जवाहरलाल नेहरू की एक ऐसी तस्वीर है जिसे भारत में लगभग हर किसी ने देखा है, भले ही वे यह न बता सकें कि यह कब और कहां ली गई थी — वह कुलीन अंदाज़, अचकन पर सजा गुलाब, और चेहरे पर वह हल्का सा इत्मीनान, जैसे उन्होंने अभी-अभी आपकी उम्मीद से कहीं अधिक नपे-तुले और खूबसूरत अल्फाज़ों में अपनी बात पूरी की हो.
नेहरू आधी रात के ऐतिहासिक भाषण वाले राजनेता हैं, गांधी के पैरोकार हैं, और गुटनिरपेक्षता के शिल्पी हैं. वे राष्ट्रीय मानस में कुछ इस कदर रच-बस गए हैं कि उन्हें एक विचारक की बजाय महज़ एक ऐतिहासिक स्मारक के रूप में देखना ज़्यादा आसान लगता है. फिर भी, शायद तस्वीरें नेहरू के सबसे दिलचस्प पहलुओं को कैद करने में नाकाम रहती हैं. प्रधानमंत्री बनने से बहुत पहले, उनका वजूद कहीं अधिक अनजाना और संवेदनशील था. वे महज़ एक कैदी थे, जिसके हाथ में एक फाउंटेन पेन था, और जो कागज़ के पन्नों पर इस उधेड़बुन में लगा था कि आखिर एक सदियों पुरानी सभ्यता को अपनी सोच बदलने के लिए कैसे राजी किया जाए.
यहां हालात और माहौल को समझना ज़रूरी है. एक तरफ जहां वियना से विस्थापित होकर न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च पहुंचे कार्ल पॉपर एक प्रांतीय कॉलेज में पढ़ाते हुए, कट्टरपंथ के खिलाफ संदेह की वकालत करते हुए अपनी उग्र किताब ‘द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमीज’ लिख रहे थे, ठीक उसी वक़्त नेहरू भी कड़े पहरे के बीच अपनी किताब मुकम्मल कर रहे थे. उन्होंने 1942 से 1945 के बीच महाराष्ट्र की बेसाल्ट पत्थरों वाली अहमदनगर जेल में ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ (भारत की खोज) का मसौदा तैयार किया, जहाँ अंग्रेजों ने उन्हें और कांग्रेस के ग्यारह अन्य नेताओं को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के बाद कैद कर रखा था.
यह किताब 1946 में प्रकाशित हुई. दो इंसान, दो कैद, और बीसवीं सदी की त्रासदियों से खुद को बाहर निकालने की दो कोशिशें. उनमें से एक ऐसा दार्शनिक था जिसे अकादमिक पाठकों की सहूलियत मयस्सर थी, और दूसरा एक राजनेता जिसे बहुत जल्द चालीस करोड़ की आबादी वाले देश की कमान सँभालनी थी.
आस्था Vs प्रमाण
‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में ही नेहरू ने ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ शब्द को वह पहचान दी, जो हमेशा के लिए उनके नाम के साथ जुड़ गई. इस शब्द को प्रयोगशालाओं और इंजीनियरों से जुड़ा कोई नारा समझ लेना बहुत आसान भूल है. लेकिन यह ऐसा बिल्कुल नहीं था. नेहरू के लिए विज्ञान कोई उद्योग नहीं था; यह सोचने का एक सलीका था, लगभग एक तरह का शिष्टाचार.
नेहरू के इस मशहूर फलसफे में किसी उसूल जैसी लय है: सच की तलाश करना, किसी भी बात को बिना परखे स्वीकार करने से इनकार करना, सबूत खिलाफ होने पर अपनी पुरानी राय को बेझिझक बदल देने की इच्छाशक्ति, और पहले से गढ़े गए सिद्धांतों के बजाय देखे गए ठोस तथ्यों पर भरोसा करना. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह सब महज़ विज्ञान को लागू करने के लिए ही नहीं, बल्कि खुद ज़िंदगी जीने के लिए निहायत ज़रूरी है. अपने आप में यह काफी हद तक ‘पॉपर’ के विचारों जैसा ही एक वाक्य है.
