नई दिल्ली: 4 अक्टूबर को कैद में पाले गए दो नर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड राजस्थान के डेजर्ट नेशनल पार्क में पहुंचे. उन्होंने वही किया, जो उनके पूर्वज बिना सोचे-समझे करते थे: खुले जंगल में घूमना.
लेकिन इन पक्षियों को दोबारा जंगल में बसाने की यह बड़ी कोशिश कई सालों की मेहनत के बाद संभव हो पाई है.
2019 से जंगली बस्टर्ड के अंडों को बचाकर लाया गया, उन्हें मशीनों की मदद से सेया गया और राजस्थान के सम और रामदेवरा में बने संरक्षण केंद्रों में चूजों को हाथों से पालकर बड़ा किया गया. आज इन प्रजनन केंद्रों में 98 बस्टर्ड रह रहे हैं. लेकिन कुछ समय पहले तक यह पक्षी हर जगह दिखाई देता था और घास के मैदानों का निर्विवाद राजा था. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का इतिहास शानदार रहा है, हालांकि इसमें कई मुश्किल दौर भी आए. आज इसका भविष्य काफी हद तक उन संरक्षण वैज्ञानिकों की उम्मीदों पर टिका है, जिन्होंने हार नहीं मानी है.
पक्षी विशेषज्ञ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में अहम भूमिका निभाने वाले एलन ऑक्टेवियन ह्यूम ने अपनी किताब द गेम बर्ड्स ऑफ इंडिया, बर्मा एंड सीलोन में इस पक्षी के विशाल इलाके में पाए जाने का जिक्र किया है.
उन्होंने लिखा कि यह पक्षी “खुले और खाली मैदानों, घास के मैदानों और छोटी झाड़ियों वाले इलाकों में पाया जाता है”. यह मैसूर से लेकर पूरे बॉम्बे प्रेसिडेंसी, काठियावाड़ और कच्छ तक, निजाम के इलाके, बरार, मध्य प्रांत, पूर्व में संबलपुर तक, सेंट्रल इंडिया एजेंसी, राजपूताना और पंजाब तक पाया जाता था. यानी भारत के 11 राज्यों में इस पक्षी की मौजूदगी थी.
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का जिक्र मुगल बादशाहों के समय में भी मिलता है. इसे शाही दावतों में बड़े चाव से खाया जाता था. ब्रिटिश राज के दौरान इसका शिकार किया जाता था.
भारतीय घास के मैदानों पर राज करने वाला यह पक्षी आखिर रेगिस्तान के कुछ इलाकों तक ही कैसे सिमट गया? इसके घास के मैदान खत्म हो गए, बड़े पैमाने पर इसका शिकार हुआ और आवारा कुत्ते भी इसके पीछे पड़ गए. फिर इसके सामने आधुनिक और हरित विकास से जुड़े नए दुश्मन आ गए: एक-दूसरे को काटती हुई हाई-वोल्टेज बिजली की तारें.
इसके बाद इस पक्षी को बचाने के लिए कई कदम उठाए गए. इसके नाम पर एक खास राष्ट्रीय परियोजना शुरू की गई, सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई चली और संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया गया. अब भारत इस पक्षी को फिर से जंगल में बसाने की कोशिश कर रहा है.
लेकिन संरक्षण के लिए आपात स्थिति बनने से पहले भी इस पक्षी को इतिहास में अपनी जगह बनाने का एक मौका मिला था.
1961 में इसे भारत का राष्ट्रीय पक्षी बनाने की दौड़ में शामिल किया गया था. लेकिन यह मोर से हार गया. क्यों? इसकी एक वजह यह थी कि यह दिखने में कैसा लगता था. दूसरी वजह इसके नाम का उच्चारण था.
राष्ट्रीय पक्षी बनने की दौड़
जब 1960 में भारत ने अपने राष्ट्रीय पक्षी की तलाश शुरू की, तब ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का मुकाबला भारतीय मोर से था. मोर की गर्दन नीले रंग की होती है और उसके पंख कई रंगों से चमकते हैं.
लेकिन मोर क्यों जीता? क्या सिर्फ उसकी खूबसूरती की वजह से? या भारतीय संस्कृति में उसके खास महत्व के कारण? या फिर बस्टर्ड से जुड़ी कोई दूसरी बात थी? शायद उसका नाम?
यह दौड़ तब शुरू हुई, जब इंटरनेशनल काउंसिल फॉर बर्ड प्रिजर्वेशन ने 1960 में टोक्यो में हुई अपनी बैठक में देशों से अपना राष्ट्रीय पक्षी चुनने की अपील की.
