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Tuesday, 13 October, 2026
होममत-विमत'विकसित भारत 2047' एक ऐसा नारा है जो अपने ही मकसद को नाकाम करता है, मोदी को नए नारे की जरूरत है

‘विकसित भारत 2047’ एक ऐसा नारा है जो अपने ही मकसद को नाकाम करता है, मोदी को नए नारे की जरूरत है

आजकल जो भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए नारे और भाषण लिख रहा है, वह या तो अपने काम से बुरी तरह थक चुका है या फिर उसके पास नए और ओरिजिनल आइडिया खत्म हो गए हैं.

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जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री के तौर पर लगातार 25 साल सत्ता में रहने का रिकॉर्ड पूरा किया, उसी दिन उन्होंने राजधानी दिल्ली में आयोजित विकसित भारत संकल्प सभा में जोशीला भाषण दिया.

उन्होंने कहा, “हम करके रहेंगे, we will do it.” इसके बाद उन्होंने वहां मौजूद लोगों से नारे लगवाए: “टॉप 3 इकोनॉमी, we will do it”; “आत्मनिर्भर भारत, we will do it”; “ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब, we will do it”; “अंतरिक्ष में कदम, we will do it”; और “2047 तक विकसित भारत, we will do it.”

प्रधानमंत्री मोदी के “हम करके रहेंगे” नारे की तुक और लय सुनकर कुछ पुरानी बातें याद आ गईं. याद कीजिए, 2016 में देशद्रोह के उस चर्चित मामले में जेल से छूटकर कैंपस लौटने पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने कैसे नारे लगाए थे. “हम क्या चाहते, आजादी… हम ले के रहेंगे आजादी… भुखमरी से आजादी, पूंजीवाद से आजादी… मैं भी बोलूं, आजादी, तुम भी बोलो, आजादी.”

बात सिर्फ इतनी है कि वामपंथी साथी से कांग्रेस नेता बने कन्हैया कुमार यह दावा नहीं कर सकते कि इस तुक और लय पर सिर्फ उनका ही अधिकार है. प्रधानमंत्री मोदी का “we will do it” वाला नारा भी 2008 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान बराक ओबामा के चुनावी नारे “यस, वी कैन” यानी “हां, हम कर सकते हैं” जैसा ही सुनाई दिया.

आजकल प्रधानमंत्री मोदी के नारे और भाषण लिखने वाला व्यक्ति या तो अपना काम करते-करते बहुत थक चुका है या उसके पास नए विचार खत्म हो गए हैं. कन्हैया कुमार के नारों ने जेएनयू कैंपस में उनके साथी वामपंथी छात्रों में जोश भर दिया था. वहीं, ओबामा का नारा भी युवा अमेरिकियों के लिए एक ऐसा नारा बन गया था, जिसे वे एकजुट होकर बुलंद करते थे. लेकिन यह उम्मीद करना कि पुराने नारों को दोहराकर प्रधानमंत्री मोदी आज के छात्रों और युवाओं का दिल जीत लेंगे, हताशा की हद है. ठीक उसी तरह, जैसे फटी जींस पहने एक युवा महिला का प्रधानमंत्री मोदी के ठीक बगल में बैठकर ‘भजन क्लबिंग’ में शामिल होने का वीडियो उन्हें जेन जी के बीच ‘कूल’ साबित करने के लिए काफी नहीं होगा.

विकसित भारत, एक समस्या वाला नारा

यह सब कहने के बाद भी, असली समस्या उधार ली गई तुक या लय नहीं है. असली समस्या मोदी सरकार के सबसे बड़े नारे में ही है, यानी विकसित भारत 2047. नीति आयोग के जुलाई 2024 के एक अप्रोच पेपर में कहा गया था: “एक विकसित देश बनने के लिए हमें 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य हासिल करने की कोशिश करनी होगी. इसके साथ ही, हर व्यक्ति की सालाना आय 18,000 डॉलर तक पहुंचानी होगी….”

“भारत की जीडीपी को आज के 3.36 ट्रिलियन डॉलर से नौ गुना बढ़ाना होगा और हर व्यक्ति की सालाना आय को आज के 2,392 डॉलर से आठ गुना बढ़ाना होगा.”

2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी ने देश की बागडोर संभाली थी, तब भारत की जीडीपी करीब 2 ट्रिलियन डॉलर थी. 2018 में, जब प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि भारत 2022 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा, तब देश की सालाना जीडीपी 2.7 ट्रिलियन डॉलर थी. आज भारत की जीडीपी करीब 4.15 ट्रिलियन डॉलर होने का अनुमान है. आसान शब्दों में कहें तो पिछले 12 साल में भारत की जीडीपी दोगुनी हुई है. नीति आयोग के 2024 के अप्रोच पेपर के हिसाब से देखें, तो भारत को विकसित देश बनने के लिए आज की जीडीपी से कई गुना आगे बढ़ना होगा. जाहिर है, यह बहुत, बहुत बड़ा लक्ष्य है. मैं एक ऐसा इंसान हूं जो मुश्किल हालात में भी उम्मीद नहीं छोड़ता. और यह बात मेरे काम आती है कि मुझे अर्थशास्त्र की समझ नहीं है.

मोदी सरकार से तुरंत नतीजे चाहती है Gen Z?

