नई दिल्ली: भारत में पब्लिक वाई-फाई को बढ़ावा देने की योजना अब एक मुश्किल सवाल का सामना कर रही है: जब किसी देश की टेलीकॉम इंडस्ट्री सस्ता मोबाइल इंटरनेट देने में इतनी सफल हो जाए, तो मुफ्त पब्लिक वाई-फाई जैसी सार्वजनिक सुविधा का क्या होगा?
सिर्फ दो दशक पहले कई मुख्यमंत्रियों ने मुफ्त पब्लिक वाई-फाई देने का वादा किया था. यह एक आदर्शवादी सपना लगता था. लेकिन उससे भी ज़्यादा, यह संभव भी लगता था. अब उस डिजिटल क्रांति का दौर खत्म होता हुआ दिखाई दे रहा है.
प्रधानमंत्री वाई-फाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस (PM-WANI) योजना शुरू होने के छह साल बाद, भारत में करीब 4.1 लाख पब्लिक वाई-फाई हॉटस्पॉट बने हैं. यह 2018 की राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति (NDCP) के तहत 2022 तक बनाए जाने वाले 1 करोड़ हॉटस्पॉट के लक्ष्य का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है. अब भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) खुद इस पूरी सोच पर सवाल उठा रहा है और पूछ रहा है कि क्या इस मॉडल को पूरी तरह से बदलने की ज़रूरत है. भारत कई चरणों को पीछे छोड़ चुका है और अब कई लोगों के लिए पब्लिक वाई-फाई पुराना विचार बन चुका है.
योजना शुरू होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X पर लिखा था, “ऐतिहासिक PM-WANI (वाई-फाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस) योजना… तकनीक की दुनिया में क्रांति लाएगी और पूरे भारत में वाई-फाई की उपलब्धता को काफी बढ़ाएगी. इससे ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘ईज़ ऑफ लिविंग’ को बढ़ावा मिलेगा. यह योजना हमारे छोटे दुकानदारों को वाई-फाई सेवा देने में सक्षम बनाएगी. इससे उनकी आय बढ़ेगी और युवाओं को बिना रुकावट इंटरनेट कनेक्टिविटी मिलेगी. यह हमारे डिजिटल इंडिया मिशन को भी मजबूत करेगी.”
इस साल अप्रैल में जारी पब्लिक वाई-फाई नेटवर्क के विस्तार पर अपने परामर्श पत्र में TRAI ने भारत के पब्लिक वाई-फाई सिस्टम के भविष्य पर लोगों से सुझाव मांगे हैं. नियामक संस्था यह पूछ रही है कि क्या PM-WANI को पूरी तरह से नए तरीके से शुरू करने की ज़रूरत है—चाहे वह फंडिंग का तरीका हो, यूज़र की पहचान की प्रक्रिया, नेटवर्क पर घूमते हुए इस्तेमाल (रोमिंग) की सुविधा हो या भुगतान का तरीका.
यह परामर्श पत्र प्रगति की समीक्षा से ज़्यादा एक समस्या की पहचान जैसा लगता है. इसमें पूछा गया है कि क्या मौजूदा व्यवस्था ऑपरेटरों को “आय की निश्चितता और लंबे समय तक टिकाऊ व्यवस्था” दे सकती है, क्या हॉटस्पॉट लगाने का खर्च सरकार को उठाना चाहिए, और लोगों को वास्तव में पब्लिक वाई-फाई से जोड़ने के लिए क्या बदलाव ज़रूरी हैं. ये सवाल एक बड़ी सच्चाई की ओर इशारा करते हैं: PM-WANI उस भारत के लिए बनाया गया था जो अभी इंटरनेट से जुड़ने की कोशिश कर रहा था. लेकिन जब तक यह योजना आई, तब तक भारत काफी हद तक इंटरनेट से जुड़ चुका था. दुनिया के सबसे सस्ते मोबाइल डेटा के कारण देश में डिजिटल बदलाव तेज़ी से हुआ, लेकिन पब्लिक वाई-फाई का सिस्टम कभी उस तरह सफल नहीं हो पाया.
फिर भी, जिन लोगों ने इस योजना की सोच को आकार दिया, उनके लिए PM-WANI की कहानी सिर्फ अधूरे लक्ष्यों की नहीं है.
पूर्व TRAI अध्यक्ष राम सेवक शर्मा, जिन्होंने बाद में PM-WANI बने ढांचे को तैयार करने में मदद की थी, ने कहा, “इस देश में बहुत से लोग 200 रुपये का प्लान भी नहीं खरीद सकते. आज परिवारों में क्या हो रहा है? ऑनलाइन क्लास है, ऑनलाइन किताबें हैं. हर बच्चे को इंटरनेट के लिए कई जीबी डेटा चाहिए. वह उन्हें कहाँ से मिलेगा? उसका खर्च कैसे उठाएंगे?”