भारत में भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने पांच पक्षियों की सूची तैयार की. इनमें गरुड़, सारस, हंस, मोर और ग्रेट इंडियन बस्टर्ड शामिल थे. जल्द ही यह मामला संसद में बहस का विषय बन गया.
कृषि उप मंत्री एम.वी. कृष्णप्पा ने बताया कि “वन्यजीव बोर्ड में ज्यादातर लोगों की राय थी कि मोर को चुना जाना चाहिए”. लेकिन सरकार “जनता की राय भी जानना चाहती थी”.
जब सांसद एन.एम. लिंगम ने पूछा कि पक्षी चुनने के लिए क्या मापदंड तय किए गए हैं, तो कृषि मंत्री एस.के. पाटिल ने साफ कहा, “आमतौर पर वही पक्षी चुना जाता है, जो लोकप्रिय हो, शायद दिखने में अच्छा हो और जिसे राष्ट्रीय महत्व या पवित्रता से जोड़ा जाता हो.”
अगर यही कसौटी थी, तो मोर को पहले से ही काफी बढ़त हासिल थी. उसका रूप खास, जाना-पहचाना, पवित्र और शाही था. साथ ही, वह साफ तौर पर भारतीय पहचान का हिस्सा था.
मोर अलग-अलग धर्मों और साम्राज्यों में खास जगह रखता था. वह कार्तिकेय का वाहन था और भगवान कृष्ण के मुकुट में भी उसके पंख लगे होते हैं. ऋग्वेद में उसे इंद्र का प्रिय पक्षी बताया गया है. कालिदास के लिए वह हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहा. मोर जातक कथाओं में भगवान बुद्ध ने खुद सुनहरे मोर के रूप में जन्म लिया था. फारसी चित्रों में भी जीवन के वृक्ष के दोनों ओर मोर दिखाए जाते थे.
लेकिन किसी भी चीज की तुलना मुगल बादशाह शाहजहां की इस भेंट से नहीं हो सकती थी. उन्होंने सात साल लगाकर शानदार तख्त-ए-ताऊस बनवाया था, जिसे दुनिया मयूर सिंहासन के नाम से भी जानती है.
हालांकि, तीन फीट से ज्यादा ऊंचा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भी कोई कमजोर दावेदार नहीं था.
इतिहास में दर्ज, शाही दावत का हिस्सा और ट्रॉफी
बस्टर्ड की कई पहचान थीं. यह शाही दावतों में परोसा जाने वाला पकवान था, शिकार की ट्रॉफी था और शिकारियों के लिए एक खास इनाम भी. लेकिन यही चीजें आगे चलकर इसके विनाश का कारण बनीं.
16वीं सदी में मुगल बादशाह बाबर ने अपनी आत्मकथा में हिंदुस्तान को ऐसा देश बताया था, जहां आकर्षण की कमी थी और जहां अच्छी दिखने वाली चीजें, अंगूर और खरबूजे भी नहीं थे. लेकिन यहां के वन्यजीवों ने उनका ध्यान खींचा और उनकी भूख भी बढ़ाई. बाबर ने अपने लेखों में “खरचल” यानी बस्टर्ड के मांस को “स्वादिष्ट और बेहतरीन” बताया.
कई सदियों बाद ह्यूम और मार्शल की राय इससे अलग थी. उन्होंने बस्टर्ड के पंखों को “बेहद खूबसूरत, महीन धारियों वाला और शिकार किए जाने वाले पक्षियों जैसा” बताया, लेकिन कहा कि इसका मांस खाने की मेज पर परोसे जाने वाले किसी खास पकवान जैसा बिल्कुल नहीं था.
स्वाद को अलग रखते हुए ह्यूम ने इसे “शिकारियों के लिए पीछा करने लायक इनाम” बताया. और शिकारियों ने इसका पीछा किया भी, वह भी बिना किसी रोक-टोक के.
ह्यूम और मार्शल ने लिखा कि पंजाब में स्थानीय शिकारी कंबल ओढ़कर चुपचाप पक्षियों के करीब पहुंचते थे. उनकी कमर पर आंतों से बनी फंदे वाली रस्सियां बंधी होती थीं. यूरोपीय शिकारियों के अपने तरीके थे. वे राइफल लेकर चलते, छिपकर पक्षियों का पीछा करते और सही समय पर गोली चलाते.
