नई दिल्ली: तपती दोपहर में 45 डिग्री की गर्मी में दीपक कुमार का चेहरा लाल हो जाता है और पसीने से भीग जाता है. वह उत्तर-पश्चिम दिल्ली के रोहिणी इलाके में एक साधारण बिल्डर-फ्लोर अपार्टमेंट की खड़ी सीढ़ियां चढ़ते हुए हांफ रहे हैं. वह घंटी बजाते हैं और इंतज़ार करते हुए रेलिंग का सहारा लेकर खड़े हो जाते हैं. कुछ देर बाद वह फिर घंटी बजाते हैं. एक बुजुर्ग महिला दरवाजा थोड़ा सा खोलती हैं और उन्हें हैरानी से देखती हैं.
नीले फीते में लटका अपना पहचान पत्र और हाउसलिस्टिंग एवं हाउसिंग जनगणना के कागज़ों वाली एक पतली फाइल दिखाते हुए वे कहते हैं, “मैं जनगणना के लिए आया हूं.” दहलीज़ पर खड़े होकर, वह अपने एंड्रॉयड फोन – अपने मुख्य सर्वे टूल, को देखते हैं और सवाल पूछना शुरू करते हैं.
पहले आसान सवाल होते हैं—घर में कितने लोग रहते हैं, इंटरनेट की सुविधा है या नहीं, परिवार के मुखिया का नाम क्या है. फिर एक बेहद बारीक सवाल आता है.
वे पूछते हैं, “घर में मुख्य रूप से कौन सा अनाज खाया जाता है?”
महिला उलझन में दिखती हैं.
“मतलब?”
“गेहूं या चावल?”
वे हंसते हुए कहती हैं, “अरे, जो घर पर बनता है.”
थोड़ी बातचीत के बाद कुमार अपने फोन में ‘गेहूं’ दर्ज कर लेते हैं. यह उन 33 सवालों में से सिर्फ एक है, जो उन्हें जनगणना 2027 के लिए दिल्ली में चल रही हाउसलिस्टिंग प्रक्रिया के तहत हर घर में पूछने हैं.

कुमार उन 50,000 गणनाकारों (एन्यूमरेटरों) में से एक हैं, जिन्हें भारत की पहली पूरी तरह डिजिटल जनगणना के लिए दिल्ली भर में तैनात किया गया है. एक महीने तक चलने वाला यह अभियान एमसीडी वार्डों के लगभग 46,000 ब्लॉकों को कवर करता है. अधिकारियों के अनुसार, लगभग 33 लाख घरों तक पहुंचकर हर इमारत का नक्शा तैयार किया जा रहा है और मोबाइल ऐप के जरिए आवासीय स्थिति, सुविधाओं और संपत्तियों का रिकॉर्ड रखा जा रहा है.
यह सर्वे अब शौचालय के प्रकार और खाना पकाने के ईंधन से लेकर घर में मौजूद स्मार्टफोन तक की जानकारी पूछता है. इसमें परिवार के मुखिया को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य श्रेणी में भी वर्गीकृत किया जाता है—यह एक पुरानी कैटेगरी है, जिसे जातिगत गणना को लेकर वर्षों से चली बहस के बाद नए सिरे से शामिल किया गया है. यह प्रक्रिया आगे होने वाली जनसंख्या जनगणना की नींव तैयार करती है, जिसमें हाल के वर्षों में सार्वजनिक बहस का प्रमुख विषय रही जातिगत गणना भी शामिल होगी.
इस वर्ष जनगणना का काम छह साल की देरी से हो रहा है. पिछली जनगणना 2011 में हुई थी. विशेषज्ञों ने इस देरी की आलोचना करते हुए कहा है कि इससे सरकारी योजना निर्माण और कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में आंकड़ों की कमी पैदा हुई है.
रोहिणी के अवंतिका स्थित सर्वोदय विद्यालय में सामाजिक विज्ञान के लगभग 40 आयु वर्ग के शिक्षक कुमार ने 2011 में भी जनगणना का काम किया था. उनकी पत्नी, जो स्वयं भी एक शिक्षिका हैं, इस बार भी इस प्रक्रिया में शामिल हैं. उनके जैसे गणनाकारों को अलग से कोई उपकरण नहीं दिया गया है, इसलिए वह हर जवाब अपने ही स्मार्टफोन में सावधानी से दर्ज करते हैं.
