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Sunday, 26 July, 2026
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मोदी की सचखंड बल्लां के प्रमुख से मुलाकात: आखिर पंजाब का सबसे बड़ा दलित डेरा इतना अहम क्यों है?

पंजाब के सबसे बड़े रविदासिया समुदाय का केंद्र होने के नाते, यह डेरा दलितों के आत्म-सम्मान, धार्मिक पहचान और चुनावी महत्व का प्रतीक बन गया है.

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चंडीगढ़: पिछले हफ्ते जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जालंधर में नए रेलवे स्टेशन का उद्घाटन करने पहुंचे थे, तो जिन कुछ लोगों से उन्होंने खास तौर पर मुलाकात की, उनमें प्रभावशाली दलित डेरा सचखंड बल्लां के प्रमुख संत निरंजन दास भी शामिल थे.

अगर प्रधानमंत्री ने इस मुलाकात की तस्वीरें X पर पोस्ट नहीं की होतीं, तो शायद इस पर ज्यादा ध्यान नहीं जाता.

प्रधानमंत्री और इस दलित डेरे के बीच की नजदीकी दोनों तरफ से दिखाई देती है. पिछले साल दिसंबर में संत दास ने गुरु रविदास जयंती के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी को डेरे आने का निमंत्रण दिया था. इसके बाद फरवरी में प्रधानमंत्री डेरे पहुंचे और समारोह में शामिल हुए.

पिछले महीने डेरा प्रमुख को पद्म श्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया.

अपनी बढ़ती निजी दोस्ती के अलावा, पंजाब के सबसे बड़े दलित डेरे को प्रधानमंत्री का खुला समर्थन राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है. माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) दलित वोटरों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है.

दिप्रिंट बता रहा है कि जालंधर के बल्लां गांव में स्थित डेरा सचखंड बल्लां कैसे उभरा और पंजाब की राजनीति में इसकी क्या अहमियत है.

तीन प्रमुख डेरे

पंजाब में डेरे काफी आम हैं. ये अलग-अलग पंथों और संगठनों के सामाजिक और धार्मिक केंद्र होते हैं. सिख गुरुद्वारों से अलग, जहां गुरु ग्रंथ साहिब को जीवित गुरु माना जाता है, वहीं डेरों का नेतृत्व आमतौर पर एक जीवित गुरु करते हैं, जिनके अपने अनुयायी होते हैं.

डेरा राधा स्वामी सत्संग ब्यास, डेरा सच्चा सौदा (जिसका मुख्यालय सिरसा में है) और डेरा सचखंड बल्लां पंजाब के तीन सबसे बड़े और सबसे ज्यादा अनुयायियों वाले डेरे हैं. इनके अनुयायियों की संख्या लाखों में है.

माझा इलाके में स्थित डेरा ब्यास को राजनीतिक रूप से तटस्थ माना जाता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में BJP ने डेरा प्रमुख बाबा गुरिंदर सिंह के साथ अपने संबंध मजबूत करने की कई कोशिशें की हैं. प्रधानमंत्री भी कई बार बाबा गुरिंदर सिंह से मिल चुके हैं.

सिरसा वाला डेरा, जिसके मालवा इलाके में बड़ी संख्या में अनुयायी हैं, गुरमीत राम रहीम के नेतृत्व में है. वह बलात्कार और हत्या के कई मामलों में सजा काट रहा है. उसे BJP के करीब माना जाता है. प्रशासन भी उसे साल में कई बार जेल से अस्थायी रिहाई देता रहा है.

अब दोआबा के बीचों-बीच स्थित एक बड़े दलित डेरे के साथ भी BJP की नजदीकी दिखाई दे रही है.

दलित वोट हैं सबसे अहम

2011 की जनगणना के मुताबिक, पंजाब की करीब 32 प्रतिशत आबादी दलित है. यह देश के सभी राज्यों में सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति (SC) आबादी वाला राज्य है. पंजाब के दलित सिख, हिंदू और ईसाई धर्मों में बंटे हुए हैं और बड़ी संख्या में डेरे से जुड़े रहते हैं. वे एकजुट होकर एक ही पार्टी को वोट भी नहीं देते.

