पिछले हफ्ते भारत के चुनाव आयोग (ECI) को लेकर दो खुले पत्र जारी किए गए. इनमें से एक पत्र 42 पूर्व जजों के एक अनौपचारिक समूह ने लिखा था. दूसरा पत्र गैर-राजनीतिक और औपचारिक संगठन ‘कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप’ के 98 पूर्व सरकारी अधिकारियों ने लिखा था. दोनों पत्रों में चुनाव आयोग के कामकाज और खास तौर पर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर एक-दूसरे से बिल्कुल उलट विचार रखे गए.
आइए, पहले देखते हैं कि पूर्व जज इस मामले को किस तरह देखते हैं. उनके पत्र में चुनाव आयोग को कमजोर करने की कोशिशों को लेकर गंभीर चिंता जताई गई. उन्होंने सवाल उठाया कि बिना किसी सबूत के ‘वोट चोरी’ के आरोप कैसे लगाए जा सकते हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि संवैधानिक संस्थाओं को बार-बार ‘चोर’ और ‘समझौता कर चुकी संस्थाएं’ कहना गलत है. उन्होंने चिंता जताई कि इस कथित हमले का मुख्य निशाना चुनाव आयोग बना हुआ है. उनके मुताबिक, इस समय कुछ राजनीतिक हितों को साधने के लिए सोच-समझकर एक अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अस्थिर करने के गंभीर नतीजों की भी परवाह नहीं की जा रही है.
SIR का बचाव करते हुए जजों ने कहा कि यह कानून के तहत होने वाली प्रक्रिया है, जिसका मकसद मतदाता सूची को साफ और सही रखना है. उनके मुताबिक, ‘वोट चोरी’ के आरोप अदालतों में नहीं, बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए जाते हैं. विपक्षी पार्टियां चुनाव हारने के बाद ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) पर सवाल उठाती हैं. लेकिन जब इन्हीं मशीनों से जीत मिलती है, तो कोई सवाल नहीं उठाया जाता.
पत्र में लिखा है, “एक ऐसी पार्टी जिसने पांच दशक से ज्यादा समय तक देश पर शासन किया, अब दावा कर रही है कि जिस व्यवस्था ने उसे सत्ता तक पहुंचाया, उसी में गड़बड़ी है.”
इसके बाद बयान का लहजा जहरीला और पक्षपात से भरा हो जाता है.
पत्र में कहा गया है, “विपक्ष यह काम अकेले नहीं करता. चुनिंदा मामलों में मुकदमे करने का लंबा रिकॉर्ड रखने वाले कुछ एक्टिविस्ट संगठन इन आरोपों को कानूनी रूप देने की कोशिश करते हैं. वे एक के बाद एक याचिकाएं दाखिल करते हैं. लेकिन शायद ही कभी सबूत पेश करते हैं. अदालत को एक मंच बना दिया जाता है और जब फैसला सुनाया जाता है, तो अगर वह उनके हित में नहीं होता, तो उसकी आलोचना की जाती है. इसके बाद नफरत भरी बातें बड़े पैमाने पर फैलाई जाती हैं. इसका मकसद एक ऐसी न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर करना है, जो लंबे समय से स्थापित है और जिस पर बड़े पैमाने पर भरोसा किया जाता है.”
EC को लेकर पूर्व सरकारी अधिकारियों का क्या कहना है
अब देखते हैं कि पूर्व सरकारी अधिकारी चुनाव आयोग और SIR को लेकर क्या कहते हैं. उनके मुताबिक, संवैधानिक नैतिकता की जानबूझकर अनदेखी का सबसे बड़ा उदाहरण मौजूदा चुनाव आयोग है, जिसमें इस समय सभी सदस्य पूर्व IAS अधिकारी हैं. इस आयोग ने मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में ऐसे बदलाव किए हैं, जिनका कोई साफ कारण समझ में नहीं आता.