पॉपर का मानना था कि एक समाज तभी तक खुला और आज़ाद रह सकता है जब तक उसके नागरिक उसे परखते और चुनौती देते रहें. नेहरू भी इंसानी दिमाग के बारे में यही सोचते थे. वे इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि भारत की लंबी राजनीतिक गुलामी की असल वजह हमारी सोच में ही कहीं दबी है — जाति-पात का भाग्यवाद, धार्मिक कट्टरपंथ के आगे झुकना, और सामंती सत्ता को सह लेने का धैर्य, ये सब आख़िरकार विरासत में मिली मान्यताओं के आगे हमारे हौसले की हार थी. ब्रिटेन से आज़ादी पाना तो आसान काम था. असल और कहीं ज़्यादा मुश्किल आज़ादी तो खुद के भीतर से मिलनी थी.
इस बात में और भी तीखापन तब आता है जब हम देखते हैं कि उस दौर में नेहरू वैचारिक तौर पर किनके साथ उठ-बैठ रहे थे, जब उन्होंने इन बातों को नकारा. वे गांधी से बेइंतहा मोहब्बत करते थे; ठीक वैसे ही जैसे एक मेधावी बेटा अपने सख्त मिज़ाज पिता से उलझी हुई अकीदत रखता है, और इसके बावजूद उन्होंने आधुनिकता को लेकर गांधी के लगभग हर विचार को सिरे से खारिज कर दिया.
गांधी को मशीनों पर ऐतबार नहीं था. उन्हें चरखे और आत्मनिर्भर गांव में कोई बीता हुआ ज़माना नहीं, बल्कि एक नैतिक शिखर दिखाई देता था, ज़िंदगी जीने का एक ऐसा तरीका जो इंसानी रूह को औद्योगिकीकरण की पीस देने वाली तार्किकता से बचाए रखता था. लेकिन नेहरू ने जब उसी भारतीय गांव को देखा, तो उन्हें उसमें कुछ भी रूमानी नज़र नहीं आया: वहां भुखमरी थी, बीमारियां थीं, और एक ऐसा माहौल था जो वहां रहने वालों को अंदर तक कुचल रहा था.
जहां गांधी को सुकून का एक ठिकाना दिखता था, वहीं नेहरू को एक फंदा नज़र आता था, और उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि सिर्फ तकनीक की आग — उनके शब्द अक्सर जोश से भरे होते थे — ही अकाल से बचने का एक गणितीय और तार्किक रास्ता दे सकती है. यह कोई छोटी-मोटी असहमति नहीं थी जिसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया हो. इसने नेहरू को जान-बूझकर ‘एनलाइटनमेंट’ (ज्ञानोदय) और आदर्शवादी तर्कशास्त्रियों की कतार में ला खड़ा किया. वे किसी ‘पवित्र अतीत’ को वापस नहीं लाना चाहते थे. वे एक ऐसे भविष्य का निर्माण करना चाहते थे जिसे तर्कों से साबित किया जा सके.
दार्शनिक और प्रधानमंत्री
और यहीं से आलोचनाओं का रुख भी मुड़ना चाहिए, क्योंकि यहीं एक दार्शनिक और एक प्रधानमंत्री के रास्ते अलग होने लगते हैं. जेल की कोठरी में संदेह की तारीफ करना एक बात है. लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठकर उसे व्यवस्था का हिस्सा बना देना बिल्कुल अलग बात है.
पॉपर की ‘ओपन सोसाइटी’ एक ऐसी शानदार अव्यवस्था होनी चाहिए थी, जहां अलग-अलग विचारों की आपस में खुली टक्कर हो और किसी का भी सच पर एकाधिकार न हो. इसके उलट, नेहरूवादी विज्ञान काफी भव्य और एकतरफा हो गया. उन्होंने बड़े-बड़े बांधों, स्टील प्लांटों और राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का उद्घाटन किया और उन्हें ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ का नाम दिया (यह वाक्यांश पहली बार 1954 में भाखड़ा-नांगल परियोजना के लिए इस्तेमाल किया गया था) — और गौर कीजिए कि यह रूपक कितनी जल्दी इस पूरी पद्धति के साथ धोखा कर जाता है.
