सबसे पहले मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि यह लेख मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और उनके साथ काम कर रहे चुनाव आयुक्तों सुखबीर संधू और विवेक जोशी के पक्ष या विरोध में नहीं है. ये तीनों भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में मेरे साथ काम कर चुके हैं. गौर करने वाली बात यह है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिए मतदाता सूचियों को ‘साफ’ करने की चुनाव आयोग की कोशिशों ने देश में राजनीतिक राय को पहले से कहीं ज्यादा बांट दिया है. इस विवाद को और बढ़ाने वाली बात यह है कि अखबारों में ऐसी खबरें छपी हैं कि तीनों चुनाव आयुक्त कुछ अहम मुद्दों पर एकमत नहीं थे. इसके अलावा, 2023 के चुनाव आयोग नियुक्ति कानून को भी चुनौती दी गई है.
सत्ताधारी पार्टी और मीडिया में उसके कई समर्थकों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के कदमों का बचाव किया है. वहीं, विपक्ष और कई दूसरे अखबारों ने भी उनकी आलोचना में कोई कमी नहीं छोड़ी है. अब मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है. मीडिया ने हमेशा हमें अलग-अलग और कई बार एक-दूसरे के विरोध में राय दी है. यही बात उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनाती है, लेकिन चिंता की बात यह है कि इस मामले ने नौकरशाही के पूर्व अधिकारियों, उच्च न्यायपालिका, कानूनी विशेषज्ञों और न्यायविदों को अलग-अलग खेमों में बांट दिया है.
एक पूर्व सॉलिसिटर जनरल ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर ध्यान दिया है और हमें उसके फैसले का इंतज़ार करना चाहिए. वहीं, न्यायपालिका से जुड़े कुछ दूसरे बड़े नामों ने फैसला आने से पहले ही मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. मेरे कैडर, बैच, स्कूल, कॉलेज, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), पूर्व सिविल सेवा अधिकारियों के समूह और मेरे कलीग्स भी इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं. मैंने पूर्व सिविल सेवा अधिकारियों मदन गोपाल और भास्वती मुखर्जी के एक खुले पत्र में चुनाव आयोग के बचाव को दिलचस्पी से पढ़ा है. इसके जवाब में केबीएस सिद्धू ने भी उतनी ही मजबूती से अपनी बात रखी है.
पिछले कुछ दिनों में मुझे ऐसी कई जानकारियां मिली हैं, जिनमें कहा गया है कि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय वह नवीन चावला के मुकाबले निश्चित रूप से कम विवादित थे. चावला को 1979 में शाह आयोग ने दोषी ठहराया था. इसके बावजूद उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था. आम चुनाव से ठीक पहले तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चावला पर कथित राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाते हुए उन्हें चुनाव आयुक्त के पद से हटाने की खास तौर पर सिफारिश की थी. उस समय संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने इस सिफारिश को खारिज कर दिया था.
इसके अलावा, चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच आपसी खींचतान न तो पहली बार हुई है और न ही कोई अनोखी बात है. टी.एन. शेषन का अपने साथी एम.एस. गिल और जी.वी.जी. कृष्णमूर्ति के साथ लगातार टकराव चलता रहता था. अरुण गोयल की नियुक्ति को लेकर भी विवाद रहा है. उन्होंने स्वेच्छा से सेवा से रिटायर होने के तुरंत बाद चुनाव आयुक्त का पद संभाला था. 2024 के आम चुनाव से कुछ हफ्ते पहले उनका अचानक इस्तीफा देना भी काफी नाटकीय था. इसके बाद उन्हें क्रोएशिया में भारत का राजदूत नियुक्त किया गया, जो भी उतना ही समझ से परे था.
फैसले पर दोनों जजों की अलग-अलग राय
23 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट के दो जजों, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पद की अवधि) कानून, 2023 को चुनौती देने वाले मामले में अलग-अलग फैसले दिए. इसके बाद इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के विचार के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया.
रिकॉर्ड के लिए बता दें कि 2023 का यह कानून शायद जल्दबाजी में पास किया गया था. राज्यसभा ने इसे 12 दिसंबर और लोकसभा ने 21 दिसंबर 2023 को पास किया था. इस पर ठीक से चर्चा भी नहीं हुई, क्योंकि उस समय विपक्ष के ज्यादातर नेता सदन में मौजूद नहीं थे. राष्ट्रपति ने 28 दिसंबर को इस पर मंजूरी दे दी और 2 जनवरी 2024 से यह देश का कानून बन गया. इससे पहले, सात दशक से ज्यादा समय तक संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते थे. हालांकि, यह नियुक्ति ‘संसद की ओर से बनाए गए किसी भी कानून के प्रावधानों के अधीन’ थी.