दलितों में रविदासिया, रामदासिया और आदि-धर्मी सबसे बड़े उप-समूह हैं. ये मुख्य रूप से दोआबा क्षेत्र के जालंधर, होशियारपुर, एसबीएस नगर और फगवाड़ा जिलों में रहते हैं.

पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ के समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर रोनकी राम ने पंजाब के दलितों पर अपने महत्वपूर्ण अध्ययन में बताया कि रविदासिया राज्य का सबसे प्रमुख दलित समुदाय है.

उन्होंने अपने शोध पत्र ‘Caste within Caste: Predicament of Political Solidarity among Scheduled Castes in Contemporary Punjab’ में लिखा, “पंजाब की 39 अनुसूचित जातियों में चार प्रमुख जातियां – चमार (23.45 प्रतिशत), आदि-धर्मी (11.48 प्रतिशत), वाल्मीकि (9.78 प्रतिशत) और मजहबी (29.72 प्रतिशत) – मिलकर कुल SC आबादी का 74.44 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं.”

उन्होंने द प्रिंट से कहा, “चमार समुदाय दो हिस्सों में बंटा है – रविदासिया (चमड़े का काम करने वाले) और रामदासिया (बुनकर). रविदासियों ने शिक्षा में आरक्षण का बेहतर फायदा उठाया है और वे रामदासियों की तुलना में ज्यादा आगे बढ़े हैं.”

रविदासिया, 15वीं सदी के भक्ति संत और समाज सुधारक गुरु रविदास के अनुयायी हैं. गुरु रविदास चमार जाति से थे और उनका समानता का संदेश दलित समुदायों में काफी लोकप्रिय हुआ.

रोनकी राम के शोध पत्र में लिखा है, “गुरु रविदास का जन्म उत्तर प्रदेश की चमार जाति में हुआ था, जिसे कुटबंधला भी कहा जाता है. यह अनुसूचित जाति (SC) में आती है. चमार चमड़े और टैनिंग के काम के लिए जाने जाते थे. उन्हें ऊंची जातियों द्वारा दबाया जाता था और उनका छूना या दिखाई देना भी अपवित्र माना जाता था. गुरु रविदास ने इस अमानवीय छुआछूत व्यवस्था का विरोध किया. उन्होंने अपने विरोध को व्यक्त करने के लिए भक्ति का रास्ता अपनाया.”

गुरु रविदास की रचनाएं गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं.

हर साल सचखंड बल्लां से भक्तों से भरी ट्रेनें वाराणसी स्थित श्री गुरु रविदास जन्मस्थान जाती हैं, जहां गुरु रविदास की जयंती मनाई जाती है. पिछले हफ्ते जालंधर दौरे के दौरान प्रधानमंत्री ने अमृतसर से वाराणसी जाने वाली संत रविदास एक्सप्रेस को भी हरी झंडी दिखाई, ताकि पंजाब के श्रद्धालुओं को यात्रा में सुविधा मिल सके.

सचखंड बल्लां डेरा पंजाब में रविदासियों का सबसे बड़ा डेरा है.

डेरा सचखंड बल्लां

रोनकी राम के मुताबिक, सचखंड बल्लां का विकास और विस्तार रविदासिया समुदाय की तरक्की का उदाहरण है.

उन्होंने कहा, “कई रविदासिया विदेश गए, वहां अच्छी कमाई की और गुरु रविदास के डेरों में निवेश किया. उन्होंने पंजाब और दुनिया भर में गुरु रविदास के नाम पर मंदिर, गुरुद्वारे, भवन, शैक्षणिक संस्थान, सांस्कृतिक संगठन और अस्पताल बनाए. वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक समुदाय के रूप में उनका राजनीतिक प्रभाव भी है. सचखंड बल्लां का विकास इसी तरक्की का उदाहरण है.”