मंदिर वह जगह नहीं होती जहां आप मान्यताओं की परीक्षा लेते हैं. यह वह जगह है जहां आपको बताया जाता है कि क्या मानना है. बंटवारे से लहूलुहान और आर्थिक रूप से खोखले हो चुके देश को जल्द-से-जल्द आधुनिक बनाने की हड़बड़ी में, नेहरू ने एक ऐसा विशाल सरकारी तंत्र खड़ा कर दिया जिसने विज्ञान की पूरी सत्ता चंद तकनीकी विशेषज्ञों के हाथों में सौंप दी.
इसका सबसे साफ उदाहरण परमाणु ऊर्जा आयोग है, जिसे कद्दावर होमी भाभा चलाते थे, और जिसे संसदीय जवाबदेही से इतना आज़ाद रखा गया था कि उसे देखकर पॉपर भी सिहर उठते. जनता को अपनी सच्चाई पर सवाल उठाने का हक देने के बजाय, भारत को ऊपर से सरकारी हुक्म के ज़रिए ‘तर्क और विज्ञान’ का ज्ञान परोसा गया, जहाँ सरकार खुद को इस तर्क का सबसे बड़ा ठेकेदार समझने लगी.
ऐसी व्यवस्था में एक बहुत बड़ा खतरा छिपा होता है: हम महज़ एक पाखंड की जगह दूसरा पाखंड खड़ा कर देते हैं, परंपरागत रूढ़ियों की जगह वैज्ञानिक प्रतिष्ठानों की रूढ़ियां ले लेती हैं, और आम नागरिक पहले की तरह ही हिस्सेदार बनने के बजाय महज़ एक मूक दर्शक बना रहता है.
मानवताहीन विज्ञान के खतरे
इन सबके बावजूद, नेहरू कोई ऐसे नासमझ इंसान नहीं थे जो तकनीक के पीछे आंख मूंदकर भागते हों. उन्होंने रसेल को पढ़ा था, उनसे खतो-किताबत की थी, और उस बुज़ुर्ग दार्शनिक की इस गहरी चिंता को महसूस किया था कि अगर विज्ञान को इंसानियत से काट दिया जाए, तो वह महज़ कत्लेआम का एक असरदार ज़रिया बनकर रह जाता है — हिरोशिमा की त्रासदी के तुरंत बाद के सालों में यह डर कोई कोरी कल्पना नहीं था.
नेहरू इसी कश्मकश के उत्तर-औपनिवेशिक रूप में फंसे थे. दुनिया में एक आधुनिक राष्ट्र के तौर पर गंभीरता से लिए जाने के लिए भारत को न्यूक्लियर फिजिक्स और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की सख्त ज़रूरत थी; लेकिन यही तकनीकें भारत की उस सावधानी से गढ़ी गई ‘गांधीवादी और शांतिप्रिय’ छवि के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाती थीं. आप उनकी विदेश नीति को भू-राजनीति में लागू किए गए ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ के तौर पर भी पढ़ सकते हैं. गुटनिरपेक्षता, असल में किसी भी बनी-बनाई विचारधारा को आँख मूँदकर मानने से इनकार करना ही थी.
शीत युद्ध ने भारत को दो बने-बनाए कट्टर रास्ते दिए थे; अमेरिकी पूंजीवाद और सोवियत साम्यवाद, और नेहरू ने हर संकट के ज़मीनी तथ्यों को परखे बिना इनमें से किसी को भी कबूल करने से मना कर दिया. यह हमेशा कारगर रहा या नहीं, यह एक अलग सवाल है. लेकिन उनका यह बौद्धिक रुख आख़िर तक एक-सा रहा.
सरकारी आदेश के जरिए तार्किकता
आख़िरी विडंबना इतनी सटीक है कि किसी इतिहासकार के लिए इस पर यकीन करना मुश्किल हो जाए, फिर भी यह सच है. 1976 में, नेहरू के गुज़रने के बारह साल बाद, और इमरजेंसी के दौरान, जब पूरे भारत में नागरिकों की आज़ादी छीन ली गई थी, तब उनकी बेटी इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान में 42वां संशोधन पारित किया. इसमें अनुच्छेद 51A(h) के रूप में एक नया मौलिक कर्तव्य चुपके से जोड़ दिया गया: अब हर भारतीय नागरिक का यह संवैधानिक फर्ज़ था कि वह ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे.’