ह्यूम और मार्शल के मुताबिक, सिंध में एस. डोइग नाम के एक शिकारी ने रेत के टीलों के पास 34 बस्टर्ड देखे थे. वह चुपचाप खड़ा रहा और फिर अचानक पक्षियों के झुंड के बीच पहुंच गया. उसने लगातार दो दिशाओं में आसानी से गोली चलाई और एक तिहाई पक्षियों को घायल कर दिया.
मालेगांव के पास जे.ई. जेम्स एक ऊंचे ज्वार के खेत में पहुंचे और वहां से उड़ते हुए आठ बस्टर्ड को गोली मार दी. वे पक्षी तीतरों की तरह उड़कर ऊपर आए थे.
वरिष्ठ पक्षी विशेषज्ञ असद रहमानी ने दिप्रिंट को बताया, “मैन्सफील्ड नाम का एक शिकारी था. उसने सिर्फ अहमदाबाद जिले में दो साल के भीतर 960 बस्टर्ड मार डाले थे.”
नाम का असर
तो दोनों पक्षी भारतीय पहचान, कद-काठी और इतिहास की कसौटी पर खरे उतरते थे. फिर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड मोर से क्यों हार गया?
1950 और 1960 के दशक में भारत एक नया और गरीब देश था, जो दुनिया में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था. उस समय देश की छवि बहुत मायने रखती थी.
चिंतन एनवायरनमेंटल रिसर्च एंड एक्शन ग्रुप की संस्थापक भारती चतुर्वेदी ने दिप्रिंट से कहा, “जब हम दुनिया के सामने अपने देश की छवि पेश कर रहे थे, तब खूबसूरती और दिखावे को लेकर भी काफी सोच-विचार किया जा रहा था. हम एक नई पहचान बनाना चाहते थे.”
मोर शान और भव्यता दिखाता था. वहीं, बस्टर्ड का नाम उतना आकर्षक नहीं था और उसके गलत उच्चारण का खतरा भी था. लेकिन शेक्सपियर ने पूछा था, “नाम में क्या रखा है?” चतुर्वेदी ने कहा कि भारत इस पक्षी के लिए उसके स्थानीय नाम ‘गोडावण’ का इस्तेमाल भी कर सकता था.
बस्टर्ड के सबसे बड़े समर्थक मशहूर पक्षी विशेषज्ञ सलीम अली थे. उनके लिए राष्ट्रीय पक्षी चुनने का मतलब था “लोगों का ध्यान किसी ऐसे खास पक्षी की ओर खींचना, जिसे संरक्षण की सबसे ज्यादा जरूरत है”. उस समय बस्टर्ड के विलुप्त होने का खतरा बढ़ रहा था.
अली ने कहा था, “बस्टर्ड एक बड़ा और शानदार पक्षी है, जो भारत का मूल निवासी है. इसकी संख्या तेजी से घट रही है. इसकी वजह शिकारियों की अंधाधुंध गोलीबारी और इसके प्राकृतिक ठिकानों पर कब्जा होना है.”
उनकी आखिरी चेतावनी थी कि इस पक्षी को आने वाले विनाश से बचाया जाए. इसके लिए पूरे देश में प्रयास करने की जरूरत थी.
1963 में मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया गया.
क्या राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा मिलने से बस्टर्ड बच जाता? शायद नहीं. लेकिन जैसे-जैसे इसकी संख्या घटती गई, सलीम अली की बातें ऐसी भविष्यवाणी की तरह गूंजती रहीं, जिसे अनसुना कर दिया गया और जो आखिरकार सच साबित हुई.
कागजों पर संरक्षण
इसके बाद धीरे-धीरे एक बड़ी त्रासदी सामने आई. न तो देशभर में कोई बड़ा विरोध हुआ और न ही इसे बचाने के लिए कोई बड़ा अभियान चलाया गया. इसकी संख्या चुपचाप और तेजी से गिरती चली गई.
1971 में भावनगर के पूर्व राजकुमार आर.एस. धर्मकुमारसिंहजी ने उस दशक का एक अहम अध्ययन प्रकाशित किया. इसके मुताबिक, 1969 में सिर्फ 1,260 बस्टर्ड बचे थे.
इसके बाद वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 आया, जिसने इस पक्षी को कानूनी सुरक्षा दी. कई दशकों से बिना रोक-टोक हो रहे शिकार, इसके ठिकानों के खत्म होने और संयुक्त राष्ट्र के मानव पर्यावरण सम्मेलन की ओर से उठाए गए मुद्दे के बीच ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को इस कानून की अनुसूची-I के तहत सबसे ऊंचे स्तर की सुरक्षा दी गई.
क्या यह एक मजबूत सुरक्षा कवच था? हां. लेकिन इसके बावजूद पक्षियों की संख्या लगातार घटती रही.