शर्मा के लिए पब्लिक वाई-फाई का मतलब सिर्फ हॉटस्पॉट बनाना नहीं था. इसे मोबाइल डेटा का एक सस्ता विकल्प माना गया था, ताकि जो लोग हर महीने का डेटा प्लान नहीं खरीद सकते, वे कम कीमत वाले छोटे-छोटे “सैशे” पैक में इंटरनेट खरीद सकें.
जब PM-WANI शुरू किया गया था, तब इसे जमीनी स्तर पर इंटरनेट क्रांति के रूप में देखा गया था. भारत में कभी बहुत लोकप्रिय रहे पब्लिक कॉल ऑफिस (PCO) से प्रेरणा लेते हुए, इस योजना का उद्देश्य मोहल्ले की दुकानों, चाय की दुकानों और कैफे को सस्ता इंटरनेट उपलब्ध कराने वाला केंद्र बनाना था. पब्लिक डेटा ऑफिस (PDO) के विकेंद्रीकृत नेटवर्क के जरिए छोटे कारोबारी लाइसेंस प्राप्त टेलीकॉम कंपनियों और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (ISP) से बैंडविड्थ खरीदते और फिर लोगों को कम कीमत वाले वाई-फाई पैक बेचते.
यह सोच सरकार के व्यापक डिजिटल इंडिया कार्यक्रम से भी मेल खाती थी. जब कल्याणकारी योजनाओं की सेवाएं, शिक्षा, भुगतान और पहचान की पुष्टि जैसी कई सुविधाएं ऑनलाइन होने लगीं, तब माना गया कि पब्लिक वाई-फाई डिजिटल ढांचे का एक अहम हिस्सा बनेगा और उन इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाएगा जहां अभी भी अच्छी कनेक्टिविटी नहीं है.
इसकी सोच आसान थी. 1990 के दशक में, मोहल्लों की छोटी दुकानों पर लगे पीसीओ, लोगों के घरों में फोन आने से पहले परिवारों और प्रवासी मजदूरों के लिए एक बड़ी सुविधा थे. PM-WANI ने इंटरनेट के दौर में उसी मॉडल को दोहराने की कोशिश की. इसमें फोन कॉल की जगह वाई-फाई कनेक्टिविटी ने ली और PCO चलाने वालों की जगह PDO ने.
छह साल बाद भी, यह वादा काफी हद तक पूरा नहीं हो पाया है.
Historic PM-WANI (Wi-Fi Access Network Interface) scheme that has been cleared by the Cabinet today will revolutionise the tech world and significantly improve WiFi availability across the length and breath of India. It will further ‘Ease of Doing Business’ and ‘Ease of Living.’
— Narendra Modi (@narendramodi) December 9, 2020
2016 में सोचा गया, सालों तक रुका रहा
भारत में पब्लिक वाई-फाई की सोच PM-WANI के शुरू होने से पहले की है. शर्मा के अनुसार, ब्रॉडबैंड पहुंच बढ़ाने पर चर्चा 2015-16 में शुरू हुई थी. इसका ढांचा तैयार करने के लिए उन्होंने अपने पूर्व UIDAI सहयोगी प्रमोद वर्मा को साथ जोड़ा, जिन्होंने आधार के मुख्य आर्किटेक्ट के रूप में भी काम किया था.
उस समय भारत कॉल ड्रॉप और नेटवर्क की खराब गुणवत्ता जैसी समस्याओं से जूझ रहा था, जबकि मोबाइल डेटा भी महंगा था.
शर्मा ने कहा, “तब डेटा की कीमत 274 रुपये प्रति जीबी तक थी. आज यह 7 रुपये प्रति जीबी है, जो दुनिया में सबसे सस्ता है.”
योजना का उद्देश्य बिना लाइसेंस वाले वाई-फाई स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करके टेलीकॉम नेटवर्क का पूरक तैयार करना था, ताकि लोग कम कीमत में थोड़ी-थोड़ी मात्रा में इंटरनेट खरीद सकें. शर्मा के अनुसार, उस समय एयरपोर्ट और होटलों में मौजूद वाई-फाई हॉटस्पॉट का इस्तेमाल करने के लिए पहचान सत्यापित करने की प्रक्रिया काफी जटिल थी. इसलिए TRAI ने ऐसा सिस्टम प्रस्तावित किया जिसमें यूज़र को सिर्फ एक बार अपनी पहचान सत्यापित करनी हो और उसके बाद वह अलग-अलग नेटवर्क पर बिना किसी रुकावट के जुड़ सके.
