विदेश मंत्रालय के इस बयान पर इतनी तेज़ प्रतिक्रिया कि “पासपोर्ट एक यात्रा का दस्तावेज़ है, नागरिकता का दस्तावेज़ नहीं”, यह दिखाती है कि जनता अब नरेंद्र मोदी सरकार के अपने अधिकारों पर हमलों से तंग आ चुकी है. हालांकि विदेश मंत्रालय की बात तकनीकी रूप से सही है, लेकिन यह बताती है कि कैसे इस बिना रोक-टोक और बिना संतुलन वाली सरकार ने जवाबदेही का बोझ लोगों पर डाल दिया है, और हर जगह मनमानी और तानाशाही को बढ़ावा दिया है.
मोदी सरकार ने लगातार ऐसी एक श्रेणी बनाने की कोशिश की है जो हमेशा अनिश्चितता में जीती रहे. उन्हें सिर्फ़ कम से कम सरकारी मदद के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी पहचान और अपने अस्तित्व की मान्यता के लिए भी सरकार पर निर्भर रहना पड़े. नागरिकों को प्रजा में बदलने के लिए, नागरिकता, स्थिरता और उस सुरक्षित अपनापन की भावना पर हमला करना पड़ता है जिसकी लोगों को अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ज़रूरत होती है. इसकी तुलना यूपीए की अधिकार आधारित सोच से कीजिए, चाहे वह शिक्षा हो, रोज़गार हो या वोट देने का अधिकार.
याद कीजिए असम का नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स (NRC), जिसने 19 लाख लोगों – हिंदू और मुसलमान – को कानूनी अनिश्चितता में छोड़ दिया, जो आज भी जारी है. या फिर नागरिकता संशोधन कानून (CAA), जो धर्म के आधार पर दो तरह की नागरिकता का संकेत देता है. या पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR), जिसमें 27 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया, जबकि उनके पास वोटर सूची में बने रहने के लिए ज़रूरी दस्तावेज़ थे, सिर्फ़ नए बनाए गए ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसीज़’ वाले वर्ग के कारण. दिलचस्प बात यह है कि SIR के कारण हटाए गए लोगों की संख्या, 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में हुए 14.8 प्रतिशत वोट बदलाव का एक बड़ा हिस्सा है.
नागरिकता, आखिरकार, भारतीय होने की सबसे बुनियादी पहचान है. यही वह “अधिकार पाने का अधिकार” है, यानी राजनीतिक समुदाय का एक वैध सदस्य होना, बुनियादी अधिकारों का हक़दार होना और सत्ता के मनमाने इस्तेमाल से सुरक्षित रहना. मोदी सरकार के वर्षों में, इस बुनियादी सोच को काफ़ी कमज़ोर कर दिया गया है.
उदाहरण के लिए, मनरेगा (अब VB-G RAM G) के तहत काम की मज़दूरी पाने के लिए, ग़रीब मज़दूरों को डिजिटल फेस रिकग्निशन स्कैन और आधार के बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट मिलान को सफलतापूर्वक पास करना पड़ता है. लेकिन सर्वर बंद होना या नेटवर्क ठीक से न चलना जैसी सिस्टम की दिक्कतें उन्हें अक्सर अनुपस्थित या सत्यापित नहीं दिखाती हैं, जिससे उनकी मेहनत की कमाई छिन जाती है. जो लोग रजिस्ट्रेशन नहीं कर पाते, उन्हें या तो सूची से हटा दिया जाता है या वे काम के लिए नाम नहीं लिखवा पाते, और ऐसे लोग मनरेगा के कुल मज़दूरों का 27 प्रतिशत तक हैं. अब सैटेलाइट की तस्वीरें तय करती हैं कि किसी आदिवासी का जंगल पर अधिकार माना जाए या नहीं, जबकि कानून के अनुसार यह सिर्फ़ एक अतिरिक्त मदद होनी चाहिए. काम को बेहतर बनाने के बजाय, बायोमेट्रिक्स और तकनीक पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता ने लाखों लोगों को कमज़ोर किया है और सरकारी जवाबदेही को घटा दिया है.