एक दशक से भी कम समय बाद, WWF-India की 2012 की एक रिपोर्ट ने इस गिरावट का ब्योरा दिया. 1978 तक इनकी संख्या घटकर 745 रह गई थी. सदी बदलने तक सिर्फ 600 पक्षी बचे थे.
इसके अगले ही साल प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ. इसे बड़े स्तर पर प्रचार मिला, खूब पैसा मिला और दुनिया भर में इस पर ध्यान दिया गया. लेकिन डॉ. रहमानी के मुताबिक, भारत “बाघों पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देने वाला देश” बना रहा.
उन्होंने कहा, “बस्टर्ड बड़े इलाके और छोटी घास वाले मैदानों में रहने वाला पक्षी है.” लेकिन इन मैदानों को जोता जा रहा था या विकास के नाम पर उन पर कब्जा किया जा रहा था.
डॉ. रहमानी के मुताबिक, भारत में पाई जाने वाली दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियां प्रोजेक्ट टाइगर के इलाकों में नहीं पाई जाती हैं. उनके रहने की जगहें दूसरी जगहों पर हैं, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता.
जब बस्टर्ड लगातार गायब हो रहे थे, तब 1978-79 की सर्दियों में यह पक्षी भारत की तेल कूटनीति के एक बड़े विवाद में फंस गया.
26 जनवरी 1979 को, जब भारत गणतंत्र दिवस मना रहा था, तब द वॉशिंगटन पोस्ट में एक अजीब शीर्षक छपा: “क्या ग्रेट बस्टर्ड भारत और अरब देशों के रिश्तों को नुकसान पहुंचाएगा?”
अरब देश, तेल और बस्टर्ड
यह घटना 1978-79 के वैश्विक तेल संकट के चरम दौर में हुई. बस्टर्ड के शिकार ने कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया. दिल्ली की सड़कों पर लोग नारे लगा रहे थे, “बस्टर्ड नहीं, कस्टर्ड खाओ.” मुंबई और जयपुर में भी विरोध प्रदर्शन हुए.
अचानक मामला बस्टर्ड और तेल के बीच मुकाबले जैसा बन गया. दांव इतने बड़े थे कि विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दिल्ली से जैसलमेर जाना पड़ा, जहां उन्होंने शाही अरब शिकारियों के दल से मुलाकात की.
सर्दियों का मौसम था और अरब देशों के शाही मेहमान राजस्थान के थार रेगिस्तान पहुंचे. उनके साथ 87 सहायक, 27 गाड़ियां, शिकार के लिए प्रशिक्षित बाजों का एक झुंड और नई दिल्ली से मिला आधिकारिक शिकार परमिट भी था.
इन मेहमानों में सऊदी अरब के राजा खालिद के रिश्तेदार प्रिंस बंदर बिन मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान भी शामिल थे. द वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, राजस्थान सरकार ने पांच दिन की इस शिकार यात्रा को “जितना हो सके उतना आरामदायक बनाने” की व्यवस्था की थी.
हालांकि, यह कोई अकेली शाही यात्रा नहीं थी. पांच सर्दियों तक अरब देशों के कई बड़े नेता भारत आकर शिकार करते रहे थे. इनमें संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख जायद बिन सुल्तान अल नाहयान और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस फहद भी शामिल थे.
अनुमान है कि इस दौरान करीब 2,400 दुर्लभ शिकार योग्य पक्षियों को मार दिया गया था. यह सब चुपचाप होता रहा, जब तक कि मीडिया को इसकी भनक नहीं लग गई.
28 दिसंबर 1978 को द टाइम्स ऑफ इंडिया ने खबर दी, “पता चला है कि राजकुमार बस्टर्ड का शिकार करना चाह सकते हैं, जबकि यह एक संरक्षित प्रजाति है.”
इससे ठीक एक महीने पहले अखबार ने खबर दी थी कि एक अरब राजकुमार ने कथित तौर पर जैसलमेर में 75 बस्टर्ड मारे थे.
उस समय राजस्थान वन्यजीव बोर्ड के सदस्य हर्ष वर्धन के लिए यह कई सालों से चल रही लड़ाई थी.
वर्धन ने बताया कि जब उन्होंने पहली बार राज्य के राजस्व मंत्री के सामने यह मुद्दा उठाया, तो उनसे कहा गया, “बेहतर होगा कि चुप रहो. वे सरकार के मेहमान हैं. तुम कौन होते हो इसका विरोध करने वाले?”