उन्होंने याद करते हुए कहा, “डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े वे सारे सिद्धांत इसमें लागू किए गए थे.” इस ढांचे का कई कंपनियों के साथ परीक्षण किया गया. इसके बाद तत्कालीन दूरसंचार मंत्री मनोज सिन्हा ने 2017 में बेंगलुरु में इसका पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया. उसी साल TRAI ने अपनी सिफारिशें दूरसंचार विभाग (DoT) को सौंप दीं.
कम पेनेट्रेशन रेट, जो मुख्य रूप से बैकहॉल कॉस्ट की वजह से कम था, की वजह से ऐसी स्थिति पैदा हुई कि, छह साल बाद, हम ओरिजिनल टारगेट का पांच परसेंट से भी कम हासिल कर पाए.
—प्रशांतो के रॉय, डिजिटल पॉलिसी एक्सपर्ट
शर्मा के अनुसार, यह प्रस्ताव लगभग तीन साल तक अटका रहा क्योंकि टेलीकॉम कंपनियां इस विचार से खुश नहीं थीं और उनका दूरसंचार विभाग पर काफी प्रभाव था. उनका दावा है कि आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप के बाद यह गतिरोध टूटा, जिसके बाद 2020 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने PM-WANI ढांचे को मंजूरी दी. हालांकि, शर्मा का मानना है कि इसके कुछ ही समय बाद इस योजना की रफ्तार धीमी पड़ गई. कोविड-19 महामारी के कारण इसका लागू होना प्रभावित हुआ और उनके अनुसार, दूरसंचार विभाग ने भी इस योजना को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई.
वह देश जिसने वाई-फ़ाई छोड़ दिया
जब पब्लिक वाई-फाई का विचार पहली बार सामने आया था, तब इसे इंटरनेट पहुंच बढ़ाने का एक अहम साधन माना गया था. लेकिन 2020 में PM-WANI शुरू होने तक भारत का डिजिटल माहौल पूरी तरह बदल चुका था.
तकनीक विशेषज्ञ और डिजिटल नीति विश्लेषक प्रसांतो के. रॉय ने दिप्रिंट से कहा, “2000 के शुरुआती वर्षों से ही, जब वाई-फाई उपलब्ध हुआ, यह साफ था कि आखिरी व्यक्ति तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए वाई-फाई एक महत्वपूर्ण रास्ता बनने वाला है.”
लेकिन 3G और 4G के आने, और उसके बाद 5G शुरू होने से बाजार पूरी तरह बदल गया. PM-WANI के आधिकारिक तौर पर शुरू होने तक मोबाइल ब्रॉडबैंड पहले ही देशभर में फैल चुका था.
उन्होंने कहा, “पूरा माहौल बदल चुका था. 4G पहले ही बड़े पैमाने पर उपलब्ध था और फिर दो-तीन साल बाद 5G भी आ गया.”
दुनिया के कई देशों में इंटरनेट पहले फिक्स्ड ब्रॉडबैंड और वाई-फाई नेटवर्क के जरिए फैला और उसके बाद मोबाइल इंटरनेट आया. लेकिन भारत ने यह एक चरण लगभग छोड़ ही दिया. सस्ते स्मार्टफोन और दुनिया के सबसे कम मोबाइल डेटा शुल्क ने इंटरनेट को सीधे लोगों की जेब तक पहुंचा दिया. ऐसे में लोगों के पास पब्लिक वाई-फाई हॉटस्पॉट खोजने की बहुत कम वजह बची.
दिसंबर 2025 तक मोबाइल डेटा की कीमत 7.87 रुपये प्रति जीबी रह गई थी. इंटरनेट इतना सस्ता हो गया कि लोग इसे अब किसी दुर्लभ सुविधा की बजाय रोजमर्रा की बुनियादी सेवा की तरह देखने लगे.
रॉय ने कहा, “दस साल पहले अगर मैं देश में किसी भी होटल में जाता था, तो वाई-फाई ऐसी सुविधा थी जिसे मैं खास तौर पर पूछता था. आज मैं वाई-फाई के बारे में पूछता भी नहीं हूं, क्योंकि मोबाइल हॉटस्पॉट चालू करना ज्यादा आसान है.”
रॉय के अनुसार, PM-WANI का उम्मीद के मुताबिक सफल न हो पाना सिर्फ लोगों की बदलती आदतों की वजह से नहीं, बल्कि इस योजना की आर्थिक चुनौतियों की वजह से भी है.