पत्र में कहा गया है कि आयोग ने मनमाने तरीके से SIR की शुरुआत की. इसके लिए उसने अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल किया और मतदाता सूची में सुधार की एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया को ऐसे कदम में बदल दिया, जिसका मकसद “बेशर्मी से असंवैधानिक, पक्षपातपूर्ण और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए लाखों असली मतदाताओं को सूची से बाहर करना और उनके मतदान के अधिकार छीनना” था.
इस प्रक्रिया का पहले कोई उदाहरण नहीं था, कानून में इसका कोई साफ आधार नहीं था और न ही इसकी जरूरत को साबित किया गया था. नागरिकों पर खुद को मतदाता के रूप में दर्ज कराने और अपनी पात्रता साबित करने के लिए दस्तावेज दिखाने की जिम्मेदारी डाल दी गई. नागरिकता को लेकर पहले से नागरिकों के पक्ष में जो स्वाभाविक धारणा थी, उसे बदल दिया गया. इसके बजाय उनसे ऐसे दस्तावेज मांगे गए, जिन तक बहुत कम लोगों की पहुंच थी. ऐसा उन लोगों से भी किया गया, जो पहले से मतदाता के रूप में पंजीकृत थे. इसके अलावा, वोट देने के अधिकार का आधार परिवार की वंशावली बना दिया गया. इस तरह चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करने के अपने बताए गए उद्देश्य के जरिए भारतीय आबादी के बड़े हिस्से में डर और घबराहट पैदा कर दी.
पूर्व सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, सबसे दुखद बात यह है कि जिस चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की कभी तारीफ होती थी, उसे सरकारी सत्ता का एक साधन बनाने और लोगों का एक ऐसा वर्ग पैदा करने की जिम्मेदारी, जिसके पास किसी देश की नागरिकता न हो, उन लोगों पर है जो IAS से आए हैं.
यह राजनीतिक पक्षपात का एक बेहद गंभीर उदाहरण रहा है. शायद स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा उदाहरण पहले कभी नहीं देखा गया. इन अधिकारियों ने एक ही झटके में न सिर्फ उस संस्था की प्रतिष्ठा को अपूरणीय नुकसान पहुंचाया है, जिसे उनके पूर्व अधिकारियों ने बहुत मेहनत से बनाया था, बल्कि भारत के चुनावी लोकतंत्र की बुनियाद को भी नुकसान पहुंचाया है.
यह भी ध्यान देने वाली बात है कि इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में ज्यादातर IAS अधिकारी हैं. अपनी सेवा के दौरान वे मतदाता पंजीकरण अधिकारी (ERO), जिला निर्वाचन अधिकारी, रिटर्निंग अधिकारी, चुनाव पर्यवेक्षक और मुख्य निर्वाचन अधिकारी के रूप में काम कर चुके हैं. इन भूमिकाओं में उन्होंने मतदाता सूचियां तैयार करने की निगरानी की है और संसद तथा राज्य विधानसभाओं के चुनाव कराए हैं, उनकी निगरानी की है या उन पर नजर रखी है.
उन्होंने चुनाव आयोग के साथ भी करीब से काम किया है. इसलिए वे भारत के चुनावी लोकतंत्र के निगरानीकर्ता और निष्पक्ष निर्णायक के रूप में आयोग की अहम भूमिका और उसके कामकाज को अच्छी तरह जानते हैं.
दूसरी ओर, पूर्व जजों के पास इस तरह का ज्ञान या अनुभव नहीं है. वे अपने चैंबर में बैठते हैं, उनके सामने रखे गए दस्तावेज देखते हैं और दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनते हैं. यह पूरी तरह संभव है कि इस सूची पर साइन करने वालों ने चुनाव से जुड़े मामलों पर कभी काम ही न किया हो.