लेकिन अगले साल जब अरब देशों के मेहमान दोबारा आए, तो इस बार कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर विरोध किया.
हाथों में बैनर लेकर और स्थानीय बिश्नोई तथा जैन समुदायों के समर्थन से प्रदर्शनकारियों ने 31 दिसंबर 1978 को “सेव बस्टर्ड रैली” निकाली. वे सीधे राज्यपाल के आवास तक पहुंचे.
हालांकि, राज्यपाल ने उन्हें बगल में स्थित मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत के आवास पर जाने को कहा. मुख्यमंत्री ने क्या जवाब दिया? उन्होंने कहा कि दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से मिलिए.
वर्धन ने दिप्रिंट को बताया कि शेखावत ने कहा था, “यह उनका फैसला है, मेरा नहीं.”
जल्द ही यह आंदोलन राजस्थान से बाहर भी फैल गया.
2 जनवरी 1979 को हिंदुस्तान टाइम्स ने बताया कि WWF-India और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने सरकार के इस कदम को “कानून का उल्लंघन करने का बेहद निंदनीय काम” बताया.
दिल्ली में स्कूली बच्चे सड़कों पर उतर आए. वे नारे लगा रहे थे, “बस्टर्ड नहीं, कस्टर्ड खाओ” और “पक्षियों के लिए हमारी हथेलियों पर तेल मत लगाओ.”
मार्च तक इंडियन एक्सप्रेस ने खुलासा किया कि एक अरब राजकुमार ने गुजरात में मैक्वीन बस्टर्ड का शिकार किया था. गुजरात के वन मंत्री चंदुभाई देसाई ने दावा किया कि विधायक जयदीपसिंहजी ऑफ बारिया के मेहमान उस राजकुमार ने सिर्फ कुछ तीतरों और एक खरगोश का शिकार किया था.
23 अप्रैल तक यह विवाद संसद पहुंच गया. सांसद हुकुम चंद कछवाय और छितुभाई गामित ने लिमडी-भावनगर के पास छह बस्टर्ड को गोली मारने की खबरों पर जवाब मांगा.
कृषि मंत्री सुरजीत सिंह बरनाला ने माना कि भारत ने “खाड़ी देशों के कुछ बेहद महत्वपूर्ण लोगों को सीमित स्तर पर छोटे बस्टर्ड का शिकार करने की अनुमति दी थी”. उन्होंने बताया कि दिसंबर 1974 से जनवरी 1979 के बीच शिकार के ऐसे 14 दल आए थे.
इसके पीछे वजह बताई गई, “इन देशों के साथ भारत के संबंधों और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना.”
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू होने के दो साल बाद. प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के एक साल बाद. और फिर भी “राष्ट्रीय हित” के नाम पर शिकार के परमिट दिए जा रहे थे.
कछवाय ने पलटकर सवाल किया, “क्या शिकार करना ही अच्छे रिश्तों की असली कसौटी है? और अगर उन्हें शिकार करने की अनुमति नहीं दी जाए, तो क्या इससे रिश्ते खराब हो जाएंगे?”
इस बहस में पूर्व राजपरिवार के सदस्य और राजनेता डॉ. करण सिंह भी शामिल हुए. उन्होंने कहा, “हम अच्छे अंतरराष्ट्रीय संबंध बनाए रखने की जरूरत पर सवाल नहीं उठा रहे हैं. लेकिन आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि गोडावण को मारा न जाए, क्योंकि यह दुनिया के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक है.”
हालांकि, बरनाला ने अपनी बात पर जोर दिया कि किसी भी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को नहीं मारा गया था. उनका दावा था कि विदेशी मेहमानों को शिकार के नियमों के बारे में सख्त निर्देश दिए गए थे.
नई दिल्ली के सामने सवाल
तो क्या उस सर्दी में बस्टर्ड मारे गए थे?
डॉ. रहमानी ने कहा कि बाजों को छोटे हुबारा बस्टर्ड का शिकार करने के लिए प्रशिक्षित किया गया था. यह पक्षी सर्दियों में राजस्थान आता है. इसके मुकाबले ग्रेट इंडियन बस्टर्ड काफी बड़ा होता है और बाजों के लिए उसका शिकार करना मुश्किल है.
लेकिन वर्धन को अब भी इस बात पर शक है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “शेख मुख्य रूप से हुबारा का शिकार करने आते थे. लेकिन कौन जानता है कि वे इसके अलावा और किसका शिकार कर रहे थे?” उन्होंने कहा कि इन मेहमानों को सरकार का समर्थन हासिल था और उनके पास बंदूकें भी थीं.