अधिकारियों का कहना है कि डिजिटलीकरण ने पिछली जनगणनाओं की तुलना में जानकारी एकत्र करना और उसकी जांच करना आसान बना दिया है, लेकिन कागजी काम कम होने के बावजूद यह काम अब भी घर-घर और सीढ़ी-दर-सीढ़ी जाकर ही करना पड़ता है.

कुमार के लिए यह एक बड़े उद्देश्य के लिए किया जाने वाला महत्वपूर्ण नागरिक कर्तव्य है. उनके द्वारा दर्ज किया गया डेटा सरकार को जीवन स्तर से जुड़े विस्तृत संकेतकों पर नज़र रखने में मदद करेगा, लेकिन इसके साथ अनिश्चितता और कठिन मेहनत भी जुड़ी हुई है. उन्हें अब भी 25,000 रुपये के वादे किए गए प्रोत्साहन और अतिरिक्त छुट्टियों को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं है. भुगतान कब होगा, इसकी भी कोई पुष्टि नहीं है. इसके अलावा एक बड़ी कानूनी जिम्मेदारी भी है. जनगणना अधिनियम के तहत लापरवाही या जानबूझकर गलत जानकारी दर्ज करने पर तीन साल तक की जेल हो सकती है.
मई के मध्य में शुरू हुआ यह अभियान अब 15 जून की समयसीमा से पहले अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है. दिन लंबे हैं, गर्मी लगातार बनी हुई है और बंद घरों के कारण बार-बार जाना पड़ता है—अक्सर सुबह जल्दी, शाम देर से या रविवार को, जब लोगों के घर पर मिलने की संभावना ज्यादा होती है.
हर दरवाजे पर अनुभव अलग होता है. कभी-कभी लोग उन्हें अंदर बुलाकर पानी भी पिला देते हैं, लेकिन अधिकतर बातचीत आधे खुले दरवाजे पर ही होती है. कुछ लोग सवालों को गैर-ज़रूरी बताते हैं. कुछ पूछते हैं कि इस जानकारी का इस्तेमाल कैसे होगा. कुछ लोग “बाद में आना” कहकर दरवाजा बंद कर देते हैं. बुजुर्ग लोगों को इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों से जुड़े सवालों का जवाब देने में कभी-कभी कठिनाई होती है. बाज़ार वाले इलाकों में एक ही इमारत में कई दुकानें और फ्लैट होते हैं, जिससे एक पता ही कई घंटों की मेहनत में बदल जाता है.
इन सभी के बावजूद कुमार इस पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. हर बंद दरवाजे पर दोबारा जाना ज़रूरी है. हर घर का रिकॉर्ड होना चाहिए. हर जवाब, चाहे वह कितना भी सामान्य क्यों न हो, देश की एक बड़ी सांख्यिकीय तस्वीर का हिस्सा बनता है.
उन्होंने कहा, “गर्मी की छुट्टियों में भी शिक्षक यह काम कर रहे हैं. हम इसे खुशी-खुशी करते हैं क्योंकि कहीं न कहीं यह देश सेवा जैसा लगता है. चाहे कोविड का समय हो या अब जनगणना का काम, शिक्षक हमेशा सरकार के जमीनी स्तर के कामों का हिस्सा होते हैं और हम इस जिम्मेदारी को गंभीरता से लेते हैं.”
मोहल्ले का नक्शा बनाना
कुमार किसी एक घर का दरवाजा खटखटाने से पहले ही अपने काम के इलाके का नक्शा तैयार कर चुके थे. इस प्रक्रिया के पहले तीन दिनों में उन्होंने रोहिणी में अपने निर्धारित ब्लॉक की हर गली में पैदल घूमकर इमारतों की पहचान की, रास्तों को चिन्हित किया और ज़मीन पर मौजूद वास्तविक स्थिति का आधिकारिक नक्शों से मिलान किया.
उन्होंने अपने फोन पर हाउसलिस्टिंग ऑपरेशंस (HLO) का नक्शा दिखाते हुए कहा, “हमें घरों की सूची नहीं दी जाती. हमें एक तय क्षेत्र दिया जाता है. उस क्षेत्र के भीतर मौजूद हर ढांचा हमारी जिम्मेदारी बन जाता है.”

इस प्रक्रिया को ‘ग्राउंड-ट्रुथिंग’ कहा जाता है और यह हाउसलिस्टिंग अभियान की नींव है. गणनाकारों को हर इमारत की पहचान करनी होती है—चाहे वह आवासीय हो, व्यावसायिक हो या दोनों तरह के उपयोग वाली हो और उसी के अनुसार डिजिटल नक्शे को अपडेट करना होता है. इन नक्शों की सटीकता 2027 में होने वाली जनसंख्या गणना को दिशा देने में मदद करेगी.