उन्होंने कहा, “बैकहॉल की लागत ज्यादा होने के कारण इसकी पहुंच सीमित रही. नतीजा यह हुआ कि छह साल बाद भी हम मूल लक्ष्य का पांच प्रतिशत से भी कम हासिल कर पाए.” उन्होंने यह भी कहा कि बनाए गए 4.1 लाख हॉटस्पॉट में से सभी इस समय चालू हों, यह भी जरूरी नहीं है.
कई मायनों में, PM-WANI उसी डिजिटल क्रांति का शिकार बन गया, जिसे तेज़ करने के लिए इसे बनाया गया था.
‘इस योजना का आर्थिक मॉडल शुरू से ही कमजोर था’
PM-WANI योजना जिन मान्यताओं पर बनाई गई थी, वे ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खाती थीं.
रॉय ने कहा, “यह ढांचा इस सोच के साथ बनाया गया था कि स्थानीय दुकानदार और छोटे कारोबारी PDO बनेंगे, लेकिन इसका आर्थिक मॉडल शुरू से ही कमजोर था.”
दूरसंचार विभाग (DoT) ने शुरुआत में अनुमान लगाया था कि छोटे ऑपरेटरों के लिए सालाना ब्रॉडबैंड की लागत करीब 6,000 से 7,000 रुपये होगी. लेकिन हकीकत में कई पब्लिक डेटा ऑफिस एग्रीगेटर (PDOA) को टेलीकॉम कंपनियों ने सामान्य रिटेल ब्रॉडबैंड की दरों पर सेवा देने के बजाय व्यावसायिक संस्थान मानते हुए कमर्शियल लीज़्ड लाइन की दरों पर शुल्क लिया.
रॉय ने कहा, “इससे उनकी शुरुआती लागत लगभग 100 गुना बढ़ गई.”
उनका कहना था कि छोटे कारोबारी 5 या 10 रुपये के डेटा “सैशे” बेचकर कभी भी इतनी लागत की भरपाई नहीं कर सकते थे.
उन्होंने कहा, “आर्थिक रूप से यह मॉडल शुरू से ही असफल था. कागज पर जो आर्थिक गणना की गई थी, उसका ज़मीनी हकीकत से कोई मेल नहीं था.” उन्होंने यह भी कहा कि इस योजना को कभी भी किसी राष्ट्रीय मिशन की तरह गंभीरता से चलाया या उसकी नियमित समीक्षा नहीं की गई.
मोबाइल सेवाओं के 2G-3G दौर में PDOs उपयोगी हो सकते थे… लेकिन इन्हें 2020 के दशक में लागू किया गया, जब 4G डेटा हर जगह उपलब्ध था और डेटा की कीमत लगभग 10 रुपये प्रति GB थी.
—रिलायंस जियो का बयान
अब TRAI मॉडल पर भी उठा रहे हैं सवाल
PM-WANI शुरू होने के छह साल बाद, अब वही नियामक संस्था जिसने भारत के पब्लिक वाई-फाई का ढांचा तैयार किया था, यह पूछ रही है कि क्या आज के भारत की टेलीकॉम पहुंच को देखते हुए इस पूरी सोच को नए तरीके से तैयार करने की ज़रूरत है.
अपने परामर्श पत्र में TRAI ने बताया है कि अप्रैल 2026 तक भारत में PM-WANI के तहत केवल करीब 4.1 लाख हॉटस्पॉट ही लगाए गए थे. इस पत्र में यह भी देखा गया है कि दूसरे देशों ने मोबाइल ब्रॉडबैंड के साथ पब्लिक वाई-फाई का इस्तेमाल किस तरह पूरक व्यवस्था के रूप में किया है. इससे संकेत मिलता है कि भारत के सामने सवाल यह नहीं है कि पब्लिक वाई-फाई की उपयोगिता है या नहीं, बल्कि यह है कि अब यह कहां और किस तरह काम कर सकता है.
परामर्श पत्र में कहा गया है, “स्पष्ट नीतिगत मंशा और कई तरह के प्रयासों के बावजूद, वास्तविक विस्तार तय किए गए लक्ष्यों से काफी कम रहा. इसकी मुख्य वजह आखिरी छोर तक कनेक्टिविटी (लास्ट-माइल कनेक्टिविटी), बैकहॉल की उपलब्धता, अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी, व्यावसायिक रूप से टिकाऊ मॉडल का अभाव और मांग के लिहाज से असमान तैयारी जैसी चुनौतियां रहीं.”