2009 में रविदासियों और कट्टर सिखों के बीच बड़ा विवाद तब सामने आया, जब ऑस्ट्रिया के वियना में रविदास गुरुद्वारे में चल रहे एक धार्मिक कार्यक्रम पर छह हथियारबंद लोगों ने हमला कर दिया. इस हमले में डेरे के दूसरे सबसे बड़े नेता संत रामानंद की मौत हो गई.

उस समय भी संत निरंजन दास डेरे के प्रमुख थे और वे संत रामानंद के साथ मौजूद थे. इस हमले में वे घायल हो गए थे.

कट्टर सिखों का मानना था कि रविदासियों की कुछ धार्मिक परंपराएं सिख धर्म की मूल शिक्षाओं से अलग हैं. उन्हें इस बात पर भी आपत्ति थी कि गुरु ग्रंथ साहिब को किसी जीवित गुरु के बराबर रखा जा रहा है.

2009 के इस हमले के बाद पंजाब में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए. जालंधर, होशियारपुर और कई दूसरे इलाकों में सिखों और रविदासियों के बीच झड़पें हुईं. कई गाड़ियों में आग लगा दी गई. एक यात्री ट्रेन को भी यात्रियों को उतारने के बाद जला दिया गया. उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शांति की अपील करनी पड़ी.

सितंबर 2010 में वियना की एक अदालत ने मुख्य हमलावर को हत्या और हत्या की कोशिश के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई. उसके चार साथियों को 17 से 18 साल की जेल और छठे आरोपी को छह महीने की सजा मिली.

अलग पहचान की मांग

वियना की यह घटना रविदासिया समुदाय के लिए अपनी अलग पहचान बनाने का बड़ा कारण बनी.

अगले साल रविदासियों ने खुद को न तो सिख माना और न ही हिंदू. उन्होंने खुद को एक अलग धर्म घोषित किया, जिसकी अपनी अलग पहचान, धार्मिक परंपराएं और अपना धर्मग्रंथ “अमृतबाणी सतगुरु रविदास जी” है.

इसके बाद रविदासियों के पूजा स्थलों और धार्मिक सभाओं में गुरु ग्रंथ साहिब की जगह अमृतबाणी रखी जाने लगी.

DAV कॉलेज, चंडीगढ़ के राजनीति विज्ञान विभाग की डॉ. कंवलप्रीत कौर ने कहा, “रविदासिया लंबे समय से खुद को एक स्वतंत्र समुदाय के रूप में मान्यता देने की मांग कर रहे हैं. BJP भी यही करना चाहती है. वह इस समुदाय की अलग पहचान, राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और उनके आध्यात्मिक नेतृत्व को मान्यता देने की मांग का राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है.”

डेरा सचखंड बल्लां का दोआबा क्षेत्र की करीब 19-20 विधानसभा सीटों पर अच्छा सामाजिक प्रभाव माना जाता है. राजनीतिक रूप से रविदासिया, दूसरे दलित समुदायों की तरह, एकजुट होकर वोट नहीं देते. लेकिन जिन सीटों पर उनकी अच्छी संख्या है, वहां उनका प्रभाव किसी भी पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

पंजाब की सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियां – कांग्रेस, सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP), शिरोमणि अकाली दल (SAD) और अन्य – इस समुदाय को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती रही हैं. चुनाव के समय बड़े नेता आशीर्वाद लेने के लिए डेरे में पहुंचते रहे हैं.

जब 2021 में कांग्रेस नेता और मौजूदा सांसद चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री बने, तो मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी पहली यात्राओं में से एक डेरा सचखंड बल्लां की थी, जहां डेरा प्रमुख ने उनका स्वागत किया.

चन्नी ने गुरु रविदास के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर अध्ययन के लिए एक शोध संस्थान बनाने का वादा भी किया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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