जब कार्यकर्ताओं ने जोधपुर हाई कोर्ट में याचिका दायर की, तो बाजों से शिकार करने को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया.
लेकिन नई दिल्ली मुश्किल में फंस गई थी. भारत मध्य पूर्व से कच्चे तेल की आपूर्ति और खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर काफी निर्भर था. 1973 के तेल प्रतिबंध और 1979 के ईरान के तेल संकट के बीच इन देशों के साथ संबंधों को खतरे में डालना आसान नहीं था.
कुछ ही दिनों के भीतर विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जैसलमेर पहुंचे. उन्होंने शाही “मेहमानों” से अदालत के आदेश का पालन करने को कहा.
इस बड़े विवाद ने आखिरकार नई दिल्ली को कदम उठाने पर मजबूर कर दिया. इस मामले ने पहली बार गोडावण को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा के केंद्र में ला दिया.
राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में अभयारण्य बनाए गए. 1981 में राजस्थान ने इसे अपना राज्य पक्षी घोषित कर दिया.
डॉ. रहमानी ने कहा, “इन पक्षियों पर बहुत ज्यादा ध्यान दिए जाने के कारण उनकी संख्या में थोड़ी स्थिरता आई.” घास के मैदानों में इनका प्रजनन फिर से बढ़ने लगा. उम्मीद की एक किरण दिखाई दी.
लेकिन जैसे-जैसे सदी आगे बढ़ी, बस्टर्ड फिर से गायब होने लगे. इस बार उनका घर ही उनके हाथ से निकल रहा था.
पुराने दुश्मन और नए खतरे
असद रहमानी ने अपनी किताब व्हेयर हैव द बर्ड्स गॉन? में बताया कि 1990 के दशक में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड छह राज्यों में अब भी पाए जाते थे. ये राज्य थे राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश. 2011 तक इनकी संख्या घटकर सिर्फ 296 रह गई.
वन्यजीव जीवविज्ञानी सुमित डूकिया ने दिप्रिंट से कहा, “अपने 30 साल के अनुभव में मैंने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की संख्या में भारी गिरावट देखी है. पश्चिमी राजस्थान में भी इनकी संख्या बहुत कम हुई है.”
2018 तक देश में इनकी कुल संख्या घटकर करीब 150 रह गई थी. इनमें से 128 पक्षी पश्चिमी राजस्थान के दो इलाकों में थे: डेजर्ट नेशनल पार्क और पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज.
इन आंकड़ों के पीछे एक ऐसी गंभीर सच्चाई छिपी है, जिस पर ध्यान नहीं दिया गया.
रहमानी ने तीन या चार पक्षियों के इन छोटे समूहों को “पारिस्थितिकी के लिहाज से मृत आबादी” कहा. बस्टर्ड लंबे समय तक जीवित रहते हैं. इसलिए प्रजनन की संभावना खत्म होने के बाद भी वे कई साल तक जिंदा रह सकते हैं. इससे ऐसा भ्रम पैदा होता है कि प्रजाति अब भी अपना अस्तित्व बनाए हुए है.
लेकिन क्या नन्नाज में अकेली बची एक मादा या रोलापाडु में मौजूद दो पक्षी इस खत्म होती प्रजाति को बचा सकते हैं?
राजस्थान ने 2013 में प्रोजेक्ट बस्टर्ड शुरू किया. इसके बाद 2016 में नई दिल्ली ने CAMPA के फंड से राष्ट्रीय प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड शुरू किया. इसके बावजूद इनकी संख्या में गिरावट जारी रही.
इसका एक कारण पुराना दुश्मन था: इनके रहने की जगहों का खत्म होना.
दशकों तक इन सुनहरे घास के मैदानों को बेकार जमीन कहकर नजरअंदाज किया गया. अब इन पर हाईवे, बड़े औद्योगिक फार्म और दूर-दूर तक फैले सोलर पावर प्लांट बनाए जा रहे हैं.
दूसरे पक्षियों की तरह, जो जटिल घोंसले बनाते हैं या पेड़ों के खोखले हिस्सों में छिप जाते हैं, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की मादा खुले मैदान की मिट्टी पर सिर्फ एक अंडा देती है और अकेले उसकी रक्षा करती है.
खुले में रखा यह अंडा आवारा कुत्तों के झुंडों के लिए आसानी से मिलने वाला भोजन बन जाता है. यही खतरा गिर के एशियाई शेरों के लिए भी है.
एक अंडा खोने का मतलब पूरे प्रजनन मौसम को खो देना हो सकता है.