इसमें यह भी कहा गया है कि राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों और निजी क्षेत्र की भागीदारी को और मजबूत करने की जरूरत है. साथ ही यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या मौजूदा मॉडल बड़े स्तर पर एक टिकाऊ व्यवस्था तैयार कर सकता है.
TRAI के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि फिलहाल संस्था सभी हितधारकों से मिले सुझावों का विश्लेषण कर रही है. इसके बाद वह केंद्र सरकार को अपनी सिफारिशें भेजेगी और अंतिम फैसला केंद्र सरकार ही लेगी.
एक अधिकारी ने कहा, “हमारा उद्देश्य ऐसे कई विकल्प तैयार करना है जो भारत की अलग-अलग तरह की कनेक्टिविटी जरूरतों को पूरा कर सकें.”
टेलीकॉम कंपनियों के हाल
PM-WANI की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक खुद टेलीकॉम इंडस्ट्री की प्राथमिकताएं थीं. इसकी मूल समस्या हितों के टकराव (कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट) से जुड़ी थी. टेलीकॉम कंपनियों से उम्मीद थी कि वे पब्लिक वाई-फाई के लिए बैकहॉल उपलब्ध कराएं, जबकि दूसरी तरफ वे अपने मोबाइल डेटा कारोबार के जरिए उसी से प्रतिस्पर्धा भी कर रही थीं.
रॉय के अनुसार, टेलीकॉम कंपनियां कम कीमत वाले बड़े स्तर के पब्लिक वाई-फाई नेटवर्क को दो कारणों से अपने लिए खतरा मानती थीं. पहला कारण था, जिसे उन्होंने “बैंडविड्थ आर्बिट्राज” कहा.
रिटेल ब्रॉडबैंड प्लान इस आधार पर बनाए जाते हैं कि एक परिवार उपलब्ध बैंडविड्थ का केवल एक हिस्सा ही इस्तेमाल करेगा. लेकिन अगर कोई दुकानदार उसी कनेक्शन से दर्जनों ग्राहकों को इंटरनेट देने लगे, तो टेलीकॉम कंपनियों को डर था कि यह बिना किसी नियमन के व्यावसायिक इंटरनेट सेवा का विस्तार बन जाएगा.
दूसरी चिंता यह थी कि इससे उनकी अपनी मोबाइल डेटा से होने वाली कमाई कम हो सकती है. इसलिए टेलीकॉम कंपनियों के पास बैकहॉल कनेक्टिविटी को सस्ता बनाने की कोई खास व्यावसायिक वजह नहीं थी.
या तो आप बेहतर सर्विस दें या सस्ती सर्विस. अगर दोनों में से कोई भी नहीं है, तो लोग इसे क्यों खरीदेंगे?
—ओसामा मंज़र, फ़ाउंडर, डिजिटल एम्पावरमेंट फ़ाउंडेशन
TRAI के परामर्श पत्र पर दिए गए उनके जवाबों में भी यही सोच दिखाई दी. सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI), भारती एयरटेल, वोडाफोन आइडिया और रिलायंस जियो ने कहा कि भारत उन देशों से बिल्कुल अलग है जहां पब्लिक वाई-फाई इंटरनेट कनेक्टिविटी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है, क्योंकि यहां सस्ता मोबाइल ब्रॉडबैंड पहले ही इंटरनेट का मुख्य माध्यम बन चुका है.
रिलायंस जियो ने माना कि रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और स्टेडियम जैसी जगहों पर पब्लिक वाई-फाई की अब भी भूमिका हो सकती है. लेकिन कंपनी का कहना था कि PM-WANI मॉडल ऐसे समय लागू किया गया जब बाजार की परिस्थितियां पहले ही बदल चुकी थीं. जियो की सबसे बड़ी आपत्ति इसी मॉडल को लेकर थी.
जियो ने लिखा, “मोबाइल सेवाओं के 2G-3G दौर में PDO उपयोगी हो सकते थे. लेकिन इसे 2020 के दशक में लागू किया गया, जब 4G डेटा हर जगह उपलब्ध था और डेटा की कीमत करीब 10 रुपये प्रति जीबी थी.”
COAI ने और भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि “पब्लिक वाई-फाई अपनी प्रासंगिकता खो चुका है.” उद्योग संगठन के अनुसार, ग्राहक “कम लागत, सुविधा और बेहतर सुरक्षा” के कारण मोबाइल डेटा को प्राथमिकता देते हैं. उसने बताया कि ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं की संख्या 2015 में 13.7 करोड़ से बढ़कर 2025 में 100 करोड़ से अधिक हो गई है. उसके मुताबिक, बड़े स्तर पर पब्लिक वाई-फाई बढ़ाने की जरूरत अब “काफी कमजोर पड़ गई है.”
