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Saturday, 13 June, 2026
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CBSE की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को गलत समझा गया है

थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को पूरी तरह समझने के लिए नौवीं और दसवीं क्लास से आगे भी देखना होगा.

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भारत में भाषा की पॉलिसी शायद ही कभी क्लासरूम तक ही सीमित रहती है. यह पहचान, पहुंच, मोबिलिटी और खुद शिक्षा के मकसद को छूती है. इसीलिए सीबीएसई की थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर हाल की बहस ने इतना ध्यान खींचा है. पॉलिसी की जानकारी को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि भारत को कई भाषाओं को महत्व देना चाहिए या नहीं. यह सवाल बहुत पहले ही काफी हद तक सुलझ गया था. असली सवाल यह है कि एक कई भाषाओं वाली पॉलिसी को इस तरह से कैसे लागू किया जाए कि वह पढ़ाई के हिसाब से सही हो, एडमिनिस्ट्रेटिव तौर पर सही हो और जिसे लोग अच्छी तरह समझ सकें. इस नज़रिए से देखें तो, सीबीएसई के हालिया कदम को और ज़्यादा गहराई और शांति से पढ़ने की ज़रूरत है, जितना कभी-कभी इसे मिला है.

पहली बात ऐतिहासिक है. थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी 2026 में सीबीएसई या 2020 की नेशनल एजुकेशन पॉलिसी से शुरू नहीं हुआ था. यह भारत की भाषाई समृद्धि को राष्ट्रीय जुड़ाव और मॉडर्न एजुकेशनल उम्मीदों के साथ मिलाने की एक बहुत पुरानी कोशिश है. इसका बड़ा फ्रेमवर्क 1964-66 के एजुकेशन कमीशन से मिलता है, जो बाद में नेशनल पॉलिसी ऑन एजुकेशन, 1968 में दिखा. एनईपी 2020 ने इस सिद्धांत को नए सिरे से नहीं बनाया. इसने मल्टीलिंगुअलिज़्म को एक मुख्य एजुकेशनल वैल्यू के तौर पर बनाए रखा और इसे ज़्यादा फ्लेक्सिबल और लर्नर-सेंटर्ड शब्दों में फिर से बनाया. इसलिए, अभी की चर्चा भारतीय स्कूलिंग में अचानक आए किसी नए आइडिया के बारे में नहीं है. यह एक जाने-पहचाने आइडिया के इम्प्लीमेंटेशन के एक नए स्टेज में आने के बारे में है.

आइए ध्यान से देखें कि यह नया फ्रेमिंग क्यों मायने रखता है. एनईपी 2020 “पढ़ाने और सीखने में मल्टीलिंगुअलिज़्म और भाषा की ताकत को बढ़ावा देने” पर ज़्यादा ज़ोर देता है. यह एक जानी-पहचानी भाषा के एजुकेशनल महत्व पर भी ज़ोर देता है. इसमें कहा गया है कि, जहां तक हो सके, पढ़ाई का माध्यम कम से कम ग्रेड 5 तक और बेहतर होगा कि ग्रेड 8 और उसके बाद भी घर की भाषा, मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा हो. पॉलिसी के हिसाब से, बुनियादी सोच यह है कि जब बच्चों को उन भाषाओं में पढ़ाया जाता है जिन्हें वे अच्छी तरह जानते हैं, तो उनकी समझ, हिस्सा लेना और आत्मविश्वास मज़बूत होता है. इसमें आगे कहा गया है कि दूसरी भाषाओं को तब अलग-अलग ज़रूरतों के तौर पर थोपने के बजाय मज़बूत नींव पर बनाया जा सकता है.