इमरजेंसी के एक फरमान ने तय कर दिया था कि लोगों को सवाल पूछने वाला होना चाहिए. कोई भी यह तसव्वुर कर सकता है कि पॉपर — जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी यह चेतावनी देने में बिता दी कि सच कभी ऊपर से हुक्म चलाकर नहीं थोपा जा सकता — इस खबर को सुनकर शायद एक फीकी हंसी हंस पड़ते. यह इस पूरे प्रोजेक्ट के भीतर बसे विरोधाभास का सबसे मुकम्मल स्मारक है: सरकारी हुक्मनामे के ज़रिए आया हुआ तर्कवाद.
लेकिन नेहरू को महज़ उनके अपने ही विरोधाभासों के जाल में उलझा हुआ छोड़ देना एक बहुत ही सस्ता और गलत अंत होगा. अक्सर यह लालच होता है कि हम उन्हें पॉपर या रसेल के पैमानों पर तौलें और उन्हें कमतर, बहुत ज़्यादा संस्थागत या अपनी बातों को लेकर कुछ ज़्यादा ही मुतमईन करार दें. लेकिन सही पैमाना वही है जो यह तुलना खुद सुझाती है.
एक नवजात गणराज्य में सिद्धांतों की परख
पॉपर और रसेल को अपने सिद्धांतों को लेक्चर हॉल और अकादमिक जर्नल्स की सुरक्षित दुनिया में आज़माने का मौका मिला, जहां एक गलत तर्क देने पर आपको बस एक आलोचना झेलनी पड़ती है. वहीं नेहरू ने अपने सिद्धांतों को एक ऐसे नवजात गणराज्य में आज़माया जो जातियों में बंटा था, बंटवारे के ज़ख्मों से कच्चा था, और जिसे अंग्रेजों ने दो सौ सालों तक बुरी तरह निचोड़ा था — जहां एक गलत तर्क की कीमत सीधे एक अकाल होती है.
यह सच है कि अपने सिद्धांतों को ज़मीन पर उतारने की उनकी कोशिशें कई जगह अहंकारी और बहुत ज़्यादा सत्ता-केंद्रित साबित हुईं; यह आलोचना अपनी जगह सही है. लेकिन यह अहंकार सत्ता की बेरुखी का नहीं, बल्कि वक़्त की नज़ाकत और जल्द-से-जल्द कुछ कर गुज़रने की हड़बड़ी का था. वे सही मायनों में सदी के महान तर्कवादियों के सच्चे समकक्ष थे, जो सच, सत्ता और इंसानी आज़ादी के उन्हीं गहरे सवालों से जूझ रहे थे, बस एक बहुत बड़े फर्क के साथ — उन्हें इन सवालों के जवाब एक समय-सीमा के भीतर, सत्ता की कुर्सी पर बैठकर देने थे, जहां दांव पर करोड़ों लोगों की ज़िंदगियां लगी थीं.
वे तर्कों के आधार पर एक पूरी तरह से तार्किक समाज बनाने में कामयाब नहीं हो सके. सच तो यह है कि कोई भी नहीं हो सकता था. लेकिन बीसवीं सदी के मध्य के उस कट्टरपंथी अंधेरे में उन्होंने जो किया, वह बेमिसाल था: उन्होंने एक विशाल और नामुमकिन से लगने वाले देश की बागडोर इस यकीन के साथ संभाली कि अंधभक्ति से बेहतर दिशा-सूचक ठोस सबूत हैं. और फिर उन्होंने जेल में बैठकर एक पूरी किताब लिख डाली ताकि अपने इस यकीन को समझा सकें, वह भी तब जब वे खुद इन चीज़ों को हकीकत की कहीं ज़्यादा मुश्किल कसौटी पर आज़माने के लिए अपनी रिहाई का इंतिज़ार कर रहे थे.
पॉपर और रसेल ने बीसवीं सदी को संदेह करना सिखाया. नेहरू ने जो किया, वह कहीं ज़्यादा मुश्किल और तन्हा सफर था: वे एक कमज़ोर और अनगढ़े राष्ट्र के मुहाने पर खड़े हुए और उन्होंने पूरी अवाम से अपील की कि वे सब मिलकर उनके साथ इसे सीखें — महज़ किसी सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे देश की तरह जिसमें उन्हें जीना है.
प्रणव शर्मा विज्ञान के इतिहासकार हैं, जो नई दिल्ली (भारत) और पारो (भूटान) में रहते हैं और लिखते हैं. विचार निजी हैं.
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