वोडाफोन आइडिया और भारती एयरटेल ने भी कहा कि भारत मुख्य रूप से मोबाइल इंटरनेट पर निर्भर बाजार है, जहां सस्ते डेटा ने पहले ही लोगों की आदतें बदल दी हैं. उनके अनुसार, पब्लिक वाई-फाई का कम इस्तेमाल किसी नियामकीय कमी की वजह से नहीं, बल्कि लोगों की अपनी पसंद का नतीजा है.
कनेक्ट होने से पहले कई रुकावटें
दिल्ली के लाजपत नगर मार्केट में PM-WANI हर जगह भी दिखा और कहीं भी नहीं. PM-WANI के हॉटस्पॉट मैप के मुताबिक, पूरे बाजार में सैकड़ों हॉटस्पॉट मौजूद थे. इनमें से कई तो एक-दूसरे से कुछ ही मीटर की दूरी पर दिखाए गए थे. लेकिन ज़मीन पर दुकानदारों ने बताया कि उन्हें इस नेटवर्क के बारे में बहुत कम या बिल्कुल जानकारी नहीं थी. ऐप पर आसपास हॉटस्पॉट दिखाई दे रहे थे, लेकिन वास्तव में काम करने वाला कनेक्शन ढूंढना कहीं ज्यादा मुश्किल था.

यूज़र के इंटरनेट से जुड़ने से पहले ही कई चरण पूरे करने पड़ते हैं—PM-WANI ऐप डाउनलोड करना, एक बार मोबाइल नंबर का सत्यापन करना, डेटा पैक खरीदना और फिर हॉटस्पॉट से जुड़ना. इसके बाद भी काम करने वाला हॉटस्पॉट ढूंढना अपने आप में एक चुनौती हो सकता है. इसके मुकाबले मोबाइल डेटा चालू करना कहीं ज्यादा आसान है.
रॉय ने कहा, “अगर आप यूरोप या चीन के कई हिस्सों में जाएं, तो वहां बसों या बाजारों में मुफ्त पब्लिक वाई-फाई से आसानी से जुड़ सकते हैं.”
लेकिन भारत में पब्लिक वाई-फाई के साथ लंबे समय से OTP के जरिए पहचान सत्यापित करना और दूसरे नियमों का पालन करना जरूरी रहा है. यह उन लोगों के लिए बड़ी समस्या है जिनके पास स्थानीय सिम कार्ड नहीं है. रॉय का कहना है कि विडंबना यह है कि जिन लोगों को पब्लिक वाई-फाई से सबसे ज्यादा फायदा हो सकता है—जैसे यात्री, प्रवासी और कभी-कभार इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोग—उन्हें ही इसका इस्तेमाल करने में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है, यहां तक कि एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों पर भी.
यह समस्या तब भी बनी हुई है, जबकि PM-WANI का मूल ढांचा इस तरह बनाया गया था कि अलग-अलग नेटवर्क पर बिना रुकावट आसानी से कनेक्ट हो सके. अब TRAI पासपॉइंट (Passpoint) और ओपनरोमिंग (OpenRoaming) जैसी तकनीकों पर विचार कर रहा है, ताकि मोबाइल नेटवर्क जैसा अनुभव मिल सके और यूज़र को बार-बार अपनी पहचान सत्यापित किए बिना अपने आप नेटवर्क से जोड़ा जा सके.
लेकिन ऐसे समय में, जब मोबाइल इंटरनेट आसानी से उपलब्ध है और बहुत सस्ता भी है, पब्लिक वाई-फाई इस्तेमाल करने के लिए हर अतिरिक्त कदम लोगों के लिए इसे न इस्तेमाल करने की एक और वजह बन जाता है.
TRAI के पूर्व चेयरमैन राम सेवक शर्मा के लिए, इसके मायने सिर्फ़ कनेक्टिविटी से कहीं ज़्यादा हैं. वे PM-WANI को रिलायंस जियो और भारती एयरटेल के दबदबे वाले टेलीकॉम मार्केट में बढ़ते एकाधिकार के एक संभावित काउंटर-वेट (संतुलन बनाने वाले उपाय) के तौर पर देखते हैं.
‘कनेक्टिविटी खुद कोई उत्पाद नहीं है’
पब्लिक वाई-फाई तभी सफल होता है, जब लोग उसका इस्तेमाल किसी और काम के लिए करते हैं. डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन (DEF) के संस्थापक ओसामा मंज़र के अनुसार, यही PM-WANI की सबसे बड़ी कमजोरी है.