संसद ने ऐसा कोई कानून नहीं बनाया था. इसलिए व्यवहार में उस समय की सरकार ही उन लोगों को चुनती थी, जिन्हें उसी सरकार के दोबारा चुनाव जीतने की प्रक्रिया की निगरानी करनी होती थी. मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने ‘अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ’ मामले में निर्देश दिया कि जब तक संसद इस बारे में कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्तियां तीन सदस्यों वाली समिति की सलाह पर की जाएंगी. इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) शामिल होंगे.
लेकिन नए कानून में मुख्य न्यायाधीश चयन समिति का हिस्सा नहीं हैं. अब इस समिति में प्रधानमंत्री, उनके चुने हुए मंत्रिमंडल के एक मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हैं. इस तरह, कानून मंत्री की अध्यक्षता वाली खोज समिति की ओर से सुझाए गए नामों में से चुनाव आयुक्तों को चुनने का सबसे बड़ा अधिकार प्रभावी रूप से प्रधानमंत्री को मिल जाता है. पहले विधेयक में खोज समिति की अध्यक्षता कैबिनेट सचिव को करनी थी, लेकिन बाद में इसे बदल दिया गया.
बड़े पदों पर नियुक्ति करने वाली समितियों में CJI की भूमिका
चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश को शामिल न किए जाने को लेकर हाल में जो विवाद हुआ है, उसे समझने के लिए आइए दूसरी नियुक्तियों में उनकी भूमिका पर नज़र डालते हैं. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के प्रमुख, लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति करने वाली समितियों में मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं, लेकिन नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी), केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी), मुख्य सूचना आयुक्त (सीआईसी) या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की नियुक्ति करने वाली समितियों में वे शामिल नहीं होते. इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त के चयन की प्रक्रिया में मुख्य न्यायाधीश को शामिल करना संविधान की ओर से ज़रूरी नहीं किया गया था.
हालांकि, लोगों की नज़र में किसी संस्था की छवि कैसी है, यह भी मायने रखता है. रोमन साम्राज्य की एक मशहूर कहावत हमेशा याद रखनी चाहिए- ‘सीजर की पत्नी को शक से परे होना चाहिए.’ लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस बात का खास महत्व है. इसलिए, भले ही किसी कानून का उल्लंघन नहीं हुआ हो, लेकिन निष्पक्षता को लेकर कई जगहों पर सवाल जरूर उठे हैं.
महाभियोग (इंपीचमेंट) सिर्फ सैद्धांतिक विकल्प है
यह भी समझना ज़रूरी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को महाभियोग के जरिए हटाना सिर्फ सैद्धांतिक रूप से संभव विकल्प है. इसके लिए जितने सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है, उसे जुटाना लगभग असंभव है. ऐसा सिर्फ बेहद दुर्लभ स्थिति में हो सकता है, जब कोई कमजोर गठबंधन सरकार चला रहा हो.
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के मामले में महाभियोग लाने के कई प्रयास हुए हैं. उदाहरण के लिए, 1993 में जस्टिस वी. रामास्वामी और 2018 में जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाए गए थे. वहीं, जस्टिस सौमित्र सेन और जस्टिस यशवंत वर्मा जैसे कुछ जजों ने कार्यकाल पूरा होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया. लेकिन इनमें से किसी भी मामले में संसद ने किसी जज को वास्तव में पद से नहीं हटाया.
चुनाव के लिए नाम चुनने का दायरा
अगली बात जो मैं कहना चाहता हूं, वह यह है कि मौजूदा नियमों के तहत चुनाव आयोग के सदस्यों को चुनने के लिए नामों का दायरा काफी सीमित है. सिर्फ वही लोग नियुक्ति के योग्य हैं, जो भारत सरकार में सचिव के पद पर काम कर चुके हैं या अभी इस पद पर काम कर रहे हैं, या फिर इसी के बराबर के पद पर रहे हैं. हकीकत यह है कि अधिकारियों के नामों को इस पद के लिए मंजूरी देने की सख्त प्रक्रिया के कारण किसी भी बैच के एक-तिहाई से भी कम अधिकारी इस शर्त को पूरा कर पाते हैं.