मोदी के खिलाफ गुस्सा दिख रहा है
अगर आपको लगता है कि यह बनाई गई अफरा-तफरी सिर्फ़ ग़रीबों को प्रभावित करती है, तो फिर से सोचिए. अख़बार के पूर्व संपादक आर. राजगोपाल उन 27 लाख लोगों में से एक थे जिन्हें ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसीज़’ के कारण पश्चिम बंगाल चुनाव में वोट देने का अधिकार नहीं मिला. क्योंकि उनका नाम सूची में नहीं था, पुलिस ने उनके पासपोर्ट रिन्यूअल आवेदन की जांच में देरी कर दी, जिससे वह अमेरिका में अपनी बेटी की शादी में शामिल नहीं हो सके.
यह देरी तब हुई, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा था कि वोटर सूची से नाम हट जाना “सख्ती से देखें तो नागरिकता तय करने के बराबर नहीं है” और इसके बाद होने वाली कोई भी कार्रवाई “सिर्फ़ चुनाव से जुड़े नतीजों तक सीमित रहनी चाहिए”. फैसले में यह भी कहा गया कि “नागरिकता में पहचान, अपनापन और कानूनी व्यक्तित्व जैसे पहलू शामिल होते हैं”, जो सिर्फ़ वोट देने के अधिकार से कहीं आगे जाते हैं.
मोदी सरकार की सबसे बड़ी पहचान यह रही है कि वह हर चीज़ को आपातकाल जैसी स्थिति बताकर अपने फायदे के फैसलों को सही ठहराती है. नोटबंदी को याद कीजिए, उससे आम लोगों को कितना दर्द हुआ, कितनी ज़िंदगियां बिखर गईं, और बदले में जनता को क्या मिला. कुछ भी नहीं.
और इसलिए, बिना किसी रोक-टोक और बिना संतुलन वाली यह सरकार यह नहीं मानती कि उसकी अपने नागरिकों के प्रति कोई ज़िम्मेदारी है. बल्कि, यह सरकार टकराव पैदा करके और विरोध करने वालों को देश विरोधी बताकर आगे बढ़ती है. मोदी सरकार हमें हमेशा यह बताती रहती है कि हम बहुत बड़े ख़तरे में हैं, विदेशी साज़िश और देश के अंदर के दुश्मनों से घिरे हुए हैं. और ये ‘दुश्मन’ कौन हैं? किसान, मुसलमान, वे लोग जो चाहते हैं कि जनगणना में OBC की गिनती हो, और अब छात्र यानी, हम सब.
अब सबसे नया ‘दुश्मन’ है ‘घुसपैठिया’. यूपीए सरकार ने कानून के तहत बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के साथ मिलकर लगभग 90,000 अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजा था.
वहीं, गृह मंत्री अमित शाह के तहत मोदी सरकार ने इसके मुकाबले बहुत ही कम लोगों को वापस भेजा है, और उनमें भी कई मामलों में गैरकानूनी तरीके से सीमा पार धकेलने की कार्रवाई हुई, जिसमें गलत पहचान की घटनाएं भी बहुत ज़्यादा रहीं. मोदी सरकार की दिलचस्पी अवैध घुसपैठ की समस्या को हल करने में कम है, जो उस समय की विरासत है जब बांग्लादेश भारत से बहुत ज़्यादा ग़रीब था, और चुनावी फायदा लेने के लिए ध्रुवीकरण और इशारों में राजनीति करने में ज़्यादा है.
यह सब तब तक चलता है, जब तक चलना बंद नहीं हो जाता. सोशल मीडिया पर खुद मोदी, उनकी दिखावटी शान और उनकी हगप्लोमेसी के खिलाफ़ बढ़ती नाराज़गी को देखिए. रद्द हुई परीक्षाओं और नौकरियों की कमी को लेकर युवाओं में गुस्सा और निराशा सबके सामने है. चुनावी तानाशाही में कुछ भी तय नहीं होता, लेकिन अब आज्ञाकारी प्रजा की जगह अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले नागरिकों की मज़बूत लहर साफ़ दिखाई देने लगी है.
अमिताभ दुबे कांग्रेस के सदस्य हैं. वे @dubeyamitabh पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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