मंज़र ने कहा, “आप सिर्फ कनेक्टिविटी नहीं बेच सकते. कनेक्टिविटी खुद बिकने वाला उत्पाद नहीं है. यह एक सहायक या अतिरिक्त सुविधा है. यह वह बुनियादी ढांचा है, जो दूसरी सेवाओं को चलाने में मदद करता है.”
जिन जगहों पर PDO के काम करने की उम्मीद थी, वहां लोगों के पास पहले से ही मोबाइल इंटरनेट उपलब्ध था.
उन्होंने कहा, “ऐसे में या तो आपको बेहतर सेवा देनी होगी, या फिर सस्ती. अगर दोनों में से कोई भी बात नहीं है, तो लोग इसे क्यों खरीदेंगे?”
मंज़र ने कहा कि वाई-फाई सबसे अच्छा तब काम करता है, जब वह किसी बड़े सिस्टम का हिस्सा हो. उन्होंने कैफे का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे वहां कॉफी की कीमत में इंटरनेट शामिल होता है, वैसे ही कनेक्टिविटी भी एक सुविधा होनी चाहिए, न कि मुख्य उत्पाद. DEF ने दूर-दराज़ के इलाकों में PM-WANI नेटवर्क लगाते समय कनेक्टिविटी का इस्तेमाल आधार केंद्रों, कॉमन सर्विस सेंटर (CSC), बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट केंद्रों और दूसरे सामाजिक उद्यमों को चलाने के लिए किया.
उन्होंने कहा, “ये सेवाएं कनेक्टिविटी के बिना चल ही नहीं सकतीं. इसलिए हम इसे पहले से ही व्यवस्था का हिस्सा बनाकर देते हैं.”
मंज़र के अनुसार, यही अंतर बताता है कि कुछ जगहों पर यह व्यवस्था टिक पाई, जबकि कई व्यावसायिक मॉडल सफल नहीं हो सके.

जिन संस्थानों को PM-WANI ने नजरअंदाज कर दिया
मंज़र का कहना है कि PCO मॉडल को दोबारा बनाने की कोशिश करने के बजाय PM-WANI को उन संस्थानों के आसपास बनाया जाना चाहिए था, जो पहले से ही लोगों की सेवा कर रहे हैं.
उनके अनुसार, स्कूल, पंचायत भवन, जिला पुस्तकालय, कॉलेज, स्वयं सहायता समूह (Self-Help Groups) और स्वास्थ्य केंद्र ऐसे प्रमुख संस्थान बन सकते थे और PDOA की भूमिका निभा सकते थे.
मंज़र ने कहा, “उन्हें कहना चाहिए था, ‘आपको इसकी खुद भी जरूरत है. तो आप ही PDOA क्यों नहीं बन जाते?’ अगर आप सिर्फ इंटरनेट उपलब्ध करा रहे हैं, लेकिन उसका इस्तेमाल करने के लिए कोई व्यवस्था ही नहीं है, तो इंटरनेट आगे नहीं बढ़ेगा. न तो यह बुनियादी ढांचा टिकेगा और न ही वह संस्थान.”
उनके अनुसार, PDOA के सामने तीन बड़ी चुनौतियां थीं.
पहली चुनौती थी पूंजी.
मंज़र ने कहा, “उन्हें इतने पैसे चाहिए थे कि वे लंबे समय तक होने वाले नुकसान को सहन कर सकें. स्टार्टअप की तरह वे स्थानीय स्तर पर इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) बन रहे थे. लेकिन ज्यादातर लोगों के पास इतनी आर्थिक क्षमता नहीं थी.”
दूसरी चुनौती थी बैकहॉल कनेक्टिविटी तक पहुंच.
उन्होंने कहा कि बड़ी इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) कंपनियां भी इस मॉडल का समर्थन करने में हिचकिचा रही थीं, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उनके अपने ग्राहक कम न हो जाएं.
तीसरी चुनौती थी पैमाना.
उन्होंने कहा कि कई ग्रामीण इलाकों और टियर-3 व टियर-4 शहरों में एक ही जगह पर इतने ज्यादा ग्राहक नहीं थे कि यह मॉडल आर्थिक रूप से सफल हो सके.
उन्होंने कहा, “PDOA के सफल होने के लिए जरूरी है कि एक जगह पर बड़ी संख्या में ग्राहक हों. लेकिन ज्यादातर गांवों और टियर-3 व टियर-4 शहरों में ऐसी स्थिति नहीं थी.”
नतीजतन, PDO और PDOA दोनों के लिए स्थायी आय कमाना मुश्किल हो गया. मंज़र के अनुसार, कई बार गांवों में बैंडविड्थ की लागत शहरों से भी ज्यादा हो जाती थी, जिससे इस योजना का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ गया.
