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Friday, 16 October, 2026
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कांग्रेस की नई पसंद नेहा बोरा के उभार के कमजोर पड़ते वाम दलों के लिए क्या मायने हैं?

बोरा सीपीआई (एमएल) लिबरेशन की छात्र इकाई AISA की अध्यक्ष हैं, जिसकी विश्वविद्यालयों की राजनीति में मौजूदगी बनी हुई है, जबकि वाम दल व्यापक चुनावी आधार बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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नई दिल्ली: छात्र-युवा आंदोलन ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया है. 12 अक्टूबर को, जब इंडिया ब्लॉक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च कर रहा था, तब कांग्रेस नेता राहुल गांधी कैमरों और प्रदर्शनकारियों की भीड़ से बोरा को बचाते हुए दिखाई दिए. इस पल से पता चला कि छात्र नेता की पहचान कैंपस की राजनीति से कितनी आगे बढ़ चुकी है.

वाम दलों के लिए जिनका चुनावी आधार तेज़ी से घट रहा है, जबकि उनके छात्र संगठन विश्वविद्यालय परिसरों में सक्रिय बने हुए हैं, बोरा का उभार एक सवाल खड़ा करता है: क्या यह आंदोलन उन्हें खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने में मदद कर सकता है?

इंडिया ब्लॉक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने से पहले ही वाम दल और उनके छात्र संगठन ग्राउंड पर लोगों को जुटा रहे थे. उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) जैसे समूहों को भी समर्थन दिया. इंडिया ब्लॉक की प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी को बोरा से अन्य वरिष्ठ नेताओं से पहले बोलने के लिए कहते हुए भी देखा गया.

कांग्रेस के नेताओं ने भी उनके उभरने पर ध्यान दिया है. कांग्रेस के एक नेता ने दिप्रिंट को बताया कि राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा दोनों बोरा को पसंद करते हैं और उन्हें उनमें ऐसी कई खूबियां दिखती हैं, जिन्हें वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं में महत्व देते हैं.

कांग्रेस नेता ने कहा, “प्रियंका और राहुल नेहा को बहुत पसंद करते हैं. उनमें ऐसी बहुत सी खूबियां हैं, जो उन्हें पसंद हैं. कांग्रेस को हमेशा से वामपंथी छात्र पसंद रहे हैं, क्योंकि उनका जमीन से अच्छा जुड़ाव होता है.”

‘एक बड़ा गठबंधन’

बोरा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आईसा) की अध्यक्ष हैं, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन की छात्र इकाई है. आईसा की विश्वविद्यालयों की राजनीति में मौजूदगी बनी हुई है, खासकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में, जबकि वाम दल अपने व्यापक चुनावी आधार को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

नवंबर 2025 में हुए जेएनयू छात्र संघ चुनाव में आईसा, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई), जो सीपीआई (एम) की छात्र इकाई है और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन (डीएसएफ) के गठबंधन ने केंद्रीय पैनल के सभी चार पद जीत लिए. आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली में मार्च 2025 में एसएफआई ने छात्र परिषद की 45 में से 24 सीटें जीतीं, जबकि आईसा ने छह सीटें जीतीं. हैदराबाद विश्वविद्यालय में सितंबर 2026 में एक बड़े वाम-आंबेडकरवादी गठबंधन ने केंद्रीय पैनल में जीत हासिल की, जिसमें आईसा ने संयुक्त सचिव का पद और पार्षद की दो सीटें जीतीं.

सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य का कहना है कि बोरा का उभार और व्यापक आंदोलन इंडिया ब्लॉक को चुनावी गठबंधन से आगे ले जाकर आंदोलनों के मंच में बदलने का मौका देता है.

भट्टाचार्य ने दिप्रिंट से कहा, “इंडिया ब्लॉक एक चुनावी गठबंधन बना रहा है. हम हमेशा चाहते थे कि इसे आंदोलनों से जोड़ा जाए. हम चाहते थे कि यह ब्लॉक हमेशा विरोध और संघर्ष पर आधारित हो. अब ऐसा होना शुरू हो गया है.”

उनके अनुसार, 12 अक्टूबर का मार्च राजनीतिक दलों, नागरिक समाज संगठनों और युवाओं के बड़े स्तर पर एक साथ आने को दिखाता है.

उन्होंने कहा, “यह मार्च सिर्फ इंडिया ब्लॉक का मार्च नहीं था. यह एक बड़े गठबंधन को दिखाता है. हम ज्यादा राजनीतिक दलों, नागरिक समाज संगठनों और नई पीढ़ी के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं.”