आखिर Gen Z में मेरे जैसी उम्मीद क्यों नहीं दिखती? प्रधानमंत्री मोदी भारत को विकसित देश बनाने के लिए सिर्फ 21 साल और तो मांग रहे हैं. ऐसा होगा या नहीं, इस पर चर्चा तो 2047 में ही हो पाएगी. तब तक उनकी बातों पर भरोसा कीजिए. यहां बात तथ्यों की नहीं, भरोसे की है. प्रधानमंत्री को शायद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की वह बात सुननी चाहिए, जो उन्होंने 1985 में अमेरिकी कांग्रेस के सामने कही थी: “भारत एक पुराना देश है, लेकिन एक युवा राष्ट्र है. और दुनिया भर के युवाओं की तरह, हम भी इंतजार नहीं कर सकते.”

राजीव गांधी के पिता नहीं, बल्कि उनके बेटे के तौर पर नहीं, यहां बात राजीव गांधी की ही है, जो उस समय की पीढ़ी यानी जेन एक्स को अधीर बता रहे थे. उन्होंने उस पीढ़ी के लिए कंप्यूटर और टेलीफोन लाए. दो पीढ़ियों बाद यही चीजें लैपटॉप और मोबाइल बन गईं. इन्हीं साधनों ने आज के छात्रों और युवाओं को ‘इंस्टा जनरेशन’ बना दिया है. 2014 में जिन छात्रों और युवाओं ने बड़ी संख्या में प्रधानमंत्री मोदी को वोट दिया था, वे आज 30 और 40 साल की उम्र में पहुंच चुके हैं. अगर 12 साल बाद उनके सपनों के पूरा होने का इंतजार करते-करते उनका धैर्य खत्म हो रहा है, तो इसके लिए उन्हें दोष मत दीजिए. और जो लोग 2014 में स्कूलों में पढ़ते थे, वे आज शायद हैरान होते होंगे और उन्हें यह समझने में मुश्किल होती होगी कि प्रधानमंत्री मोदी जब कांग्रेस के शासनकाल की गलतियों और कमियों के बारे में बताते हैं, तो आखिर वे किस दौर की बात कर रहे हैं.

2024 में कुल मतदाताओं में 18 से 29 साल की उम्र वाले लोगों की हिस्सेदारी 22.78 प्रतिशत थी. अगर 2029 तक 2014 में 30 साल की उम्र वाले लोगों को भी इस वर्ग के साथ जोड़ दिया जाए, तो यह ‘बेचैन’ पीढ़ी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकती है. उनसे यह कहना कि अपने सपनों को पूरा होते देखने के लिए 21 साल और इंतिजार करें, असल में उन्हें किसी दूसरी पार्टी को विकल्प के तौर पर देखने के लिए प्रेरित करने जैसा है. इसलिए विकसित भारत 2047 एक बेहद खराब राजनीतिक नारा है. यह ‘इंस्टा जनरेशन’ की सोच और उसकी बुनियादी मान्यताओं के बिल्कुल खिलाफ है.

इसके अलावा, लोगों से आज इस उम्मीद में वोट देने को कहना कि उनके सपने 2047 में पूरे होंगे, चाहे भविष्य की तस्वीर कितनी भी अच्छी क्यों न दिखाई जाए, उनकी समझ का अपमान करने जैसा है. 2047 का वादा आज की नाकामियों के लिए बहाने के तौर पर पेश किया जा सकता है. समस्या यह भी है कि बीजेपी और मोदी सरकार योजनाओं को पूरा करने की समय-सीमा बार-बार बदलती रही हैं और लक्ष्य को बार-बार आगे खिसकाती रही हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 तक भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का वादा किया था, लेकिन अब वही लक्ष्य बदलकर 2047 तक विकसित भारत बनाने की परियोजना बन गया है. उन्होंने किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था. अब वे इस बारे में बात नहीं करते. ठीक इसी तरह, वे स्किल इंडिया, स्मार्ट सिटीज, स्वच्छ भारत और ऐसी कई दूसरी योजनाओं का भी जिक्र कम ही करते हैं, जिन्हें उन्होंने बीजेपी के 2014 के चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने के लिए शुरू किया था.

भरोसे का संकट

बीजेपी ने अपने 2014 के चुनावी घोषणापत्र में ‘भरोसे का संकट’ शीर्षक के तहत कहा था: “आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केंद्र सरकार की विश्वसनीयता और उस पर लोगों का भरोसा बहाल करना है…. कांग्रेस पार्टी ने न सिर्फ सरकार की गरिमा को कम किया है, बल्कि भारत की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है. यही वजह है कि रुपये की गिरती कीमत और दूसरे देशों द्वारा हमारे साथ मनमाना व्यवहार करने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं. बीजेपी सरकार के भरोसे और विश्वसनीयता को फिर से बहाल करने के लिए काम करेगी. हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि व्यवस्था में जिम्मेदारी और जवाबदेही की पूरी प्रक्रिया हो.”

शायद यह उस घोषणापत्र को याद करने का सही समय नहीं है, खासकर तब जब रुपये के गिरकर 97 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंचने और अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की भारतीय पेशेवरों और कंपनियों को लेकर की गई “बेहद अपमानजनक” टिप्पणियों और घोषणाओं पर जोरदार बहस चल रही है. जहां तक व्यवस्था में जिम्मेदारी और जवाबदेही की बात है, इसे भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से बेहतर कौन समझ सकता है?

आज प्रधानमंत्री मोदी को देश के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने के लिए बहुत कुछ करना होगा. उन्हें इसकी शुरुआत ‘विकसित भारत 2047’ के नारे को खत्म करके करनी चाहिए. क्योंकि यह नारा खोखले वादों जैसा लगता है और बीते समय के अधूरे वादों की याद दिलाता है.

डीके सिंह ‘दिप्रिंट’ में पॉलिटिकल एडिटर हैं. वे @dksingh73 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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