स्कूली शिक्षा के लिए नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (NCFSE) 2023 उस सोच को करिकुलम के रूप में तीन भाषाओं को R1, R2, और R3 के रूप में बताकर बदलता है. R1 आम तौर पर वह भाषा होती है जिसमें सबसे पहले पढ़ाई-लिखाई बढ़ती है, मान लीजिए मातृभाषा; R2 और R3 स्कूल के सालों में सीखी गई दूसरी भाषाएं हैं. सीबीएसई की मौजूदा स्कीम सीधे इसी फ्रेमवर्क से ली गई है. इसका मुख्य नियम यह है कि पढ़ाई जाने वाली तीन भाषाओं में से कम से कम दो मूल भारतीय भाषाएं होनी चाहिए. यही वह नियम है जिसके इर्द-गिर्द मौजूदा चर्चा का ज़्यादातर हिस्सा घूम रहा है. ठीक से समझा जाए तो, यह अंग्रेज़ी या विदेशी भाषाओं पर रोक नहीं है. यह एक करिकुलर सेफ़गार्ड है जिसे यह पक्का करने के लिए डिज़ाइन किया गया है कि भारतीय भाषाएं स्कूल की पढ़ाई में सिर्फ एक हिस्सा न होकर, बल्कि सेंट्रल बनी रहें. हाल की पब्लिक डिबेट में हमेशा इस ज़रूरी फ़र्क को साफ़ तौर पर नहीं बताया गया है.

बोझ नहीं, धीरे-धीरे आगे बढ़ने की प्रक्रिया

थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को समझने के लिए केवल नौवीं-दसवीं क्लास पर ध्यान देना काफी नहीं है. एनईपी-2020 के तहत बहुभाषी शिक्षा को धीरे-धीरे विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है. इसे माध्यमिक स्तर पर अचानक अतिरिक्त बोझ के रूप में जोड़ने का इरादा नहीं है.

सीबीएसई ने 9 अप्रैल 2026 को जारी सर्कुलर में कहा था कि मान्यता प्राप्त स्कूल 2026-27 सत्र से छठी कक्षा और उससे ऊपर की कक्षाओं में ‘आर-3’ भाषा शुरू करें. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि जिन स्कूलों में छठी कक्षा से ‘आर-3’ पढ़ाई जाएगी, वही भाषा आमतौर पर नौवीं और दसवीं कक्षा में भी जारी रहेगी. यानी छात्र माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते उस अतिरिक्त भाषा से पहले ही परिचित हो चुके होंगे.

छठी और सातवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में भी यह स्पष्ट किया गया है कि तीसरी भाषा का उद्देश्य छात्रों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव डालना नहीं है. इसमें रोजमर्रा की बातचीत, पढ़ने और सरल लेखन जैसे छोटे पैराग्राफ, पत्र और निमंत्रण पत्र लिखने का अभ्यास कराया जाएगा. लक्ष्य यह है कि छात्र उस भाषा का व्यावहारिक उपयोग सीखें. उनसे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वे तुरंत उस भाषा में विशेषज्ञ बन जाएं.

यहां दो बातें महत्वपूर्ण हैं. पहली, इस नीति को दंडात्मक नहीं बल्कि विकासोन्मुखी नजरिए से देखा जाना चाहिए. दूसरी, जब नौवीं कक्षा में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू होगा, तो उसे छठी कक्षा से शुरू हुई प्रक्रिया के अगले चरण के रूप में समझना चाहिए.

सीबीएसई ने 15 मई 2026 के सर्कुलर में कहा कि 1 जुलाई 2026 से नौवीं कक्षा के छात्रों को ‘आर-1’, ‘आर-2’ और ‘आर-3’ के तहत तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं होंगी. इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि ‘आर-3’ के तहत विदेशी भाषा भी पढ़ी जा सकती है, बशर्ते बाकी दो भाषाएं भारतीय हों. विदेशी भाषा को चौथी भाषा के रूप में भी पढ़ा जा सकता है. इसलिए यह कहना गलत होगा कि यह नीति विदेशी भाषाओं के अध्ययन का रास्ता बंद कर रही है. वास्तव में यह भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता देते हुए अन्य भाषाएं सीखने की भी पर्याप्त गुंजाइश देती है.

कई लोगों को चिंता है कि इससे छात्रों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा. लेकिन सीबीएसई ने साफ कहा है कि ‘आर-3’ के लिए दसवीं बोर्ड परीक्षा नहीं होगी. इसका मूल्यांकन स्कूल स्तर पर होगा और किसी छात्र को ‘आर-3’ के कारण बोर्ड परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा. यानी फिलहाल तीसरी भाषा को केवल सीखने के उद्देश्य से शामिल किया गया है, न कि किसी बड़ी परीक्षा के दबाव के साथ.