भट्टाचार्य का कहना है कि वह इस आंदोलन को सिर्फ चुनावी फायदे के नज़रिए से नहीं देख रहे हैं. उनका कहना है कि तत्काल चिंता खुद चुनावी प्रक्रिया को लेकर थी.

उन्होंने कहा, “अगर इसका असर चुनावों में दिखाई देता है, तो संतुलन बदल जाएगा. यह पीढ़ी बदलाव चाहती है और इसे बदलने में नेहा की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, लेकिन सबसे पहले चुनावी प्रक्रिया को बदलने की जरूरत है.”

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने बोरा से बात की है, भट्टाचार्य ने कहा कि वह पार्टी के संपर्क में बनी हुई हैं.

उन्होंने कहा, “नेहा हमारे संपर्क में है. वह सिर्फ छात्र नेता ही नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यकर्ता भी है.”

हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक चंद्रचूड़ सिंह का मानना है कि कांग्रेस और वाम दलों के बीच यह साथ आना चुनावी तौर पर वाम दलों के लिए फायदेमंद नहीं हो सकता.

सिंह ने दिप्रिंट से कहा, “वाम दल हमेशा से इस तरह की आंदोलन और सड़क पर उतरने वाली राजनीति करते रहे हैं. और अगर कांग्रेस अब इस दायरे में वापस आ रही है, तो जाहिर तौर पर दोनों के बीच तालमेल होगा.”

उन्होंने वाम दलों की छात्र राजनीति से नेताओं के कांग्रेस में जाने के एक पैटर्न की ओर इशारा किया. उन्होंने 2021 में कांग्रेस में शामिल हुए कन्हैया कुमार का उदाहरण दिया.

उन्होंने कहा, “एसएफआई और आईसा से हमेशा काफी संख्या में नेता कांग्रेस में गए हैं. विश्वविद्यालय स्तर पर, खासकर जेएनयू में, वाम दलों की कुछ मौजूदगी है. लेकिन वाम दलों की राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदगी नहीं है और न ही उनके पास राष्ट्रीय स्तर की कोई संभावना है. इसलिए कांग्रेस के साथ उनका स्वाभाविक तालमेल बन सकता है.”

सिंह ने कहा कि अगर बोरा आगे चलकर कांग्रेस में शामिल हो जाएं तो उन्हें हैरानी नहीं होगी. उन्होंने कहा, “यह कोई असामान्य बात नहीं होगी.”

वाम दलों से कांग्रेस में छात्र नेताओं का जाना कोई नई बात नहीं है. कई पूर्व छात्र कार्यकर्ता आगे चलकर कांग्रेस के पूरे राजनीतिक तंत्र के साथ काम कर चुके हैं, जिसमें राजनीतिक संचार, चुनाव प्रचार का प्रबंधन और सोशल मीडिया का काम शामिल है. कैंपस में लोगों को जुटाने और राजनीतिक संगठन चलाने का उनका अनुभव भी उन्हें उस पार्टी के लिए उपयोगी बनाता है, जो युवा मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश कर रही है.

वाम दलों की मुश्किलें

सीपीआई (मार्क्सवादी), सीपीआई, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने मिलकर 2004 में लोकसभा की 59 सीटें जीती थीं. इनकी कुल सीटें 2009 में घटकर 24, 2014 में 11 और 2019 में छह रह गईं. 2024 में यह संख्या बढ़कर नौ हो गई.

सीपीआई (एम), जिसने 2004 में 43 सीटें जीती थीं, 2024 में घटकर चार सीटों पर आ गई. इस दौरान उसका वोट शेयर 5.66 प्रतिशत से घटकर 1.78 प्रतिशत रह गया. सीपीआई की सीटें 2004 में 10 और 1.41 प्रतिशत वोट शेयर से घटकर 2024 में दो सीट और 0.49 प्रतिशत वोट शेयर रह गईं. सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने 2024 में दो लोकसभा सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 0.27 प्रतिशत रहा, जबकि आरएसपी ने एक सीट जीती.

सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने बिहार में अपनी पकड़ बनाए रखी है और 2024 में लोकसभा की दो सीटें जीतीं. हालांकि, विधानसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा. पार्टी ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में लड़ी गई 20 सीटों में से सिर्फ दो सीटें जीतीं. 2020 में उसने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इनमें से 12 सीटें जीती थीं. वाम दलों को पश्चिम बंगाल में भी अपनी खोई जमीन वापस पाने में मुश्किल हुई है. पश्चिम बंगाल में 34 साल तक लेफ्ट फ्रंट के शासन के बाद 2011 में वाम दलों ने सत्ता खो दी थी. वहीं, केरल में भी चुनावी स्थिति बदलती रही है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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