चुनाव आयोग को कौन-सी समस्याएं हैं
चाहे जो भी हो, हकीकत क्या है? SIR लागू करने और व्यवस्था तथा प्रक्रिया में कई बदलाव करने के दौरान चुनाव आयोग ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का गलत इस्तेमाल किया है. उसने ऐसी प्रक्रियाएं शुरू कीं, जिन्हें बेवजह जटिल बनाया गया. इससे मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी करने की गुंजाइश पैदा हो गई. इस पूरी प्रक्रिया को बिना सही चर्चा, विचार-विमर्श और सलाह-मशविरा किए शुरू कर दिया गया. साथ ही, इस काम में लगे लाखों सरकारी अधिकारियों के लिए उचित नियम भी नहीं बनाए गए और न ही उन्हें सही ट्रेनिंग दी गई.
पूर्व सरकारी अधिकारियों के पत्र में लिखा है, “बताया जाता है कि SIR का फैसला व्हाट्सएप के जरिए बताया गया था और चुनाव आयोग में इस बारे में कोई फाइल मौजूद नहीं है.”
देशभर में SIR के कारण 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटा दिए गए. यह भारत के कुल मतदाताओं का करीब 15 प्रतिशत है. माना जाता है कि इनमें बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक और बुजुर्ग लोग शामिल हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया को देशभर में अयोग्य, मनमाने, तानाशाही और गैर-पेशेवर तरीके से चलाया गया.
यह पूरी तरह से एक नौकरशाही प्रक्रिया थी. कम ट्रेनिंग पाए, कम प्रेरित और जूनियर स्तर के सरकारी कर्मचारी, जिन्हें अंशकालिक रूप से काम करने के लिए लगाया गया था, ‘बूथ लेवल ऑफिसर’ (BLO) कहलाते हैं. उन्होंने जल्दबाजी और दबाव में काम किया. चुनाव आयोग की तरफ से बार-बार अलग-अलग और एक-दूसरे से टकराने वाले फैसले, आदेश और निर्देश जारी किए गए. इसके कारण इन अधिकारियों ने अधूरे और गलत नतीजे दिए. उनके काम की निगरानी करने वाले सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारियों और मतदाता पंजीकरण अधिकारियों (ERO) ने भी ठीक से निगरानी नहीं की. उनकी निगरानी महज नाम के लिए की गई.
अब, द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में सामने आया है कि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने चुनाव आयोग के नाम पर जारी किए गए कई फैसलों, आदेशों और निर्देशों पर आधिकारिक रूप से आपत्ति जताई थी. बताया गया है कि उन्होंने 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की. उनका कहना था कि ये फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे.
इनमें सबसे गंभीर मामले फॉर्म 6 में गैरकानूनी बदलाव और ECINet की शुरुआत के हैं. ECINet के जरिए मतदाता सूचियों को एक केंद्रीय व्यवस्था के तहत लाया गया. फॉर्म 6 में बदलाव से नए मतदाताओं के नाम जोड़ने पर काफी रोक लग गई. वहीं, ECINet ने ERO की भूमिका को कमजोर कर दिया. कानून के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और सुधार करने का अधिकार ERO के पास होता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग में फैसले लेने से जुड़े कानून का उल्लंघन किया है. इस कानून के मुताबिक, आयोग के सभी काम, जिनमें काम करने की प्रक्रिया और जिम्मेदारियों का बंटवारा भी शामिल है, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किए जाने चाहिए. अगर किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो उसका फैसला “बहुमत की राय के अनुसार” किया जाना चाहिए.
कानून के मुताबिक, जिन बड़े फैसलों को लेने का अधिकार “चुनाव आयोग” के पास है, अगर वे फैसले आयोग के सामने रखे बिना उसके नाम पर लिए गए हैं, तो वे कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं और वैध नहीं हैं.
26 सितंबर को चुनाव आयोग की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि फॉर्म 6 में बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी थी. बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने इस दावे को खारिज कर दिया. आयोग ने ECINet के कामकाज की समीक्षा के लिए IIT और IIIT के स्वतंत्र विशेषज्ञों की एक समिति बनाने का भी ऐलान किया.