इस काम में मुश्किलें आम बात हैं. रोहिणी के कई इलाकों में सड़क से देखने पर जो इमारत एक ही ढांचा लगती है, उसके अंदर कई दुकानें, कई किराए के कमरे और समय के साथ जोड़ी गई अतिरिक्त मंजिलें हो सकती हैं. नक्शे में जो इमारत एक प्रविष्टि जैसी दिखती है, वह बाद में पांच या छह अलग-अलग जनगणना रिकॉर्ड में बदल सकती है.
कुमार ने कहा, “कभी किसी ने एक अतिरिक्त मंजिल बना ली होती है. कभी छत पर एक कमरा किसी और को किराए पर दिया गया होता है. जब तक हम पूरा काम नहीं कर लेते, तब तक हमें ठीक-ठीक पता नहीं चलता कि वहां कितने परिवार हैं.”

उनके वर्तमान क्षेत्र में 53 मुख्य ढांचे हैं, लेकिन जब दुकानों, किरायेदारों, अतिरिक्त मंजिलों और छत पर बने कमरों को शामिल किया जाएगा, तो उनके अनुमान के अनुसार कुल संख्या 150 से 200 परिवारों तक पहुंच सकती है.
कुमार आमतौर पर अपनी कार ब्लॉक के भीतर पार्क करते हैं और फिर पैदल निकल पड़ते हैं. यह रोहिणी का एक बेतरतीब, निम्न-मध्यम वर्गीय इलाका है, जहां संकरी गलियों के नीचे दुकानें और ऊपर घर बने हुए हैं. उनके अनुसार, यहां के अधिकांश लोग या तो छोटे व्यवसाय चलाते हैं या प्राइवेट नौकरियां करते हैं. अब तक वह इन गलियों में एक पहचाना हुआ चेहरा बन चुके हैं और रास्ते में दुकानदार व स्थानीय निवासी उनका अभिवादन करते हैं.
जब किसी इमारत की पहचान कर उसकी जानकारी दर्ज कर ली जाती है, तो मोबाइल ऐप के जरिए उसे एक जनगणना संख्या दी जाती है. दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी सूचीबद्ध किया जाता है, लेकिन अलग श्रेणी में. उन्हें घरों वाले सभी सवालों के जवाब नहीं देने होते, फिर भी उन्हें रिकॉर्ड में शामिल करना जरूरी होता है.
कुमार ने कहा, “इस तरह, जब हम वास्तविक जनगणना के लिए दोबारा आएंगे, तो हमें ठीक-ठीक पता होगा कि क्या चीज़ कहां है.”

हल्का और तेज़
2011 की जनगणना में भी हिस्सा ले चुके कुमार के लिए इस बार का काम काफी हल्का है. उस समय उन्हें फॉर्म, रजिस्टर और फाइलों के बड़े-बड़े बंडल साथ लेकर चलने पड़ते थे, जबकि अब ऐसा नहीं है.
उन्होंने कहा, “इस बार काम बहुत आसान है. पहले इतने सारे कागज और दस्तावेज संभालते-संभालते दिमाग खराब हो जाता था.” अब कुमार अपनी फाइल में सिर्फ अपने क्षेत्र के घरों और मंजिलों की एक बैकअप सूची रखते हैं.
जनगणना 2027 के एचएलओ ऐप ने ज्यादातर कागज़ी काम की जगह ले ली है. हर पूरा किया गया सर्वे उनके फोन पर एक सारांश डैशबोर्ड में तुरंत दिखाई देता है. जानकारी की पुष्टि करने के बाद कुमार उसे केंद्रीय डेटाबेस में अपलोड कर देते हैं. ऐप अपने आप जनगणना घर संख्या तैयार करता है और उनके निर्धारित क्षेत्र में काम की प्रगति पर नज़र रखता है.

पहली बार लोगों को फील्ड विजिट शुरू होने से पहले ऑनलाइन स्वयं गणना (सेल्फ-एन्यूमरेशन) करने की भी अनुमति दी गई थी.
कुमार का कहना है कि यह सुविधा उपयोगी है—अगर लोग इसका इस्तेमाल करें तो.
उन्होंने कहा, “मेरे फोन पर 21 परिवारों का सेल्फ-एन्यूमरेशन दिख रहा है, लेकिन अभी तक सिर्फ चार लोगों ने मुझे अपना कोड दिया है.”