चतुर्वेदी ने कहा, “हमें इनकी आबादी को संभालने के लिए ऐसे तरीके खोजने होंगे, जिनसे जानवरों को नुकसान न पहुंचे.” उन्होंने नसबंदी और वन्यजीवों के साथ टकराव कम करने की दूसरी रणनीतियों का सुझाव दिया.
जैसे-जैसे इनके रहने की जगह खत्म होती गई, बची हुई जमीन भी इनके लिए अनजान और बदली हुई दुनिया बनती गई.
भारत के ऊर्जा बदलाव से पैदा हुआ टकराव
थार रेगिस्तान में दूर-दूर तक पवन चक्कियां दिखाई देने लगीं और हाई-वोल्टेज बिजली की तारें इस पक्षी के आखिरी ठिकाने से होकर गुजरने लगीं.
भारत में स्वच्छ ऊर्जा की क्रांति तेजी से आगे बढ़ रही थी. लेकिन दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक के लिए इसमें एक ऐसा खतरा छिपा था, जिस पर ध्यान नहीं दिया गया.
बस्टर्ड की आंखें सिर के दोनों तरफ होती हैं, ताकि वह दूर तक देख सके. लेकिन इसकी वजह से वह अपने ठीक सामने मौजूद तारों को नहीं देख पाता. इसका भारी शरीर अचानक दिशा बदलने में भी मुश्किल पैदा करता है. हर उड़ान उसकी जिंदगी के लिए एक जुआ बन जाती है.
टूटा हुआ पंख या कोई गंभीर चोट उसके लिए मौत का कारण बन सकती है.
हर साल औसतन 18 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड बिजली की इन तारों से टकराकर मर जाते हैं. जब कुल पक्षियों की संख्या सिर्फ 100 से 120 रह गई हो, तो हर मौत बहुत बड़ा नुकसान है. सभी पक्षी प्रजातियों को मिलाकर यह संख्या हर साल लगभग 88,000 है.
इन मौतों को रोकने के लिए वन्यजीव संरक्षणकर्ता एम.के. रंजीतसिंह ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.
19 अप्रैल 2021 को एम.के. रंजीत सिंह बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पक्षियों के अहम ठिकानों के 99,000 वर्ग किलोमीटर इलाके में व्यापक प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया. इसमें बिजली की तारों को जमीन के नीचे बिछाना और पहले से लगी तारों पर पक्षियों को उनसे टकराने से बचाने वाले उपकरण लगाना शामिल था.
इसके बाद संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा के बीच जोरदार टकराव शुरू हो गया.
विशाल रेगिस्तानी इलाकों में बिजली की तारों को जमीन के नीचे बिछाना तकनीकी रूप से मुश्किल और महंगा था. इससे भारत के स्वच्छ ऊर्जा अभियान पर भी असर पड़ सकता था. इसलिए सरकार और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने इस फैसले का विरोध किया.
21 मार्च 2024 को भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने इस बड़े सवाल को स्वीकार किया. उन्होंने कहा, “स्वच्छ पर्यावरण के बिना, जो स्थिर हो और जलवायु परिवर्तन के उतार-चढ़ाव से प्रभावित न हो, जीवन के अधिकार को पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सकता.”
उन्होंने कहा कि “ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का संरक्षण किसी भी हालत में समझौते के लायक नहीं है”. लेकिन इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन से बचाव की जरूरत के बीच संतुलन बनाना भी जरूरी है.
हालांकि, जमीन पर अब तक बहुत कम बदलाव हुआ है.
रंजीतसिंह ने दिप्रिंट से कहा, “क्या बिजली की तारें जमीन के नीचे चली गई हैं? नहीं. तो क्या यह अदालत की अवमानना नहीं है?” उन्होंने कहा कि अब तक एक बड़ा नतीजा यह रहा है कि नई बिजली की तारें नहीं बिछाई गई हैं.
उन्होंने कहा कि उनकी लड़ाई विकास के खिलाफ नहीं है. न ही वह इस कल्पना में जी रहे हैं कि इस पक्षी की संख्या पहले जैसी बहुत ज्यादा हो जाएगी.
उन्होंने कहा, “ऐसा सोचना सिर्फ इच्छा करना है.”
उन्होंने कहा, “हम बिजली की तारें बिछाने से रोकने की मांग नहीं कर रहे हैं. हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि उन्हें जमीन के नीचे बिछाया जाए. सड़कें जरूरी हैं. हम सिर्फ इतना कहते हैं कि उनका रास्ता बदल दिया जाए.”