चुनौतियां

सीबीएसई जानता है कि स्कूल व्यवस्था शिक्षकों, टाइम-टेबल, पाठ्यपुस्तकों और स्थानीय संसाधनों पर आधारित होती है. बोर्ड ने यह भी माना है कि मिडिल स्टेज और सेकेंडरी स्टेज की ‘आर-3’ भाषाओं में लगभग 75-80 प्रतिशत समानता है. इसलिए 2026-27 सत्र में, जब तक नई किताबें उपलब्ध नहीं हो जातीं, नौवीं कक्षा के छात्रों को छठी कक्षा की ‘आर-3’ किताबें पढ़ने की अनुमति दी गई है.

सीबीएसई का कहना है कि 19 अनुसूचित भाषाओं की पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराई जाएंगी. अन्य भारतीय भाषाओं के लिए एससीईआरटी और राज्यों के दूसरे संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है. ये अस्थायी व्यवस्थाएं हैं, लेकिन इससे पता चलता है कि सीबीएसई बदलाव को व्यवस्थित तरीके से लागू करना चाहता है, न कि केवल आदेश जारी करके.

शिक्षकों की उपलब्धता भी एक बड़ी चुनौती है. इस मामले में भी बोर्ड ने लचीला रुख अपनाया है. स्कूल ‘सहोदय’ समूहों के जरिए एक-दूसरे से सहयोग ले सकते हैं. वर्चुअल या मिश्रित शिक्षण व्यवस्था का उपयोग कर सकते हैं. सेवानिवृत्त शिक्षकों और योग्य स्नातकोत्तर छात्रों की मदद भी ली जा सकती है.

बेशक, ये उपाय स्थायी समाधान नहीं हैं और लंबे समय में नियुक्ति तथा प्रशिक्षण में निवेश जरूरी होगा. लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि व्यावहारिक समस्याओं को नजरअंदाज करके यह योजना लागू की जा रही है. असली सवाल यह है कि क्या इन चुनौतियों से निपटने की व्यवस्था बनाई जा रही है. सीबीएसई के सर्कुलर से यही संकेत मिलता है.

इस बहस में बहुभाषावाद के बड़े शैक्षणिक महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. यूनेस्को लगातार कहता रहा है कि बच्चों को उनकी समझ की भाषा में शिक्षा देना और बहुभाषी शिक्षण अपनाना बेहतर और समावेशी परिणाम देता है. इसी तरह, यूरोपीय संघ भी स्कूली शिक्षा की भाषा के अलावा दो अतिरिक्त भाषाएं सीखने को प्रोत्साहित करता है. हर देश की परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन एक बात समान है—बहुभाषी क्षमता को शिक्षा की एक महत्वपूर्ण ताकत माना जाता है.

भारत जैसे देश में, जहां सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन अनेक भाषाओं से बना है, यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.

सीबीएसई की योजना यह नहीं कहती कि पूरे देश के सभी बच्चों को एक ही भाषा पढ़नी होगी. यह केवल यह कहती है कि ‘एनसीएफएसई-2023’ के तहत तीन भाषाएं पढ़ी जाएं, जिनमें कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं हों. साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि ‘आर-3’ कोई दंडात्मक बोर्ड विषय नहीं होगा. विदेशी भाषाओं के अध्ययन का विकल्प भी खुला रहेगा.

अब समय आ गया है कि स्कूल सीबीएसई की त्रिभाषा योजना को लागू करें. इसमें स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लचीलापन भी दिया गया है. यह योजना छात्रों को भाषाई रूप से अधिक सक्षम बनाने और राष्ट्रीय जुड़ाव को मजबूत करने में मदद कर सकती है. हमें भारतीय भाषाओं को संरक्षित करना चाहिए, बहुभाषावाद को एक संसाधन के रूप में मजबूत करना चाहिए और साथ ही विदेशी भाषाओं के लिए भी अपने दरवाजे खुले रखने चाहिए.

एम. जगदीश कुमार, शिक्षा मंत्रालय की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 समीक्षा समिति के अध्यक्ष हैं. वे पूर्व में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के अध्यक्ष और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कुलपति रह चुके हैं. व्यक्त विचार उनके निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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