इन सभी अधिकारियों को चुनाव कराने का अनुभव रहा होगा और उन्होंने चुनाव आयोग (ईसीआई) तथा राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) की ओर से पर्यवेक्षक के तौर पर भी काम किया होगा. इन सभी ने कम से कम तीन दशक तक सेवा की होगी. अपने करियर में उन्होंने राज्य और केंद्र सरकारों में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारों के साथ काम किया होगा. इसलिए, सैद्धांतिक तौर पर शासन के सामान्य सिद्धांतों और चुनाव से जुड़ी प्रक्रियाओं को समझने के मामले में उनके बीच बहुत ज्यादा अंतर नहीं होना चाहिए.
एक फैसला और असहमति का नोट
लेकिन आज की स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यों की समिति में, उनके चुने हुए मंत्री को मिलाकर, 2:1 के अनुपात में बहुमत का फायदा प्रधानमंत्री के पास है. इसका मतलब यह है कि समिति की बैठक होने से पहले ही नतीजा तय हो जाता है. विपक्ष के नेता ऐसी बैठक में शामिल होते हैं, जिसका नतीजा पहले से पता होता है. उनके पास सिर्फ दो विकल्प बचते हैं- फैसले को मान लेना या असहमति का नोट लिखना.
इसलिए यह मानना गलत नहीं होगा कि ऐसी हर बैठक का अंत एक फैसले और उसके खिलाफ असहमति के नोट के साथ होगा. फरवरी 2025 में जब नए कानून के तहत पहले मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति हुई, तो ठीक ऐसा ही हुआ था.
योग्यता, वरिष्ठता और पारदर्शिता
इसलिए मेरा सुझाव है कि ऐसा तरीका अपनाया जाए, जो नियमों का गलत फायदा उठाकर किसी संस्था पर कब्जा करने से रोके. क्या हम ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जिसमें निष्पक्ष रहना और सही तरीके से काम करना ही सबसे समझदारी भरा विकल्प हो? स्वतंत्र संस्थाएं इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकतीं कि बहुमत में बैठी सरकार अपनी मर्जी से सही काम करेगी. इन संस्थाओं की नींव ऐसे नियमों पर होनी चाहिए, जिनके तहत अपने फायदे के बारे में सोचने वाली सरकार के लिए भी किसी निष्पक्ष व्यक्ति को नियुक्त करना ही समझदारी हो.
क्या हम ऐसा तरीका तय नहीं कर सकते, जिसमें अंतिम चयन के दौरान योग्यता, वरिष्ठता और पारदर्शिता को ध्यान में रखा जाए? कैबिनेट सचिवालय और कानून मंत्रालय मिलकर भारत सरकार के उन 12 सबसे वरिष्ठ सचिवों की एक सूची तैयार करें, जिनके अगले छह महीनों में रिटायर होने की उम्मीद है. इस सूची में से प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता को अधिकतम दो अधिकारियों के नाम हटाने का विकल्प दिया जाए. वे चाहें तो इस विकल्प का इस्तेमाल न भी करें.
जो अधिकारी इसके बाद भी चयन की दौड़ में बने रहें, उनमें से चुनाव कराने के अनुभव के आधार पर चयन किया जा सकता है. इसके लिए पारदर्शी मानक तय किए जा सकते हैं. जैसे, किसी अधिकारी ने कितनी बार रिटर्निंग ऑफिसर (आरओ) या सहायक रिटर्निंग ऑफिसर (एआरओ) के तौर पर काम किया है और चुनाव आयोग या राज्य चुनाव आयोग की ओर से पर्यवेक्षक के रूप में कितने समय तक काम किया है.
शायद इससे उस निष्पक्ष चुनाव आयोग को ज्यादा लोगों की मंजूरी मिलेगी, जो दुनिया में लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनावी प्रक्रिया को पूरा कराता है.
संजीव चोपड़ा सेंटर फॉर कंटेंपररी स्टडीज़, प्राइम मिनिस्टर्स म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी (PMML), नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं, जहां उनकी फेलोशिप का टॉपिक है बॉर्डर्स, बाउंड्रीज़ एंड ब्लूवाटर्स ऑफ भारत. वे पद्मश्री मेजर बॉब खाथिंग की बायोग्राफी पर भी काम कर रहे हैं, जो नगालैंड के पूर्व चीफ सेक्रेटरी और बर्मा में भारत के एम्बेसडर थे. यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: ECI विवाद: SIR को लेकर पूर्व जजों के खुले पत्र में क्या गलतियां हैं?