के उपन्यास अठारह सूरज के पौधे (1965) पर आधारित थी. यह फिल्म लगभग 8 लाख रुपये के बजट में बनी थी, जिसमें कौल ने अपनी जेब से 3 लाख रुपये लगाए थे.

हाल के वर्षों में NFDC ने लंचबॉक्स (2013) और तन्वी: द ग्रेट (2026) जैसी फिल्मों को समर्थन दिया है, लेकिन ऐसे प्रोजेक्ट आज भी अपवाद हैं, आम बात नहीं.

2000 के बाद बॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों का स्वरूप काफी बदल गया. नई सदी के पहले दशक में हेरा फेरी (2000), गोलमाल (2006), भूल भुलैया (2007), भेजा फ्राई (2007), ऑल द बेस्ट (2009) और हाउसफुल (2010) जैसी कॉमेडी फिल्मों का दबदबा रहा.

वहीं, कभी खुशी कभी गम (2001), कल हो ना हो (2003) और वीर-ज़ारा (2004) जैसी पारिवारिक और रोमांटिक फिल्मों को भी दर्शकों का भरपूर प्यार मिला.

इसके बाद वाले दशक में दक्षिण भारतीय फिल्मों के सफल रीमेक पर निर्भरता बढ़ गई. वांटेड (2009), बॉडीगार्ड (2011), सिंघम (2011), राउडी राठौर (2012), दृश्यम (2015) और कबीर सिंह (2019) जैसी फिल्मों को हिंदी दर्शकों के लिए दोबारा बनाया गया. इससे निर्माताओं को ऐसी कहानियां मिलीं जो पहले ही बॉक्स ऑफिस पर सफल साबित हो चुकी थीं.

पांडे ने कहा, “जब फिल्मों का निर्माण पूरी तरह व्यावसायिक फंडिंग पर निर्भर होने लगा, तब सिर्फ कुछ खास तरह के प्रोजेक्ट ही बन पाए. कोई निर्माता सिर्फ इसलिए किसी साहित्यिक कृति पर करोड़ों रुपये नहीं लगाएगा क्योंकि किसी निर्देशक को कोई लेखक पसंद है.”

हाल के वर्षों में फ्रेंचाइजी फिल्में, पैन-इंडिया ब्लॉकबस्टर और बड़े एक्शन वाली फिल्में उद्योग पर हावी हो गई हैं. ऐसे माहौल में हिंदी साहित्य पर आधारित फिल्मों के लिए मुख्यधारा में जगह बनाना और मुश्किल हो गया है.

मद्रास कैफे (2013), मिशन मजनू (2023) और गांधी टू हिटलर (2011) जैसी फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता अविजित दत्ता का कहना है कि आज हिंदी फिल्में मुख्य रूप से बड़े शहरों के मल्टीप्लेक्स दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं. ग्रामीण दर्शकों पर खास ध्यान नहीं दिया जाता और हिंदी साहित्य जिन वास्तविकताओं को सामने लाता है, वे शायद निर्माताओं को जोखिम भरी लगती हैं.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि निर्माता बहुत अच्छे पाठक नहीं होते. साहित्य पर ध्यान देने के बजाय, जो अपनी विशेषता में भी सार्वभौमिक हो सकता है, वे आसान रास्ता चुनते हैं और कोरियाई, चीनी या हॉलीवुड की लोकप्रिय फिल्मों के अलग-अलग रूप बना लेते हैं.”

(इस फीचर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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