जंगल में दोबारा बसाने की कोशिश
कई दशकों तक ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की कहानी पीछे हटने की रही है. पक्षियों की संख्या कम होती गई, घास के मैदान सिकुड़ते गए और खुले आसमान में इनकी मौजूदगी घटती गई.
लेकिन आज इस कहानी में एक नया मोड़ आया है. अब इनके बचने की एक कमजोर, लेकिन उम्मीद जगाने वाली संभावना दिखाई दे रही है.
डूकिया ने बताया कि अबू धाबी के इंटरनेशनल फंड फॉर हुबारा कंजर्वेशन के विशेषज्ञों की मदद से वैज्ञानिकों ने जंगली बस्टर्ड के अंडे इकट्ठा करना, उन्हें मशीनों से सेना और चूजों को पालकर बड़ा करना सीखा.
अब करीब 98 बस्टर्ड कैद में रह रहे हैं. डूकिया के मुताबिक, पहले योजना थी कि इन पक्षियों को करीब 30 साल बाद जंगल में छोड़ा जाएगा. लेकिन काम में उम्मीद से ज्यादा तेजी आई है.
4 अक्टूबर 2026 को इन दो पक्षियों की ऐतिहासिक उड़ान पर खुशी जताते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और जमीन पर काम करने वाले कर्मचारियों की “करीब एक दशक से जारी लगातार मेहनत” की तारीफ की. उन्होंने कहा कि ये सभी लोग ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को राजस्थान के रेगिस्तानों में दोबारा बसाने के लिए काम कर रहे हैं.
प्रजनन केंद्रों के अंदर हर दिन एक शांत और खास दिनचर्या चलती है.
रेगिस्तान की तेज गर्मी में सफेद सुरक्षात्मक सूट पहने युवा शोधकर्ता घंटों तक बिना हिले-डुले खड़े रहते हैं. वे पक्षियों के व्यवहार को दर्ज करते हैं और उनके लिए खास भोजन तैयार करते हैं. इसमें ताजे तरबूज, जंगली काचरी, कीड़े और झींगुर शामिल हैं. इनमें से कुछ कीड़ों को शोधकर्ताओं की टीम खुद पालती है.
रहमानी ने बताया कि लक्ष्य हर साल 20 से 30 पक्षियों को जंगल में छोड़ना है. आखिरकार इन्हें महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश में भी दोबारा बसाने की योजना है.
लेकिन इन पक्षियों को एक राज्य से दूसरे राज्य में ले जाना ही उन्हें दोबारा बसाने के लिए काफी नहीं है. डूकिया के मुताबिक, संरक्षण से जुड़ी राजनीति के कारण कोई राज्य उस प्रजाति को दूसरे राज्य को देने से हिचक सकता है, जिसे वह अपनी खास पहचान मानता है.
इसके अलावा, कोई भी प्रजनन कार्यक्रम नए घास के मैदान नहीं बना सकता. इस पक्षी का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उस पूरे पर्यावरण को बचाया जाए, जहां यह प्रजाति विकसित हुई है और रहने के लिए अनुकूल हुई है.
रहमानी ने कहा, “बस्टर्ड को हमेशा संरक्षण की जरूरत रहेगी. और संरक्षण का काम कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता.”
थार रेगिस्तान में लौटें, तो वे दोनों पक्षी एक-दूसरे से सटकर खड़े थे. उनकी चोंच बंधी हुई थीं. दोनों ग्रेट इंडियन बस्टर्ड एक अनजानी दुनिया को देख रहे थे.
फिर उन्हें आजाद करने का समय आया.
पहला पक्षी आगे की ओर उछला, कुछ देर रुका और चारों ओर देखने लगा. उसकी आंखें जैसे कुछ तलाश रही थीं. दूसरा पक्षी कुछ देर हिचकिचाया और फिर आगे बढ़ने का फैसला किया.
इसके बाद पंख फड़फड़ाए. कुछ अनिश्चित उड़ानें भरीं. और अचानक जैसलमेर के नारंगी आसमान में दो परछाइयां दिखाई देने लगीं.
कैद में पाले गए ये दोनों नर पक्षी अब एक ऐसी दुनिया में घूम रहे हैं, जो उनके लिए विशाल, अनजान और पूरी तरह जंगली है.
उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं है कि उनके पंखों के साथ कितनी बड़ी उम्मीदें जुड़ी हुई हैं. लेकिन वे अपने साथ रेत के टीलों के पार एक और भी कीमती चीज लेकर जा रहे हैं. वह है उम्मीद की एक छोटी-सी किरण.
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