नई दिल्ली: एक नई स्टडी में पाया गया है कि हर्बल सिगरेट, जिन्हें प्राकृतिक, तंबाकू-मुक्त और बिना अपराधबोध के पीने योग्य स्वास्थ्यवर्धक विकल्प के रूप में बेचा जाता है, पारंपरिक तंबाकू वाली सिगरेट से भी ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं.
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान गांधीनगर (IITGN) और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस अर्बाना-शैंपेन (UIUC) के शोधकर्ताओं ने पाया कि हर्बल सिगरेट से निकलने वाला धुआं तंबाकू वाली सिगरेट के धुएं जितना ही या उससे भी ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है.
यह अध्ययन हर साल 31 मई को मनाए जाने वाले विश्व तंबाकू निषेध दिवस से पहले जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है.
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत में बिकने वाले तंबाकू सिगरेट के दो लोकप्रिय ब्रांडों और हर्बल सिगरेट के चार ब्रांडों के धुएं की तुलना की. हर्बल सिगरेट में तुलसी, लौंग, दालचीनी, पुदीना, ग्रीन टी, वाटर लिली और कैमोमाइल जैसे तत्व शामिल थे. कुछ उत्पादों में तेंदू पत्तों का भी इस्तेमाल किया गया था, जिनका उपयोग आमतौर पर बीड़ी लपेटने के लिए किया जाता है.
IITGN के सिविल इंजीनियरिंग और केमिकल इंजीनियरिंग विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर और डॉ. किरण सी. पटेल सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट के सह-समन्वयक समीर पटेल ने दिप्रिंट से कहा, “सबसे बड़ी गलतफहमियों में से एक यह है कि अगर किसी उत्पाद में निकोटीन नहीं है, तो वह नुकसान नहीं पहुंचा सकता. लोग सोचते हैं कि पुदीना या तुलसी जैसी जड़ी-बूटियां स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती हैं क्योंकि उन्हें खाया जा सकता है. लेकिन उन्हें जलाकर सांस के जरिए शरीर में लेना पूरी तरह अलग प्रक्रिया है.”
शोध पत्र में भारतीय बाजार में उपलब्ध हर्बल और तंबाकू सिगरेट से निकलने वाले मुख्य धुएं (फर्स्टहैंड स्मोक) के भौतिक, रासायनिक और ऑक्सीडेटिव गुणों की विस्तृत तुलना की गई है. इसमें कहा गया है कि हर्बल सिगरेट बड़ी मात्रा में बेहद बारीक कण और जहरीले तत्व छोड़ती हैं, जो सांस और हृदय संबंधी बीमारियों से जुड़े हैं.
पटेल ने कहा, “हमारे निष्कर्ष उस आम धारणा को चुनौती देते हैं कि तंबाकू-मुक्त मतलब जोखिम-मुक्त. जिन लगभग सभी मानकों को हमने मापा, उनमें हर्बल सिगरेट का धुआं तंबाकू सिगरेट के बराबर या उससे ज्यादा हानिकारक निकला. पत्तों में लिपटी हर्बल सिगरेट सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हुई.”
जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स के अनुसार, सिगरेट पीना आज भी दुनिया भर में एक बड़ी समस्या बना हुआ है. अनुमान है कि 1.18 अरब लोग नियमित रूप से धूम्रपान करते हैं. इनमें 32.6 प्रतिशत पुरुष और 6.5 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं. इसके कारण हर साल 70 लाख से ज्यादा लोगों की मौत होती है.
हर्बल सिगरेट की हकीकत
अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने सिगरेट को एक नियंत्रित चैंबर में जलाया, जिसे इंसानों के धूम्रपान करने के तरीके की नकल करने और निगरानी के लिए तैयार किया गया था. इसके बाद निकलने वाले धुएं का विश्लेषण कणों के आकार, रासायनिक संरचना और ऑक्सीडेटिव क्षमता के आधार पर किया गया. ऑक्सीडेटिव क्षमता उन हानिकारक अणुओं के बनने से जुड़ी होती है, जो फेफड़ों और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
अध्ययन में पाया गया कि हर्बल सिगरेट के धुएं में तंबाकू सिगरेट की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत ज्यादा 500 नैनोमीटर से छोटे कण निकलते हैं.
हर्बल और इन तथाकथित “प्राकृतिक सिगरेटों” से निकलने वाले ये कण ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि वे फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच सकते हैं और खून में भी प्रवेश कर सकते हैं.
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि तेंदू पत्ते में लिपटी सिगरेटों की ऑक्सीडेटिव क्षमता कागज में लिपटी सिगरेटों की तुलना में लगभग 49 प्रतिशत ज्यादा थी.
पटेल ने कहा, “पत्तों में लिपटी हर्बल सिगरेट हमारे परीक्षण में सबसे ज्यादा खतरनाक साबित हुई.”
एक मामले में तुलसी से भरी हर्बल सिगरेट, जिसे “100 प्रतिशत प्राकृतिक भराव और स्वस्थ जीवनशैली के लिए केमिकल-फ्री” बताकर बेचा जा रहा था, उसमें सभी नमूनों में सबसे ज्यादा सीसा (लेड) पाया गया.
यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस अर्बाना-शैंपेन में पर्यावरण इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के सहयोगी शोधकर्ता विशाल वर्मा ने कहा, “यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है क्योंकि कई उपभोक्ता निकोटीन-मुक्त उत्पादों को कम नुकसानदायक मानते हैं.”
उद्योग में नियमन की कमी
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस अध्ययन ने हर्बल सिगरेट उद्योग में नियामकीय कमी को भी उजागर किया है.
भारत में तंबाकू उत्पादों को सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (COTPA) के तहत नियंत्रित किया जाता है, लेकिन तंबाकू-मुक्त बताकर बेचे जाने वाले उत्पादों के नियमन और विज्ञापन को लेकर ज्यादा स्पष्टता नहीं है.
अध्ययन के मुख्य लेखक डॉ. आलोक कुमार ठाकुर के अनुसार, कई हर्बल सिगरेट ब्रांड यह दावा करते हैं कि उनके उत्पाद खांसी कम कर सकते हैं, नींद बेहतर बना सकते हैं या चिंता कम कर सकते हैं, जबकि इन दावों के समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण बहुत सीमित हैं.
अध्ययन के सह-लेखक डॉ. पी.एस. गणेश सुब्रमणियन ने कहा, “जलने की प्रक्रिया, बारीक कण, कालिख, सूक्ष्म धातुएं और उन्हें लपेटने वाला पदार्थ, डिब्बे पर लिखी बातों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.”
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह अध्ययन धूम्रपान करने वालों में लंबे समय में होने वाली बीमारियों की सीधे जांच नहीं करता. यह केवल धुएं के हानिकारक गुणों और उनके संभावित जैविक प्रभावों पर केंद्रित है.
पटेल ने कहा, “हर्बल सिगरेट का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए अब इनके नियमन की शुरुआत करने का सही समय है. फिलहाल हर्बल सिगरेट नियमन के मामले में एक धुंधले क्षेत्र में हैं. इन्हें स्वास्थ्य और वेलनेस से जुड़े दावों के साथ बेचा जा रहा है, लेकिन इन पर तंबाकू सिगरेट जैसी पाबंदियां लागू नहीं हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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