इससे सिर्फ यही बात साबित होती है कि मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी मर्जी से फैसले लेते रहे हैं. इन फैसलों के कारण लाखों नागरिकों को वोट देने के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित होना पड़ सकता है.
बंद तानाशाही
इस मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद के दोनों सदनों के 193 सदस्यों ने महाभियोग प्रस्ताव पेश किया था. आरोपपत्र पर लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे.
आरोपों में “पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण” व्यवहार, मतदाता सूची के मौजूदा SIR के जरिए “बड़े पैमाने पर लोगों को वोट देने के अधिकार से वंचित करना”, “साबित हो चुका गलत आचरण”, “जनता के भरोसे को कमजोर करने वाले” कदम, एक राजनीतिक पार्टी के पक्ष में संवैधानिक जिम्मेदारियों का “पक्षपातपूर्ण इस्तेमाल” और “चुनावी धोखाधड़ी” की शिकायतों की जांच में “जानबूझकर रुकावट डालना” शामिल हैं.
इन आरोपों के मामले में उन्हें राहत मिल गई. लेकिन राज्यसभा के 73 सांसदों के हस्ताक्षर वाला महाभियोग प्रस्ताव अब भी लंबित है.
पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग EVM पर आधारित मतदान व्यवस्था का गलत इस्तेमाल कर रहा है. वह मशीनों के सोर्स कोड और मतदान प्रक्रिया की CCTV रिकॉर्डिंग तक पहुंच देने से इनकार कर रहा है. इसके अलावा, वोटर वेरिफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) की भूमिका को सीमित किया जा रहा है और सिंबल लोडिंग यूनिट्स को रहस्यमय बना दिया गया है. इन सबका स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों पर बुरा असर पड़ रहा है.
इसमें कोई हैरानी नहीं है कि स्वीडन के वी-डेम इंस्टीट्यूट ने अपनी ‘डेमोक्रेसी रिपोर्ट 2024’ में भारत को चुनावी तानाशाही वाला देश बताया. यह लोकतांत्रिक आजादी और नागरिक स्वतंत्रता में बड़ी गिरावट को दिखाता है.
वी-डेम इंस्टीट्यूट देशों को चार तरह की व्यवस्थाओं में बांटता है: उदार लोकतंत्र, चुनावी लोकतंत्र, चुनावी तानाशाही और पूर्ण बंद तानाशाही.
भारत को चुनावी तानाशाही की श्रेणी में रखा गया है. इस व्यवस्था में कई राजनीतिक पार्टियों के बीच चुनाव तो होते हैं, लेकिन लोकतंत्र की बुनियादी जरूरतों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं होती. इनमें अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तथा नागरिक स्वतंत्रता शामिल हैं.
चुनावों के प्रबंधन और उनकी निगरानी के बारे में रिपोर्ट में खास तौर पर कहा गया है, “चुनाव कराने वाली संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर हो रही है और विधायी निगरानी तथा जनता से सलाह-मशविरा करने की प्रक्रिया में कमी आई है.”
अब SIR के जरिए मतदाता सूचियों का गलत इस्तेमाल किए जाने से भारत के “बंद तानाशाही” की श्रेणी में जाने का खतरा पैदा हो गया है. यह तानाशाही शासन का एक ऐसा रूप है, जिसमें लोगों पर और ज्यादा पाबंदियां लगाई जाती हैं.
यह बात दोहराना जरूरी है कि पूर्व जजों का पत्र गैर-पेशेवर लगता है और उनके तर्कों में कोई दम नहीं है. कुछ राय ऐसी होती हैं, जिन्हें अपने तक ही रखना बेहतर होता है.
एम.जी. देवसहायम एक रिटायर्ड IAS अधिकारी और ‘पीपल-फर्स्ट’ के चेयरमैन हैं. उन्होंने भारतीय सेना में भी सेवा की है. वे ‘इमरजेंसी एंड नियो-इमरजेंसी: हू विल डिफेंड डेमोक्रेसी?’ किताब के लेखक हैं. विचार निजी हैं.
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