भारतनेट और PM-WANI के बीच संबंध नहीं बन पाया
डिजिटल पहुंच बढ़ाने का साझा उद्देश्य होने के बावजूद, भारतनेट और PM-WANI लगभग अलग-अलग परियोजनाओं की तरह आगे बढ़े. 2012 में शुरू हुई भारतनेट योजना के तहत करीब 2.5 लाख ग्राम पंचायतों तक फाइबर कनेक्टिविटी पहुंचाई गई है. PM-WANI जहां बैकहॉल के लिए निजी टेलीकॉम कंपनियों पर निर्भर है, वहीं भारतनेट सरकार के स्वामित्व वाला फाइबर नेटवर्क उपलब्ध कराता है, जो पब्लिक वाई-फाई के लिए एक मजबूत आधार बन सकता था.
शर्मा का कहना है कि भारतनेट के विस्तार के साथ PM-WANI की जरूरत और बढ़ गई है. उनके अनुसार, भारतनेट पर लगभग 42,000 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो आधार पर खर्च हुए करीब 8,000 करोड़ रुपये से कहीं ज्यादा है. लेकिन इस निवेश पर मिलने वाला लाभ (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) शून्य है.
उनका कहना है कि भारतनेट के फाइबर नेटवर्क को PM-WANI की आखिरी छोर तक इंटरनेट पहुंचाने वाली व्यवस्था (लास्ट-माइल आर्किटेक्चर) के साथ जोड़कर पूरे देश में पब्लिक इंटरनेट का नेटवर्क बनाया जा सकता था.
उन्होंने कहा, “भारतनेट और PM-WANI का आपस में मेल कराया जा सकता है.”
मंज़र ने भी ऐसा ही सवाल उठाया. उनका कहना था कि अगर PM-WANI को आखिरी छोर तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए सरकार समर्थित ढांचे के रूप में बनाया गया था, तो फिर शुरुआत से ही भारतनेट और BSNL को इसमें और गहराई से क्यों नहीं जोड़ा गया?
उनके अनुसार, ग्राम पंचायतों तक कनेक्टिविटी पहुंचाने के लिए बनाई गई भारत ब्रॉडबैंड नेटवर्क लिमिटेड (BBNL) PM-WANI की स्वाभाविक साझेदार हो सकती थी.
उन्होंने कहा, “जहां भी हमने PM-WANI का इस्तेमाल किया, वहां सबसे पहले BSNL का इस्तेमाल किया. कई जगह एयरटेल की सेवा उपलब्ध ही नहीं थी, इसलिए BSNL वहां बेहतर काम करता था.” उन्होंने बताया कि आज DEF स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार BSNL और एयरटेल, दोनों का इस्तेमाल करता है.
लेकिन बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है. ग्रामीण भारत तक फाइबर नेटवर्क पहुंचाने पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए, फिर भी उस कनेक्टिविटी को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए जिस व्यवस्था की जरूरत थी, वह पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी.
क्या PM-WANI को अब भी बचाया जाना चाहिए?
PM-WANI के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती लोगों को इंटरनेट से जोड़ना नहीं है. असली चुनौती यह है कि लोगों के पास पब्लिक वाई-फाई इस्तेमाल करने की कोई वजह बचे.
रॉय ने कहा कि इस दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है. उनके अनुसार, हाल में बनाए गए टैरिफ नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि इंटरनेट सेवा प्रदाता (ISP) PDO से कमर्शियल लीज़्ड लाइन के नाम पर बहुत ज्यादा शुल्क न वसूलें.
उन्होंने कहा, “हालांकि छोटे दुकानदार के लिए यह अब भी महंगा है, लेकिन इससे कमर्शियल लीज़्ड लाइन की तुलना में 50 से 100 गुना ज्यादा लागत वाली समस्या खत्म हो जाती है.”
शर्मा के लिए यह मुद्दा सिर्फ इंटरनेट कनेक्टिविटी तक सीमित नहीं है. उनका मानना है कि PM-WANI तेजी से कुछ कंपनियों तक सीमित होते जा रहे टेलीकॉम बाजार में संतुलन बनाने का काम कर सकता है, जहां रिलायंस जियो और भारती एयरटेल का दबदबा है.
उन्होंने कहा, “वरना हमारे पास सिर्फ दो ऑपरेटर, एयरटेल और जियो रह जाएंगे और वे प्रभावी रूप से दो कंपनियों का बाजार (डुओपॉली) बना देंगे. फिर वे लगातार कीमतें बढ़ाते रहेंगे.”
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