तकनीक से परिचित ऐसे परिवारों के लिए कुमार की जांच प्रक्रिया मुश्किल से एक मिनट लेती है, लेकिन हकीकत यह है कि काम पूरा करने के लिए उन्हें लोगों से मिलना ही पड़ता है. कई लोगों ने सेल्फ-एन्यूमरेशन के बारे में कभी सुना ही नहीं है. कुछ लोग यह नहीं जानते कि यह कैसे काम करता है. नतीजतन, यह हाई-टेक जनगणना आज भी काफी हद तक एक पुरानी परंपरा पर निर्भर है—किसी व्यक्ति का दरवाजा खटखटाना.
33 सवाल और अंतहीन सब्र
यह प्रश्नावली कुमार को घरेलू जीवन के लगभग हर पहलू के बारे में पूछताछ करने के लिए मजबूर करती है. कुछ जानकारियां वह खुद देखकर दर्ज कर सकते हैं. फर्श टाइलों का है. दीवारें कंक्रीट की हैं. छत पक्की है, लेकिन कुछ सवालों के सीधे जवाब नहीं मिलते और उनके लिए सावधानी से पूछताछ करनी पड़ती है.
मकान के स्वामित्व से जुड़ा एक सवाल कभी-कभी दस मिनट लंबी बातचीत में बदल जाता है, जिसमें प्रवास, विरासत और पारिवारिक विवादों की कहानी शामिल होती है. तब जाकर कुमार समझ पाते हैं कि घर किराए का है या मालिक का.
बहुत कम जवाब सिर्फ “हां” या “नहीं” में मिलते हैं.

एक निवासी बताने लगते हैं कि वह 20 साल पहले उत्तर प्रदेश से दिल्ली कैसे आए थे. कोई दूसरा व्यक्ति इमारत का पूरा इतिहास सुनाने लगता है और फिर आखिर में बताता है कि ऊपर की मंजिल किराए पर दी हुई है.
कुमार ने मुस्कुराते हुए कहा, “जवाब कहीं न कहीं उस कहानी के अंदर छिपा होता है.” वे लोगों की बातें ध्यान से सुनते हैं, सिर हिलाते हैं, उन्हें अपनी लंबी कहानी पूरी करने देते हैं और फिर धीरे-धीरे बातचीत को वापस फॉर्म के सवालों की ओर ले आते हैं. लोगों को सहज महसूस कराने के लिए वह बीच-बीच में छोटे मज़ाक और हल्की-फुल्की बातें भी करते हैं, फिर मूल सवाल पर लौट आते हैं.
उनके निर्धारित इलाके में ज्यादातर कामकाजी लोग सुबह जल्दी घर से निकल जाते हैं और देर शाम लौटते हैं. इसलिए जनगणना से जुड़ी बातचीत अक्सर बुजुर्ग माता-पिता या गृहिणियों के साथ होती है.
उन्होंने बताया, “ज्यादातर समय दरवाजा बुजुर्ग महिलाएं ही खोलती हैं.” उनके मुताबिक, इनमें से कई महिलाओं को इंटरनेट, स्मार्टफोन या ऊपर रहने वाले किरायेदारों से जुड़े सवालों के जवाब नहीं पता होते. “कई बार वे कहती हैं, ‘जब मेरे बच्चे घर पर हों तब आना, उन्हें यह सब पता है.’”
ज्यादातर सवाल सामान्य होते हैं—जैसे परिवार का आकार, पीने का पानी, बिजली, स्वच्छता, खाना पकाने का ईंधन, वाहन आदि, लेकिन कभी-कभी माहौल थोड़ा असहज हो जाता है, जब कुमार पूछते हैं कि परिवार का मुखिया अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य श्रेणी में आता है या नहीं. जनगणना 2027 में यह जानकारी आगे होने वाली व्यापक जातिगत गणना की आधारशिला तैयार करेगी.

अधिकांश लोग बिना झिझक जवाब दे देते हैं. लेकिन कुछ लोग जानना चाहते हैं कि यह जानकारी क्यों मांगी जा रही है.
कुमार ने कहा, “वे हमसे भी बहुत सारे सवाल पूछते हैं. वे पूछते हैं कि हमें अपना डेटा क्यों देना चाहिए? सरकार इसका क्या करेगी?”
कुमार सभी को एक ही जवाब देते हैं.
“मैं उन्हें बताता हूं कि यह जानकारी सरकार को यह समझने में मदद करती है कि अगले दस वर्षों में लोगों की क्या ज़रूरतें होंगी.”
आखिरकार, ज्यादातर लोग सहयोग कर ही देते हैं.
एक बड़ा उद्देश्य
अगर जनगणना के लिए धैर्य सबसे ज़रूरी गुण है, तो उसके बाद दृढ़ता का स्थान आता है. कुमार के दिन का एक बड़ा हिस्सा उन पतों पर दोबारा जाने में बीतता है, जहां वह पहले भी दस्तक दे चुके होते हैं.
वह अपनी मुलाकातों का समय सुबह जल्दी या दफ्तर के समय के बाद रखते हैं, जब लोगों के घर पर मिलने की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन तब भी काम पूरा हो जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती. गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वह उन घरों की जानकारी पूरी करने की दौड़ में लगे हैं, जहां पहले सर्वे पूरा नहीं हो पाया था.
कभी निवासी दफ्तर गए होते हैं. कभी वे सो रहे होते हैं. कई बार दरवाजा गर्मी की छुट्टियों पर घर में मौजूद बच्चे खोलते हैं या ऐसे बुजुर्ग, जो दोपहर की नींद से जगाए जाने के बाद बात करने के मूड में नहीं होते और कभी-कभी तो कोई दरवाजा ही नहीं खोलता. ऐसे घरों को बंद (लॉक्ड) दर्ज किया जाता है और उनकी स्थिति की पुष्टि होने तक बार-बार वहां जाना पड़ता है.
कुमार ने कहा, “मुझे यह पता करना होता है कि कोई वहां रहने आया है या नहीं, घर खाली है या लोग सिर्फ कहीं बाहर गए हुए हैं.”
दोपहर भर कुमार का फोन लगातार बजता रहता है. एक कॉल किसी सुपरवाइजर की होती है, जो पूछता है कि कितने घर बाकी हैं. दूसरी कॉल डेटा सिंक करके जमा करने की याद दिलाने के लिए होती है. मुलाकातों के बीच वह वार्ड स्तर के एक व्हाट्सऐप ग्रुप को भी देखते हैं, जहां अन्य गणनाकार अपने सर्वे की प्रगति की जानकारी साझा कर रहे होते हैं. कुमार पूरे दिन वही जवाब देते रहे हैं जो बार-बार दोहराना पड़ रहा है—कुछ घरों पर आखिरी बार फिर जाना बाकी है.
कुमार ने सीधे शब्दों में कहा, “ये दबाव बनाने के तरीके हैं. समयसीमा अब करीब है.”
उन्हें अभी तक कोई भुगतान नहीं मिला है, लेकिन इससे उनके रोज नए संकल्प के साथ काम पर निकलने में कोई फर्क नहीं पड़ता. उनका कहना है कि यह फील्डवर्क उनके लिए कई महिला गणनाकारों की तुलना में फिर भी आसान है. कुछ महिला गणनाकार घर-घर जाने के दौरान अपने पति, पिता या किसी अन्य पुरुष रिश्तेदार को साथ ले जाती हैं. कुछ सुरक्षा के लिए जोड़ी बनाकर काम करती हैं. अनजान इलाकों में घूमने में कम समय लगे, इसलिए कई लोग घरों का दौरा जल्दी पूरा कर लेते हैं और बाद में ऐप में जानकारी भरते हैं.
मजबूत मन भी इस काम की एक अनकही जरूरत है. कुमार कहते हैं कि कई बार यह काम “अपमानजनक” भी महसूस हो सकता है. कुछ दिनों में लोग उनके मुंह पर दरवाजा बंद कर देते हैं. कुछ पूछते हैं कि उन्हें उनके घर की जानकारी क्यों चाहिए. कई बार किसी एक पते पर तीन या चार बार लौटना पड़ता है, तब जाकर कोई घर पर मिलता है.
कुमार को आगे बढ़ाते रहने वाली चीज यह विश्वास है कि जनगणना तभी सफल हो सकती है जब हर घर की गिनती हो. शाम तक भी वह रोहिणी की गलियों में फोन हाथ में लिए घूम रहे होते हैं और एक-एक करके पतों को सूची से हटाते जाते हैं. कोई भी घर छूट नहीं सकता. यह एक राष्ट्रीय सेवा है, भले ही इसमें बहुत मेहनत लगती हो और कई बार लोगों को यह दखल देने वाला काम लगे.
ज्यादातर लोग कुछ दिनों बाद इस मुलाकात को भूल जाएंगे, लेकिन यह डेटा वर्षों तक मौजूद रहेगा. और कुमार के लिए अगली सीढ़ियां चढ़ते रहने की यही सबसे बड़ी वजह है.
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